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आपराधिक कानून

पीड़ित को त्वरित विचारण की मांग करने का अधिकार है

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 09-Oct-2026

रेणुका जैन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्य और अन्य 

"पीड़ित या पीड़ित का विधिक संरक्षक आपराधिक न्याय प्रणाली में एक निश्चित हितधारक होता है।" 

न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरका आर 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुयान और न्यायमूर्ति अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने रेणुका जैन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य एवं अन्य (2026) मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्त के समान, पीड़ित को भी त्वरित एवं निष्पक्ष विचारण का अधिकार है तथा वह विचारण का शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित करने के लिये भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है। न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया जिसमें पीड़िता की याचिका को तुच्छ बताकर खारिज कर दिया गया था और उस पर 10,000 रुपए का जुर्माना अधिरोपित किया गया था। 

रेणुका जैन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य एवं अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 420 के अधीन दर्ज FIR में वास्तविक परिवादकर्त्ता था। 
  • अन्वेषण के बाद, आरोप पत्र दाखिल किया गया और मामला प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज किया गया। 
  • विचारण में हुए विलंब से व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय का रुख किया था। 
    • उच्च न्यायालय ने विचारण न्यायालय को आरोप विरचित होने के दो वर्ष के भीतर कार्यवाही पूरी करने का निदेश दिया। 
  • विचारण में बहुत कम प्रगति हुई, इसलिये उसने शीघ्र निपटान के लिये निदेश मांगने हेतु धारा 528 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन फिर से उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • अभियोजन पक्ष ने इस प्रकार की कार्यवाही शुरू करने के लिये उनकी विधिक वैधता पर प्रश्न उठाया। 
  • उच्च न्यायालय ने अभियोजन पक्ष की आपत्ति स्वीकार कर ली। न्यायालय ने कहा कि: 
    • राज्य द्वारा चलाए जा रहे अभियोजन में, परिवादकर्त्ता की भूमिका केवल एक साक्षी होने तक सीमित होती है। 
    • ऐसी याचिका केवल राज्य या अभियुक्त ही दायर कर सकता है। 
  • उच्च न्यायालय ने उनकी याचिका को तुच्छ और न्यायालय के पहले से ही भरे हुए मामलों के भार को कम करने वाला बताते हुए खारिज कर दिया और उन पर 10,000 रुपए का जुर्माना अधिरोपित किया। 
  • अपीलकर्त्ता ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

पीड़ित की भूमिका पर: 

  • यह कहना सही नहीं है कि पीड़ित की भूमिका केवल साक्षी होने तक ही सीमित है। 
  • पीड़ित या पीड़ित का विधिक संरक्षक आपराधिक न्याय प्रणाली में एक निश्चित हितधारक होता है। 
  • पीड़िता आपराधिक कार्यवाही से अपरिचित नहीं है। वही वह व्यक्ति है जिसे अभियुक्त के हाथों नुकसान या क्षति पहुँची है। 

पीड़ित के त्वरित विचारण के अधिकार पर: 

  • अभियुक्त की तरह पीड़ित को भी त्वरित विचारण और निष्पक्ष विचारण की मांग करने का अंतर्निहित अधिकार है। 
  • न्यायालय ने केशवेंद्र सिंह बनाम शंकर सिंह (2026) के मामले पर विश्वास किया, जिसमें यह माना गया था कि त्वरित विचारण का अधिकार न केवल अभियुक्त का विशेषाधिकार है अपितु पीड़ित का भी एक मूल्यवान अधिकार है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन सुनवाई का अधिकार (Locus Standi) के संबंध में:  

  • सांविधिक योजना को पढ़ने पर, पीड़ित को निश्चित रूप से त्वरित विचारण की मांग करने का अधिकार है। 
  • वह विचारण की कार्यवाही में शीघ्रता लाने के लिये विचारण न्यायालय को निदेश जारी किये जाने की मांग करते हुए भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन उच्च न्यायालय में याचिका प्रस्तुत कर सकती है। 

उच्च न्यायालय के दृष्टिकोण और लागत के संबंध में: 

  • उच्च न्यायालय द्वारा पीड़िता की याचिका को पूरी तरह से तुच्छ या न्यायालय के कामकाज पर भार बताने का निर्णय उचित नहीं था। 
  • इसका निर्णय विधिक और सांविधानिक प्रावधानों की पूरी तरह से गलत व्याख्या पर आधारित था और इसे बरकरार नहीं रखा जा सकता था। 
  • तदनुसार, अपीलकर्त्ता पर अधिरोपित किये गए जुर्माने को अपास्त कर दिया गया। 

विचारण न्यायालय को दिये गए निदेशों पर: 

  • राज्य ने न्यायालय को सूचित किया कि अभियोजन पक्ष के 22 साक्षियों के नाम दर्ज किये गए थे, जिनमें से एक को हटा दिया गया है। 
  • न्यायालय ने अभिलिखित किया कि अभियोजन पक्ष के 21 साक्षी अभी भी मौजूद हैं और PW-1 से प्रतिपरीक्षा की जा रही है। 
  • इसने विचारण न्यायालय को निदेश दिया कि वह 24 सितंबर 2026 से एक वर्ष की अधिकतम सीमा के भीतर कार्यवाही को शीघ्रता से समाप्त करे। 

निष्कर्ष 

  • विधिक स्थिति: त्वरित विचारण का अधिकार पीड़ित और अभियुक्त दोनों को प्राप्त है। पीड़ित को धारा 528 भारित नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन उच्च न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार है, जिसमें विचारण में तेजी लाने का निदेश मांगा जा सकता है।  
  • परिणाम: अपील मंजूर कर ली गई, उच्च न्यायालय का आदेश और लागत अपास्त कर दी गई, और विचारण न्यायालय को 24 सितंबर 2026 से एक वर्ष के भीतर विचारण को समाप्त करने का निदेश दिया गया। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों की व्यावृत्ति है। 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC)) की धारा 482 के अनुरूप है। 
  • इससे कोई नई शक्ति प्राप्त नहीं होती। यह केवल उन अंतर्निहित शक्तियों को मान्यता देता है जो उच्च न्यायालय के पास पहले से ही विद्यमान हैं।        

उपबंध : 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में ऐसा कुछ भी नहीं माना जाएगा जिससे उच्च न्यायालय की आवश्यक आदेश देने की अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित किया जा सके।  
    • संहिता के अंतर्गत किसी आदेश को प्रभावी करने के लिये; या 
    • किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये; या 
    • अन्यथा न्याय के उद्देश्यों को सुरक्षित करने के लिये। 

त्वरित विचारण का अधिकार क्या है? 

 बारे में: 

  • भारत के संविधान में त्वरित विचारण के अधिकार का स्पष्ट रूप से उल्लेख नहीं है। इसे प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार के अंतर्गत अनुच्छेद 21 में शामिल किया गया है। 
  • हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने त्वरित विचारण के अधिकार को अनुच्छेद 21 के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता दी। 
  • परंपरागत रूप से, इस अधिकार को मुख्य रूप से अभियुक्त को लंबे समय तक कारावास और लंबित विचारण की चिंता से बचाने के रूप में समझा जाता था। 
  • केशवेंद्र सिंह बनाम शंकर सिंह (2026) और रेणुका जैन बनाम दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र राज्य (2026) जैसे निर्णयों के माध्यम से, उच्चतम न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पीड़ित भी इस अधिकार का समान रूप से हकदार है।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन पीड़ित: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 2(1)(म) (पूर्व में धारा 2(बक) दण्ड प्रक्रिया संहिता) "पीड़ित" को ऐसे व्यक्ति के रूप में परिभाषित करती है जिसे अभियुक्त के कृत्य या लोप के कारण कोई हानि या क्षति पहुँची हो। इस शब्द में ऐसे पीड़ित का संरक्षक या विधिक वारिस भी शामिल है।   
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पीड़ित को विशिष्ट सहभागी अधिकार भी प्रदान करता है, जैसे कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 360 के अधीन राज्य द्वारा मामला वापस लेने से पहले सुनवाई का अधिकार।