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सांविधानिक विधि

मिथ्या निर्वाचन शपथपत्रों के संबंध में मतदाता निजी परिवाद दायर कर सकते हैं

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 19-Oct-2026

राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेन्द्र बेलडेल 

"विधियों का निर्वचन करना मुख्य रूप से न्यायालयों का कार्य है।" 

न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेन्द्र बेलडाले (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RP Act) की धारा 125क के अधीन अपराध के संबंध में निजी परिवाद पोषणीय है तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 195(1) के अधीन प्रतिबंध, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 215 है, उस पर लागू नहीं होता। तथापि, मामले के तथ्यों के आधार पर न्यायालय ने परिवाद को पुनर्जीवित करने से इंकार कर दिया तथा अन्य आधारों पर कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा पारित निरस्तीकरण आदेश को बरकरार रखा। 

राजकुमार मड़की बनाम डॉ. शैलेंद्र बेलडाले (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • प्रत्यर्थी डॉ. शैलेंद्र बेलडाले 2023 में बीदर निर्वाचन क्षेत्र से कर्नाटक विधानसभा के लिये निर्वाचित हुए थे। 
  • अपीलकर्त्ता राजकुमार मड़की ने आरोप लगाया कि प्रत्यर्थी ने अपने नामांकन पत्रों के साथ दायर शपथपत्रों में अपने आवासीय पते के बारे में मिथ्या घोषणा की थी। 
  • अपीलकर्त्ता ने धारा 200 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन बेंगलुरु के अपर मुख्य महानगरीय मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद दायर कराया, जिसमें लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क के अधीन अपराध का आरोप लगाया गया था। 
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने परिवाद को खारिज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) के अधीन निर्बंधन लागू होते हैं और ऐसे परिवाद केवल भारत निर्वाचन आयोग या संबंधित लोक सेवक ही दर्ज कर सकता है, कोई निजी व्यक्ति नहीं। 
  • इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्या दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) धारा 125क लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम पर लागू होती है:  

  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195(1) में लोक सेवक द्वारा परिवाद की आवश्यकता वाले अपराधों में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क को शामिल नहीं किया गया है। 
  • धारा 125क को 2002 में जोड़ा गया था, जबकि धारा 195 दण्ड प्रक्रिया संहिता में बाद में, 2006 में संशोधन किया गया था। चूँकि विधायिका ने उस समय धारा 195 में धारा 125क को नहीं जोड़ा था, इसलिये इस लोप को जानबूझकर किया गया लोप माना जाना चाहिये। 
  • यदि विधायिका का यह आशय होता कि मिथ्या शपथपत्र के अपराध का संज्ञान केवल लोक सेवक के परिवाद पर ही लिया जा सकता है, तो वह धारा 195 दण्ड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करके ऐसा कह सकती थी। 

किसी भी सांविधिक वर्जन के अभाव में: 

  • कोई भी अधिनियम यह उपबंधित नहीं करता है कि धारा 125क के अधीन किसी अपराध का परिवाद केवल लोक सेवक द्वारा ही दर्ज किया जा सकता है। 
  • धारा 125क का प्रारंभ एक गैर-बाधाकारी खंड से होता है, जिसके परिणामस्वरूप तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उसमें विहित दण्ड लागू होता है। 

प्रत्यर्थी के तर्कों पर: 

  • प्रत्यर्थी ने तर्क दिया कि निजी परिवादों की अनुमति देने से निर्वाचित उम्मीदवारों के विरुद्ध तुच्छ आपराधिक कार्यवाही को बढ़ावा मिलेगा। 
  • प्रत्यर्थी ने जून 2020 के निर्वाचन आयोग के एक प्रेस नोट पर भी विश्वास किया, जिसमें कहा गया था कि आयोग शपथपत्रों में गंभीर लोपों को दर्शाने वाले परिवादों पर विचार करेगा तथा प्रत्येक मामले के तथ्यों के अनुसार उन्हें अन्वेषण अभिकरणों को संदर्भित करेगा। 
  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विधियों का निर्वचन मुख्यतः न्यायालयों का कार्य है; अतः विधिक उपबंधों की व्याख्या के संबंध में निर्वाचन आयोग के दिशा-निर्देश एवं प्रेस नोट न्यायालयों पर बाध्यकारी नहीं हैं। 

तुच्छ परिवादों के विरुद्ध सुरक्षा उपायों पर:  

  • प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर, मजिस्ट्रेटों को तुच्छ परिवादों अथवा निर्वाचित को मात्र प्रताड़ित करने के उद्देश्य से संस्थित कार्यवाहियों से समुचित रूप से निपटने की शक्ति प्राप्त है। 

मामले के तथ्यों के आधार पर: 

  • आवासीय पते के संबंध में लगाए गए आरोप का अभिलेख पर उपलब्ध दस्तावेजों द्वारा प्रथमदृष्टया खंडन किया जा चुका था। 
  • दोषसिद्धि की संभावना अत्यंत क्षीण प्रतीत हो रही थी तथा कार्यवाही जारी रखने से केवल न्यायिक समय व्यय होता। 

निष्कर्ष: 

  • न्यायालय ने उच्च न्यायालय के विधिक तर्क को अस्वीकार कर दिया, किंतु आपराधिक कार्यवाही को पुनर्जीवित नहीं किया। न्यायालय ने अन्य आधारों पर परिवाद के निरस्तीकरण को बरकरार रखा। अपील का निस्तारण कर दिया गया तथा पक्षकारों को अपने-अपने वाद-व्यय वहन करने का निदेश दिया गया। 

लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 125क क्या है? 

 बारे में: 

  • लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 125क निर्वाचन नामांकन संबंधी दस्तावेजों में मिथ्या शपथपत्र प्रस्तुत करने या जानकारी छिपाने के लिये दण्ड का उपबंध करतीहै। 
  • इसे 2002 में उच्चतम न्यायालय के निर्वाचकों के उम्मीदवारों के पूर्ववृत्त जानने के अधिकार पर दिये गए निर्णयों (भारत संघ बनाम एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स, 2002 और पी.यू.सी.एल. बनाम भारत संघ, 2003) के बाद शामिल किया गया था। 

उपबंध:  

  • वह उम्मीदवार जो किसी निर्वाचन में निर्वाचित होने के आशय से: 
    • धारा 33क(1) के अधीन आवश्यक जानकारी प्रदान करने में असफल रहता है; या 
    • वह ऐसी मिथ्या जानकारी देता है जिसे वह जानता है या जिसके बारे में उसे मिथ्या होने का विश्वास करने का कारण है; या 
    • किसी भी जानकारी को छुपाता है, 

धारा 33(1) के अधीन अपने नामांकन पत्र में या धारा 33क (2) के अधीन अपने शपथपत्र में ऐसा करने पर अपराध करता है। 

  • दण्ड: छह महीने तक का कारावास, जुर्माना, या दोनों। 
  •   यह उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी लागू होता है।  

संबंधित उपबंध (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 33क — सूचना का अधिकार): 

  • किसी उम्मीदवार को यह प्रकट करना होगा कि क्या वह ऐसे लंबित मामले में किसी अपराध का अभियुक्त है, जो दो वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डनीय है तथा जिसमें आरोप विरचित किये जा चुके हैं। 
  • उसे यह भी प्रकट करना होगा कि क्या उसे किसी अपराध के लिये (धारा 8(1), (2) या (3) के अधीन आने वाले अपराधों से भिन्न) दोषसिद्ध ठहराया गया है तथा एक वर्ष या उससे अधिक के कारावास से दण्डित किया गया  है। 
  • यह जानकारी धारा 33क (2) के अधीन शपथपत्र के साथ प्रस्तुत की जाती है, जिसे रिटर्निंग ऑफिसर सार्वजनिक जानकारी के लिये प्रदर्शित करता है। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 क्या है? 

 बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 215 लोक सेवकों के विधिपूर्ण प्राधिकार की अवमानना से संबंधित अपराधों, लोक न्याय के विरुद्ध अपराधों तथा साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के अभियोजन से संबंधित है। 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 195 के अनुरूप है। 

उपबंध: 

  • धारा 215(1)(क): भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 के अधीन अपराधों (जो भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 172 से 188 के अनुरूप हैं), अथवा ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण, प्रयत्न या आपराधिक षड्यंत्र का कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा, सिवाय संबंधित लोक सेवक या उस लोक सेवक, जिसके प्रशासनिक अधीन वह लोक सेवक है (अथवा किसी अन्य प्राधिकृत लोक सेवक) की लिखित परिवाद पर। 
  • धारा 215(1)(ख): लोक न्याय के विरुद्ध कतिपय अपराधों तथा न्यायालय की कार्यवाही में या उससे संबंधित रूप से कारित, साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत या दिये गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों का संज्ञान केवल उस न्यायालय की लिखित परिवाद पर लिया जा सकता है, जिसमें ऐसा अपराध कारित किया गया हो, अथवा ऐसे न्यायालय की लिखित परिवाद पर लिया जा सकता है जिसके अधीन वह अधीनस्थ है।