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पारिवारिक कानून

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13(1)(iक)

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 07-Oct-2026

ए. बनाम एस. (2026) 

"विवाह को केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता ।" 

न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति 

स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की पीठ ने ए. बनाम एस. (2026) के मामले का निर्णय दिया। न्यायालय ने माना कि संतानोत्पत्ति की अक्षमता को पत्नी की वैवाहिक त्रुटि नहीं माना जा सकता और निःसंतानता अपने आप में क्रूरता नहीं है। न्यायालय ने यह भी माना कि पत्नी की कठिन प्रजनन उपचार कराने की इच्छा विवाह को बनाए रखने के उसके आशय को दर्शाती है। न्यायालय ने पति की अपील खारिज कर दी और कुटुंब न्यायालय के तलाक से इंकार करने के आदेश को बरकरार रखा। 

ए. बनाम एस. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • दोनों पक्षकारों ने 2007 में विवाह किया था। 
  • पति का दावा था कि विवाह के पहले छह महीने शांतिपूर्ण रहे, जिसके बाद पत्नी का रवैया बदल गया। उसने क्रूरता के आधार पर तलाक की मांग की और आरोप लगाया कि: 
    • पत्नी अपने परिवार को उसके परिवार से श्रेष्ठ मानती थी और उसके और उसके परिवार के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां करती थी। 
    • जब भी वह दफ्तर से देर से घर आता था, तो वह बिना किसी कारण के उस पर संदेह करती थी और उस पर जानबूझकर घर से बाहर रहने का आरोप लगाती थी। 
    • दंपति की कोई संतान नहीं थी, और इलाज के बाद भी पत्नी गर्भवती नहीं हुई। 
    • एक बार उसने सार्वजनिक रूप से उसे अपशब्द कहे, उसे नपुंसक कहा, जूतों से उस पर हमला किया, अपनी थाली निकालकर उस पर फेंक दी और फिर अपने मायके चली गई। 
    • उसने वैवाहिक घर लौटने से इंकार कर दिया। 
  • पत्नी ने सभी आरोपों से इंकार किया और दावा किया कि: 
    • पति को शराब पीने की आदत थी, और पत्नी ने केवल उसके नशे में गाड़ी चलाकर घर आने पर आपत्ति जताई थी। 
    • वह अपने पति को बताए बिना कभी भी ससुराल से बाहर नहीं जाती थी। पति खुद भी काम के सिलसिले में यात्रा करते समय उसे उसकी बहन के घर छोड़ जाता था। 
    • उसने कभी भी उसके साथ दुर्व्यवहार या शारीरिक मारपीट नहीं की। 
    • उसकी सर्जरी हुई थी और उसका इलाज चल रहा था। संतानहीनता का कारण वैवाहिक जीवन से उनका जानबूझकर इंकार करना नहीं था। 
  • कुटुंब न्यायालय ने विवाह-विच्छेद की याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने पाया कि: 
    • पति के आरोपों का कोई सबूत नहीं मिला। 
    • पत्नी का इलाज चल रहा था, और इस बात का कोई पुख्ता सबूत नहीं था कि वह स्थायी रूप से बच्चे को जन्म देने में असमर्थ हो गई थी। 
  • पति ने उच्च न्यायालय में अपील की। ​​उसने तर्क दिया कि: 
    • कुटुंब न्यायालय ने स्वतंत्र पुष्टि के अभाव पर अनुचित बल दिया था। 
    • वैवाहिक क्रूरता सामान्यतः घर की चारदीवारी के भीतर होती है और इसे स्वतंत्र प्रत्यक्षदर्शियों या पुलिस परिवाद के माध्यम से साबित नहीं किया जा सकता है। 
    • न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या पति ने क्रूरता साबित कर दी थी, और क्या निःसंतानता को पत्नी की वैवाहिक त्रुटि माना जा सकता है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

संतानहीनता और विवाह के उद्देश्य पर: 

  • दंपतियों की संतानोत्पत्ति में असमर्थता को, अपने आप में, पत्नी की वैवाहिक त्रुटि में परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। 
  • विवाह को केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता। 
  • किसी दंपति के संतान न होने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि उनका वैवाहिक संबंध असफल रहा है। 

पत्नी के प्रजनन उपचार के बारे में: 

  • पत्नी को फाइब्रॉइड (fibroids) की समस्या थी और उसने इसका इलाज करवाया था। 
  • इस उपचार में शारीरिक असुविधा, बार-बार चिकित्सा प्रक्रियाएं, भावनात्मक अनिश्चितता और काफी व्यक्तिगत तनाव शामिल था। 
  • इस प्रकार के उपचार से गुजरने की उसकी इच्छा को क्रूरता के समान आचरण नहीं माना जा सकता। 
  • इसके विपरीत, इससे यह पता चलता है कि उसने विवाह को नहीं छोड़ा था और वह इसे बनाए रखने का आशय रखती थी। 
  • जो व्यक्ति वैवाहिक जीवन को त्यागने का आशय रखता है, वह सामान्यतः इसे पुनः आरंभ करने की इच्छा व्यक्त नहीं करेगा। 

क्रूरता के सबूत मिलने पर: 

  • क्रूरता का आकलन वैवाहिक संबंध को समग्र रूप से देखकर किया जाना चाहिये, न कि किसी कठोर या यांत्रिक सूत्र को लागू करके। 
  • यद्यपि, नासाबित आरोप स्वतः ही साबित क्रूरता नहीं बन जाते। 
  • उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यद्यपि आचरण का संचयी प्रभाव सुसंगत है, फिर भी उस आचरण को गठित करने वाले मूलभूत तथ्यों को स्थापित किया जाना चाहिये। 
  • इस मामले में पति अपने द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोपों को साबित करने में असफल रहा। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के आदेश में कोई कमी नहीं पाई और पति की अपील खारिज कर दी। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iक) क्या है? 

बारे में: 

  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 में उन आधारों की सूची दी गई है जिन पर पति या पत्नी में से कोई भी विवाह-विच्छेद की डिग्री की मांग सकते है।  
  • धारा 13(1) का खंड (iक) पति या पत्नी को तलाक लेने की अनुमति देता है यदि दूसरे पक्ष ने विवाह के बाद याचिकाकर्त्ता के साथ क्रूरता का व्यवहार किया हो । 
  • यह खंड विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़ा गया था। उस संशोधन से पहले, क्रूरता केवल धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण का आधार थी, और क्रूरता ऐसी होनी चाहिये थी जिससे नुकसान की उचित आशंका उत्पन्न हो। 
  • अधिनियम में इसकी परिभाषा नहीं दी गई है; न्यायालयों ने न्यायिक निर्वचन के माध्यम से इसका अर्थ विकसित किया है। 

क्रूरता के प्रकार: 

प्रकार 

अर्थ  

शारीरिक क्रूरता 

पति/पत्नी के प्रति हिंसात्मक कृत्य या शारीरिक क्षति पहुँचाने वाले कृत्य। 

मानसिक क्रूरता 

ऐसा आचरण जिससे मानसिक पीड़ा और संताप इस स्तर तक उत्पन्न हो जाए कि पति/पत्नी से युक्तिसंगत रूप से यह अपेक्षा न की जा सके कि वह दूसरे पति/पत्नी के साथ रह सके। 

न्यायालयों द्वारा निर्धारित प्रमुख सिद्धांत: 

  • सबूत का मानक: वैवाहिक मामलों में, क्रूरता को संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर साबित किया जाना चाहिये, न कि उचित संदेह से परे (डॉ. एन.जी. दस्ताने बनाम श्रीमती एस. दस्ताने, 1975)। 
  • मानसिक क्रूरता: यह इस प्रकार की होनी चाहिये कि पक्षकारों से यथोचित रूप से एक साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती (वी. भगत बनाम डी. भगत, 1994)। 
  • दृष्टांतदर्शक: उच्चतम न्यायालय ने उन मामलों की एक गैर-विस्तृत सूची दी जो मानसिक क्रूरता के समान हो सकते हैं और इस बात पर बल दिया कि वैवाहिक जीवन की सामान्य टूट-फूट क्रूरता नहीं है (समर घोष बनाम जया घोष, 2007)। 
  • संपूर्ण वैवाहिक दृष्टिकोण: क्रूरता का आकलन वैवाहिक संबंध के संपूर्ण पहलू पर विचार करके किया जाता है, जिसमें दोनों पक्षकारों की सामाजिक और व्यक्तिगत पृष्ठभूमि भी शामिल होती है।