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सांविधानिक विधि
निर्वाचक नामावलियों का विशेष गहन संशोधन
«17-Oct-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
भारत निर्वाचन आयोग (ECI) देशभर में चरणबद्ध रूप से निर्वाचक नामावलियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कर रहा है। नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण के विपरीत, विशेष गहन पुनरीक्षण एक समयबद्ध प्रक्रिया है, जो घर-घर जाकर गणना एवं सत्यापन पर आधारित है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम निर्वाचक नामावली में दर्ज हो तथा प्रत्येक अपात्र प्रविष्टि को हटा दिया जाए। सितंबर 2026 तक, इस प्रक्रिया के तीसरे चरण में 16 राज्य और 3 संघ राज्य क्षेत्र सम्मिलित हैं, जिनके विभिन्न क्षेत्रों की अंतिम निर्वाचक नामावलियाँ सितंबर से दिसंबर 2026 के बीच प्रकाशित की जानी निर्धारित हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) क्या है?
- विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR): यह भारत निर्वाचन आयोग द्वारा निर्वाचक नामावलियों का गहन सत्यापन है, जिसमें नियमित संक्षिप्त पुनरीक्षण की तुलना में व्यापक क्षेत्रीय गणना एवं सत्यापन किया जाता है।
- उद्देश्य: कोई भी पात्र नागरिक निर्वाचक नामावली में नाम दर्ज होने से वंचित न रहे तथा किसी भी अपात्र व्यक्ति का नाम निर्वाचक नामावली में बना न रहे।
- क्षेत्रीय सत्यापन: बूथ स्तर के अधिकारी (BLOs) घर-घर जाकर गणना प्रपत्र वितरित करते हैं तथा मतदाताओं के विद्यमान विवरणों का सत्यापन करते हैं।
- निर्वाचक नामावली: किसी निर्वाचन क्षेत्र की आधिकारिक मतदाता सूची। इसमें नाम दर्ज कराने के लिये सामान्यतः भारतीय नागरिकता, निर्धारित मतदान आयु की पूर्ति तथा संबंधित क्षेत्र में सामान्य निवास आवश्यक है।
- जांच की गई प्रविष्टियाँ: मृत्यु, स्थायी प्रवासन, दोहरे पंजीकरण, गलत विवरण तथा सत्यापन के पश्चात् भी जिन मतदाताओं का पता नहीं लगाया जा सका है, उनसे संबंधित प्रविष्टियों की जाँच की जाती है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की पृष्ठभूमि क्या है?
- गहन पुनरीक्षण कोई नई प्रक्रिया नहीं है। भारत के विभिन्न भागों में वर्ष 1952–56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983–84, 1987–89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003 तथा 2004 में भी ऐसे पुनरीक्षण किये गए थे।
- र्तमान राष्ट्रव्यापी प्रक्रिया का महत्त्व जनसांख्यिकीय परिवर्तनों, प्रवासन, शहरीकरण तथा अधिक सटीक निर्वाचक नामावलियाँ तैयार करने की आवश्यकता के कारण बढ़ा है।
- राजनीतिक दल बूथ स्तर के अभिकर्ताओं (BLAs) के माध्यम से इस प्रक्रिया में भाग लेते हैं। प्रथम दो चरणों में लगभग 59 करोड़ निर्वाचकों को सम्मिलित किया गया, जिसमें 6.3 लाख से अधिक बूथ स्तर के अधिकारी (BLOs) तथा 9.2 लाख BLAs संलग्न थे।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के चरण कौन-से हैं?
चरण I:
- इसमें जून से सितंबर 2025 तक बिहार को शामिल किया गया।
- प्रारंभ में निर्वाचकों की संख्या 7.89 करोड़ थी, जो अंतिम निर्वाचक नामावली में घटकर लगभग 7.42 करोड़ रह गई।
चरण II:
- इसमें छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल के साथ-साथ अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह, लक्षद्वीप तथा पुडुचेरी सम्मिलित थे।
- लगभग 50.99 करोड़ निर्वाचकों को सम्मिलित किया गया तथा अंतिम निर्वाचक संख्या लगभग 45.81 करोड़ रही, जो लगभग 10.2% की कमी दर्शाती है।
चरण III:
- इसमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना तथा उत्तराखंड के साथ-साथ दिल्ली, चंडीगढ़ तथा दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव सम्मिलित हैं।
- लगभग 36.73 करोड़ निर्वाचकों के सत्यापन हेतु 3.94 लाख से अधिक BLOs को नियुक्त किया गया है, जिन्हें लगभग 3.42 लाख BLAs का सहयोग प्राप्त है।
शेष क्षेत्र:
- जनगणना संबंधी आवश्यकताओं तथा उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर तथा लद्दाख को बाद के कार्यक्रम के लिये निर्धारित किया गया है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की आवश्यकता क्यों है?
- दोहरी प्रविष्टियों को हटाना: एक ही व्यक्ति के अनेक स्थानों पर पंजीकरण की पहचान करना।
- प्रवास संबंधी जानकारी को अपडेट करना: कामगार, छात्र और परिवार जो प्रायः एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं, वे प्रायः पुराने पते पर ही पंजीकृत रहते हैं।
- मृत्यु दर्ज करना: उन मृत मतदाताओं के नाम हटाता है जिन्हें अभी तक हटाया नहीं गया है।
- पात्र मतदाताओं को जोड़ना: नए मतदाताओं तथा पूर्व में त्रुटिवश छूट गए पात्र व्यक्तियों का नामांकन सुनिश्चित करना।
- एक व्यक्ति, एक मत: शुद्ध एवं अद्यतन निर्वाचक नामावलियाँ निर्वाचन संबंधी समता को सुदृढ़ करती हैं।
- लोक विश्वास: प्रारूप निर्वाचक नामावली का प्रकाशन तथा शिकायत निवारण की व्यवस्थाएँ निर्वाचन प्रक्रिया में विश्वास बढ़ाती हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया क्या है?
- अधिसूचना: भारत निर्वाचन आयोग (ECI) कार्यक्रम, अर्हक तिथि, सम्मिलित क्षेत्रों तथा प्रक्रिया की घोषणा करता है।
- घर-घर जाकर सर्वेक्षण: BLOs गणना प्रपत्र वितरित करने तथा एकत्रित करने के लिये घर-घर जाते हैं।
- डेटा सत्यापन: क्षेत्रीय जाँच से प्राप्त निष्कर्षों का मौजूदा अभिलेखों तथा आधिकारिक आँकड़ों से मिलान किया जाता है।
- प्रविष्टियों की पहचान: नाम विलोपित करने से पूर्व मृत्यु, स्थान परिवर्तन, दोहरे पंजीकरण तथा ऐसे निर्वाचकों से संबंधित प्रविष्टियों की जाँच की जाती है, जिनका पता नहीं लगाया जा सका है।
- उम्मीदवारों की सूची का मसौदा: उम्मीदवारों की सूची का मसौदा नागरिकों और राजनीतिक दलों द्वारा जांच के लिये प्रकाशित किया जाता है।
- दावे और आपत्तियां:
- प्ररूप 6 – नाम सम्मिलित करने हेतु आवेदन।
- प्ररूप 7 – आपत्ति दर्ज करने अथवा नाम विलोपित कराने हेतु आवेदन।
- प्ररूप 8 – विवरणों में संशोधन अथवा निवास स्थानांतरण के संबंध में आवेदन।
- नोटिस एवं सत्यापन: नाम विलोपन निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार किया जाता है। किसी निर्वाचक को ऐसा मानने से पूर्व कि उसका पता नहीं लगाया जा सका है, BLOs दो से तीन बार प्रयास करते हैं।
- अपील: व्यथित व्यक्ति पहले निर्दिष्ट अपीलीय प्राधिकारी तथा तत्पश्चात् मुख्य निर्वाचन अधिकारी के समक्ष अपील कर सकते हैं।
- अंतिम प्रकाशन: दावों एवं आपत्तियों का निस्तारण करने के पश्चात् अंतिम निर्वाचक नामावली प्रकाशित की जाती है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का विधिक ढाँचा क्या है?
भारत का संविधान, 1950:
- अनुच्छेद 324: निर्वाचन नामावलियों की तैयारी सहित निर्वाचनों के अधीक्षण, निर्देशन एवं नियंत्रण की शक्तियां भारत निर्वाचन आयोग में निहित करता है।
- अनुच्छेद 326: यह उपबंधित करता है कि लोकसभा तथा राज्य विधानसभाओं के निर्वाचन वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे, जो विधि द्वारा निर्धारित अर्हताओं एवं निरर्हताओं के अधीन होंगे।
लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950:
- धारा 16: पंजीकरण के लिये निरर्हताएँ निर्धारित करती है, जिनमें भारत का नागरिक न होना भी सम्मिलित है।
- धारा 19: पंजीकरण को पात्रता शर्तों से जोड़ती है, जैसे कि पात्रता आयु और निर्वाचन क्षेत्र में सामान्य निवास।
- धारा 21(3): भारत निर्वाचन आयोग को अभिलिखित किये जाने वाले कारणों के आधार पर किसी भी समय निर्वाचक नामावली के विशेष पुनरीक्षण का निर्देश देने की शक्ति प्रदान करती है।
- धारा 22: निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों को समुचित सत्यापन के पश्चात् प्रविष्टियों में संशोधन करने, उन्हें एक भाग से दूसरे भाग में स्थानांतरित करने अथवा विलोपित करने की अनुमति देती है।
निर्वाचकों का रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960:
- ये नियम निर्वाचक नामावलियों के पुनरीक्षण, दावों, आपत्तियों तथा संबंधित विषयों के लिए प्रक्रियात्मक ढाँचा प्रदान करते करें।
न्यायिक स्थिति:
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एंड अन्य बनाम भारतीय निर्वाचन आयोग एंड अन्य (27 मई 2026) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) भारत निर्वाचन आयोग के सांविधिक अधिदेश के अंतर्गत आता है तथा स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन सुनिश्चित करने के उसके सांविधानिक कर्त्तव्य के अनुरूप है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में प्रमुख प्राधिकारी कौन हैं?
भारत निर्वाचन आयोग:
- यह पुनरीक्षण की योजना बनाता है तथा उसे निर्देशित करता है, कार्यक्रम एवं प्रक्रिया संबंधी अधिसूचनाएँ जारी करता है और अनुच्छेद 324 के अंतर्गत सत्यापन तथा अंतिम प्रकाशन की निगरानी करता है।
मुख्य निर्वाचन अधिकारी:
- भारत निर्वाचन आयोग के मार्गदर्शन में राज्य/संघ राज्य क्षेत्र के स्तर पर SIR का क्रियान्वयन करता है।
- यह जिला निर्वाचन अधिकारियों, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों तथा बूथ स्तर के अधिकारियों (BLOs) के साथ समन्वय स्थापित करता है तथा प्रशिक्षण, जागरूकता अभियानों और शिकायत निवारण की निगरानी करता है।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) का क्या महत्त्व है?
- सटीकता: मतदाता सूचियों को वास्तविक जमीनी परिस्थितियों के अधिक अनुरूप बनाता है।
- लोकतांत्रिक वैधता: पात्र नागरिकों के लिये मतदान के समान अवसर सुनिश्चित करता है।
- समावेशन: प्रथम बार मतदान करने वाले मतदाताओं तथा निवास स्थान में परिवर्तन से प्रभावित व्यक्तियों के नामांकन में सहायता करता है।
- प्रशासनिक दक्षता: मतदान केंद्रों की बेहतर योजना बनाने तथा मतदाताओं तक पहुँच स्थापित करने में सहायता करता है।
- पारदर्शिता: बूथ स्तर के अभिकर्ता (BLAs) पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान राजनीतिक दलों को विसंगतियाँ इंगित करने का अवसर प्रदान करते हैं।
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के समक्ष क्या चुनौतियाँ हैं?
- मतदान से वंचित होने का खतरा: आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में वास्तविक एवं पात्र मतदाताओं के नाम निर्वाचक नामावली से छूट सकते हैं।
- प्रवासी: बार-बार निवास स्थान बदलने के कारण सामान्य निवास का सत्यापन कठिन हो जाता है।
- दस्तावेज़ीकरण का भार: गरीब, बुजुर्ग, बेघर और हाशिए पर रहने वाले लोगों को फॉर्म भरने या रिकॉर्ड प्रस्तुत करने में कठिनाई हो सकती है।
- समय: निर्वाचनों के निकट बड़े पैमाने पर पुनरीक्षण किये जाने से प्रशासनिक दबाव तथा राजनीतिक विवाद उत्पन्न हो सकते है।
- डिजिटल विभाजन: ऑनलाइन प्रक्रियाओं के कारण सीमित इंटरनेट पहुँच अथवा डिजिटल साक्षरता वाले व्यक्तियों को नुकसान हो सकता हैं।
- लोक विश्वास: यदि नामों के बड़े पैमाने पर विलोपन के कारणों तथा उपलब्ध उपचारों की स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती है, तो इससे लोगों में चिंता उत्पन्न हो सकती है।
आगे की राह क्या है?
- दस्तावेज़ीकरण संबंधी आवश्यकताओं को सरल और संतुलित रखें।
- घर-घर जाकर सत्यापन की प्रक्रिया को बरकरार रखें, विशेषकर उच्च प्रवासन और संवेदनशील क्षेत्रों में।
- निजता का समुचित ध्यान रखते हुए नाम विलोपन के कारणों को अभिलिखित किया जाना चाहिये तथा उनका प्रकटीकरण किया जाना चाहिये।
- अंतिम प्रकाशन से पूर्व दावे, आपत्तियाँ तथा अपील प्रस्तुत करने के लिये पर्याप्त समय दिया जाना चाहिये।
- राजनीतिक दलों को सक्रिय रूप से बूथ स्तर के अभिकर्ताओं (BLAs) की नियुक्ति करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
- डुप्लिकेट वोटों का पता लगाने के लिये तकनीक का उपयोग करें, लेकिन केवल स्वचालित फ्लैग के माध्यम से मतदाताओं को हटाने के लिये इसका उपयोग न करें।
- प्रवासी व्यक्तियों, दिव्यांगजनों और पहली बार मतदान करने वाले मतदाताओं के लिये विशेष शिविर और बहुभाषी जागरूकता अभियान आयोजित करें।
- अनुचित अपवर्जन का पता लगाने के लिये पुनरीक्षण के पश्चात् स्वतंत्र लेखापरीक्षण किए जाने चाहिये।
निष्कर्ष
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) भारत की निर्वाचक नामावलियों को शुद्ध एवं अद्यतन करने के उद्देश्य से संचालित एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 324 एवं 326 तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 का विधिक आधार प्राप्त है और जिसे उच्चतम न्यायालय द्वारा भी मान्यता प्रदान की गई है। तथापि, इसके पूर्ववर्ती चरणों में निर्वाचकों की संख्या में हुई कमी सावधानी बरतने की आवश्यकता को दर्शाती है। SIR की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि निर्वाचक नामावलियों की सटीकता तथा सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की सांविधानिक प्रत्याभूति के बीच संतुलन किस प्रकार स्थापित किया जाता है, जिससे अपात्र प्रविष्टियों को हटाने का प्रयास वास्तविक एवं पात्र मतदाताओं को निर्वाचक नामावली से अपवर्जित करने का कारण न बन जाए।