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सांविधानिक विधि

शक्तियों का पृथक्करण और मुख्य न्यायाधीश का इंकार

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 19-Oct-2026

स्रोत: द हिंदू 

परिचय 

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने विपक्षी नेताओं के मुलाकात के अनुरोध को अस्वीकार कर दिया। वे मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के आचरण पर आरोप लगाना चाहते थे। वे दिल्ली में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का निरोध और प्रमुख सड़कों के बंद होने का मुद्दा भी उठाना चाहते थे।  

  • इस अस्वीकृति का आधार न्यायपालिका का तटस्थ रहने और राजनीतिक विवादों से दूर रहने का कर्त्तव्य था। मुख्य न्यायाधीश के पत्र में इस बात पर बल दिया गया कि न्यायपालिका सांविधानिक सीमाओं को धुंधला नहीं कर सकती। 
  • वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने इस निर्णय का समर्थन किया। उन्होंने उल्लेख किया कि पूर्व में, जब ‘एक राष्ट्र–एक चुनाव’ संबंधी संयुक्त संसदीय समिति ने उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों से मिलने का प्रस्ताव रखा था, तब अधिवक्ता समुदाय ने इस आधार पर आपत्ति की थी कि उक्त विधेयक से संबंधित कोई विधि भविष्य में न्यायालय में चुनौती के अधीन हो सकती है। उन्होंने कहा कि यहाँ भी उसी मानक को लागू करना न्यायिक औचित्य का विषय है।  

विपक्ष ने मुख्य न्यायाधीश से संपर्क क्यों किया?  

10 अक्टूबर को, दोनों सदनों में विपक्ष के नेताओं, मल्लिकार्जुन खर्गे (राज्यसभा) और राहुल गांधी (लोकसभा) ने संयुक्त रूप से भारत के मुख्य न्यायाधीश कांत को पत्र लिखा। यह एक दुर्लभ घटना थी, जिसमें विपक्ष ने किसी अन्य संवैधानिक प्राधिकारी के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायिक पदाधिकारी से संपर्क किया। 

इस पत्र में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और निर्वाचन आयोग के संबंध में एक ज्ञापन प्रस्तुत करने का अनुरोध किया गया था। यह पत्र उन नागरिकों के विरुद्ध पुलिस की कठोर कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद भेजा गया, जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त के त्यागपत्र की मांग कर रहे थे। पत्र में विद्यार्थियों की मनमानी गिरफ्तारियों, मेट्रो स्टेशनों को बंद किये जाने, रेलगाड़ियों को निरस्त किये जाने तथा सड़कों पर अवरोधक लगाए जाने का उल्लेख किया गया था। पत्र के अनुसार, इन कार्रवाइयों से दिल्ली में “घेराबंदी जैसी स्थिति” उत्पन्न हो गई थी। 

11 अक्टूबर को, श्री गांधी ने एक दूसरा, विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत किया:  

  • उन्होंने उच्चतम न्यायालय को संविधान का संरक्षक और प्रत्येक नागरिक के मतदान के अधिकार का रक्षक बताया। 
  • उन्होंने उल्लेख किया कि वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें तथा पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 के अधीन गठित चयन समिति के सदस्य हैं तथा उन्होंने 17 फरवरी, 2025 को मुख्य निर्वाचन आयुक्त कुमार के चयन के संबंध में औपचारिक असहमति दर्ज की थी। 
  • उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मुख्य निर्वाचन आयुक्त पर शक्तियों के मनमाने एवं एकपक्षीय प्रयोग का आरोप लगाया। 
  • उन्होंने भारत के मुख्य न्यायाधीश से अनुरोध किया कि इस अभ्यावेदन को लोकहित में पत्र याचिका (Letter Petition) के रूप में ग्रहण किया जाए। 

राहुल गांधी ने कौन-से उपचार मांगे?  

  • निर्वाचन आयोग द्वारा विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के अभिलेखों का पूर्ण प्रकटीकरण। 
  • निर्णयों की समीक्षा करने तथा निर्वाचक नामावली से नामों के विलोपन का लेखापरीक्षण करने के लिये उच्चतम न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति का गठन। 
  • विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक। 

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) ने क्या प्रत्युत्तर दिया?  

12 अक्टूबर को, भारत के मुख्य न्यायाधीश ने 10 अक्टूबर के पत्र का उत्तर दिया, किंतु 11 अक्टूबर के अभ्यावेदन का प्रत्यक्ष रूप से उल्लेख नहीं किया। 

  • उन्होंने बैठक में शामिल होने से इंकार कर दिया क्योंकि उठाए गए मुद्दे पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन थे।   
  • उन्होंने कहा कि लंबित मामलों पर चर्चा करने के लिए बैठक करना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होगा, जो मूल संरचना सिद्धांत का एक भाग है। ऐसा करना न्यायिक आचारनीति एवं औचित्य के भी विरुद्ध होगा। 
  • उन्होंने कहा कि संविधान उच्चतम न्यायालय को इन मुद्दों से निपटने के लिये कोई प्रशासनिक शक्ति प्रदान नहीं करता है। तथापि, न्यायालय अपने न्यायिक पक्ष पर इन मुद्दों की परीक्षा करने के लिये बाध्य है।  
  • उन्होंने पुनः पुष्टि की कि नागरिक विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से किसी भी समय अपने मूल अधिकारों के प्रवर्तन की मांग कर सकते हैं।  
  • उन्होंने नेताओं को ज्ञापन प्रस्तुत करने के बजाय न्यायालय की न्यायिक शक्तियों का उपयोग करने की सलाह दी। 

उन्होंने उल्लेख किया कि समान मुद्दों से संबंधित याचिकाएं 13 अक्टूबर के लिए सूचीबद्ध थीं। उन्होंने आश्वासन दिया कि नेताओं द्वारा दायर की जाने वाली किसी भी याचिका पर यथाशीघ्र सुनवाई की जाएगी। 

इसके पश्चात् श्री गांधी ने विपक्ष के 12 अन्य नेताओं के साथ एक रिट याचिका दायर की। यह याचिका पंजीकृत हो चुकी है और सुनवाई के लिये तैयार है। 

विधि क्या कहती है? 

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) का प्रत्युत्तर तीन प्रमुख आधारों पर आधारित है। 

शक्तियों का पृथक्करण 

  • यह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच शासन संबंधी शक्तियों का विभाजन करता है तथा मूल संरचना का अपरिवर्तनीय भाग है।  
  • न्यायपालिका विवादों का निर्णय करती है तथा कार्यपालिका या विधायिका की कार्रवाई की समीक्षा केवल न्यायिक कार्यवाहियों के माध्यम से करती है। 
  • सरकार की नीतियों में हस्तक्षेप करने के लिये उसे कोई कार्यकारी या प्रशासनिक पर्यवेक्षण संबंधी शक्ति प्राप्त नहीं है। 

विचाराधीन नियम और न्यायिक औचित्य 

  • भारत के मुख्य न्यायाधीश, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली न्यायपीठ का भी नेतृत्व करते हैं। किसी एक पक्ष के साथ निजी बैठक करना प्रक्रियात्मक निष्पक्षता को दरकिनार करने के समान होगा।  
  • न्यायालय के बाहर राजनीतिक दलों के साथ आमने-सामने निजी बैठकें न्यायिक निष्पक्षता से समझौता करती हैं तथा पक्षपात की धारणा उत्पन्न करती हैं। 
  • विवादों का निपटारा खुले न्यायालय में किया जाना चाहिये, जहाँ प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अधीन दोनों पक्षकारों को सुना जाता है। 

न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांत 

  • ये सिद्धांत न्यायाधीशों के लिये नैतिक मानक निर्धारित करते हैं, जिनमें ऐसे किसी भी अनुचित आचरण से बचना सम्मिलित है, जो न्यायिक निष्पक्षता में जनता के विश्वास को क्षति पहुँचा सकता है।  

न्यायिक औचित्य की जांच कब-कब शुरू हुई है? 

  • प्रधानमंत्री की मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ की यात्रा (2024): गणेश चतुर्थी पूजा के लिये तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के आवास पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कथित निकटता को लेकर आलोचना को जन्म दिया। 
  • न्यायाधीशों द्वारा राजनीतिक नेताओं की प्रशंसा: न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती ने सत्ता में इंदिरा गांधी की वापसी पर उन्हें बधाई दी थी। न्यायमूर्ति एम.आर. शाह द्वारा कथित रूप से प्रधानमंत्री मोदी को “एक आदर्श एवं नायक” कहा गया था। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने उन्हें “बहुमुखी प्रतिभा का धनी व्यक्ति” कहा था।  
  • मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई: बिम्सटेक (BIMSTEC) सम्मेलन के दौरान तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश गोगोई के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री मोदी ने उच्चतम न्यायालय का दौरा किया था। सेवानिवृत्ति के बाद न्यायमूर्ति गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया था। वे जनवरी 2018 में आयोजित उस प्रेस कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित चार न्यायाधीशों में से एक थे, जिसमें तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के अधीन मामलों के आवंटन को लेकर चिंताएँ व्यक्त की गई थीं।  
  • केशवानंद भारती के बाद पदच्युति: इस निर्णय द्वारा मूल संरचना सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) स्थापित किये जाने के बाद, इंदिरा गांधी सरकार ने न्यायमूर्ति जे.एम. शेलट, न्यायमूर्ति के.एस. हेगड़े तथा न्यायमूर्ति ए.एन. ग्रोवर को दरकिनार कर न्यायमूर्ति ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। इन तीनों न्यायाधीशों ने त्यागपत्र दे दिया था। 
  • न्यायपालिका को बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रखना: न्यायाधीशों की नियुक्तियों में कार्यपालिका के अतिक्रमण को लेकर उत्पन्न चिंताओं के परिणामस्वरूप कॉलेजियम प्रणाली (Collegium System) का विकास हुआ तथा बैंगलोर सिद्धांतों (Bangalore Principles) को अपनाया गया।  

निष्कर्ष 

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत द्वारा बैठक से इंकार किया जाना इस सिद्धांत की पुनः पुष्टि करता है कि न्यायपालिका केवल खुले न्यायालय की कार्यवाहियों के माध्यम से कार्य करती है, न कि निजी बैठकों के माध्यम से। शक्तियों के पृथक्करण, न्यायाधीनता के नियम तथा न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांतों पर भरोसा करते हुए, उन्होंने विपक्ष को उचित न्यायिक प्रक्रिया अपनाने का निर्देश दिया। उन्होंने शीघ्र सुनवाई का आश्वासन भी दिया, जिससे न्याय तक पहुँच सुनिश्चित बनी रही। न्यायाधीशों और राजनेताओं के बीच निकटता को लेकर पूर्व में उत्पन्न विवादों के संदर्भ में यह घटनाक्रम दर्शाता है कि न्यायिक स्वतंत्रता न केवल किसी भी प्रकार के प्रभाव के अभाव पर, अपितु इस संबंध में जनविश्वास पर भी निर्भर करती है कि न्यायपालिका ऐसे किसी प्रभाव से मुक्त है।