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आपराधिक कानून
केवल शारीरिक रूप-रंग पर अपमानजनक टिप्पणी करना स्त्री की लज्जा का अनादर नहीं है
«03-Oct-2026
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अमृता एम. बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य "केवल इस आधार पर कि याचिकाकर्त्ताओं और अभियुक्त नंबर 3 ने परिवादकर्त्ता को शारीरिक बनावट के आधार पर अपमानित किया और उसकी शारीरिक बनावट को लेकर उसका मजाक उड़ाया, यह नहीं कहा जा सकता कि अभिलेख पर विद्यमान सामग्री से धारा 509 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन दण्डनीय अपराध का प्रकटन होता है।" न्यायमूर्ति एस.आर. कृष्ण कुमार |
स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति एस.आर. कृष्ण कुमार की एकल पीठ ने अमृता एम. बनाम कर्नाटक राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में, शरीर को अपमानित करने और परिवादकर्त्ता को मौखिक रूप से गाली देने के आरोप में दो महिलाओं के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509 (भारतीय न्याय संहिता की धारा 79) के अधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया । न्यायालय ने माना कि केवल शरीर को अपमानित करना ही किसी महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाने के अपराध के लिये पर्याप्त नहीं है।
अमृता एम. बनाम कर्नाटक राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 09.08.2023 को परिवादकर्त्ता ने परिवाद दर्ज कराया जिसमें आरोप लगाया गया कि तीन व्यक्तियों, दो लड़कियों और एक लड़के ने सार्वजनिक स्थान पर उसके और उसकी सहेली के साथ मौखिक रूप से दुर्व्यवहार किया था।
- कथित टिप्पणियों में नाम लेकर अपमान करना, मोटापे को लेकर शर्मिंदा करना, शरीर को लेकर शर्मिंदा करना, नस्लवादी टिप्पणियां और अश्लील शब्द शामिल थे।
- परिवादकर्त्ता ने आगे आरोप लगाया कि अभियुक्त शराब के नशे में थे जब उन्होंने उस पर अपशब्दों का प्रयोग किया।
- सदाशिवनगर पुलिस थाने में तीनों अभियुक्तों के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509 के अधीन अपराध के लिये FIR दर्ज की गई और अन्वेषण के बाद चार्जशीट दाखिल की गई।
- इससे पहले लड़के (अभियुक्त नंबर 3) ने उच्च न्यायालय का रुख किया था, और उसके विरुद्ध कार्यवाही रद्द कर दी गई थी।
- इसके बाद दोनों लड़कियों (अभियुक्त संख्या 1 और 2) ने अपने विरुद्ध कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए एक आपराधिक याचिका (CRL.P No. 4343 of 2026) के माध्यम से उच्च न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509 के लिये आवश्यक तत्त्वों की अनुपस्थिति पर: न्यायालय ने माना कि परिवाद, प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र की सामग्री और परिवादकर्त्ता तथा साक्षियों के कथन भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509 के अधीन अपराध के लिये आवश्यक तत्त्वों को प्रकट नहीं करते हैं।
- शरीर को लेकर शर्मिंदा करना शालीनता का अपमान नहीं माना जाता: भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509 के अनिवार्य तत्त्वों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने पाया कि केवल परिवादकर्त्ता के शरीर को लेकर शर्मिंदा करना और उसकी शारीरिक बनावट के बारे में उसका अपमान करना अपराध नहीं माना जाता है।
- समानता के सिद्धांत पर: न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध लगाए गए आरोप, सह-अभियुक्त लड़के के विरुद्ध लगाए गए आरोपों के समान, मिलते-जुलते और एक ही घटना से संबंधित थे, जिसकी कार्यवाही पहले ही रद्द कर दी गई थी। अतः न्यायालय ने यह माना कि याचिकाकर्त्ताओं के पक्ष में भी समानता का सिद्धांत लागू करना न्यायसंगत और उचित होगा।
- परिणाम: आपराधिक याचिका स्वीकार कर ली गई और याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध संबंधित न्यायालय में लंबित कार्यवाही रद्द कर दी गई।
किसी महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाना क्या अपराध है?
सांविधिक उपबंध:
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 509: जो कोई भी किसी महिला की लज्जा भंग करने के आशय से कोई शब्द बोलता है, कोई ध्वनि करता है या इशारा करता है, या कोई वस्तु प्रदर्शित करता है, इस आशय से कि वह शब्द या ध्वनि उस महिला द्वारा सुनी जाए, या ऐसा इशारा या वस्तु उस महिला द्वारा देखी जाए, या उस महिला की निजता का उल्लंघन करता है, तो वह अपराध करता है।
- दण्ड : तीन वर्ष तक का साधारण कारावास और जुर्माना। (आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा अधिकतम कारावास की अवधि एक वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष कर दी गई थी।)
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 79 में संबंधित उपबंध के अधीन वही अपराध और दण्ड बरकरार रखा गया है।
- चूँकि वर्तमान मामले में घटना 2023 में हुई थी, अर्थात 1 जुलाई 2024 को भारतीय न्याय संहिता के लागू होने से पहले, इसलिये भारतीय दण्ड संहिता लागू रही।
आवश्यक सामग्रियां:
- किसी महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाने का आशय अवश्य रहा होगा।
- इस प्रकार का अपमान निम्न माध्यमों से होना चाहिये:
- किसी महिला द्वारा सुने या देखे जाने के आशय से कोई शब्द बोलना, कोई ध्वनि या इशारा करना, या कोई वस्तु प्रदर्शित करना, या
- महिला की निजता का उल्लंघन करना।
- आशय ही मूल तत्त्व है। किसी महिला की लज्जा को ठेस पहुँचाने के आशय के बिना केवल अपशब्द या आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग करना इस धारा के अंतर्गत नहीं आता।
शील का अर्थ:
- भारतीय दण्ड संहिता या भारतीय न्याय संहिता में "शील" शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है।
- पंजाब राज्य बनाम मेजर सिंह (1966) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि एक महिला की लज्जा का सार उसका स्त्रीत्व है।
- रूपन देओल बजाज बनाम के.पी.एस.गिल (1995) मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि यह निर्धारित करने के लिये अंतिम कसौटी कि क्या लज्जा भंग हुई है, यह है कि क्या अपराधी का कृत्य किसी महिला की शालीनता की भावना को ठेस पहुँचाने में सक्षम है।
- राजू पांडुरंग महाले बनाम महाराष्ट्र राज्य (2004) के मामले में , सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि आरोपी का आपराधिक इरादा ही मामले का मूल तत्व है।