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पारिवारिक कानून

पुनर्विवाह स्थायी निर्वाह-व्यय प्राप्त करने में स्वतः बाधा नहीं है

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 16-Oct-2026

बी. बनाम श्रीमती ए. 

"भरण-पोषण का उद्देश्य उचित परिस्थितियों में पति या पत्नी को वित्तीय सहायता और उचित जीविका प्रदान करना है; यह कोई पुरस्कार, इनाम या निरंतर अधिकार नहीं है..." 

न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण  

स्रोत: कर्नाटक उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों?

कर्नाटक उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति डी.के. सिंह और न्यायमूर्ति एच. शांति भूषण की खंडपीठ ने बी. बनाम श्रीमती ए. (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि तलाकशुदा पत्नी का पुनर्विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 (HMA) की धारा 25 के अधीन स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि निर्धारित करने में एक महत्त्वपूर्ण कारक है, यद्यपि यह उसके हक से स्वतः वंचित करने वाला कारक नहीं है। न्यायालय ने पति की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए स्थायी निर्वाह-व्यय 25 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दिया। 

बी. बनाम श्रीमती ए. (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • दोनों पक्षकारों का विवाह 2021 में हुआ था।  
  • पत्नी ने आरोप लगाया कि विवाह के तीन महीने बाद से ही पति ने उसे मानसिक और शारीरिक क्रूरता, लैंगिक दुर्व्यवहार, मनमानी पाबंदियों और मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित करने का शिकार बनाया और उसे 2022 में वैवाहिक घर से निकाल दिया गया। 
  • पति ने आरोपों से इंकार करते हुए दावा किया कि उसने पत्नी की सभी आवश्यकताओं को पूरा किया, उसे महंगे उपहार दिये और सुलह के कई प्रयास किये। उसने आरोप लगाया कि पत्नी पुणे में पृथक् आवास पर अड़ी हुई थी और अपनी मर्जी से वापस आने से इंकार कर रही थी। 
  • मैसूरु कुटुंब न्यायालय ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(iक) और 13(2)(ii) के अधीन विवाह भंग कर दिया और पत्नी को स्थायी निर्वाह-व्यय के रूप में 25 लाख रुपए प्रदान किये। 
  • कुटुंब न्यायालय ने कहा कि पति का वार्षिक वेतन 25 लाख रुपए था, जबकि पत्नी का वार्षिक वेतन 7 लाख रुपए था।  
  • पति ने केवल स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि को चुनौती देते हुए उच्च न्यायालय में अपील की, न कि विवाह विच्छेद को। 
  • उन्होंने तर्क दिया कि कुटुंब न्यायालय ने उनके आश्रित माता-पिता के प्रति उनके वित्तीय दायित्वों पर विचार नहीं किया था। 
  • अपील लंबित रहने के दौरान, पत्नी के अधिवक्ता ने विवाह प्रमाण पत्र के साथ एक ज्ञापन दाखिल किया जिसमें कहा गया कि उसने 21 अप्रैल, 2024 को पुनर्विवाह कर लिया था । 
  • इसके बाद पति ने तर्क दिया कि पत्नी का पुनर्विवाह निर्वाह-व्यय की राशि निर्धारित करने में एक प्रासंगिक कारक था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

निर्वाह-व्यय में परिवर्तन करने की शक्ति के संबंध में: 

  • हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 न्यायालय को परिस्थितियों में परिवर्तन होने पर स्थायी निर्वाह-व्यय के आदेश को बदलने, संशोधित करने या रद्द करने में सक्षम बनाती है। 
  • धारा 25(3) में विशेष रूप से ऐसे परिवर्तन की परिकल्पना की गई है जहाँ जिस पक्षकार के पक्ष में आदेश दिया गया था उसने पुनर्विवाह कर लिया है। 

स्थायी निर्वाह-व्यय के अवधारण के संबंध में: 

  • स्थायी निर्वाह-व्यय अवधारित करने का कोई निश्चित फार्मूला नहीं है। 
  • न्यायालय को दोनों पक्षकारों की आय और संपत्ति, उनके संबंधित साधन, स्थिति, कमाई की क्षमता, भविष्य की संभावनाएं, उचित आवश्यकताएं और मामले की अन्य परिस्थितियों पर विचार करना चाहिये। 
  • इन परिस्थितियों पर प्रभाव डालने वाली बाद की घटनाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिये। 
  • कुटुंब न्यायालय ने पति की आय और वित्तीय क्षमता, पत्नी की अपेक्षाकृत कम आय और विवाह विच्छेद के बाद उसे जिन परिस्थितियों में रहना होगा, उन सभी बातों पर विचार किया था। 

पुनर्विवाह के प्रभाव पर: 

  • पत्नी के पुनर्विवाह ने उन परिस्थितियों को काफी हद तक बदल दिया जो कुटुंब न्यायालय द्वारा विवादित निर्णय सुनाए जाने के समय उसकी भविष्य की वित्तीय आवश्यकताओं के आकलन के लिये सुसंगत थीं। 
  • एक बार जब तलाकशुदा पत्नी स्वेच्छा से पुनर्विवाह कर लेती है, तो भरण-पोषण जारी रखने का आधार काफी हद तक बदल सकता है, विशेषत: जहाँ नया विवाह साथ, समर्थन और वित्तीय सुरक्षा प्रदान करता है। 
  • तलाकशुदा पति या पत्नी निर्वाह-व्यय को एक सुनिश्चित मौद्रिक लाभ के रूप में नहीं मान सकते जो वैवाहिक और वित्तीय परिस्थितियों में बाद में होने वाले परिवर्तनों के होते हुए भी बना रहता है। 
  • आर्थिक कठिनाई को कम करने के उद्देश्य से दिया गया वैवाहिक उपाय केवल इसलिये अप्रत्याशित लाभ में परिवर्तित नहीं हो सकता क्योंकि प्राप्तकर्ता ने पुनर्विवाह कर लिया है। 

पुनर्विवाह स्वतः ही बाधा नहीं है: 

  • शरथ कैरियप्पा के.एस. बनाम श्रीमती शारिन एन.एस. (2024) पर विश्वास करते हुए, जहाँ एक खंडपीठ ने अपील के लंबित रहने के दौरान पत्नी के पुनर्विवाह के बाद स्थायी निर्वाह-व्यय कम कर दिया था, न्यायालय ने माना कि पुनर्विवाह अपने आप में स्थायी निर्वाह-व्यय के हकदार होने की परिस्थितियों को समाप्त नहीं करता है। 
  • यद्यपि, पुनर्विवाह परिस्थितियों में एक महत्त्वपूर्ण परिवर्तन है जिसे देय राशि का अवधारण करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिये। 

पति द्वारा बताए गए अन्य आधारों पर: 

  • न्यायालय ने पत्नी द्वारा आय का प्रकटन न करने और आश्रित माता-पिता के प्रति पति के वित्तीय दायित्वों के संबंध में पति के दावों को खारिज कर दिया, क्योंकि इन दावों के समर्थन में संपत्ति और देनदारियों का कोई शपथपत्र दाखिल नहीं किया गया था। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने स्थायी निर्वाह-व्यय की राशि 25 लाख रुपए से घटाकर 10 लाख रुपए कर दी। 
  • अपील को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गया और कुटुंब न्यायालय के निर्णय को उस हद तक संशोधित कर दिया गया। 

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 क्या है? 

 बारे में: 

  • हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 स्थायी निर्वाह-व्यय और भरण-पोषण से संबंधित है । 
  • यह लिंग-तटस्थ है और इसके अधीन पति या पत्नी में से कोई भी स्थायी निर्वाह-व्यय का दावा कर सकता है।  

उपबंध: 

  • धारा 25(1): हिंदू विवाह अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने वाला कोई न्यायालय यथास्थिति पत्नी या पति द्वारा इस प्रयोजन के लिये अपने से आवेदन किये जाने पर आज्ञप्ति देने के समय या तत्पश्चात किसी समय प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री को आदिष्ट कर सके कि आवेदक या आवेदिका के अपने भरण-पोषण और पालन के लिये ऐसे आवेदक या आवेदिका के जीवन काल से अधिक न होने वाली अवधि के लिये ऐसी पूर्ण राशि या ऐसी मासिक कालावधीय राशि देता या देती रहे जैसी कि प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री को अपनी आय और अन्य संपत्ति को, यदि कोई हो, आवेदक या आवेदिका की आय या संपत्ति को और पक्षकारों के आचरण और मामले की अन्य परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय को न्याय्य लगे और यदि आवश्यक हो तो ऐसी देनगी प्रत्युत्तरदाता या प्रत्युत्तरदात्री की स्थावर संपत्ति पर प्रभार द्वारा प्रतिभूत की जाएगी। 
  • धारा 25(2): यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा दिये गये आदेश के पश्चात् किसी समय पक्षकारों में से किसी की परिस्थितियों में तब्दीली हो गई हो तो वह ऐसे किसी आदेश को ऐसी रीति में जैसी कि न्यायालय न्याय्य समझे किसी पक्षकार की प्रेरणा पर परिवर्तित, रूपभेदित या विखण्डित कर सकेगा। 
  • धारा 25(3): यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि उस पक्षकार ने जिसके पक्ष में कि इस धारा के अधीन आदेश दिया जा चुका है, पुनः विवाह कर लिया है यदि ऐसा पक्षकार पत्नी है। तो वह सती नहीं रही है, यदि ऐसा पक्षकार पति है तो उसने किसी स्त्री से विवाह के बाद लैंगिक सम्भोग किया है तो वह दूसरे पक्षकार की प्रेरणा पर ऐसे किसी आदेश को ऐसी रीति में जो न्यायालय न्यायसंगत समझे, परिवर्तित, उपांतरित या विखंडित कर सकेगा। 

निर्वाह-व्यय अवधारित करने वाले कारक: 

  • राजनेश बनाम नेहा (2020) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने भरण-पोषण पर दिशानिर्देश निर्धारित करते हुए कहा कि सुसंगत कारकों में पक्षकारों की स्थिति, दावेदार की उचित आवश्यकताएं, दावेदार की स्वतंत्र आय और संपत्ति, वैवाहिक घर में जीवन स्तर और संदाय करने वाले पति या पत्नी की वित्तीय क्षमता और देनदारियां शामिल हैं। 
  • उच्चतम न्यायालय ने भरण-पोषण संबंधी कार्यवाही में दोनों पक्षकारों द्वारा परिसंपत्तियों एवं दायित्वों के प्रकटन का शपथपत्र दाखिल करना भी अनिवार्य कर दिया है, यही कारण है कि वर्तमान मामले में पति के निराधार दावों को स्वीकार नहीं किया जा सका।