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आपराधिक कानून

पहले से अभिरक्षा में रह रहे अभियुक्त की द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी है

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 05-Oct-2026

मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"अभिरक्षा में रहते हुए द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी।" 

न्यायमूर्ति मनीष माथुर  

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मनीष माथुर ने मोती राम जाट उर्फ मोती राम जाट फौजी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। उन्होंने माना कि किसी ऐसे अभियुक्त की औपचारिक गिरफ्तारी, जो पहले से ही किसी पुराने मामले में रिमांड में है, एक नई गिरफ्तारी है, इसलिये गिरफ्तारी के आधार पर सांविधानिक सुरक्षा उपाय इस पर लागू होते हैं। यद्यपि, याचिका खारिज कर दी गई, क्योंकि रिमांड को चुनौती विचारण के शुरू होने के बाद दी गई थी। 

मोती राम जाट बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अभियुक्त को पहले से दर्ज एक FIR के सिलसिले में अभिरक्षा में लिया गया था। 
  • इसके बाद आतंकवाद-विरोधी दस्ता (ATS) ने एक अन्य मामले में प्रोडक्शन वारण्ट के माध्यम से उसकी पेशी की मांग की। वह मामला भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 148, 152 और 61(2) के अधीन दर्ज किया गया था। 
  • बाद वाले मामले में उन्हें औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया और न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया।  
  • अभियुक्त ने उच्च न्यायालय में रिमांड आदेश को चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि: 
    • न तो उन्हें और न ही उनके परिवार के सदस्यों को उनकी गिरफ्तारी का कारण बताया गया। 
    • इससे अनुच्छेद 22(1) के अधीन उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन हुआ है, इसलिये रिमांड आदेश को अपास्त किया जाना चाहिये। 
  • राज्य ने इस याचिका का विरोध किया। उसने तर्क दिया कि: 
    • बाद में रिमांड आदेश पारित होने के समय अभियुक्त पहले से ही अभिरक्षा में था। 
    • तो यह केवल अभिरक्षा में परिवर्तन था, नई गिरफ्तारी नहीं। 
    • इसलिये अनुच्छेद 22(1) या संबंधित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रावधानों का अनुपालन करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या द्वितीय गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी? 

  • न्यायालय ने धनराज अश्वानी बनाम अमर एस. मुलचंदानी के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया। उस निर्णय में, उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि एक मामले में अभिरक्षा में लिये गए व्यक्ति को पहले मामले में अभिरक्षा में रहते हुए ही दूसरे मामले में औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया जा सकता है। इसके बाद, उसे संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने के लिये बंदी पारगमन (PT) वारण्ट प्राप्त किया जा सकता है।  
  • इस सिद्धांत को लागू करते हुए, उच्च न्यायालय ने माना कि द्वितीय गिरफ्तारी या अभिरक्षा को पिछली गिरफ्तारी की निरंतरता नहीं माना जा सकता। यह एक नई गिरफ्तारी है। 
  • इसलिये, बाद के किसी मामले में औपचारिक गिरफ्तारी केवल अभिरक्षा में परिवर्तन नहीं है। 

अनुच्छेद 22(1) और धारा 48(2) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की प्रयोज्यता पर: 

  • चूँकि बाद की गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी है, इसलिये संविधान के अनुच्छेद 22(1) के अधीन सुरक्षा उपायों का पालन किया जाना चाहिये, जिसे भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48(2) के साथ पढ़ा जाना चाहिये। 
  • गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार संविधान के भाग 3 के अंतर्गत एक मौलिक अधिकार है। 

विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य के मामले पर आधारित: 

  • गिरफ्तारी के कारणों को इस प्रकार संप्रेषित किया जाना चाहिये जिससे गिरफ्तार व्यक्ति को उससे जुड़े बुनियादी तथ्यों की पर्याप्त जानकारी मिल सके। यह जानकारी उसे समझ में आने वाली भाषा में दी जानी चाहिये। 
  • यदि अभियुक्त अनुपालन पर विवाद करता है, तो अन्वेषण अधिकारी या एजेंसी को यह साबित करना होगा कि अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन किया गया था। 
  • अनुच्छेद 22(1) का अनुपालन न करने पर गिरफ्तारी और उसके परिणामस्वरूप जारी किये गए रिमांड आदेश अमान्य हो जाते हैं। 
  • यद्यपि, इससे अन्वेषण, आरोप पत्र या विचारण की वैधता समाप्त नहीं होती। आरोप पत्र दाखिल करने से सांविधानिक आवश्यकता का भंग भी दूर नहीं होता। 
  • गिरफ्तारी के कारणों को गिरफ्तार व्यक्ति के मित्रों, रिश्तेदारों या उसके द्वारा नामित व्यक्तियों के साथ भी साझा किया जाना चाहिये, जिससे वे विधिक रूप से उचित होने पर उसकी रिहाई सुनिश्चित करने के लिये त्वरित विधिक कदम उठा सकें। 

जिस मंच पर इस प्रकार की चुनौती उठाई जा सकती है: 

  • न्यायालय ने माना कि विहान कुमार में चर्चा की गई अनुच्छेद 22(1) सुरक्षा उपाय धारा 167 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन प्रारंभिक गिरफ्तारी और रिमांड के चरण में लागू होते हैं।  
  • एक बार धारा 190 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन संज्ञान ले लिया गया हो, और धारा 204 और 207 दण्ड प्रक्रिया संहिता का अनुपालन कर लिया गया हो, तो उन सुरक्षा उपायों का उपयोग मूल निरोध को चुनौती देने के लिये नहीं किया जा सकता है। 
  • इस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका था, संज्ञान लिया जा चुका था और विचारण शुरू हो चुका था। इसलिये प्रारंभिक निरोध और रिमांड को चुनौती देने पर विचार नहीं किया जा सकता था। 

निष्कर्ष 

  • विधिक स्थिति: किसी अन्य मामले में पहले से ही अभिरक्षा में लिये गए अभियुक्त की औपचारिक गिरफ्तारी एक नई गिरफ्तारी मानी जाएगी। संविधान के अनुच्छेद 22(1) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48(2) का अनुपालन अनिवार्य है। 
  • परिणाम: याचिका खारिज कर दी गई, क्योंकि गिरफ्तारी और रिमांड को चुनौती विचारण की शुरुआत के बाद उठाई गई थी। 

भारत के संविधान का अनुच्छेद 22(1) क्या है? 

बारे में: 

  • अनुच्छेद 22 कुछ मामलों में गिरफ्तारी और निरोध से सुरक्षा प्रदान करता है। यह भाग 3 (मौलिक अधिकार) के अंतर्गत आता है। 
  • अनुच्छेद 22(1) के अधीन, गिरफ्तार किये गए किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधारों की सूचना यथाशीघ्र दिये बिना अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं किया जा सकता।  
  • गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के कानूनी सलाहकार से परामर्श करने और उसके द्वारा बचाव किए जाने के अधिकार से भी वंचित नहीं किया जा सकता है।   

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 48 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 48 के अधीन गिरफ्तारी करने वाले व्यक्ति पर यह दायित्व है कि वह दूसरों को गिरफ्तारी और गिरफ्तार व्यक्ति को कहाँ रखा जा रहा है, इसकी जानकारी दे। 
  • यह उपबंध पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता (1973) की धारा 50क के अंतर्गत आता था। 
  • गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के कारणों की सूचना देने का कर्त्तव्य स्वयं भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 47 में निहित है। यह पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 50 थी।  

मुख्य उपबंध: 

  • 48(1): गिरफ्तारी करने वाले पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति को गिरफ्तारी और निरोध के स्थान के बारे में जानकारी तुरंत निम्नलिखित के साथ साझा करनी होगी: 
    • गिरफ्तार व्यक्ति द्वारा बताए गए या नामित नातेदार, मित्र या अन्य व्यक्ति, और 
    • जिले में नामित पुलिस अधिकारी। 
  • 48(2): पुलिस अधिकारी को गिरफ्तार व्यक्ति को पुलिस थाने लाए जाने के तुरंत बाद इस अधिकार के बारे में सूचित करना होगा।  
  • 48(3): पुलिस थाने में रखी गई एक किताब में यह अभिलिखित किया जाना चाहिये कि गिरफ्तारी की सूचना किसे दी गई थी। 
  • 48(4): जिस मजिस्ट्रेट के समक्ष गिरफ्तार व्यक्ति को पेश किया जाता है, उसे यह जांच करनी चाहिये कि इन आवश्यकताओं का अनुपालन किया गया है।