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आपराधिक कानून

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 72

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 06-Oct-2026

गोपाल पाठक बनाम नितिन उर्फ ​​पप्पू एवं अन्य 

"न्यायालय का यह कर्त्तव्य है कि वह हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करे और अपने स्वयं के निष्कर्ष पर पहुँचे..." 

न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति मनमोहन 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और न्यायमूर्ति मनमोहन की पीठ ने गोपाल पाठक बनाम नितिन उर्फ ​​पप्पू एवं अन्य (2026) के मामले में अभिनिर्धारित किया। न्यायालय ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 72 के अधीन, किसी न्यायालय को विवादित हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करके अपना निष्कर्ष निकालना चाहिये। वह केवल इसलिये विशेषज्ञ साक्ष्य नहीं मंगवा सकता क्योंकि वह स्वयं विशेषज्ञ नहीं है। न्यायालय ने लिखावट विशेषज्ञ की परीक्षा का निदेश देने वाले उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और विचारण न्यायालय के आदेश को बहाल कर दिया। 

गोपाल पाठक बनाम नितिन उर्फ ​​पप्पू और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह विवाद एक वसीयत की प्रामाणिकता से संबंधित था, जिसमें उस पर मौजूद हस्ताक्षरों पर प्रश्न उठाए गए थे। 
  • प्रत्यर्थी ने हस्तलेख विशेषज्ञ की राय लेने के लिये भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 39 के अधीन एक आवेदन दायर किया। 
  • विचारण न्यायालय ने विशेषज्ञ साक्ष्य मंगवाने के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। 
  • मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय (ग्वालियर पीठ) ने विचारण न्यायालय के निर्णय को पलट दिया। न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि वसीयत की प्रामाणिकता निर्धारित करने के लिये विशेषज्ञ साक्ष्य "अत्यावश्यक" है, क्योंकि न्यायालय स्वयं विशेषज्ञ नहीं है। 
  • अपीलकर्त्ता ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि: 
    • जब न्यायालय स्वयं भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 72 के अधीन हस्ताक्षरों की तुलना कर सकता है, तो विशेषज्ञ साक्ष्य मंगवाने की शक्ति का नियमित रूप से उपयोग नहीं किया जा सकता है। 
    • प्रत्यर्थी ने अपने धारा 39 के आवेदन में स्वीकार किया था कि उसके पिता एक किराएदार थे, इसलिये वह हस्ताक्षरों पर प्रश्न उठाकर वसीयत की प्रामाणिकता पर एक साथ विवाद नहीं कर सकता था। 
  • प्रत्यर्थी ने थिरुवेंगड़ा पिल्लई बनाम नवनीतम्मल और अन्य (2008) के मामले का हवाला देते हुए उच्च न्यायालय के आदेश का बचाव किया। उन्होंने तर्क दिया कि जहाँ लिखावट, हस्ताक्षर या उंगलियों के निशान पर विवाद हो, वहाँ केवल न्यायालय द्वारा निर्णय देना जोखिम भरा और खतरनाक होगा, इसलिये मामले को किसी विशेषज्ञ के पास भेजा जाना चाहिये। 
  • न्यायालय के समक्ष प्रश्न यह था कि क्या विवादित हस्ताक्षर से जुड़े प्रत्येक मामले में विशेषज्ञ की राय आवश्यक है। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय के तुलना करने के कर्त्तव्य पर: 

  • हस्ताक्षर या लिखावट की तुलना करना और अपने स्वयं के निष्कर्ष पर पहुँचना न्यायालय का कर्त्तव्य है। 
  • न्यायालय यह कहकर इस कर्त्तव्य से बच नहीं सकता कि वह विशेषज्ञ नहीं है। 
  • किसी विशेषज्ञ का साक्ष्य केवल एक राय है और न्यायालय पर बाध्यकारी नहीं है। 

विशेषज्ञ साक्ष्य मांगने पर: 

  • किसी भी विवादित लिखावट, हस्ताक्षर या उंगली के निशान से जुड़े हर मामले को विशेषज्ञ परीक्षा के लिये भेजना अग्राह्य है, जबकि न्यायालय इसकी तुलना करके निर्णय ले सकता है। 
  • विशेषज्ञों की गवाही को नियमित रूप से नहीं मांगा जा सकता है। 
  • यदि न्यायालय को किसी प्रकार का संदेह हो, या लिखावट या छाप धुंधली, अस्पष्ट या बहुत हल्की हो, तो विशेषज्ञ की राय लेने का उसे पूर्ण विवेक प्राप्त है। 

उच्च न्यायालय के निष्कर्ष पर: 

  • उच्च न्यायालय का यह निष्कर्ष कि वसीयत की प्रामाणिकता निर्धारित करने के लिये भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 39 के अधीन विशेषज्ञ की राय आवश्यक थी, विधि की दृष्टि से अस्थिर था। 
  • हस्ताक्षरों की तुलना न्यायालय द्वारा स्वयं भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 72 के अधीन की जा सकती थी। 

थिरुवेंगडा पिल्लई बनाम नवनीतम्मल और अन्य (2008) की निर्भरता पर: 

  • इस निर्णय का यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि विवादित लिखावट, हस्ताक्षर या उंगलियों के निशान से जुड़े हर मामले में विशेषज्ञ साक्षी की परीक्षा करना अनिवार्य है। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने अपील को मंजूर करते हुए, हस्तलेख विशेषज्ञ को बुलाने के उच्च न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और विशेषज्ञ साक्ष्य के अनुरोध को अस्वीकार करने वाले विचारण न्यायालय के आदेश को बहाल कर दिया। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 72 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 72 किसी हस्ताक्षर, लेखन या मुद्रा की तुलना अन्य स्वीकृत या साबित दस्तावेजों से करने से संबंधित है। 
  • यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 73 के अनुरूप है। 
  • यह न्यायालय को विशेषज्ञ पर निर्भर हुए बिना, विवादित लेखन की तुलना स्वीकृत या साबित नमूनों से करने का अधिकार देता है। 

उपबंध : 

  • धारा 72(1): यह निर्धारित करने के लिये कि कोई हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा उस व्यक्ति की है जिसके द्वारा इसे लिखा या बनाया गया प्रतीत होता है, न्यायालय द्वारा उस व्यक्ति के रूप में स्वीकार किये गए या साबित किये गए किसी भी हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा की तुलना उस हस्ताक्षर, लेख या मुद्रा से की जा सकती है जिसे साबित किया जाना है। इसकी अनुमति तब भी दी जाती है जब स्वीकार किया गया नमूना किसी अन्य प्रयोजन के लिये प्रस्तुत या साबित न किया गया हो। 
  • धारा 72(2): न्यायालय, न्यायालय में उपस्थित किसी भी व्यक्ति को कोई शब्द या अंक लिखने का निदेश दे सकता है, जिससे न्यायालय उनकी तुलना उन शब्दों या अंकों से कर सके जो उस व्यक्ति द्वारा कथित रूप से लिखे गए हैं। 
  • धारा 72(3): यह धारा आवश्यक संशोधनों के साथ उंगलियों के निशानों पर भी लागू होती है। 

भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 39 के साथ परस्पर क्रिया: 

  • भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 39 (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 45 के अनुरूप) लिखावट और उंगलियों के निशान की पहचान के प्रश्नों सहित विशेषज्ञों की राय को सुसंगत बनाती है।  
  • धारा 39 के अंतर्गत विशेषज्ञ की राय केवल एक सुसंगत तथ्य और न्यायालय के लिये एक सहायता है। यह निश्चायक या बाध्यकारी नहीं है। 
  • धारा 72 तुलना करने का प्राथमिक उत्तरदायित्व न्यायालय पर डालती है। धारा 39 का सहारा लेना विवेकाधीन है और इसका उपयोग उन मामलों में किया जाता है जहाँ न्यायालय को वास्तविक संदेह हो या सामग्री स्पष्ट न हो।