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व्यापारिक सन्नियम
धारा 143(2) के अधीन सूचना जारी किये बिना पुनर्निर्धारण की कार्यवाही विधि की दृष्टि से दूषित है
« »30-Oct-2026
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प्रधान आयकर आयुक्त, भुवनेश्वर बनाम उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2026) "अधिनियम की धारा 147 के अधीन पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही के लिये अधिनियम की धारा 143(2) के अधीन सूचना जारी किया जाना अनिवार्य पूर्वापेक्षा है।" न्यायमूर्ति संजय कुमार और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय कुमार तथा न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की पीठ ने प्रधान आयकर आयुक्त, भुवनेश्वर बनाम उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2026) और इससे संबद्ध मामलों में निर्णय दिया। न्यायालय ने राजस्व विभाग की अपील खारिज कर दी तथा उड़ीसा उच्च न्यायालय के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 143(2) के अधीन कोई सूचना जारी नहीं किये जाने के कारण पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही विधिक रूप से दूषित थी।
प्रधान आयकर आयुक्त बनाम उड़ीसा माइनिंग कॉर्पोरेशन लिमिटेड (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- राजस्व विभाग ने आयकर अधिनियम, 1961 (अधिनियम) की धारा 147 के अधीन करदाताओं के विरुद्ध पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही शुरू की।
- इन कार्यवाही के दौरान इसने अधिनियम की धारा 143(2) के अधीन कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया।
- करदाताओं ने पुनर्मूल्यांकन की कार्यवाही में भाग लिया।
- उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही:
- उड़ीसा उच्च न्यायालय ने करदाताओं के पक्ष में निर्णय दिया।
- इसने पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही को दूषित माना क्योंकि राजस्व ने धारा 143(2) के अधीन अनिवार्य नोटिस जारी नहीं किया था।
- राजस्व विभाग की ओर से उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दलील:
- राजस्व विभाग ने अधिनियम की धारा 292खख पर विश्वास किया।
- इसमें तर्क दिया गया कि धारा 143(2) के अधीन औपचारिक नोटिस जारी करने में विफल रहने से पुनर्मूल्यांकन अमान्य नहीं होगा, क्योंकि करदाताओं ने अन्यथा कार्यवाही में भाग लिया था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 143(2) के अधीन नोटिस की अनिवार्य प्रकृति के संबंध में:
- धारा 143(2) के अधीन नोटिस अनिवार्य है। यह करदाता को कोई भी साक्ष्य या विवरण प्रस्तुत करने या प्रस्तुत करवाने का अवसर देता है, जिस पर वे अनुतोष का दावा करते हैं।
- धारा 147 के अधीन पुनर्मूल्यांकन के लिये नोटिस एक अनिवार्य शर्त है।
- धारा 143(2) के अधीन नोटिस के बिना, राजस्व आगे कोई कार्यवाही नहीं कर सकता।
धारा 292खख के दायरे क संबंध में:
- यह निर्णय न्यायमूर्ति सचदेवा ने लिखा था। इसमें कहा गया कि धारा 292खख में निहित काल्पनिक प्रावधान केवल तभी लागू होता है जब वास्तव में नोटिस जारी किया गया हो। उस स्थिति में, उपस्थित होने वाला करदाता बाद में यह दावा नहीं कर सकता कि:
- नोटिस जारी नहीं किया गया था।
- नोटिस समय पर तामील नहीं किया गया, या
- नोटिस ठीक से तामील नहीं कराया गया था।
- इसलिये, यह काल्पनिक प्रावधान राजस्व विभाग के लिये तब मददगार होता है जब कोई करदाता नोटिस के जवाब में पेश होता है और फिर नोटिस जारी करने या तामील करने के तरीके पर विवाद करता है।
- यह नियम उन मामलों में लागू नहीं होता जहाँ कोई नोटिस जारी ही नहीं किया गया हो, जैसा कि इस मामले में है।
- न्यायालय ने कहा कि यह काल्पनिक प्रावधान उस स्थिति में लागू नहीं हो सकता जहाँ राजस्व विभाग ने स्वयं स्वीकार किया है कि उसने नोटिस जारी नहीं किया था। जहाँ राजस्व विभाग स्वयं कहता है कि अधिनियम के अनुसार कोई नोटिस नहीं भेजा गया था, वहाँ धारा 292खख लागू नहीं होती।
करदाता की भागीदारी पर:
- पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही में करदाताओं की भागीदारी स्वयं में धारा 143(2) के साथ धारा 292खख के अनुपालन के रूप में नहीं मानी जाती है, जब धारा 143(2) के अधीन कोई औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया था।
न्यायालय द्वारा निकाले गए निष्कर्ष:
- धारा 292खख किसी करदाता को अधिनियम के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही में यह आपत्ति उठाने से नहीं रोकती कि धारा 143(2) के अंतर्गत कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था। यह तब भी लागू होता है जब करदाता पुनर्मूल्यांकन के दौरान उपस्थित हुआ हो और आपत्ति उठाए बिना सहयोग किया हो।
- राजस्व को धारा 143(2) के अधीन नोटिस देना होगा, भले ही करदाता यह अनुरोध करे कि धारा 139 के अधीन दाखिल किये गए पिछले रिटर्न को धारा 148 के अधीन नोटिस के जवाब में दाखिल किये गए रिटर्न के रूप में माना जाए।
- पुनर्मूल्यांकन के दौरान धारा 142(1) के अधीन निर्धारण अधिकारी द्वारा लिखा गया पत्र, जिसमें निर्धारिती से प्रस्तावित पुनर्मूल्यांकन के आधारों को स्पष्ट करने के लिये कहा गया है, धारा 143(2) के अधीन नोटिस देने के अनिवार्य कर्त्तव्य को पूरा नहीं करता है।
परिणाम :
- राजस्व विभाग की अपील खारिज कर दी गई।
पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही में नोटिसों को नियंत्रित करने वाले विधिक सिद्धांत क्या हैं?
बारे में:
- पुनर्मूल्यांकन वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा राजस्व विभाग किसी विशेष मूल्यांकन वर्ष के लिये मूल्यांकन से छूट गई आय का आकलन या पुनर्मूल्यांकन करता है।
- इस अधिनियम में पुनर्मूल्यांकन के लिये प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की एक श्रृंखला निर्धारित की गई है। आवश्यक नोटिस जारी करना उनमें से एक है, और यह करदाता के सुनवाई के अधिकार की रक्षा करता है।
धारा 139 – आय विवरण:
- प्रत्येक व्यक्ति जिसकी कुल आय कर से मुक्त अधिकतम राशि से अधिक है, उसे निर्धारित समय के भीतर आय विवरण दाखिल करना होगा।
धारा 142(1) – मूल्यांकन से पहले की जांच:
- निर्धारण अधिकारी करदाता को नोटिस जारी कर रिटर्न दाखिल करने या मूल्यांकन के लिये आवश्यक खाते, दस्तावेज या जानकारी प्रस्तुत करने के लिये कह सकता है।
धारा 143(2) – जांच सूचना:
- जहाँ रिटर्न दाखिल किया गया है, वहाँ निर्धारण अधिकारी करदाता को नोटिस जारी कर उसे उपस्थित होने या रिटर्न के समर्थन में साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिये कह सकता है।
- नोटिस उस प्रावधान में विहित समय सीमा के भीतर तामील किया जाना चाहिये।
- न्यायिक निर्वचन के माध्यम से, इसे एक न्यायिक आवश्यकता के रूप में माना जाता है, इससे पहले कि जांच के आधार पर मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन पूरा किया जा सके।
- धारा 147 – मूल्यांकन से छूट प्राप्त आय:
- यदि किसी आकलन वर्ष के लिये कर योग्य आय का आकलन नहीं हो पाया है, तो आकलन अधिकारी धारा 148 से 153 के अधीन रहते हुए उस आय का आकलन या पुनर्मूल्यांकन कर सकता है।
धारा 148 – आय के मूल्यांकन से छूट जाने की स्थिति में नोटिस जारी करना:
- धारा 147 के अधीन आकलन या पुनर्मूल्यांकन करने से पहले, आकलन अधिकारी को करदाता को संबंधित वर्ष के लिये आय विवरण दाखिल करने के लिये नोटिस जारी करना होगा।
- इस नोटिस के जवाब में दाखिल किया गया रिटर्न अधिनियम के अधीन उसी प्रकार संसाधित किया जाता है जैसे कि वह धारा 139 के अधीन दाखिल किया गया रिटर्न हो।
धारा 292खख– कुछ परिस्थितियों में नोटिस वैध माना जाएगा:
- यह उपबंध वित्त अधिनियम, 2008 द्वारा जोड़ा गया था।
- यदि कोई करदाता किसी मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन से संबंधित किसी कार्यवाही में उपस्थित होता है, या किसी जांच में सहयोग करता है, तो अधिनियम के अधीन आवश्यक कोई भी नोटिस समय पर और विधिवत रूप से तामील किया हुआ माना जाएगा।
- इसके बाद करदाता अधिनियम के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही या जांच में यह आपत्ति नहीं कर सकता कि नोटिस तामील नहीं किया गया, समय पर तामील नहीं किया गया या अनुचित तरीके से तामील किया गया।
- परंतुक: यह धारा उस स्थिति में लागू नहीं होती जब करदाता ने मूल्यांकन या पुनर्मूल्यांकन पूरा होने से पहले वह आपत्ति उठाई हो।