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सांविधानिक विधि
स्वीकृत संविदात्मक देय राशि को रोकना मनमाना है
«20-Oct-2026
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मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य "स्वीकृत देय राशियों/संविदात्मक देय राशियों का अनिश्चित अवधि तक भुगतान न किया जाना भी मनमानीपूर्ण निष्क्रियता के समान है, जिसे विधि के अंतर्गत स्वीकार नहीं किया जा सकता।" न्यायमूर्ति जे. जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की पीठ ने मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि राज्य प्राधिकारी द्वारा स्वीकृत संविदात्मक देय राशियों का भुगतान न किया जाना मनमाना है तथा ऐसी देय राशियों की वसूली के लिये भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन रिट याचिका प्रस्तुत की जा सकती है। न्यायालय ने नगर पंचायत को निदेश दिया कि वह स्वीकृत देय राशियों का भुगतान 6% वार्षिक की दर से साधारण ब्याज सहित करे।
मेसर्स विकास कंस्ट्रक्शंस बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता, जो एक सिविल ठेकेदार है, ने दो कार्य आदेशों के अधीन चंदौली नगर पंचायत के लिये निर्माण कार्य किया।
- कंपनी ने दावा किया कि आवेदन और अनुस्मारक भेजने के बावजूद 28,43,443 रुपए के बिलों का संदाय नहीं किया गया।
- याचिकाकर्त्ता ने बकाया राशि की वसूली के लिये अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय का रुख किया।
- उच्च न्यायालय ने चंदौली नगर पंचायत के कार्यकारी अधिकारी को व्यक्तिगत शपथपत्र पर यह बताने का निदेश दिया कि क्या दावा स्वीकार किया गया था।
- शपथपत्र में प्रत्यर्थियों का पक्ष:
- पहले कार्य आदेश के अधीन 7,92,580 रुपए का संदाय नहीं किया गया था, और प्रत्यर्थी इसके संदाय पर विचार करने के लिये तैयार थे।
- दूसरे कार्य आदेश के अधीन बकाया 6,31,890 रुपए जारी नहीं किये जा सके क्योंकि याचिकाकर्त्ता ने निर्धारित प्रारूप में बिल के बजाय अधूरा फॉर्म संख्या 26 जमा किया था, और इंजीनियरों द्वारा प्रमाणीकरण लंबित था।
- कार्य के पूर्ण होने पर कोई विवाद नहीं था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धन संबंधी दावों के लिये दायर याचिका की वैधता पर:
- रिट न्यायालय की अधिकारिता में धन संबंधी दावों पर निर्णय लेने पर लगी रोक पूर्णतः लागू नहीं होती है।
- उत्कल हाइवेज इंजीनियर्स एंड कॉन्ट्रैक्टर्स बनाम चीफ जनरल मैनेजर (2025) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 226 के अधीन धन दावों का निर्णय किया जा सकता है जहाँ स्वीकृत बकाया का संदाय न करना मनमाना है।
- उत्तर प्रदेश राज्य बनाम ब्रिज एंड रूफ कंपनी (इंडिया) लिमिटेड (1996) के अधीन, गंभीर रूप से विवादित संविदात्मक दावों का निर्णय सिविल वाद में किया जाना चाहिये, लेकिन धन की कमी जैसे आधारों पर रोके गए स्वीकृत दावों को रिट अधिकारिता में लागू किया जा सकता है।
स्वीकृत बकाया राशि पर:
- बकाया राशि स्पष्ट और निश्चित थी, और प्रत्यर्थी ने एक व्यक्तिगत शपथपत्र में इसे स्वीकार किया था।
- इस बात पर कोई विवाद नहीं था कि काम पूरा हो चुका था और प्रत्यर्थियों पर बकाया राशि का संदाय करने का दायित्व था।
- अनिश्चित अवधि के लिये स्वीकृत बकाया राशि को रोके रखना मनमाना है और विधि की दृष्टि से मान्य नहीं है।
- हस्तक्षेप करने से इंकार करने पर याचिकाकर्त्ता के वैध दावे की कीमत पर प्रत्यर्थियों को अनुचित लाभ होगा।
दोनों राशियों पर:
- पहले कार्य आदेश के अधीन 7,92,580 रुपए की राशि एक स्पष्ट स्वीकृति थी और इसका संदाय करना ही था।
- दूसरे कार्य आदेश के अधीन 6,31,890 रुपये का संदाय याचिकाकर्त्ता द्वारा शपथपत्र में उल्लिखित औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद किया जाएगा।
ब्याज के संबंध में:
- पूर्णिमा आडवाणी और अन्य बनाम गवर्नमेंट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली (2025) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने माना कि जिस व्यक्ति को वैध रूप से देय धन से वंचित किया गया है, वह ब्याज के रूप में प्रतिकर का हकदार है।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने रिट याचिका मंजूर कर ली।
याचिकाकर्त्ता को दूसरे कार्य आदेश के लिये दो सप्ताह के भीतर एक नया बिल जारी करने का निदेश दिया गया था, और प्रत्यर्थियों को देय तिथि से संदाय होने तक 6% प्रति वर्ष की साधारण ब्याज दर के साथ चार सप्ताह के भीतर स्वीकृत पूरी राशि का संदाय करने का निदेश दिया गया था।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 226 क्या है?
बारे में:
- अनुच्छेद 226 प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर किसी भी व्यक्ति या प्राधिकारी, जिसमें सरकार भी सम्मिलित है, को निदेश, आदेश या रिट जारी करने का अधिकार देता है।
- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण की प्रकृति में रिट जारी की जा सकती हैं।
- उपबंध:
- अनुच्छेद 226(1): उच्च न्यायालय मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन और “किसी अन्य प्रयोजन” के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है, जिसके कारण उनकी रिट अधिकारिता, अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता से अधिक व्यापक है।
- अनुच्छेद 226(2): उच्च न्यायालय अपने प्रादेशिक अधिकारिता से बाहर स्थित किसी प्राधिकारी को भी रिट जारी कर सकता है, यदि वाद-हेतुक पूर्णतः या आंशिक रूप से उसकी प्रादेशिक अधिकारिता के अंतर्गत उत्पन्न होता है।
- अनुच्छेद 226(3): जहाँ दूसरे पक्षकार को सुनवाई का अवसर दिये बिना कोई अंतरिम आदेश पारित किया जाता है, वहाँ प्रभावित पक्षकार उस आदेश को अपास्त कराने के लिये आवेदन कर सकता है तथा ऐसे आवेदन का निस्तारण दो सप्ताह के भीतर किया जाना आवश्यक है।
- अनुच्छेद 226(4): अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय की शक्ति, अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की शक्ति को न्यून या प्रभावित नहीं करती है।
अधिकारिता की प्रकृति:
- अनुच्छेद 226 के धीन उपचार विवेकाधीन है।
- जहाँ समान रूप से प्रभावकारी वैकल्पिक उपचार उपलब्ध होता है, वहाँ उच्च न्यायालय सामान्यतः हस्तक्षेप करने से विरत रहता है। तथापि, यह न्यायिक आत्म-संयम का नियम है, न कि अधिकारिता पर कोई प्रतिबंध।