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सांविधानिक विधि
मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को उन्मुक्ति
«16-Oct-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा दायर उस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया है, जिसमें मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ECs) को उनके आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए कार्यों के लिये प्रदान की गई आजीवन उन्मुक्ति को चुनौती दी गई है। यह उन्मुक्ति मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें तथा पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 16 से प्राप्त होती है। इस चुनौती के माध्यम से विधि के समक्ष समता तथा सांविधानिक पदाधिकारियों को प्रदान की जा सकने वाली उन्मुक्तियों की सीमाओं से संबंधित प्रश्न उठाए गए हैं।
विधि के समक्ष समता क्या है?
- समता एक मौलिक अधिकार है और संविधान की मूलभूत संरचना का भाग है।
- अनुच्छेद 14 में यह उपबंधित किया गया है कि राज्य भारत के भूभाग के भीतर किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समता या विधियों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा।
विधि के समक्ष समता:
- यह ब्रिटिश न्यायविद वी. डाइसी द्वारा प्रतिपादित विधि के शासन की अवधारणा का एक घटक है।
- इसका अर्थ है किसी भी व्यक्ति के पक्ष में विशेष विशेषाधिकारों का अभाव, सभी का एक ही विधि के दायरे में आना, और यह कि कोई भी व्यक्ति अपनी स्थिति की परवाह किये बिना विधि से ऊपर नहीं है।
विधियों का समान संरक्षण:
- यह एक अमेरिकी अवधारणा है, जिसका तात्पर्य समान परिस्थितियों में समान व्यवहार से है, चाहे वह विधि द्वारा प्रदत्त विशेषाधिकार हों या अधिरोपित किये गए दायित्व।
सांविधानिक उन्मुक्तियाँ क्या हैं?
संविधान विशिष्ट पदों को कुछ विशेष अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करता है।
राष्ट्रपति और राज्यपालों को उन्मुक्ति (अनुच्छेद 361):
- राष्ट्रपति अथवा किसी राज्य के राज्यपाल के पद पर बने रहने की अवधि के दौरान उनके विरुद्ध कोई भी आपराधिक कार्यवाही न तो संस्थित की जाएगी और न ही जारी रखी जाएगी।
- उनके पद पर बने रहने की अवधि के दौरान उनकी गिरफ्तारी या कारावास के लिये कोई आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
- उनके व्यक्तिगत कृत्यों के संबंध में उनके पद पर बने रहने की अवधि के दौरान कोई सिविल कार्यवाही संस्थित नहीं की जा सकती, जब तक कि नोटिस की तामील के पश्चात् दो माह की अवधि समाप्त न हो जाए।
- ब्रिटिश शासन के दौरान गवर्नर-जनरल और गवर्नरों को ये विशेषाधिकार प्राप्त थे और इन उच्च पदों की गरिमा को बनाए रखने के लिये संविधान के अधीन इन्हें जारी रखा गया है।
संसदीय विशेषाधिकार (अनुच्छेद 105 और 194):
- ये संसद तथा राज्य विधानमंडलों के सदस्यों को विशेषाधिकार प्रदान करते हैं, जिनमें सदन के भीतर वाक्-स्वातंत्र्य तथा मतदान करने की स्वतंत्रता सम्मिलित है।
- जब तक संसद इन विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध करने हेतु कोई विधि अधिनियमित नहीं करती, तब तक सदन तथा उनके सदस्य उन विशेषाधिकारों का उपभोग करते रहेंगे, जिनका उपभोग संविधान के प्रारंभ से पूर्व ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स द्वारा किया जाता था।
- सद ने आज की तारीख तक ऐसी कोई विधि अधिनियमित नहीं की है।
राजनयिक उन्मुक्ति:
- वियना राजनयिक संबंध सम्मेलन, 1961 के अधीन अन्य देशों के राजनयिकों और सिविल को नागरिक और आपराधिक अधिकारिता से उन्मुक्ति प्राप्त है।
- यह एक अंतरराष्ट्रीय संधि है जो पारस्परिक आधार पर 190 से अधिक देशों में लागू होती है।
मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को कौन-सी उन्मुक्ति प्राप्त है?
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023 को दिसंबर 2023 में पारित किया गया था।
- इस अधिनियम की धारा 16 उपबंधित करती है कि कोई भी न्यायालय, वर्तमान या पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त अथवा निर्वाचन आयुक्त के विरुद्ध उनके आधिकारिक कर्त्तव्यों के निर्वहन में किये गए या किये जाने का तात्पर्यित किसी कार्य के संबंध में किसी सिविल या आपराधिक कार्यवाही को न तो ग्रहण करेगा और न ही जारी रखेगा।
- इस प्रकार, यह उन्मुक्ति आजीवन और बिना शर्त होती है।
इस उपबंध को क्यों हटाया जाना चाहिये?
अन्य उन्मुक्तियों के साथ तुलना:
- राष्ट्रपति एवं राज्यपालों को गिरफ्तारी तथा आपराधिक कार्यवाही से प्राप्त उन्मुक्ति औपनिवेशिक विरासत है, किंतु यह केवल उनके पद पर बने रहने की अवधि तक लागू होती है।
- संसदीय विशेषाधिकार, यद्यपि विधि के समक्ष समता के सिद्धांत के अपवाद हैं, तथापि मुख्यतः सदनों के भीतर किये गए कृत्यों तथा सदनों के सत्र में रहने की अवधि तक सीमित हैं।
- राजनयिक उन्मुक्ति कार्यात्मक आवश्यकता एवं पारस्परिकता के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका उद्देश्य सुचारु राजनयिक संबंधों को सुगम बनाना है।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम की धारा 16 इन सभी से आगे बढ़कर संबंधित पदाधिकारी के पदत्याग के पश्चात् भी उन्मुक्ति प्रदान करती है।
इस उपबंध का विधायी इतिहास:
- आजीवन उन्मुक्ति प्रदान करने वाला खंड संसद में प्रस्तुत मूल विधेयक का भाग नहीं था।
- परिणामस्वरूप, विधेयक के साथ संलग्न उद्देश्यों एवं कारणों के कथन में इस उपबंध का कोई औचित्य उल्लिखित नहीं है ।
- इस उपबंध को राज्यसभा में विधेयक पारित किये जाने के दिन संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया तथा तत्पश्चात् लोकसभा द्वारा पारित किये जाने और राष्ट्रपति की स्वीकृति प्राप्त होने के बाद यह अधिनियम का भाग बन गया।
- केंद्रीय विधि मंत्री ने इस संशोधन को यह कहते हुए उचित ठहराया कि इससे मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को निर्बाध तथा स्वतंत्र रूप से अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन करने में सहायता मिलेगी।
अनुच्छेद 14 के अंतर्गत युक्तियुक्त वर्गीकरण की कसौटी:
- अनुच्छेद 14 विधियों के अनुप्रयोग के लिए वर्गीकरण की अनुमति देता है, किंतु ऐसा वर्गीकरण मनमाना या अतार्किक नहीं होना चाहिये।
- ऐसा वर्गीकरण बोधगम्य विभेद (Intelligible Differentia) पर आधारित होना चाहिए तथा उसका विधि के उद्देश्य के साथ युक्तियुक्त संबंध (Rational Nexus) होना चाहिये।
अन्य स्वतंत्र प्राधिकारियों की स्थिति:
- अनेक सांविधानिक एवं सांविधिक प्राधिकरणों से अपने कार्यों का स्वतंत्र रूप से निर्वहन करने की अपेक्षा की जाती है। इनमें न्यायाधीश, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, लोक सेवा आयोगों के अध्यक्ष एवं सदस्य, लोकपाल एवं लोकायुक्त तथा सूचना आयुक्त सम्मिलित हैं।
- इनमें से किसी को भी अपने आधिकारिक कार्यों के लिये आजीवन और बिना शर्त उन्मुक्ति प्राप्त नहीं है।
- निर्वाचन आयुक्तों की सेवा की शर्तें एवं कार्य-संचालन अधिनियम, 1991, जो पूर्व में मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं निर्वाचन आयुक्तों को नियंत्रित करता था, में ऐसा कोई उपबंध नहीं था।
निष्कर्ष
मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम की धारा 16 को दी गई चुनौती, संवैधानिक पदाधिकारियों की स्वतंत्रता की रक्षा करने तथा इस सिद्धांत को बनाए रखने के बीच विद्यमान तनाव को उजागर करती है कि कोई भी व्यक्ति विधि से ऊपर नहीं है। चूँकि यह उन्मुक्ति आजीवन, निरपेक्ष तथा राष्ट्रपति, राज्यपालों, विधायकों अथवा अन्य स्वतंत्र प्राधिकरणों को प्राप्त उन्मुक्ति से अधिक व्यापक है और इसे बिना किसी निर्दिष्ट औचित्य के प्रस्तुत किया गया था, इसलिये यह अनुच्छेद 14 के अंतर्गत गंभीर न्यायिक परीक्षण के अधीन है। ADR की याचिका पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय यह निर्धारित करेगा कि क्या इस प्रकार की व्यापक एवं सर्वव्यापी उन्मुक्ति विधि-पुस्तकों में बनी रह सकती है।