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सांविधानिक विधि

सूचना अधिकार अधिनियम के 21 वर्ष

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 12-Oct-2026

स्रोत: द हिंदू 

परिचय  

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को 21 वर्ष पूरे हो चुके हैं। नागरिकों को सूचना प्राप्त करने का अधिकार देने के अलावा, अधिनियम की एक प्रमुख विशेषता धारा 4 है, जिसके अधीन लोक प्राधिकरणों को स्वेच्छा से विभिन्न प्रकार की जानकारी प्रकाशित करने का दायित्व दिया गया है जिससे लोगों को बुनियादी जानकारी के लिये भी सूचना का अधिकार आवेदन दाखिल न करने पड़ें। यद्यपि, केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की रिपोर्टों और 94 सरकारी विभागों की वेबसाइटों के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि सक्रिय रूप से जानकारी प्रकाशित करने के इस दायित्व की अभी भी बड़े पैमाने पर अनदेखी की जा रही है। इस बीच, सूचना का अधिकार आवेदनों और लंबित मामलों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। 

सूचना अधिकार अधिनियम, 2005 के बारे में मुख्य तथ्य क्या हैं? 

  • यह अधिनियम नागरिकों को लोक अधिकारियों के पास मौजूद जानकारी तक पहुँच प्रदान करता है, जिसका उद्देश्य पारदर्शिता, जवाबदेही और सुशासन को बढ़ावा देना है। 
  • इस अधिनियम के अधीन पहला सूचना का अधिकार आवेदन पुणे के शाहिद रजा बर्नी को दिया जाता है। 
  • यह अधिनियम केंद्र, राज्य और स्थानीय स्तर पर लोक प्राधिकरणों पर लागू होता है। 
  • धारा 22 के अधीन, असंगति की सीमा तक यह अधिनियम किसी भी अन्य विधि पर प्रभावी होगा। 
  • धारा 8(2) के अधीन, छूट प्राप्त जानकारी का भी प्रकटीकरण किया जा सकता है जहाँ लोकहित संरक्षित हितों को होने वाले नुकसान से अधिक हो। 
  • धारा 8(1) के अधीन, नागरिक ऐसी जानकारी प्राप्त नहीं कर सकते हैं जिससे भारत की संप्रभुता, अखंडता, सुरक्षा, या रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों को नुकसान पहुँचे, विदेशी राज्यों के साथ संबंधों पर प्रभाव पड़े, या किसी अपराध को उकसाने की ओर ले जाए। 
  • मूल रूप से, मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्तों का कार्यकाल 5 वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक निश्चित होता था, और उनका वेतन मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों के समान होता था। 
  • सूचना का अधिकार (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने केंद्र सरकार को उनके कार्यकाल, वेतन, भत्ते और सेवा शर्तों को निर्धारित करने का अधिकार दिया। 
  • इस अधिनियम ने MGNREGA, PDS और स्थानीय विकास कार्यों जैसे सार्वजनिक व्यय की जांच में सुधार किया है और आदर्श हाउसिंग सोसाइटी, 2G स्पेक्ट्रम और राष्ट्रमंडल खेलों जैसे घोटालों को उजागर करने में सहायता की है। 

धारा 4 के अंतर्गत सक्रिय प्रकटीकरण क्या है? 

  • धारा 4(1)(ख) के अधीन प्रत्येक लोक प्राधिकरण को अधिकारियों के संपर्क विवरण से लेकर बजट और व्यय विवरण तक 16 श्रेणियों की जानकारी स्वेच्छा से प्रकाशित करनी होगी और उन्हें नियमित रूप से अपडेट करना होगा। 
  • कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने खरीद, सार्वजनिक-निजी भागीदारी और प्राप्त सूचना का अधिकार आवेदनों सहित आठ व्यापक शीर्षों के अधीन अतिरिक्त जानकारी प्रकट करने के लिये दिशानिर्देश जारी किये हैं। 
  • इस अधिनियम के अधीन लोक अधिकारियों को यथासंभव अधिक से अधिक जानकारी स्वतः साझा करने की आवश्यकता है, जिससे नागरिकों को सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से न्यूनतम आवश्यकता हो। 
  • अनुपालन की जांच के लिये, सरकार ने तृतीय-पक्ष पारदर्शिता ऑडिट को अनिवार्य कर दिया है, और ऑडिट रिपोर्ट केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) को प्रस्तुत की जानी चाहिये। 

डेटा विश्लेषण से क्या पता चला? 

  • लेखापरीक्षा प्रस्तुतियाँ: केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) की 2024-25 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, रजिस्ट्रीकृत 2,303 लोक प्राधिकरणों में से केवल 1,446 (लगभग 62.7%) ने पारदर्शिता लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत कीं। लगभग 37% ने तो रिपोर्ट प्रस्तुत ही नहीं कीं। 
  • लेखापरीक्षा ग्रेड: रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले प्राधिकरणों में से 410 को ग्रेड A, 253 को ग्रेड B, 302 को ग्रेड C, 215 को ग्रेड D तथा 266 को ग्रेड E प्राप्त हुआ। आधे से अधिक प्राधिकरणों को ग्रेड C या उससे निम्न श्रेणी प्राप्त हुई, जिसका अर्थ है कि उनके अंक 80% या उससे कम थे, जबकि ग्रेड E का तात्पर्य 60% से कम अंक प्राप्त करना था। 
  • सुधार की प्रवृत्ति: पिछले पाँच वर्षों में अनुपालन में सुधार हुआ है। रिपोर्ट प्रस्तुत करने वाले प्राधिकरणों की संख्या वर्ष 2020–21 में 754 से लगभग दोगुनी होकर वर्ष 2024–25 में 1,440 से अधिक हो गई।   
  • वेबसाइटों पर रिपोर्ट: यद्यपि दिशानिर्देशों में लेखापरीक्षा रिपोर्टों को विभागीय वेबसाइटों पर अपलोड करने की अनुशंसा की गई है, तथापि सूचना का अधिकार पोर्टल पर सूचीबद्ध 94 विभागों में से केवल 33 विभागों की वर्ष 2024–25 की रिपोर्टें उपलब्ध थीं। 43 विभागों में कोई रिपोर्ट नहीं मिली, जबकि शेष विभागों में पुरानी, अपूर्ण अथवा केवल संदर्भित रिपोर्टें उपलब्ध थी। 
  • अनिवार्य प्रकटीकरण: 94 विभागों में से केवल 56 विभागों (लगभग 62%) ने वर्ष 2025–26 के आँकड़ों के अनुसार, अधिकांश अनिवार्य श्रेणियों के अंतर्गत सूचना का प्रकटीकरण किया था। 26 विभागों की वेबसाइटों पर अधिनियम के अंतर्गत अपेक्षित सूचना उपलब्ध नहीं थी तथा सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय की वेबसाइट पर ऐसी कोई सूचना उपलब्ध नहीं थी। 
  • लंबित मामलों की बढ़ती संख्या: सूचना का अधिकार (RTI) के अंतर्गत प्राप्त अनुरोधों तथा लंबित मामलों की संख्या में वर्षों से निरंतर वृद्धि हुई है। वर्ष 2024–25 में निस्तारित किए गए लगभग 23 लाख अनुरोधों में से लगभग 5.1 लाख (करीब 22%) अनुरोध पिछले वर्ष से लंबित थे। 

सूचना अधिकार अधिनियम के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?  

  • कमजोर सक्रिय प्रकटीकरण: धारा 4 का अनुपालन न किए जाने के कारण नागरिकों को मूलभूत जानकारी प्राप्त करने के लिये भी आवेदन प्रस्तुत करने पड़ते हैं, जिससे लोक प्राधिकारियों तथा सूचना आयोगों पर कार्यभार बढ़ता है।  
  • दीर्घ विलंब : अधिकांश सूचना आयोगों में किसी मामले के निस्तारण में एक वर्ष से अधिक समय लगता है। कुछ राज्यों में अनुमानित अवधि अत्यधिक है; उदाहरणार्थ, निस्तारण की वर्तमान दर के अनुसार तेलंगाना में लगभग 29 वर्ष तथा त्रिपुरा में 23 वर्ष लगने का अनुमान है। 
  • रिक्तियां: वर्ष 2023 से 2024 के बीच, सूचना आयुक्तों की नियुक्ति न किये जाने के कारण छह सूचना आयोग कुछ समय के लिये पूर्णतः निष्क्रिय हो गए। इसके अतिरिक्त, कई आयोगों ने मुख्य सूचना आयुक्त के बिना कार्य किया है।  
  • संशोधनों के माध्यम से शक्ति का ह्रास: वर्ष 2019 के संशोधन ने सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता को कम कर दिया। डिजिटल वैयक्तिक डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 द्वारा धारा 8(1)(j) में संशोधन किया गया, जिससे लोक अधिकारियों से संबंधित सूचना सहित सभी वैयक्तिक सूचनाओं को प्रकटीकरण से छूट प्रदान कर दी गई। 
  • छूटों का व्यापक उपयोग: भाग प्रायः राष्ट्रीय सुरक्षा तथा शासकीय गुप्त बात अधिनियम, 1923 का हवाला देकर सूचना देने से इंकार कर देते हैं। अनुसूची II को धारा 24 के साथ पढ़ने पर RAW, IB तथा CERT-In जैसे संगठन सूचना के प्रकटीकरण से छूट प्राप्त हैं, तथापि भ्रष्टाचार तथा मानवाधिकारों के उल्लंघन से संबंधित सूचना इसके अपवाद हैं। 
  • अधिकार अधिकार कार्यकर्ताओं को धमकियां: अनेक कार्यकर्ताओं को उत्पीड़न, हमलों तथा यहाँ तक कि हत्या का सामना करना पड़ा है, जबकि व्हिसिल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014 का कार्यान्वयन अभी भी अपर्याप्त है। 

किन सुधारों की आवश्यकता है? 

  • धारा 4 के अधीन सक्रिय प्रकटीकरण को वास्तव में अनिवार्य बनाएं, लेखापरीक्षा रिपोर्टों को विभागीय वेबसाइटों पर अपलोड करना अनिवार्य करें और खराब लेखापरीक्षा ग्रेड के लिये लोक प्राधिकरणों के प्रमुखों को जवाबदेह ठहराएं। 
  • सूचना आयोगों में रिक्त पदों को पारदर्शी और समयबद्ध प्रक्रिया के माध्यम से भरें, और प्रत्येक आयुक्त के लिये पर्याप्त कर्मचारी, प्रौद्योगिकी और निपटान मानदंड प्रदान करें। 
  • सूचना देने से अनुचित रूप से इनकार करने अथवा विलंब करने पर धारा 20 के अंतर्गत लोक सूचना अधिकारियों पर शास्ति अधिरोपित की जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि सूचना आयोग धारा 25 के अंतर्गत अपनी वार्षिक रिपोर्ट समय पर प्रकाशित करें।  
  • सूचना का अधिकार पोर्टलों को डिजिलॉकर (DigiLocker) के साथ एकीकृत किया जाए, आवेदनों की वास्तविक समय में स्थिति का अनुसरण करने की सुविधा प्रदान की जाए तथा नागरिकों को आवेदन तैयार करने में सहायता देने के लिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित साधनों का उपयोग किया जाए। 
  • व्हिसिल ब्लोअर्स संरक्षण अधिनियम, 2014 का पूर्ण कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाए, जिसमें गुमनाम शिकायतों तथा आपातकालीन संरक्षण की व्यवस्था सम्मिलित हो। सूचना का अधिकार उपयोगकर्ताओं पर हमलों से संबंधित मामलों के शीघ्र निस्तारण के लिये त्वरित विचारण न्यायालय स्थापित किए जाएँ तथा जिला स्तर पर हेल्पलाइन एवं विधिक सहायता की व्यवस्था की जाए। 
  • सूचना आयुक्तों की नियुक्तियों में संसदीय पर्यवेक्षण की व्यवस्था की जाए तथा उनका निश्चित कार्यकाल और सेवा संबंधी शर्तें पुनः बहाल की जाए। 

निष्कर्ष 

अधिनियमन के इक्कीस वर्ष पश्चात् भी, सूचना का अधिकार अधिनियम (RTI Act) भारत में लोकतांत्रिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के सबसे सशक्त साधनों में से एक बना हुआ है। तथापि, स्वप्रेरित प्रकटीकरण के अपर्याप्त अनुपालन, लंबित मामलों में वृद्धि, सूचना आयोगों में रिक्त पदों, विधायी संशोधनों के माध्यम से अधिकारों के क्षरण तथा कार्यकर्ताओं के समक्ष उत्पन्न खतरों ने इसकी प्रभावशीलता को कम कर दिया है। यदि लोक प्राधिकारी धारा 4 का निष्ठापूर्वक अनुपालन करें, तो नागरिकों को आवेदन प्रस्तुत किये बिना ही मूलभूत सूचना प्राप्त हो सकेगी, सूचना आयोगों पर कार्यभार कम होगा तथा यह अधिनियम पारदर्शी एवं जवाबदेह शासन की स्थापना के अपने मूल उद्देश्य के अधिक निकट पहुँच सकेगा।