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आपराधिक कानून
नशीले पदार्थ का सेवन करने पर शिक्षक द्वारा छात्र को डाँटना आत्महत्या का दुष्प्रेरण नहीं है
«15-Oct-2026
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सुरेंद्रनाथ मिश्र एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य "एक सामान्य चेतावनी में आपराधिक आशय का अभाव होता है।" न्यायमूर्ति राधा कृष्ण पटनायक |
स्रोत: ओडिशा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति राधा कृष्ण पटनायक ने सुरेंद्रनाथ मिश्रा एवं अन्य बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि किसी आपराधिक आशय के अभाव में, अनुशासन बनाए रखने और नशे की हालत में किसी छात्र को फटकार लगाने मात्र से शिक्षकों पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 107 के अधीन आत्महत्या के दुष्प्रेरण का अभियोजन नहीं चलाया जा सकता। न्यायालय ने शिक्षकों और विद्यालय के वार्डन के विरुद्ध संज्ञान लेने के आदेश को अपास्त कर दिया।
सुरेंद्रनाथ मिश्रा और अन्य बनाम ओडिशा राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता उस विद्यालय के शिक्षक और वार्डन थे, जहाँ मृतक, एक 16 वर्षीय छात्र, पढ़ रहा था।
- याचिकाकर्त्ताओं ने मृतक सहित कुछ छात्रों को 'डेंड्राइट' नामक पदार्थ का सेवन करने के बाद नशे की हालत में पकड़ा था।
- उन्होंने छात्रों को फटकार लगाई और चेतावनी दी कि इस घटना की जानकारी उनके संरक्षकों को दी जाएगी।
- आरोप है कि इस चेतावनी से उत्पन्न भय और शर्मिंदगी के कारण मृतक ने छात्रावास भवन की चौथी मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली।
- अन्वेषण के बाद पुलिस ने याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल किया।
- उपखंड न्यायिक मजिस्ट्रेट (SDJM), चंपुआ ने याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 (बालक की आत्महत्या का दुष्प्रेरण) और धारा 3(5) (सामान्य आशय) के अधीन अपराधों के लिये संज्ञान लिया।
- इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ताओं ने उच्च न्यायालय में आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कर दोषमुक्त होने की मांग की, जिसमें उन्होंने तर्क दिया कि आरोप पत्र में मौजूद सामग्री से प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है।
- याचिकाकर्त्ताओं ने तर्क दिया कि उनका कृत्य पूरी तरह से अनुशासन लागू करने के लिये था, और उनका आशय कभी भी मृतक को परेशान करने या जानबूझकर उसे आत्महत्या करने के लिये उकसाने का नहीं था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
आत्महत्या के दुष्प्रेरण के आवश्यक तत्त्वों पर:
- आत्महत्या को उकसाने या उसमें सहायता करने का कोई कृत्य या लोप, दुष्प्रेरण का आरोप लगाने के लिये आवश्यक है।
- कथित उत्पीड़न और मृत्यु के बीच एक सीधा संबंध स्थापित किया जाना चाहिये।
- आपराधिक मनःस्थिति (Mens Rea) का महत्त्व बहुत अधिक है: इस बात का प्रथम दृष्टया सबूत होना चाहिये कि अभियुक्त ने अपेक्षित आशय से कार्य किया।
- विधिक मानदंड के लिये सक्रिय उकसावे, भड़कावे या जानबूझकर सहायता करने का सबूत आवश्यक है।
शिक्षकों द्वारा की जाने वाली अनुशासनात्मक कार्रवाई के संबंध में:
- एक सामान्य चेतावनी में आपराधिक आशय का अभाव होता है।
- यदि कोई विद्यार्थी अत्यधिक संवेदनशील है, तो ऐसी दुखद परिणति के लिये शिक्षक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जिसकी पूर्वकल्पना कोई साधारण व्यक्ति सामान्य एवं नियमित अनुशासनात्मक कार्रवाई से नहीं कर सकता था।
- किसी विद्यालय में मानक प्रशासनिक या शैक्षणिक अनुशासन का पालन करते हुए यदि कोई छात्र आत्महत्या कर लेता है, तो उसमें अपराध गठित करने के लिये आवश्यक आपराधिक आशय नहीं होता है।
- एक शिक्षक का नैतिक दायित्व है कि वह अनुशासन बनाए रखे, और एक साधारण फटकार उकसाने या जानबूझकर सहायता करने के समान नहीं है।
- अनुशासनात्मक कार्रवाई को उकसावे के समान तभी माना जाएगा जब उत्पीड़न और अपमान के बार-बार, विशिष्ट आरोप हों, जो जानबूझकर और बिना किसी उचित कारण के किये गए हों।
जिन पूर्व निर्णयों पर विश्वास किया गया है:
- न्यायालय ने वी.पी. सिंह बनाम पंजाब राज्य और अन्य (2022) और थंगावेल बनाम राज्य (2025) पर विश्वास किया।
- इन निर्णयों में यह कहा गया है कि दुर्व्यवहार के लिये किसी छात्र को निलंबित करना या संस्थागत अनुशासन लागू करना, यदि छात्र बाद में आत्महत्या कर लेता है, तो उसे दुष्प्रेरण की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है।
- महज डांट-फटकार आत्महत्या का कारण नहीं बनती, और एक समझदार व्यक्ति यह उम्मीद नहीं कर सकता कि एक सामान्य चेतावनी किसी छात्र को आत्महत्या करने के लिये प्रेरित करेगी।
मामले के तथ्यों के आधार पर:
- इस बात का कोई प्रथम दृष्टया सबूत नहीं था कि याचिकाकर्त्ताओं ने मृतक को नियमित रूप से परेशान किया या सक्रिय रूप से और जानबूझकर उसे उकसाया।
- याचिकाकर्त्ताओं का इस मौत में कोई प्रत्यक्ष संलिप्तता नहीं थी और उन्हें इसके लिये दुष्प्रेरण का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने पुनर्विचार याचिका मंजूर कर ली और याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध संज्ञान के विवादित आदेश को अपास्त कर दिया।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 क्या है?
बारे में:
- भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 107 बालक या विकृत चित्त व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण से संबंधित है ।
- यह भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 305 के अनुरूप है।
- यह भारतीय न्याय संहिता की धारा 108 (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 306 के समकक्ष है) से अलग है, जो सामान्यतः आत्महत्या के दुष्प्रेरण से संबंधित है।
परीक्षा नोट : भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 में “दुष्प्रेरण” को परिभाषित किया गया है। भारतीय न्याय संहिता के अधीन, दुष्प्रेरण को धारा 45 में परिभाषित किया गया है, जबकि भारतीय न्याय संहिता की धारा 107 में बालक की आत्महत्या के दुष्प्रेरण को शामिल किया गया है।
उपबंध:
- धारा 107: यह उस स्थिति में लागू होती है जब कोई बालक, विकृत चित्त व्यक्ति, मत्तता की अवस्था में व्यक्ति आत्महत्या करता है।
- जो कोई भी इस प्रकार की आत्महत्या के लिये दुष्प्रेरित करता है, उसे मृत्युदण्ड, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डित किया जाएगा।
- दोषी पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
- धारा 108 (तुलना): जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की आत्महत्या का दुष्प्रेरण करेगा, उसे किसी एक भाँति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा तथा वह जुर्माने के लिये भी दायी होगा।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 45 के अधीन उकसाना क्या है?
भारतीय न्याय संहिता की धारा 45 (जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 107 के समकक्ष है) यह उपबंधित करती है कि कोई व्यक्ति किसी कार्य के किये जाने का दुष्प्रेरण तब करता है, जब वह:
- किसी व्यक्ति को वह कार्य करने के लिये उकसाता है।
- एक या अधिक व्यक्तियों के साथ उस कार्य को करने के लिये षड्यंत्र में सम्मिलित होता है, यदि उस षड्यंत्र के अनुसरण में कोई कार्य या अवैध लोप घटित होता है।
- किसी कार्य या अवैध लोप द्वारा, उस कार्य के किये जाने में जानबूझकर सहायता करता है।