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सिविल कानून
वाद-हेतुक के अभाव में किसी पक्षकार को वाद में बने रहने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता
«14-Oct-2026
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मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य "...निजी प्रत्यर्थियों को ऐसे वाद में पक्षकार बनने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिसमें न तो वादी को उनके विरुद्ध कोई वाद-हेतुक प्राप्त हुआ है और न ही उनके विरुद्ध कोई अनुतोष मांगा गया है।" न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी |
स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति एम.ए. चौधरी ने मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन भूमि विवाद के वाद से तीन निजी व्यक्तियों को हटाने के विचारण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और कहा कि राजस्व अधिकारियों के साथ विवाद का निपटारा उनकी अनुपस्थिति में भी प्रभावी ढंग से किया जा सकता है। न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन दायर याचिका को खारिज कर दिया।
मोहम्मद सुल्तान भट बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
याचिकाकर्त्ता मोहम्मद सुल्तान भट ने श्रीनगर के तैलबल जिले के डेंजरपोरा स्थित भूमि के संबंध में घोषणा और स्थायी व्यादेश हेतु एक वाद दायर किया, जिसमें राजस्व अधिकारियों के साथ-साथ निजी व्यक्तियों को भी प्रतिवादी बनाया गया।
विवाद निम्नलिखित प्रकार से उत्पन्न हुआ:
- 1967 में दर्ज एक उत्तराधिकार परिवर्तन के अनुसार, याचिकाकर्त्ता के पिता की संपत्ति उसे और उसके भाई को अंतरित कर दी गई थी, जिसमें उनकी दो बहनों को शामिल नहीं किया गया था।
- बहनों में से एक ने वित्तीय आयुक्त के समक्ष इस परिवर्तन को चुनौती दी, जिन्होंने 2017 में इसे अपास्त कर दिया और मुस्लिम वैयक्तिक विधि के अनुसार नए सिरे से परिवर्तन की कार्यवाही शुरू करने का निदेश दिया।
याचिकाकर्त्ता ने यह प्रस्तुत किया कि:
- बाद में उनकी बहनों के साथ एक समझौता हुआ, जिसके अधीन एक बहन को उसका अंश नकद में मिला और दूसरी को जमीन दी गई।
- समझौते और सिविल कार्यवाही के लंबित होते हुए भी, राजस्व अधिकारियों ने निजी प्रत्यर्थियों के अनुरोध पर संपत्ति से संबंधित कार्यवाही जारी रखी।
निचली अदालत के समक्ष कार्यवाही:
- निजी प्रत्यर्थियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन वादपत्र को नामंजूर करने की मांग की, यह तर्क देते हुए कि कोई वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया था और उनके विरुद्ध कोई अनुतोष नहीं मांगा गया था।
- विचारण न्यायालय (तीसरे सिविल अधीनस्थ न्यायाधीश (वन मजिस्ट्रेट), श्रीनगर) ने वादपत्र को नामंजूर करने से इंकार कर दिया।
- यद्यपि, बाद में इसने आदेश I नियम 10(2) सिविल प्रक्रिया संहिता के अधीन उनके नाम हटा दिये, यह मानते हुए कि उन्हें अनुचित तरीके से शामिल किया गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के दायरे पर:
- यह उपबंध न्यायालय को अनुचित रूप से शामिल किये गए पक्षकार को हटाने या ऐसे व्यक्ति को जोड़ने का अधिकार देता है जिसकी उपस्थिति वाद में शामिल प्रश्नों के प्रभावी और पूर्ण निर्णय के लिये आवश्यक है।
- न्यायालय ने निम्नलिखित के बीच अंतर किया:
- आवश्यक पक्षकार – वह पक्षकार जिसके बिना कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता।
- उचित पक्षकार – वह व्यक्ति जिसकी उपस्थिति पूर्ण और अंतिम निर्णय लेने में सक्षम बनाती है, भले ही उसके विरुद्ध कोई विशिष्ट अनुतोष का दावा न किया गया हो।
- किसी व्यक्ति को पक्षकार के रूप में शामिल करने का एकमात्र कारण यह है कि वह परिणाम से आबद्ध हो, और उसके बिना संबंधित प्रश्न का प्रभावी और पूर्ण रूप से समाधान नहीं किया जा सकता है।
अभिवचनों के आधार पर:
- निजी प्रत्यर्थियों के विरुद्ध न तो कोई वाद-हेतुक बताया गया था और न ही कोई विनिर्दिष्ट अनुतोष की मांग की गई थी।
- वादपत्र के अनुसार ही, तहसीलदार और नायब तहसीलदार संभागीय आयुक्त के निर्देशों के अनुसार कार्य कर रहे थे, और याचिकाकर्त्ता मूल रूप से राजस्व अधिकारियों की कार्रवाई को चुनौती दे रहा था।
निजी प्रत्यर्थियों की उपस्थिति के संबंध में:
- राजस्व अधिकारियों के समक्ष कार्यवाही को निजी प्रत्यर्थियों के बिना भी प्रभावी ढंग से निपटाया जा सकता है।
- उनकी उपस्थिति आवश्यक नहीं थी, और उन्हें ऐसे वाद में बने रहने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता था जहाँ कोई वाद-हेतुक उत्पन्न नहीं हुआ था और उनके विरुद्ध कोई अनुतोष नहीं मांगा गया था।
अनुच्छेद 227 के अधीन हस्तक्षेप पर:
- विचारण न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 1 नियम 10(2) के अधीन अपनी शक्ति का सही ढंग से प्रयोग किया था।
- याचिकाकर्त्ता आदेश में किसी भी प्रकार की विकृति या अवैधता को प्रदर्शित करने में असफल रहा, जिसके लिये उच्च न्यायालय के पर्यवेक्षी अधिकारिता के अधीन हस्तक्षेप की आवश्यकता हो।
निष्कर्ष:
- न्यायालय ने याचिका और उससे संबंधित आवेदन को खारिज कर दिया, विचारण न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और सभी लागू अंतरिम निर्देशों को रद्द कर दिया।
सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 1 नियम 10 क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 1 वादों के पक्षकारों से संबंधित है, अर्थात्, किन लोगों को वादी और प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जा सकता है।
- नियम 10 न्यायालय को कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम में पक्षकारों को प्रतिस्थापित करने, जोड़ने या हटाने के द्वारा पक्षकारों से संबंधित दोषों को दूर करने का अधिकार देता है।
- इसका उद्देश्य वादों की बहुलता से बचना और यह सुनिश्चित करना है कि विवाद के सभी प्रश्नों का अंतिम निर्णय एक ही कार्यवाही में हो जाए।
सांविधिक शर्तें:
- नियम 10(1) – गलत वादी के नाम से वाद: जहाँ सद्भावनापूर्ण गलती से किसी गलत व्यक्ति के नाम पर वादी के रूप में वाद दायर किया गया हो, तो न्यायालय उचित वादी को प्रतिस्थापित या जोड़ सकता है।
- नियम 10(2) – न्यायालय पक्षकारों को हटा या जोड़ सकता है: न्यायालय किसी भी प्रक्रम पर, आवेदन सहित या उसके बिना, और ऐसी शर्तों पर जो उचित प्रतीत हों, आदेश दे सकता है:
- किसी भी पक्षकार का नाम, जिसे अनुचित रूप से शामिल किया गया हो, हटा दिया जाएगा; और
- उन सभी व्यक्तियों का नाम जोड़ा जाएगा जिन्हें शामिल किया जाना चाहिये था, या जिनकी उपस्थिति प्रभावी और पूर्ण न्यायनिर्णय के लिये आवश्यक है।
- नियम 10(3): किसी भी व्यक्ति को उसकी सहमति के बिना वादी के रूप में, या किसी अक्षम वादी के वादमित्र के रूप में नहीं जोड़ा जाएगा।
- नियम 10(4): जहाँ कोई प्रतिवादी जोड़ा जाता है, वहाँ वादपत्र में आवश्यकतानुसार संशोधन किया जाएगा और समन तथा वादपत्र की संशोधित प्रतियाँ नए प्रतिवादी को भेजी जाएँगी।
- नियम 10(5): किसी नए जोड़े गए प्रतिवादी के विरुद्ध कार्यवाही समन की तामील पर ही प्रारंभ मानी जाएगी, जो परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 21 के अधीन है।
संबंधित उपबंध:
- आदेश 1 नियम 9: पक्षकारों के कुसंयोजन या असंयोजन के कारण कोई भी वाद खारिज नहीं किया जाएगा, सिवाय आवश्यक पक्षकार के कुसंयोजन होने के।
- आदेश 1 नियम 13: असंयोजन या कुसंयोजन के संबंध में आपत्तियां यथाशीघ्र उठाई जानी चाहिये, अन्यथा उन्हें क्षमा किया हुआ माना जाएगा।
- आदेश 7 नियम 11: वादपत्र को नामंजूर करने का उपबंध करता है, जिसमें वह स्थिति भी शामिल है जब उसमें वाद-हेतुक प्रकट नहीं होता है। नामंजूरी पूरे वादपत्र के विरुद्ध कार्य करती है, यही कारण है कि विचारण न्यायालय ने यहाँ आदेश I नियम 10(2) का प्रयोग केवल अनुचित रूप से शामिल किये गए प्रतिवादियों को हटाने के लिये किया।
- आवश्यक पक्षकार बनाम उचित पक्षकार:
|
आधार |
आवश्यक पक्षकार |
उचित पक्षकार |
|
अर्थ |
ऐसा पक्षकार जिसके बिना कोई प्रभावी डिक्री पारित नहीं की जा सकती। |
ऐसा पक्षकार जिसकी उपस्थिति से वाद का पूर्ण एवं अंतिम न्यायनिर्णयन करने में सहायता मिलती है। |
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अनुतोष |
जिसके विरुद्ध कोई अनुतोष चाहा गया हो। |
जिसके विरुद्ध कोई अनुतोष चाहा जाना आवश्यक नहीं है। |
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अनुपस्थिति का प्रभाव |
वाद खारिज किए जाने योग्य हो सकता है। |
वाद विफल नहीं होता। |
अनुच्छेद 227 के अंतर्गत पर्यवेक्षी अधिकारिता क्या है?
अर्थ और प्रकृति:
- अनुच्छेद 227 प्रत्येक उच्च न्यायालय को उसके क्षेत्रीय अधिकारिता के अंतर्गत आने वाले सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान करता है।
- इसका उद्देश्य अधीनस्थ न्यायालयों को उनकी अधिकार सीमा के भीतर रखना है, और यह अपील या पुनरीक्षण संबंधी अधिकारिता नहीं है।
विस्तार:
- उच्च न्यायालय केवल तभी हस्तक्षेप करता है जब अधीनस्थ न्यायालय ने अधिकारिता से बाहर जाकर कार्य किया हो, अपनी अधिकारिता का उल्लंघन किया हो, या कोई स्पष्ट त्रुटि की हो जिसके परिणामस्वरूप गंभीर अन्याय हुआ हो।
- तथ्यों या विधि की मात्र त्रुटियां, या एक भिन्न संभावित दृष्टिकोण, हस्तक्षेप को उचित नहीं ठहराते।