- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
पारिवारिक कानून
अभिरक्षा याचिका की सुनवाई उस स्थान पर की जानी चाहिये, जहाँ बालक निवास करता है
« »26-Oct-2026
|
X बनाम Y "...जहाँ तक बालक के कल्याण का प्रश्न है, यह किसी भी न्यायालय के लिये सदैव सर्वोपरि विचारणीय विषय होता है।" न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत |
स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मौलिक जे. शेलत ने X v. Y (2026) मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 (GWA) के अधीन अभिरक्षा संबंधी आवेदन की सुनवाई उस कुटुंब न्यायालय द्वारा की जानी चाहिये, जिसकी क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर बच्चे निवास करते हैं, क्योंकि कोई भी आदेश पारित करने से पूर्व उस न्यायालय के लिये बच्चे से संवाद करना आवश्यक है। न्यायालय ने पत्नी का स्थानांतरण आवेदन खारिज कर दिया, किंतु उसे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कार्यवाही में उपस्थित होने की अनुमति प्रदान की।
X बनाम Y (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पत्नी, जो राजकोट में अपने माता-पिता के साथ रह रही थी, अपने बच्चों से अलग रह रही थी, जो पति की देखरेख में थे।
- उसने अवयस्क बालकों के संरक्षक के रूप में नियुक्ति और उनकी अभिरक्षा/वापसी की मांग करते हुए हिम्मतनगर स्थित कुटुंब न्यायालय के समक्ष संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 के अधीन कार्यवाही शुरू की थी।
- पति ने हिम्मतनगर स्थित कुटुंब न्यायालय में उसके विरुद्ध वैवाहिक वाद भी दायर किया था।
- पत्नी ने पति के वाद को हिम्मतनगर स्थित कुटुंब न्यायालय से राजकोट स्थित कुटुंब न्यायालय में अंतरित करने के लिये उच्च न्यायालय में याचिका दायर की।
- पत्नी के तर्क:
- वह एक अनपढ़ महिला है जो अपने बच्चों से बहुत दूर रहती है।
- हिम्मतनगर और राजकोट के बीच लगभग 300 किलोमीटर की दूरी के कारण कार्यवाही में शामिल होने में काफी कठिनाई और असुविधा हुई।
- पति के तर्क:
- पत्नी ने स्वयं हिम्मतनगर में संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम की कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें उसे किसी भी सूरत में उपस्थित होना आवश्यक था।
- उनके वाद को राजकोट अंतरित करने से कोई लाभ नहीं होगा।
- वह कार्यवाही में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के लिये उसके यात्रा खर्च को वहन करने को तैयार था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
अभिरक्षा संबंधी कार्यवाही में अधिकारिता के संबंध में:
- यह निर्विवाद था कि संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम के अधीन, अभिरक्षा के लिये आवेदन उस न्यायालय में दायर किया जाना चाहिये जहाँ बच्चे निवास करते हैं, अर्थात्, हिम्मतनगर स्थित कुटुंब न्यायालय में।
- संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम की कार्यवाही को राजकोट स्थित कुटुंब न्यायालय में अंतरित नहीं किया जा सका, क्योंकि उस न्यायालय के पास विवाद का निर्णय करने की कोई अधिकारिता नहीं थी।
बालक के कल्याण के संबंध में:
- किसी भी न्यायालय के लिये बालक का कल्याण सदैव सर्वोपरि विचारणीय विषय होता है।
- चूँकि संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम आवेदन पर निर्णय लेने वाले न्यायालय को कोई भी आदेश पारित करने से पहले बच्चे के साथ बातचीत करनी होती है, इसलिये यह अधिक वांछनीय है कि मामले का निर्णय उस न्यायालय द्वारा किया जाए जिसकी अधिकारिता में बालक निवास करते हैं।
पत्नी की कठिनाई के संबंध में:
- पत्नी को किसी भी सूरत में हिम्मतनगर में स्वयं द्वारा शुरू की गई संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम की कार्यवाही में उपस्थित होना आवश्यक था।
- वह कुटुंब न्यायालय से अनुरोध कर सकती है कि उसे वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से दोनों कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दी जाए।
- इस प्रकार के अनुरोध को स्वीकार किया जाएगा, जब तक कि प्रतिपरीक्षा या किसी अन्य कारण से उसकी शारीरिक उपस्थिति आवश्यक न हो।
निष्कर्ष:
न्यायालय ने अंतरण आवेदन को खारिज कर दिया और हिम्मतनगर स्थित कुटुंब न्यायालय को दोनों कार्यवाही में तेजी लाने और विधि के अनुसार, अधिमानतः आदेश प्राप्त होने की तिथि से एक वर्ष के भीतर, उनका निर्णय करने का निदेश दिया।
संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 क्या है?
बारे में:
- संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम एक पंथनिरपेक्ष विधि है जो भारत में अवयस्कों के व्यक्ति और संपत्ति के संरक्षकों की नियुक्ति और घोषणा को नियंत्रित करता है।
- यह धर्म की परवाह किये बिना सभी अवयस्कों पर लागू होता है और हिंदू अप्राप्तवयता और संरक्षकता अधिनियम, 1956 जैसे व्यक्तिगत विधियों के साथ-साथ प्रभावी होता है।
मुख्य उपबंध:
- धारा 9 (अधिकारिता वाला न्यायालय):
- किसी अवयस्क के व्यक्ति की संरक्षकता के लिए आवेदन उस जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, जिसकी अधिकारिता के अंतर्गत वह स्थान आता है जहाँ अवयस्क सामान्यतः निवास करता है।
- किसी अवयस्क की संपत्ति की संरक्षकता के लिये आवेदन उस जिला न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसकी अधिकारिता के अंतर्गत वह स्थान आता है जहाँ अवयस्क सामान्यतः निवास करता है या जहाँ उसकी संपत्ति स्थित है।
- धारा 17 (न्यायालय द्वारा विचारणीय विषय):
- न्यायालय को उन परिस्थितियों पर विचार करते हुए, जो अवयस्क के कल्याण के लिये उपयुक्त प्रतीत हों, अवयस्क की आयु, लिंग और धर्म, प्रस्तावित संरक्षक का चरित्र एवं सामर्थ्य तथा मृतक माता या पिता की इच्छाओं को ध्यान में रखना होगा।
- यदि अवयस्क इतनी आयु का है कि वह विवेकपूर्ण ढंग से अपनी पसंद व्यक्त कर सके, तो न्यायालय उसकी पसंद पर विचार कर सकता है।
- धारा 25 (प्रतिपाल्य की अभिरक्षा):
- यदि कोई प्रतिपाल्य संरक्षक की अभिरक्षा छोड़ देता है या उसे उस अभिरक्षा से हटा दिया जाता है, तो न्यायालय, यदि ऐसा करना प्रतिपाल्य के कल्याण के लिये आवश्यक हो, उसकी वापसी का आदेश दे सकता है।
कुटुंब न्यायालयों की अधिकारिता:
- कुटुंब न्यायालय अधिनियम, 1984 की धारा 7 के अधीन, कुटुंब न्यायालय को ऐसे वादों और कार्यवाहियों में जिला न्यायालय की अधिकारिता प्राप्त है, जो किसी अवयस्क के व्यक्ति की संरक्षकता अथवा उसकी अभिरक्षा या उससे मिलने के अधिकार से संबंधित हों।