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आपराधिक कानून

2018 के संशोधन अधिनियम का निरसन, परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 148 को प्रभावित नहीं करता है

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 09-Oct-2026

ए.एल.डी. इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम बलजीत सिंह 

"संशोधन अधिनियम को निरस्त करने से मूल अधिनियम में पहले से ही शामिल किये गए संशोधन समाप्त नहीं हो जाते।" 

न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमैन 

स्रोत: राजस्थान उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अनिल कुमार उपमान ने ए.एल.डी. इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम बलजीत सिंह (2026) मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 148, जो अपीलीय न्यायालय को दोषसिद्ध अपीलार्थी को जुर्माने या प्रतिकर की राशि का कम-से-कम 20% जमा करने का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करती है, इसे समाविष्ट करने वाले 2018 के संशोधन अधिनियम के निरसन के होते हुए भी प्रभावी बनी हुई है। न्यायालय ने यह भी अभिनिर्धारित किया कि केवल वित्तीय कठिनाई निक्षेप से छूट प्रदान करने के लिये असाधारण परिस्थिति नहीं है। अपील खारिज कर दी गई। 

ए.एल.डी. इन्फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड बनाम बलजीत सिंह (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता को परक्राम्य लिखत अधिनियम के अधीन चेक अनादरण के अपराध के लिये दोषी ठहराया गया था।  
  • दोषसिद्धि के विरुद्ध उनकी अपील की सुनवाई करते हुए, अपीलीय न्यायालय ने उन्हें परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 148 के अधीन विचारण न्यायालय द्वारा दिये गए प्रतिकर का 20% जमा करने का निदेश दिया। 
  • अपीलकर्त्ता ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उसने तर्क दिया कि: 
    • धारा 148 को परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा परक्राम्य लिखत अधिनियम में जोड़ा गया था। 
    • 2018 के संशोधन अधिनियम को निरसन एवं संशोधन अधिनियम, 2025 द्वारा निरस्त कर दिया गया था। 
    • चूँकि धारा 148 को लागू करने वाला दस्तावेज निरस्त कर दिया गया था, इसलिये यह उपबंध अब लागू नहीं रह सकता था। 
  • उन्होंने आगे तर्क दिया कि: 
    • धारा 148 में "हो सकता है" शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिये जमा (निक्षेप) स्वचालित नहीं है। 
    • जंबू भंडारी बनाम मध्य प्रदेश इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन लिमिटेड और अन्य के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि अपवाद तब किया जा सकता है जब अपीलीय न्यायालय संतुष्ट हो कि जमा की शर्त लगाना अन्यायपूर्ण होगा या अपीलकर्त्ता को अपील के अधिकार से वंचित कर देगा। 
    • यह जमा राशि उस पर असाधारण रूप से भारी वित्तीय भार अधिरोपित करेगी, और इसे एक असाधारण स्थिति के रूप में माना जाना चाहिये। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

किसी संशोधन अधिनियम के निरसन के प्रभाव पर: 

  • न्यायालय ने इंडिपेंडेंट स्कूल्स फेडरेशन ऑफ इंडिया बनाम भारत संघ के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया। उस निर्णय में यह माना गया था कि मूल अधिनियम में जोड़ा गया प्रावधान संशोधन अधिनियम के निरस्त होने के बाद भी विधि की किताब में बना रहता है। 
  • यह सांविधिक निर्वचन का एक सुस्थापित सिद्धांत है कि एक बार किसी संशोधन को मूल अधिनियम में समाविष्ट कर दिये जाने के पश्चात्, वह उस अधिनियम का भाग बन जाता है तथा अपनी विधिक शक्ति मूल अधिनियम से प्राप्त करता है। 
  • संशोधन अधिनियम को निरस्त करने से केवल संशोधन अधिनियम का एक स्वतंत्र विधायी उपाय के रूप में अस्तित्व समाप्त होता है। इससे मूल अधिनियम में पहले से शामिल किये गए संशोधन समाप्त नहीं होते। 

साधारण खंड अधिनियम, 1897 की धारा 6ए पर: 

  • न्यायालय ने साधारण खंड अधिनियम की धारा 6क का उल्लेख किया, जो किसी ऐसे अधिनियम को निरस्त करने से संबंधित है जो किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम में संशोधन करता है।   
  • धारा 6क के अधीन, इस प्रकार के निरसन से निरस्त अधिनियम द्वारा किये गए किसी भी संशोधन की निरंतरता प्रभावित नहीं होती है। 
  • अत: 2018 के संशोधन अधिनियम के निरस्त होने के बावजूद, परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 148 लागू रहेगी।  

वित्तीय कठिनाई के आधार पर प्रस्तुत अभिवचन के संबंध में: 

  • यह तर्क कि जमा राशि से वित्तीय कठिनाई होगी, अपने आप में कोई असाधारण परिस्थिति नहीं हो सकती। 
  • यह जंबू भंडारी मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा परिकल्पित अपवाद को आकर्षित नहीं करता है ।  

निष्कर्ष 

  • विधिक स्थिति: परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 2018 के निरस्त होते भी, परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 148 लागू रहेगी, क्योंकि मूल अधिनियम में शामिल संशोधन, संशोधन अधिनियम के निरस्त होने के बाद भी प्रभावी रहता है। केवल वित्तीय कठिनाई के आधार पर 20% पूर्व जमा राशि माफ करना उचित नहीं है। 
  • परिणाम: अपील खारिज कर दी गई और अपीलीय न्यायालय द्वारा 20% जमा राशि का निदेश देने वाले आदेश को बरकरार रखा गया। 

परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 148 क्या है? 

 बारे में: 

  • परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 की धारा 148 अपील न्यायालय को दोषसिद्धि के विरुद्ध अपील लंबित रहने के दौरान संदाय का आदेश देने का अधिकार देती है। 
  • इसे परक्राम्य लिखत (संशोधन) अधिनियम, 2018 द्वारा जोड़ा गया था, जो 1 सितंबर 2018 से लागू हुआ। 
  • इसका उद्देश्य भुगतानकर्ताओं को परिवादकर्त्ता को संदाय में विलंब करने के लिये अपील का प्रयोग करने से रोकना है। 

उपबंध: 

  • धारा 148(1): धारा 138 के अधीन दोषसिद्धि के विरुद्ध लेखीवाल द्वारा अपील करने पर, अपील न्यायालय अपीलकर्त्ता को जुर्माना या विचारण न्यायालय द्वारा दिये गए प्रतिकर के 20% के समान न्यूनतम राशि जमा करने का आदेश दे सकता है। यह राशि धारा 143क के अधीन संदाय किये गए किसी भी अंतरिम प्रतिकर के अतिरिक्त होगी। 
  • धारा 148(2): राशि आदेश की तिथि से 60 दिनों के भीतर, या अपीलकर्त्ता द्वारा पर्याप्त कारण बताए जाने पर 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के भीतर जमा की जानी चाहिये। 
  • धारा 148(3): अपील न्यायालय अपील लंबित रहने के दौरान किसी भी समय परिवादकर्त्ता को जमा राशि जारी करने का निदेश दे सकता है। 
  • धारा 148(3) का परंतुक: यदि अपीलकर्त्ता को दोषमुक्त कर दिया जाता है, तो न्यायालय परिवादकर्त्ता को आदेश देगा कि वह जारी की गई राशि को संबंधित वित्तीय वर्ष के प्रारंभ में भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा प्रकाशित बैंक दर पर ब्याज सहित आदेश के 60 दिनों के भीतर, या पर्याप्त कारण होने पर 30 दिनों की अतिरिक्त अवधि के भीतर चुकाए।