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आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) लोक सेवकों के लिये सुरक्षा उपायों का विस्तार करती है

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 22-Oct-2026

पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान  

"...भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 175 की उपधारा (4) के अधीन ऐसी अपेक्षा को समाविष्ट किया गया है।" 

न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की खंडपीठ ने पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन तथा अन्य याचिकाकर्ताओं को CMRL-Exalogic के मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने के केरल उच्च न्यायालय के एकल न्यायाधीश द्वारा दिये गए निदेश को चुनौती देने की अनुमति प्रदान की। इस दौरान, न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4), पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) से किस प्रकार भिन्न है। 

पिनराई विजयन बनाम अधिवक्ता के. एम. शाजहान (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला केरल में CMRL-Exalogic मामले से जुड़ा है। 
  • केरल उच्च न्यायालय के एक एकल न्यायाधीश ने याचिकाकर्त्ताओं, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन भी शामिल हैं, के विरुद्ध FIR दर्ज करने और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अन्वेषण शुरू करने का निदेश दिया। 
  • याचिकाकर्त्ताओं ने उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष इस आदेश के विरुद्ध अपील करने की अनुमति मांगी। 
  • खंडपीठ ने अपील की अनुमति देने से इंकार कर दिया। 
  • इससे व्यथित होकर याचिकाकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता द्वारा लाए गए परिवर्तन पर: 

  • न्यायालय ने कहा कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की तुलना में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन न्यायिक हस्तक्षेप के माध्यम से FIR दर्ज करने की योजना में परिवर्तन आया है। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) के अधीन, मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज करने का निदेश देने से पहले लोक सेवक या उनके वरिष्ठ अधिकारी को शामिल करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) के अधीन, यदि किसी लोक सेवक के विरुद्ध आधिकारिक कर्त्तव्यों के दौरान किये गए कृत्यों के लिये परिवाद किया जाता है, तो मजिस्ट्रेट को निम्नलिखित करना होगा: 
    • लोक सेवक के वरिष्ठ अधिकारी से तथ्यों और परिस्थितियों पर एक रिपोर्ट प्राप्त करनी होगी; और 
    • उस घटना के घटित होने के कारण के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिये गए कथनों पर विचार करना होगा । 

लोक सेवक के सुने जाने के अधिकार पर: 

  • सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति बागची ने टिप्पणी की कि धारा 175(4) के अधीन, मजिस्ट्रेट द्वारा FIR दर्ज करने का निदेश देने से पहले लोक सेवक की राय ली जाती है। 
  • ऐसे लोक सेवक को अपने तर्कों के गुण-दोष के आधार पर सुनने का अधिकार है, न कि अधिकारिता के अभाव के कारण प्रारंभ में ही उन्हें खारिज कर दिया जाए। 

संदर्भ का सीमित उद्देश्य: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने धारा 175(4) भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का उल्लेख केवल नई विधि के अधीन FIR दर्ज करने से पहले संभावित अभियुक्त को उपलब्ध विस्तारित सुरक्षा उपायों को समझाने के लिये किया था। 
  • इसने यह निर्णय नहीं किया कि क्या यह उपबंध याचिकाकर्त्ताओं के विरुद्ध लगाए गए आरोपों पर लागू होता है। 

याचिकाकर्त्ताओं की चुनौती के संबंध में: 

  • न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ताओं ने एकल न्यायाधीश के आदेश को चुनौती देने के लिये प्रथम दृष्टया मामला बनाया है, विशेष रूप से इसलिये क्योंकि इसमें न केवल FIR दर्ज करने का निदेश दिया गया था अपितु भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के अधीन अन्वेषण प्रारंभ करने का भी निदेश दिया गया था। 

निर्देश: 

  • खंडपीठ द्वारा अपील की अनुमति देने से इंकार करने के निर्णय को अपास्त कर दिया गया और याचिकाकर्त्ताओं को अपनी अपीलें आगे बढ़ाने की अनुमति दी गई। 
  • याचिकाकर्त्ताओं को उच्च न्यायालय से अंतरिम अनुतोष प्राप्त करने का अवसर देने के लिये अन्वेषण को सात दिनों के लिये स्थगित कर दिया गया था। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175 संज्ञेय मामलों का अन्वेषण करने की पुलिस अधिकारी की शक्ति से संबंधित है । 
  • यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 के अनुरूप है । 

उपधारा: 

  • धारा 175(1): कोई पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना किसी ऐसे संज्ञेय मामले का अन्वेषण कर सकता है, जिसकी जांच या विचारण करने की शक्ति उस थाने की सीमाओं के अंदर के स्थानीय क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायालय को अध्याय 14 के उपबंधों के अधीन है। 
    • परंतुक: संज्ञेय अपराध की प्रकृति और गंभीरता पर विचार करते हुए, पुलिस अधीक्षक, उप पुलिस अधीक्षक से मामले का अन्वेषण करने के लिये अपेक्षा कर सकेगा। 
  • धारा 175(2): किसी पुलिस अधिकारी की कार्यवाही पर इस आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता कि अधिकारी को इस धारा के अधीन अन्वेषण करने का अधिकार नहीं था। 
  • धारा 175(3): धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट निम्नलिखित के बाद अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • धारा 173(4) के अधीन दिये गए शपथपत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर विचार करना; 
    • ऐसी जांच करना जो आवश्यक समझी जाए; और 
    • पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत जानकारी पर विचार करते हुए। 
  • धारा 175(4): धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट, लोक सेवक के विरुद्ध आधिकारिक कर्त्तव्यों के दौरान उत्पन्न हुए परिवाद पर, निम्नलिखित शर्तों के अधीन रहते हुए अन्वेषण का आदेश दे सकता है: 
    • (क) लोक सेवक से वरिष्ठ अधिकारी से घटना के तथ्यों और परिस्थितियों से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त करना; और 
    • (ख) घटना के कारण उत्पन्न हुई परिस्थिति के संबंध में लोक सेवक द्वारा दिये गए कथनों पर विचार करना। 

क्या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4), दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) से भिन्न है? 

पहलू 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 156(3) 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(3) एवं (4)  

सशक्त मजिस्ट्रेट 

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 190 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 210 के अधीन सशक्त मजिस्ट्रेट 

शपथपत्र की आवश्यकता 

इस उपबंध में इसका उल्लेख नहीं है। 

आवेदन के साथ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(4) के अधीन शपथपत्र प्रस्तुत करना आवश्यक है।  

मजिस्ट्रेट द्वारा जांच 

इस उपबंध में इसका उल्लेख नहीं है।  

मजिस्ट्रेट आवश्यक जांच कर सकता है तथा पुलिस अधिकारी के निवेदन पर विचार कर सकता है।  

लोक सेवकों के विरुद्ध परिवाद 

कोई विशेष प्रक्रिया निर्धारित नहीं है। 

वरिष्ठ अधिकारी से रिपोर्ट प्राप्त करना तथा लोक सेवक के अभिकथनों पर विचार करना आवश्यक है।  

वरिष्ठ अधिकारी द्वारा अन्वेषण 

ऐसा कोई उपबंध नहीं है। 

पुलिस अधीक्षक, अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता पर विचार करते हुए, पुलिस उपाधीक्षक को अन्वेषण करने का निर्देश दे सकता है।