- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
सिविल कानून
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 के अधीन स्वतंत्रता आदेश 2 नियम 2 के वर्जन का निवारण नहीं कर सकती
« »30-Sep-2026
|
बॉम्बे गैराज अहमदाबाद लिमिटेड और अन्य बनाम जे.पी. इस्कोन प्राइवेट लिमिटेड और अन्य "वाद संस्थित करते समय न्यायालय की अनुमति नहीं मांगी गई थी और वाद प्रत्याहरण के समय मांगी गई स्वतंत्रता, वाद संस्थित किये जाने के समय प्राप्त की जाने वाली अनुमति के अभाव से उत्पन्न दोष को दूर नहीं करती है ।" न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने बॉम्बे गैराज अहमदाबाद लिमिटेड और अन्य बनाम जे.पी. इस्कोन प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 23 नियम 1(3) को आदेश 2 नियम 2(3) के अधीन अनुमति के विकल्प के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है। यदि कोई वादी न्यायालय की अनुमति के बिना वाद दायर करते समय उपलब्ध किसी अनुतोष को छोड़ देता है, तो प्रत्याहरण के प्रक्रम में दी गई स्वतंत्रता बाद के वाद में लोपित अनुतोष का दावा करने के अधिकार को पुनर्जीवित नहीं करती है।
बॉम्बे गैराज अहमदाबाद लिमिटेड और अन्य बनाम जे.पी. इस्कोन प्राइवेट लिमिटेड और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद अचल संपत्ति की विक्रय के लिये कथित मौखिक करार से उत्पन्न हुआ था।
- वादी (प्रत्यर्थी संख्या 1) ने पहले केवल स्थायी व्यादेश की मांग करते हुए वाद दायर किया था। यद्यपि उस समय वादी को विनिर्दिष्ट पालन का अधिकार उपलब्ध था, फिर भी उसने इसका दावा नहीं किया और बाद में इसके लिये वाद दायर करने हेतु आदेश 2 नियम 2 के अंतर्गत न्यायालय से कोई अनुमति प्राप्त नहीं की गई।
- बाद में चल रही समझौता वार्ता का हवाला देते हुए प्रथम वाद वापस ले लिया गया, जिसमें नए वाद दायर करने की स्वतंत्रता भी शामिल थी।
- इसके बाद वादी ने कथित मौखिक करार के विनिर्दिष्ट पालन की मांग करते हुए द्वितीय वाद दायर किया।
- विचारण न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय ने वादी के पक्ष में निर्णय दिया।
- इससे व्यथित होकर संपत्ति के खरीदारों (अपीलकर्त्ताओं) ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
आदेश 2 नियम 2 और आदेश 23 नियम 1 के बीच संबंध पर:
- न्यायालय ने माना कि वादी आदेश 23 नियम 1(3) के अधीन प्राप्त स्वतंत्रता का उपयोग आदेश 2 नियम 2(3) के अधीन अनुमति के विकल्प के रूप में नहीं कर सकता है।
- इसमें यह पाया गया कि आदेश 2 नियम 2 के अधीन अनुमति वाद दायर करते समय प्राप्त की जानी चाहिये, और वापसी के समय मांगी गई स्वतंत्रता ऐसी अनुमति प्राप्त न करने के दोष को दूर नहीं करती है।
आदेश 2 नियम 2 के वर्जन की प्रयोज्यता पर:
- न्यायालय ने माना कि दूसरा वाद स्पष्ट रूप से आदेश 2 नियम 2 के अधीन वर्जित दायरे में आता है।
- इसमें स्पष्ट किया गया कि यह नियम तब लागू होता है जब कोई पूर्ववर्ती वाद, जिसमें वादी ने अपने लिये उपलब्ध सभी अनुतोषों की मांग नहीं की थी, एक नया वाद दायर करने के लिये वापस ले लिया जाता है। ऐसे मामले में, दूसरा वाद तभी विचारणीय है जब वादी ने पहले वाद को दायर करते समय न्यायालय से उन अनुतोषों को उठाने की अनुमति प्राप्त की हो जिनकी मांग नहीं की गई थी।
प्रत्याहरण के समय दी गई स्वतंत्रता के दायरे पर:
- न्यायालय ने कहा कि जब पहला वाद दायर किया गया था तब कोई अनुमति नहीं ली गई थी, यद्यपि उस समय विनिर्दिष्ट पालन का अनुतोष उपलब्ध था।
- इसमें कहा गया कि प्रत्याहरण के समय दी गई स्वतंत्रता ने वादी को केवल व्यादेश की प्रार्थना के साथ एक नया वाद दायर करने में सक्षम बनाया, न कि विनिर्दिष्ट पालन के लिये अतिरिक्त प्रार्थना के साथ।
वादी द्वारा संशोधन की मांग न करने के संबंध में:
- न्यायालय ने इस दलील पर ध्यान दिया कि नया वाद ऐसे समय में दायर किया गया था जब पहले वाद में संशोधन करके विनिर्दिष्ट पालन के अनुतोष को जोड़ा जा सकता था।
- चूँकि इस प्रकार के किसी संशोधन की मांग नहीं की गई थी, इसलिये दूसरा वाद आदेश 2 नियम 2 की कठोरता के दायरे में पूरी तरह से आ गया।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने विचारण न्यायालय और गुजरात उच्च न्यायालय के निष्कर्षों को अपास्त रद्द कर दिया, अपील को मंजूर कर लिया और विनिर्दिष्ट पालन के लिये दायर दूसरे वाद को खारिज कर दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 2 नियम 2 क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 2 नियम 2 में इस आवश्यकता का उल्लेख है कि किसी वाद में किसी वाद-हेतुक से उत्पन्न होने वाले संपूर्ण दावे को शामिल किया जाना चाहिये।
- यह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 2 (वाद का ढाँचा) के अंतर्गत आता है।
- यह इस सिद्धांत पर आधारित है कि किसी प्रतिवादी को एक ही वाद-हेतुक के लिये दो बार तंग नहीं किया जाना चाहिये, और यह दावों और अनुतोषों के विभाजन को रोकता है।
उपबंध :
आदेश 2 नियम 2 में कहा गया है:
उपनियम (1): वाद के अंतर्गत संपूर्ण दावा होगा
- हर वाद के अंतर्गत वह पूरा दावा होगा जिसे उस वाद-हेतुक के विषय में करने का वादी हकदार है, किंतु वादी वाद को किसी न्यायालय की अधिकारिता के भीतर लाने की दृष्टि से अपने दावे के किसी भाग का त्याग कर सकेगा।
उपनियम (2): दावे के एक भाग का त्याग
- "जहाँ वादी अपने दावे के किसी भाग के बारे में वाद लाने का लोप करता है या उसे साशय त्याग देता है वहाँ उसके पश्चात् वह इस प्रकार लोप किये गए या त्यक्त भाग के बारे में वाद नहीं लाएगा।"
उपनियम (3): अनेक अनुतोषों में से किसी एक के लिये वाद दायर करने में लोप
- "कई अनुतोषों में से एक के लिये वाद लाने का लोप एक ही वाद-हेतुक के बारे में एक से अधिक अनुतोष पाने का हकदार व्यक्ति ऐसे सभी अनुतोषों या उनमें से किसी के लिये वाद ला सकेगा, किंतु यदि वह ऐसे सभी अनुतोषों के लिये वाद लाने का लोप न्यायालय की इजाजत के बिना करता है तो उसके पश्चात् वह इस प्रकार लोप किये गए किसी भी अनुतोष के लिये वाद नहीं लाएगा।"
स्पष्टीकरण:
- "इस नियम के प्रयोजनों के लिये, कोई बाध्यता और उसके पालन के लिये सांपार्श्विक प्रतिभूति और उसी बाध्यता के अधीन उद्भूत उत्तरोत्तर दावों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे क्रमशः एक ही वाद-हेतु गठित करते हैं।"
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 23 नियम 1 क्या है?
बारे में:
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 नियम 1 में वाद का प्रत्याहरण या दावे के भाग का परित्याग से संबंधित उपबंध हैं।
- यह सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 23 (वादों का प्रत्याहरण और समायोजन) के अंतर्गत आता है।
- यह पूर्ण प्रत्याहरण (जो एक नए वाद को रोकती है) और न्यायालय की अनुमति से प्रत्याहरण (जो उसी विषय पर एक नए वाद की अनुमति देती है) के बीच अंतर करता है।
उपबंध :
आदेश 23 नियम 1 में कहा गया है:
उपनियम (1):
- "वाद संस्थित किये जाने के पश्चात् किसी भी समय वादी सभी प्रतिवादियों या उनमें से किसी के विरुद्ध अपने वाद का परित्याग या अपने दावे के भाग का परित्याग कर सकेगा।"
- परंतु जहाँ वादी अवयस्क है या ऐसा व्यक्ति है, जिसे आदेश 32 के नियम । से नियम 14 तक के उपबंध लागू होते हैं वहाँ न्यायालय की इजाजत बिना न तो वाद का और न दावे के किसी भाग का परित्याग किया जाएगा।"
उपनियम (2):
- उपनियम (1) के परंतुक के अधीन इजाजत के लिये आवेदन के साथ वाद-मित्र का शपथपत्र देना होगा और यदि प्रस्थापित अवयस्क या ऐसे अन्य व्यक्ति का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा किया जाता है तो, प्लीडर को इस आशय का प्रमाणपत्र भी देना होगा कि परित्याग उसकी राय में अवयस्क या ऐसे अन्य व्यक्ति के फायदे के लिये है।
उपनियम (3):
जहाँ न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि,—
- (क) वाद किसी प्ररुपिक त्रुटि के कारण विफल हो जाएगा, या
- (ख) वाद की विषय-वस्तु या दावे के भाग के लिये नया वाद संस्थित करने के लिये वादी को अनुज्ञात करने के पर्याप्त आधार हैं।
वहाँ वह ऐसे निबंधनों पर जिन्हें वह ठीक समझे, वादी को ऐसे बाद की विषय-वस्तु या दावे के ऐसे भाग के संबंध में नया वाद संस्थित करने की स्वतंत्रता रखते हुए ऐसे वाद से या दावे के ऐसे भाग से अपने को प्रत्याहृत करने की अनुज्ञा दे सकेगा।
उपनियम (4):
"जहाँ वादी—
- (क) उपनियम (1) के अधीन किसी वाद का या दावे के भाग का परित्याग करता है, या
- (ख) उपनियम (3) में निर्दिष्ट अनुज्ञा के बिना वाद से या दावे के भाग से प्रत्याहृत कर लेता हैं,
वहाँ वह ऐसे खर्च के लिये दायी होगा जो न्यायालय अधिनिर्णीत करें और वह ऐसी विषय-वस्तु या दावे के ऐसे भाग के बारे में कोई नवा वाद संस्थित करने से प्रवारित होगा।
उपनियम (5):
- इस नियम की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह न्यायालय को अनेक वादियों में से एक वादी को उपनियम (1) के अधीन वाद या दावे के किसी भाग का परित्याग करने या किसी वाद या दावे का अन्य वादियों की सहमति के बिना उपनियम (3) के अधीन प्रत्याहरण करने की अनुज्ञा देने के लिये प्राधिकृत करती हैं।