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सिविल कानून

आवश्यक पक्षकार के बिना समझौता डिक्री अकृत है

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 01-Oct-2026

गीता बाई एवं अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह और अन्य

"दिवंगत श्रीमती बल्लो बाई या उनके विधिक वारिसों को पक्षकार बनाए बिना पारित समझौता डिक्री, जबकि वह वाद में एक आवश्यक पक्षकार थीं, विधि की दृष्टि में अकृत थी।"

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता

स्रोत: उच्चतम न्यायालय

चर्चा में क्यों?

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ ने गीता बाई एवं अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह एवं अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि विभाजन के वाद में आवश्यक पक्षकार को पक्षकार बनाए बिना प्राप्त किया गया समझौता डिक्री अकृत है। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि छूटे हुए पक्षकार को डिक्री पारित करने वाले न्यायालय के समक्ष ऐसे डिक्री को वापस लेने की अपील करने का अधिकार है।

गीता बाई और अन्य बनाम के. अर्जुन सिंह और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • संपत्ति के मालिक की निर्वसीयत मृत्यु हो गई, और वे अपने पीछे चार बच्चे छोड़ गए, जिनमें एक पुत्री, स्वर्गीय श्रीमती बल्लो बाई भी शामिल थीं।
  • अपीलकर्त्ताओं ने, मृतक पुत्री के विधिक उत्तराधिकारी होने के नाते, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के अधीन अपने नाना की संपत्ति में 1/4 हिस्से का दावा किया। उन्होंने तर्क दिया कि संपत्ति उनके चार बच्चों के बीच समान रूप से विभाजित हुई थी।
  • सहदायिकी संपत्ति के बंटवारे के लिये एक वाद दायर किया गया और विचारण न्यायालय में मुकदमेबाजी के कई दौर चले।
  • तेलंगाना उच्च न्यायालय ने अंततः भाइयों/विधिक वारिसों (वादी के रूप में) और प्रतिवादियों के बीच हुए समझौते के आधार पर एक समझौता डिक्री पारित की।
  • यद्यपि, स्वर्गीय श्रीमती बल्लो बाई और उनके विधिक उत्तराधिकारी को वाद की किसी भी अवस्था में पक्षकार के रूप में शामिल नहीं किया गया था।
  • अपीलकर्त्ताओं ने समझौते डिक्री के विरुद्ध अपील याचिकाएं दायर कीं। उच्च न्यायालय ने उन्हें यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उनके पास पृथक् वाद दायर करने या अनुमति लेने के बाद उच्च न्यायालय में अपील करने का विकल्प है।
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि वे वाद के आवश्यक पक्षकार थे और उच्च न्यायालय ने उनके अधिकारों की अनदेखी की थी।

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

  • समझौता डिक्री का अकृत होना: न्यायालय ने माना कि मृतक की पुत्री या उसके विधिक उत्तराधिकारी को पक्षकार बनाए बिना, जबकि वह एक आवश्यक पक्षकार थी, वादी और प्रतिवादियों द्वारा प्राप्त समझौता डिक्री विधि की दृष्टि में अकृत थी।
  • अपीलकर्त्ताओं को मुकदमे से अजनबी न मानने के संबंध में: न्यायालय ने पाया कि मृतक पुत्री और उसके विधिक उत्तराधिकारी को किसी भी प्रकार से वाद से अजनबी नहीं माना जा सकता। सहदायिकी संपत्ति में उनके अधिकार विभाजन की कार्यवाही के परिणाम से सीधे प्रभावित होते हैं।
  • सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम 3क की अप्रयोज्यता पर: न्यायालय ने माना कि आदेश 23 नियम 3क के अधीन लगाया गया प्रतिबंध, जो किसी समझौते डिक्री को विधिविरुद्ध बताते हुए उसे अपास्त करने के लिये नया वाद दायर करने को वर्जित करता है, विधि की अवहेलना करते हुए पारित किये गए समझौते डिक्री के विरुद्ध लागू नहीं होगा।
  • निर्णय वापस लेने के अधिकार पर: न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कार्यवाही से अपवर्जित आवश्यक पक्षकार, अपने पीछे उसकी जानकारी के बिना पारित की गई समझौता डिक्री को चुनौती देने तथा उसे पारित करने वाले न्यायालय के समक्ष उक्त डिक्री को वापस लेने की मांग करने का हकदार था। सांविधिक वर्जिन का उपयोग उसे इस अधिकार से वंचित करने के लिये नहीं किया जा सकता था।
  • उच्च न्यायालय की त्रुटि पर: न्यायालय ने पाया कि उच्च न्यायालय द्वारा पुनः नियुक्ति आवेदनों को अस्वीकार करने और अपीलकर्त्ताओं को एक पृथक् वाद या अपील में भेजने का दृष्टिकोण त्रुटिपूर्ण था।
  • परिणाम: अपील मंजूर कर ली गई और मामले को उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया जिससे उच्चतम न्यायालय की टिप्पणियों के आलोक में पुनः नियुक्ति आवेदनों पर नए सिरे से विचार किया जा सके।

आवश्यक पक्षकार  क्या है?

अर्थ:

  • एक आवश्यक पक्षकार वह होता है जिसके बिना कोई भी आदेश प्रभावी ढंग से पारित नहीं किया जा सकता। वाद के उचित गठन के लिये उनकी उपस्थिति अत्यावश्यक है।
  • इसमें वे पक्षकार शामिल हैं जिनके अधिकार कार्यवाही से सीधे प्रभावित होते हैं और जिनकी उपस्थिति न्यायालय द्वारा प्रभावी निर्णय पारित करने के लिये आवश्यक है।

आवश्यक पक्षकार का निर्धारण करने के लिये दो परीक्षण:

  • संबंधित कार्यवाही में शामिल मामले के संबंध में ऐसे पक्षकार के विरुद्ध कुछ अनुतोष प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिये।
  • ऐसे पक्षकार की अनुपस्थिति में प्रभावी निर्णय पारित करना संभव नहीं होना चाहिये।
  • इन परीक्षणों की पुष्टि उच्चतम न्यायालय ने कस्तूरी बनाम अय्यमपेरुमल (2005) के मामले में की थी ।

सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सांविधिक ढाँचा:

  • आदेश 1 नियम 9: पक्षकारों के कुसंयोजन या असंयोजन न होने मात्र से कोई वाद खारिज नहीं होगा। यद्यपि, परंतुक में स्पष्ट किया गया है कि यह नियम आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन न होने पर लागू नहीं होता है।
  • आदेश I नियम 10(2): न्यायालय कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में किसी भी व्यक्ति को जोड़ सकता है जिसे शामिल किया जाना चाहिये था, या जिसकी उपस्थिति वाद में शामिल सभी प्रश्नों का प्रभावी और पूर्ण रूप से निर्णय करने के लिये आवश्यक है।

आवश्यक पक्षकार बनाम उचित पक्षकार:

  • एक आवश्यक पक्षकार वह होता है जिसकी अनुपस्थिति में कोई भी प्रभावी निर्णय पारित नहीं किया जा सकता है।
  • उचित पक्षकार वह होता है जिसकी उपस्थिति अपरिहार्य नहीं होती है, लेकिन उसकी उपस्थिति से न्यायालय मामले का अधिक प्रभावी और पूर्ण ढंग से निर्णय कर पाता है।
  • इस अंतर को मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट (पी.) लिमिटेड बनाम रीजेंसी कन्वेंशन सेंटर एंड होटल्स (पी.) लिमिटेड (2010) में स्पष्ट किया गया था ।

आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन के परिणाम:

  • पीड़ित पक्षकार की बात सुने बिना पारित किया गया कोई भी आदेश शून्य है।
  • प्रभावित पक्षकार ऐसे आदेशों को बाध्यकारी न मानते हुए अनदेखा कर सकता है।
  • आवश्यक पक्षकार के अभाव में कार्यवाही पूरी तरह से विफल हो सकती है।

समझौता डिक्री क्या होता है?

अर्थ:

  • समझौता डिक्री वह डिक्री होती है जो किसी वाद के पक्षकारों के बीच हुए वैध करार या सुलह के आधार पर न्यायालय द्वारा पारित की जाती है। यह विवाद को पूर्ण या आंशिक रूप से सुलझाती है।
  • यह मूलतः पक्षकारों के बीच एक संविदा है जिस पर न्यायालय की मुद्रा लगी होती है।

सिविल प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत सांविधिक ढाँचा :

  • आदेश 23 नियम 3: जहाँ न्यायालय संतुष्ट है कि किसी वाद का निपटारा पूर्णतः या आंशिकतः वैध करार या लिखित रूप में तथा पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते द्वारा किया गया है, तो वह समझौते को दर्ज करेगा तथा तदनुसार डिक्री पारित करेगा।
  • आदेश 23 नियम 3क: किसी डिक्री को इस आधार पर अपास्त करने के लिये कोई वाद नहीं चलेगा कि जिस समझौते पर वह आधारित है वह वैध नहीं था।
  • धारा 96(3): पक्षकारों की सहमति से न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं होती।
  • आदेश 43 नियम 1क (2): समझौता दर्ज करने के बाद पारित डिक्री के विरुद्ध अपील में, एक पक्षकार यह तर्क दे सकता है कि समझौता दर्ज किया जाना चाहिये था या नहीं।

समझौता डिक्री के विरुद्ध उपचार:

  • समझौते की वैधता पर विवाद करने वाले पक्षकार को सामान्यतः उसी न्यायालय में जाना चाहिये जिसने समझौता अभिलिखित किया था। पुष्पा देवी भगत बनाम राजिंदर सिंह (2006) के मामले में जैसा कहा गया है, पृथक् वाद दायर करना उचित नहीं है।
  • समझौता अभिलिखित करने वाले न्यायालय को डिक्री पारित करने से पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि करार वैध है, जैसा कि बनवारी लाल बनाम चंदो देवी (1993) में बल दिया गया है ।
  • जैसा कि इस मामले में स्पष्ट किया गया है, एक आवश्यक पक्षकार जिसे कभी पक्षकार नहीं बनाया गया, वह विवाद से अपरिचित नहीं है। ऐसा पक्षकार उस न्यायालय के समक्ष समझौता डिक्री को वापस लेने की मांग कर सकता है जिसने इसे पारित किया था, क्योंकि डिक्री अकृत है और आदेश 23 नियम 3क के अधीन वर्जन इसे संरक्षण नहीं देता है।