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पारिवारिक कानून
निःसंतानता क्रूरता नहीं है; विवाह केवल संतानोत्पत्ति के लिये नहीं है
« »03-Oct-2026
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ए. बनाम एस. "पति-पत्नी की संतानोत्पत्ति में असमर्थता को अपने आप में पत्नी की वैवाहिक गलती नहीं माना जा सकता। विवाह को केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता।" न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जी.आर. स्वामीनाथन और न्यायमूर्ति एम.डी. सुमति की खंडपीठ ने ए. बनाम एस. (2026) के मामले में क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग करने वाले पति की अपील को खारिज कर दिया। न्यायालय ने माना कि निःसंतानता को पत्नी की वैवाहिक गलती नहीं माना जा सकता, और कठिन प्रजनन उपचार से गुजरने वाली पत्नी विवाह को बनाए रखने का आशय प्रदर्शित करती है, न कि उसे छोड़ने का।
ए. बनाम एस. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- दोनों पक्षकारों का विवाह 2007 में संपन्न हुआ था।
- पति का दावा था कि वैवाहिक जीवन पहले छह महीनों तक ही शांतिपूर्ण रहा, जिसके बाद पत्नी के व्यवहार में परिवर्तन आया।
- उन्होंने पत्नी द्वारा मानसिक क्रूरता का आरोप लगाया:
- वह अपने परिवार को उसके परिवार से श्रेष्ठ मानती थी और उसके और उसके परिवार के बारे में अपमानजनक टिप्पणियां करती थी।
- कार्यालय से देर से लौटने पर उन पर अनावश्यक रूप से संदेह किया गया।
- उसने सार्वजनिक रूप से उसे अपशब्द कहे, उसे नपुंसक कहा, जूतों से उस पर हमला किया, अपनी थाली निकालकर उस पर फेंक दी और वापस आने से इंकार करते हुए अपने मायके चली गई।
- उन्होंने यह भी बताया कि दंपति की कोई संतान नहीं थी और इलाज के होते हुए भी पत्नी गर्भवती नहीं हुई थी।
- पत्नी ने सभी आरोपों से इंकार किया। उसने कहा कि:
- पति को शराब पीने की आदत थी, और पत्नी ने केवल उसके नशे में गाड़ी चलाकर घर आने पर आपत्ति जताई थी।
- वह कभी भी पति को सूचित किये बिना ससुराल नहीं छोड़ती थी; अपितु, पति स्वयं काम के सिलसिले में यात्रा करते समय उसे उसकी बहन के घर छोड़ जाता था।
- उसकी फाइब्रॉइड्स की सर्जरी हुई थी और वह चिकित्सा उपचार ले रही थी, और बच्चे का न होना उसकी ओर से किसी जानबूझकर इंकार के कारण नहीं था।
- कुटुंब न्यायालय ने तलाक देने से इंकार कर दिया, यह मानते हुए कि पति के आरोप साक्ष्यों से समर्थित नहीं थे और इस बात का कोई निश्चायक सबूत नहीं था कि पत्नी स्थायी रूप से बच्चे को जन्म देने में असमर्थ थी।
- पति ने CMA(MD) संख्या 724/2022 में उच्च न्यायालय में अपील दायर की, जिसमें उसने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने स्वतंत्र पुष्टि की कमी पर अनुचित बल दिया था, क्योंकि वैवाहिक क्रूरता सामान्यतः घर की चारदीवारी के भीतर होती है और इसे प्रत्यक्षदर्शियों या पुलिस परिवाद के माध्यम से साबित नहीं किया जा सकता है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- संतानहीनता वैवाहिक दोष नहीं है: न्यायालय ने माना कि संतान न होने की अक्षमता को पत्नी का वैवाहिक दोष नहीं माना जा सकता। केवल संतान न होने के कारण किसी पति या पत्नी को वैवाहिक दोष नहीं माना जा सकता।
- विवाह के उद्देश्य पर: न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विवाह को केवल संतानोत्पत्ति के उद्देश्य तक सीमित नहीं किया जा सकता।
- प्रतिबद्धता के साक्ष्य के रूप में प्रजनन उपचार पर: न्यायालय ने पाया कि उपचार में शारीरिक कष्ट, बार-बार चिकित्सा प्रक्रियाएं, भावनात्मक अनिश्चितता और काफी व्यक्तिगत तनाव शामिल था। पत्नी की इसे सहने की इच्छा क्रूरता नहीं हो सकती; अपितु यह विवाह को बचाने के उसके आशय को दर्शाती है।
- क्रूरता के आकलन पर: न्यायालय इस बात से सहमत था कि क्रूरता का आकलन वैवाहिक संबंध को समग्र रूप से ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिये, न कि किसी कठोर या यांत्रिक सूत्र के आधार पर। यद्यपि, नासाबित आरोप स्वतः साबित क्रूरता नहीं बन जाते।
- मूलभूत तथ्यों के साक्ष्य पर: उच्चतम न्यायालय के एक निर्णय पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि यद्यपि आचरण का संचयी प्रभाव सुसंगत है, फिर भी उस आचरण को गठित करने वाले मूलभूत तथ्यों को पहले स्थापित किया जाना चाहिये। पति अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहा।
- पत्नी के आचरण के संबंध में: न्यायालय ने कहा कि वैवाहिक जीवन को त्यागने का आशय रखने वाला व्यक्ति सामान्यतः इसे पुनः आरंभ करने की इच्छा व्यक्त नहीं करेगा, जिससे पति का मामला और भी कमजोर हो गया।
- परिणाम: कुटुंब न्यायालय के आदेश में कोई खामी न पाते हुए, उच्च न्यायालय ने अपील खारिज कर दी।
क्रूरता किस आधार पर विवाह-विच्छेद का कारण बन सकती है?
अर्थ:
- हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) में "क्रूरता" को परिभाषित नहीं किया गया है। इसका अर्थ न्यायिक निर्वचन के माध्यम से विकसित हुआ है।
- क्रूरता शारीरिक या मानसिक हो सकती है। इसका तात्पर्य ऐसे आचरण से है जिससे याचिकाकर्त्ता के मन में यह आशंका उत्पन्न हो जाती है कि दूसरे पति/पत्नी के साथ रहना हानिकारक या नुकसानदायक होगा।
सांविधिक उपबंध:
- हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)( iक): कोई भी पति या पत्नी इस आधार पर तलाक की डिक्री द्वारा विवाह विच्छेद की मांग कर सकता है कि दूसरे पक्षकार ने विवाह के बाद याचिकाकर्त्ता के साथ क्रूरता का व्यवहार किया है।
- विवाह विधि (संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा क्रूरता को विवाह-विच्छेद का एक स्वतंत्र आधार बना दिया गया। इससे पहले, यह केवल धारा 10 के अधीन न्यायिक पृथक्करण का आधार था।
शारीरिक क्रूरता बनाम मानसिक क्रूरता:
- शारीरिक क्रूरता में हिंसा या शारीरिक हानि के कृत्य, या जीवन, अंग या स्वास्थ्य को खतरे में डालने वाला आचरण शामिल है।
- मानसिक क्रूरता में ऐसा आचरण शामिल होता है जो इस हद तक मानसिक पीड़ा और कष्ट पहुँचाता है कि पक्षकारों के लिये एक साथ रहना असंभव हो जाता है।
सबूत का मानदंड:
- वैवाहिक कार्यवाही प्रकृति में सिविल होती है, और क्रूरता को संदेह से परे नहीं, अपितु संभावनाओं की प्रबलता के आधार पर साबित किया जाना चाहिये।
- यह बात उच्चतम न्यायालय ने एन.जी. दस्ताने बनाम श्रीमती एस. दस्ताने (1975) के मामले में निर्धारित की थी।
- क्रूरता साबित करने का भार उस पति/पत्नी पर होता है जो इसका आरोप लगाता है।
क्रूरता पर ऐतिहासिक निर्णय:
- शोभा रानी बनाम मधुकर रेड्डी (1988): क्रूरता का जानबूझकर होना आवश्यक नहीं है; ध्यान परिवादकर्त्ता पति या पत्नी पर आचरण के प्रभाव पर केंद्रित है।
- भगत बनाम डी. भगत (1994): मानसिक क्रूरता ऐसा आचरण है जो इस प्रकार की मानसिक पीड़ा और कष्ट पहुँचाता है कि पक्षकारों से यथोचित रूप से एक साथ रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
- समर घोष बनाम जया घोष (2007): उच्चतम न्यायालय ने मानसिक क्रूरता के उदाहरणों की एक दृष्टांतदर्शक सूची (संपूर्ण नहीं) दी और यह माना कि वैवाहिक जीवन की सामान्य टूट-फूट क्रूरता के समान नहीं है।
- श्रीनिवास राव बनाम डी.ए. दीपा (2013): पति या पत्नी के विरुद्ध मिथ्या और मानहानिकारक आरोप लगाना और मिथ्या परिवाद दर्ज करना मानसिक क्रूरता के समान हो सकता है।
- जॉयदीप मजूमदार बनाम भारती जायसवाल मजूमदार (2021): पति या पत्नी की ख्याति और करियर को प्रभावित करने वाले निराधार मानहानिकारक आरोप मानसिक क्रूरता का गठन करते हैं।