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सांविधानिक विधि
निवारक निरोध और राज्य की शक्ति की सीमाएँ
«14-Oct-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
दिल्ली पुलिस ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग करने तथा SIR को वापस लेने की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन करने हेतु जंतर-मंतर पहुँचने का प्रयास कर रहे 5,000 से अधिक व्यक्तियों को निरोध में लिया। निरुद्ध किये गए व्यक्तियों में कथित रूप से राजनीतिक नेता, अधिवक्ता, पत्रकार, विद्यार्थी तथा कार्यकर्ता शामिल थे। इनमें से कुछ व्यक्तियों को विरोध-प्रदर्शन प्रारंभ होने से पूर्व ही निरुद्ध किया गया था। 11 अक्टूबर, 2026 को उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार तथा दिल्ली पुलिस को विधि एवं व्यवस्था के अधीन रहते हुए व्यक्तियों की स्वतंत्र आवाजाही सुनिश्चित करने का निदेश दिया। यह घटनाक्रम निवारक निरोध तथा निषेधात्मक आदेशों के विस्तार और प्रयोज्यता के साथ-साथ इन दोनों पर लागू सांविधानिक सीमाओं से संबंधित महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता हैं।
निवारक निरोध क्या है?
- निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को न्यायालय द्वारा विचारण या दोषसिद्धि के बिना निरोध में रखना।
- इसका उद्देश्य अतीत में किये गए किसी कृत्य को दण्डित करना नहीं है, अपितु व्यक्ति को भविष्य में अपराध करने से रोकना है।
- इसका प्रयोग लोक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा और विधि व्यवस्था बनाए रखने जैसे आधारों पर किया जा सकता है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) के अधीन किसी व्यक्ति को तब निरोध में लिया जा सकता है जब सरकार को यह विश्वास हो जाए कि उसकी गतिविधियां भारत की रक्षा, विदेशी शक्तियों के साथ भारत के संबंधों या राज्य की सुरक्षा के लिये हानिकारक हैं। इस अधिनियम के अधीन निरोध की अधिकतम अवधि 12 महीने है।
सांविधानिक सुरक्षा उपाय क्या हैं?
संविधान का अनुच्छेद 22 व्यक्तियों को मनमाने निरोध से संरक्षण प्रदान करता है:
- अनुच्छेद 22(3): खंड (1) और (2) के अधीन गिरफ्तारी के सामान्य सुरक्षा उपाय निवारक निरोध विधि के अधीन निरुद्ध किये गए व्यक्तियों पर लागू नहीं होते हैं।
- अनुच्छेद 22(4): किसी भी व्यक्ति को तीन महीने से अधिक समय तक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता है जब तक कि सलाहकार बोर्ड निरंतर निरोध के लिये पर्याप्त कारण की रिपोर्ट न दे।
- अनुच्छेद 22(5): निरोध के आधार यथाशीघ्र बंदी को सूचित किया जाना चाहिये, और उसे प्रतिनिधित्व करने का शीघ्र अवसर दिया जाना चाहिये।
- अनुच्छेद 22(6): लोकहित के विरुद्ध माने जाने वाले तथ्यों का प्रकट करना आवश्यक नहीं है।
- अनुच्छेद 22(7): संसद सलाहकार बोर्ड की राय के बिना तीन महीने से अधिक की निरोध के लिये परिस्थितियाँ निर्धारित कर सकती है।
नजरबंदी आदेश भी न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं, और अनुच्छेद 32 और 226 के तहत बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका गैरकानूनी नजरबंदी के खिलाफ प्राथमिक उपाय है।
भारत में निवारक निरोध की व्यवस्था किस प्रकार विकसित हुई है?
- औपनिवेशिक काल: रॉलेट अधिनियम, 1919 और भारत रक्षा अधिनियम, 1939 ने बिना विचारण के निरोध में रखने की अनुमति दी, जो अक्सर स्वतंत्रता सेनानियों और राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध होता था।
- निवारक निरोध अधिनियम, 1950: भारत ने स्वतंत्रता के बाद भी निवारक निरोध को बरकरार रखा; यह अधिनियम 1969 तक लागू रहा।
- आंतरिक सुरक्षा अधिनियम (MISA, 1971): इस अधिनियम ने निरोध में लेने की शक्तियों का विस्तार किया और आपातकाल (1975-1977) के दौरान राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध इसका व्यापक रूप से प्रयोग किया गया। इसे 1978 में निरस्त कर दिया गया।
- राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 और विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम, 1974: इन्होंने तस्करी जैसे आर्थिक अपराधों सहित निवारक निरोध के लिये एक निरंतर ढाँचा तैयार किया।
- विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967: इसके संशोधनों ने आतंकवाद और विधिविरुद्ध गतिविधियों से निपटने के लिये राज्य की शक्तियों का विस्तार किया।
- न्यायिक परिवर्तन: मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह माना कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करने वाली कोई भी प्रक्रिया न्यायसंगत, निष्पक्ष और उचित होनी चाहिये।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन निषेधात्मक आदेश क्या है?
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 163 दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 144 के समान है।
- यह जिला मजिस्ट्रेट, उपखंड मजिस्ट्रेट अथवा विशेष रूप से सशक्त कार्यपालक मजिस्ट्रेट को ऐसे मामलों में आदेश जारी करने का अधिकार प्रदान करता है, जहाँ किसी तात्कालिक निवारण या शीघ्र उपचार की आवश्यकता हो।
- उद्देश्य: विधिपूर्वक नियोजित व्यक्तियों के कार्य में बाधा, क्षोभ या क्षति को रोकना; मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिये संकट; लोक शांति में विघ्न; दंगा अथवा मारपीट को रोकना।
प्रमुख विशेषताएँ:
- यह शक्ति निवारक प्रकृति की है तथा अत्यावश्यक परिस्थितियों में पूर्व सूचना दिए बिना भी इसका प्रयोग किया जा सकता है।
- आदेश में उन तात्त्विक तथ्यों का उल्लेख होना आवश्यक है, जिनके आधार पर वह जारी किया गया है।
- यह आदेश सामान्यतः अधिकतम दो माह तक प्रभावी रहता है, जिसे राज्य सरकार द्वारा बढ़ाकर अधिकतम छह माह तक किया जा सकता है।
- यह उच्च न्यायालयों की न्यायिक पुनर्विलोकन की अधिकारिता के अधीन है।
निवारक निरोध बनाम निषेधात्मक आदेश:
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आधार |
निवारक निरोध |
निषेधात्मक आदेश |
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प्रकृति |
किसी विशिष्ट व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्रतिबंधित करता है। |
किसी क्षेत्र में कतिपय कृत्यों पर प्रतिबंध लगाता है। |
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प्राधिकारी |
राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) जैसे अधिनियमों के अधीन सरकार। |
कार्यपालक मजिस्ट्रेट |
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संरक्षोपाय |
अनुच्छेद 22(4) से 22(7) के अंतर्गत सांविधानिक संरक्षण। |
अनुच्छेद 19 के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधन। |
उच्चतम न्यायालय ने 11 अक्टूबर 2026 को क्या आदेश दिया?
रविवार को हुई विशेष सुनवाई में, उच्चतम न्यायालय ने निम्नलिखित निदेश दिये:
- अवैध निरोध बंद होना चाहिये और विधि एवं लोक व्यवस्था के अधीन रहते हुए लोगों की आवाजाही, यातायात, मेट्रो और रेल सेवाओं की निर्बाध अनुमति दी जानी चाहिये।
- विधि के अनुसार इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध रहनी चाहिये, और विधि-व्यवस्था और यातायात की जरूरतों के आधार पर बैरिकेड्स की समीक्षा की जानी चाहिये।
- प्रत्येक निरोध की प्रक्रिया विधि द्वारा विहित प्रक्रिया के अनुसार ही होनी चाहिये।
- शांतिपूर्ण सभाओं की अनुमति दी जानी चाहिये, सिवाय उन क्षेत्रों के जो धारा 163 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन आदेशों के अंतर्गत आते हैं।
- न्यायालयों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिये उच्चतम न्यायालय के पास लगे धारा 163 के नोटिस बोर्ड हटाए जाने चाहिये।
- अधिवक्ताओं, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को उनके कर्त्तव्यों का पालन करने से नहीं रोका जाना चाहिये।
न्यायालय ने 9 अक्टूबर के अपने आदेश के उल्लंघन के लिये अवमानना कार्यवाही का नोटिस भी जारी किया, 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी और सामूहिक निरोध से संबंधित बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाओं को मुख्य मामले के साथ जोड़ दिया। न्यायालय ने राज्य से निरोध के विधिक आधार को स्पष्ट करने की मांग की और मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिये अनुच्छेद 32 के अधीन अपने कर्त्तव्य पर बल दिया।
न्यायालयों ने क्या निर्णय दिये हैं?
- बाबूलाल पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961): दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 144 वैध है, लेकिन इसका प्रयोग केवल आपात स्थिति में लोक व्यवस्था के लिये विशिष्ट खतरों को रोकने के लिये किया जा सकता है, और यह असीमित शक्ति नहीं है।
- मधु लिमाये बनाम उपखंड मजिस्ट्रेट (1971): इस शक्ति का प्रयोग न्यायिक रूप से और केवल आपातकालीन स्थितियों में किया जाना चाहिये, न कि नियमित रूप से।
- खुदीराम दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1975): निरोध के आधारों की संसूचना मनमानी शक्ति के विरुद्ध एक रोक है, जो बंदी को प्रतिनिधित्व करने और न्यायिक पुनर्विलोकन की मांग करने में सक्षम बनाता है।
- इन री: रामलीला मैदान घटना (2012): धारा 144 को केवल अचानक और गंभीर आपात स्थितियों में ही लागू किया जा सकता है; सोई हुई भीड़ के विरुद्ध इसके प्रयोग की आलोचना की गई थी।
- मजदूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध अत्यधिक था; अधिकारियों को इसके बजाय विरोध प्रदर्शनों को विनियमित करना चाहिये।
- शेख नाज़नीन बनाम तेलंगाना राज्य (2022): निवारक निरोध एक असाधारण शक्ति है जो स्वतंत्रता पर प्रहार करती है और इसका नियमित रूप से प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
- अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य (2023): अनुच्छेद 14, 19 और 21 के "स्वर्णिम त्रिकोण" की सुरक्षा को निवारक निरोध मामलों में लगन से लागू किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
निवारक निरोध और निषेधात्मक आदेश असाधारण परिस्थितियों के लिये हैं, जहाँ सामान्य विधि प्रवर्तन आसन्न खतरे को रोकने में बहुत धीमी पड़ सकती है। क्योंकि ये बिना विचारण के स्वतंत्रता को सीमित करते हैं, संविधान इन्हें अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपायों और अनुच्छेद 14, 19 और 21 के अधीन निष्पक्षता, तर्कसंगतता और आनुपातिकता के मानदंडों के अधीन करता है। दिल्ली के विरोध प्रदर्शन और उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप से यह स्पष्ट होता है कि लोक व्यवस्था बनाए रखने की शक्ति का उपयोग शांतिपूर्ण असहमति को दबाने के लिये नहीं किया जा सकता है, और न्यायालय व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अंतिम संरक्षक बने रहते हैं।