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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38

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 07-Oct-2026

रवि चौरसिया एवं अन्य. बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"...उक्त संदिग्ध द्वारा दी गई सभी सूचनाओं को अमान्य कर देता है, विशेषकर आत्म-अभिशंसन वाले कथनों को।" 

न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की पीठ ने रवि चौरसिया एवं अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में अभिनिर्धारित किया। न्यायालय ने यह माना कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 38 के अधीन, पुलिस को किसी संदिग्ध को औपचारिक रूप से गिरफ्तार करने से पहले ही, पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता की उपस्थिति के अधिकार के बारे में सूचित करना अनिवार्य है। 

  • न्यायालय ने यह भी माना कि बाद में की गई औपचारिक गिरफ्तारी और रिमांड पहले की अवैध निरोध को ठीक नहीं कर सकती। न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए याचिकाकर्त्ता को छोड़ने का निदेश दिया और प्रतिकर के रूप में ₹30,000 प्रदान किये। 

रवि चौरसिया और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रयागराज के सोरांव पुलिस द्वारा रवि चौरसिया को अवैध रूप से निरोध में रखने का आरोप लगाते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई थी । 
  • घटनाओं का क्रम इस प्रकार था: 

तिथि 

घटना  

14 सितंबर, 2026 

पुलिस ने याचिकाकर्ता को अयोध्या से अभिरक्षा में लिया और उसे सोरांव पुलिस थाने ले गई। गिरफ्तारी दर्शाई नहीं गई। 

15 सितंबर, 2026 

उसकी माता उसकी कुशल-क्षेम की जानकारी लेने के लिये पुलिस थाने गईं। इसके पश्चात् उच्च न्यायालय के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की गई। 

16 सितंबर, 2026  

पुलिस ने उसे प्रातः 10:45 बजे औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया, गिरफ्तारी को जनरल डायरी में दर्ज किया, उसकी चिकित्सीय परीक्षा कराई तथा उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया, जिन्होंने उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया। 

  • उच्च न्यायालय ने पुलिस थाने से CCTV फुटेज मंगवाई। 
  • थाने के भारसाधक अधिकारी (SHO) और अन्वेषण अधिकारी द्वारा दायर किये गए जवाबी शपथपत्र में स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया कि याचिकाकर्त्ता अभिरक्षा में था। 
  • थाने के भारसाधक अधिकारी (SHO) ने कहा कि याचिकाकर्त्ता की उपस्थिति को जनरल डायरी में दर्ज न कर पाना एक "अनजाने में हुई त्रुटि" थी।   
  • न्यायालय के समक्ष प्रश्न निम्नलिखित थे: 
    • क्या याचिकाकर्त्ता की औपचारिक गिरफ्तारी से पहले का निरोध अवैध था, और क्या बाद की गिरफ्तारी और रिमांड इसे ठीक कर सकता है? 
    • क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के अधीन पूछताछ के दौरान अधिवक्ता का अधिकार उस संदिग्ध पर लागू होता है जिसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार नहीं किया गया है? 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के अधीन अधिवक्ता के अधिकार पर: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती है, तथापि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं।  
  • इस उपबंध को इस प्रकार से नहीं पढ़ा जा सकता है जिससे पुलिस औपचारिक गिरफ्तारी को स्थगित करके इस सुरक्षा उपाय से बच सके । 
  • न्यायालय ऐसी किसी प्रथा की अनुमति नहीं देगा जिसमें पुलिस: 
    • किसी संदिग्ध को गिरफ्तार करने से बचें, 
    • उसे पुलिस थाने बुलाकर 5-6 घंटे तक पूछताछ करे, और 
    • बिना अधिवक्ता की सहायता के दिये गए उनके आत्म-अभिशंसन कथनों का प्रयोग करके उन्हें अभियुक्त बनाए। 
  • ऐसा करने से आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध उनके अधिकार का उल्लंघन होगा।  
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के अधीन पुलिस का कर्त्तव्य तब भी उत्पन्न होता है जब किसी संदिग्ध को पूछताछ के लिये पुलिस थाने ले जाया जाता है । 
  • संदिग्ध व्यक्ति को, उसकी गिरफ्तारी या अभियोजित कियेजाने से पहले ही, इस बात की जानकारी दी जानी चाहिये कि पूछताछ के दौरान पुलिस थाने में उसकी पसंद के अधिवक्ता की उपस्थिति का अधिकार है। 
  • इसका यह अर्थ नहीं है कि पूछताछ के दौरान अधिवक्ता का उपस्थित रहना अनिवार्य है। 

संदिग्ध को सूचित न करने के परिणाम: 

  • पुलिस किसी व्यक्ति को उसके अधिवक्ता से सलाह लेने के अधिकार के बारे में बताए बिना उससे पूछताछ नहीं कर सकती और फिर उसके कथनों के आधार पर उसे अभियुक्त नहीं बना सकती। 
  • संदिग्ध व्यक्ति को इस अधिकार के बारे में सूचित न करने से उसके द्वारा दी गई सभी जानकारी, विशेष रूप से आत्म-अभिशंसन वाले कथं, अमान्य हो जाते हैं। 

अवैध निरोध के संबंध में: 

  • न्यायालय ने SHO द्वारा दिये गए "अनजाने में हुई त्रुटि" के स्पष्टीकरण को खारिज कर दिया। न्यायालय ने माना कि याचिकाकर्त्ता की उपस्थिति को सामान्य डायरी में दर्ज न करना अवैध निरोध के आरोप से बचने के लिये जानबूझकर किये गया "लोप" था। 
  • याचिकाकर्त्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किये बिना 24 घंटे से अधिक समय तक पुलिस अभिरक्षा में रखा गया। 
  • संविधान के अनुच्छेद 21 और 22 के संदर्भ में “विषाक्त वृक्ष के फल का सिद्धांत (Fruit of the Poisonous Tree Doctrine)” को लागू करते हुए, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि बाद में की गई औपचारिक गिरफ्तारी और रिमांड प्रारंभिक अवैध निरोध को वैधता प्रदान नहीं कर सकते। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका मंजूर कर ली। 
  • यदि याचिकाकर्त्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे छोड़ने का निदेश दिया गया। 
  • उसने अवैध निरोध के लिये प्रतिकर के तौर पर ₹30,000 देने का आदेश दिया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 38 में पूछताछ के दौरान गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने के अधिकार का उपबंध है । 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 41घ के अनुरूप है, जिसे दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2008 द्वारा जोड़ा गया था। 
  • यह विधिक सलाहकार से परामर्श करने के सांविधानिक अधिकार को वैधानिक रूप प्रदान करता है। 

उपबंध: 

  • जब किसी व्यक्ति को पुलिस द्वारा गिरफ्तार करके पूछताछ की जाती है, तो उसे पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार होता है, तथापि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं। 

रवि चौरसिया (2026) में व्याख्या: 

  • यह सुरक्षा उपाय उस संदिग्ध व्यक्ति पर भी लागू होता है जिसे पूछताछ के लिये पुलिस थाने बुलाया जाता है, भले ही उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार न किया गया हो। 
  • पुलिस को संदिग्ध व्यक्ति को इस अधिकार के बारे में सूचित करना होगा। 
  • ऐसा न करने पर प्राप्त किये गए कथन, विशेषकर आत्म-अभिशंसन वाले कथन, अमान्य हो जाते हैं। 

सांविधानिक और वैधानिक सुरक्षा उपाय शामिल हैं 

उपबंध 

सुरक्षा 

अनुच्छेद 20(3) 

किसी अपराध के लिए अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिये विवश नहीं किया जाएगा। 

अनुच्छेद 21 

किसी व्यक्ति को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया से अन्यथा, उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा। 

अनुच्छेद 22(1) 

गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को उसकी गिरफ्तारी के आधारों से अवगत कराया जाना आवश्यक है तथा उसे अपनी पसंद के विधि-व्यवसायी से परामर्श करने और उसके द्वारा प्रतिरक्षित होने का अधिकार है। 

अनुच्छेद 22(2) 

गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को यात्रा के लिये आवश्यक समय को छोड़कर, 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 (दण्ड प्रक्रिया संहिता की 57) 

बिना वारण्ट गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक अभिरक्षा में निरुद्ध नहीं किया जा सकता।  

" विषाक्त वृक्ष के फल” का सिद्धांत (Doctrine of “Fruit of the Poisonous Tree”) क्या है? 

  • यह सिद्धांत संयुक्त राज्य अमेरिका के विधि-विधान में विकसित हुआ। इसके अंतर्गत किसी अवैध कृत्य, जैसे विधिविरुद्ध तलाशी, अवैध गिरफ्तारी या अवैध पूछताछ से प्राप्त साक्ष्य को दूषित माना जाता है और उसे अपवर्जित कर दिया जाता है। 
  • इसमें “वृक्ष (Tree)” अवैध कृत्य को तथा “फल (Fruit)” उस अवैध कृत्य से उत्पन्न या उससे प्राप्त किसी भी सामग्री अथवा परिणाम को दर्शाता है। 
  • भारतीय न्यायालयों ने सामान्यतः इस सिद्धांत को साक्ष्य को अस्वीकार करने के कठोर नियम के रूप में नहीं अपनाया है। पूरन मल बनाम निरीक्षण निदेशक (1974) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने माना कि अवैध तलाशी के माध्यम से प्राप्त साक्ष्य केवल इसी कारण से अग्राह्य नहीं है।