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आपराधिक कानून

पीड़ित के वयस्क हो जाने के पश्चात् भी साक्ष्य अभिलिखित करते समय लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के संरक्षणात्मक उपबंध लागू होते हैं

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 30-Oct-2026

टी. बनाम गुजरात राज्य और अन्य 

"मात्र इस तथ्य से कि विचारण प्रारंभ होने के समय पीड़िता की आयु 18 वर्ष से अधिक थी, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि अभिसाक्ष्य के अभिलेखन के संबंध में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के उपबंध लागू नहीं होंगे।" 

न्यायमूर्ति मूल चंद त्यागी 

स्रोत: गुजरात उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मूल चंद त्यागी ने टी. बनाम गुजरात राज्य और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अहमदाबाद (ग्रामीण) के अनन्य POCSO न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया तथा उसे लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO Act) की धाराओं 33(2), 36 एवं 37 के अधीन पीड़िता का परिसाक्ष्य बंद कमरे में अभिलिखित करने का निदेश दिया, भले ही विचारण प्रारंभ होने तक पीड़िता 18 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुकी थी। 

टी. बनाम गुजरात राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) के अधीन अपराधों के लिये 15 मार्च 2026 को प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज की गई थी। 
  • FIR के अनुसार, कथित अपराध के समय पीड़िता की आयु लगभग 17 वर्ष और 11 महीने थी। 
  • जब विचारण शुरू हुआ तब तक वह 18 वर्ष की हो चुकी थी। 
  • अहमदाबाद (ग्रामीण) स्थित विशेष लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण न्यायालय ने एक आदेश पारित किया जिसमें पीड़ित के कथन अभिलिखित करने के लिये लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उस आदेश को विशेष आपराधिक याचिका के माध्यम से उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। 
  • उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दलीलें: 
  • एक पक्ष ने तर्क दिया कि चूँकि पीड़िता अब वयस्क हो चुकी है, इसलिये याचिकाकर्त्ता को विधि के अनुसार अभियोक्ता से प्रतिपरीक्षा करने का प्रभावी अवसर मिलना चाहिये। 
  • राज्य ने तर्क दिया कि लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण न्यायालय को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की प्रक्रिया का पालन करना चाहिये था। उसका तर्क था कि घटना के समय पीड़िता अवयस्क (लगभग 17 वर्ष और 11 महीने की) थी, इसलिये अभिसाक्ष्य का अभिलेखन करने संबंधी लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण उपबंध विचारण पर लागू होते हैं। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

आयु अवधारण के लिये सुसंगत तिथि के संबंध में: 

  • न्यायालय ने कहा कि FIR 15 मार्च 2026 को दर्ज की गई थी और कथित अपराध के समय पीड़िता की आयु 17 वर्ष और 11 महीने थी। 
  • यह अपराध लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता दोनों के अधीन दर्ज किया गया था। इसलिये लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 33(2), 36 और 37 विचारण पर लागू होती हैं। 

विचारण से पूर्व पीड़िता के वयस्क हो जाने के संबंध में:  

  • विचारण प्रारंभ होने के समय पीड़िता की आयु 18 वर्ष से अधिक होने का यह अर्थ नहीं है कि उसके परिसाक्ष्य को अभिलिखित करने से संबंधित लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के उपबंध लागू होना बंद हो जाएँगे। 
  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन संरक्षणात्मक प्रक्रिया इस बात पर निर्भर करती है कि अपराध किये जाने के समय पीड़िता बालक थी या नहीं, न कि इस बात पर कि विचारण प्रारंभ होने के समय उसकी आयु कितनी है। 

विवादित आदेश के संबंध में: 

  • अतः अहमदाबाद (ग्रामीण) के अनन्य लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया गया। 

जारी किये गए निर्देश: 

  • विशेष लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण न्यायालय को लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम की धारा 33(2), 36 और 37 के अनुसार पीड़िता का परिसाक्ष्य बंद कमरे में अभिलिखित करने का निर्देश दिया गया।  
  • याचिका का निस्तारण कर दिया गया। 

लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम के अधीन बाल पीड़िता के साक्ष्य अभिलिखित करने को नियंत्रित करने वाले विधिक उपबंध क्या हैं? 

बारे में: 

  • लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम बालकों को लैंगिक हमला, लैंगिक उत्पीड़न तथा अश्लील चित्रण से संरक्षण प्रदान करने के उद्देश्य से अधिनियमित किया गया था। इसके अधीन विशेष न्यायालयों की स्थापना तथा अपराधों की रिपोर्टिंग, साक्ष्य अभिलिखित करने और विचारण संचालित करने के लिये बाल-अनुकूल प्रक्रिया का उपबंध किया गया है। 
  • अधिनियम की धारा 2(1)(घ) के अधीन, “बालक” से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसकी आयु 18 वर्ष से कम है।  

धारा 33(2) – विशेष न्यायालय के माध्यम से पूछे जाने वाले प्रश्न: 

  • बालक की मुख्य परीक्षा, प्रतिपरीक्षा अथवा पुनःपरीक्षा अभिलिखित करते समय विशेष लोक अभियोजक अथवा अभियुक्त के अधिवक्ता को अपने प्रश्न विशेष न्यायालय को प्रस्तुत करने होंगे। 
  • तत्पश्चात् विशेष न्यायालय उन प्रश्नों को बालक से पूछेगा।  

धारा 36 – परिसाक्ष्य देते समय बालक को अभियुक्त के संपर्क में नहीं आने देना: 

  • विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि बालक का साक्ष्य अभिलिखित किए जाने के दौरान किसी भी प्रकार से अभियुक्त के संपर्क में न आए। तथापि, अभियुक्त को बालक का कथन सुनने तथा अपने अधिवक्ता से संवाद करने में सक्षम होना चाहिये। 
  • इस प्रयोजन के लिए, विशेष न्यायालय वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, एकतरफा दृश्यता वाले दर्पणों, पर्दों अथवा किसी अन्य उपकरण के माध्यम से बालक का कथन अभिलिखित कर सकता है। 

धारा 37 – विचारण बंद कमरे में संचालित किया जाना:  

  • विशेष न्यायालय मामलों का विचारण बंद कमरे में (In Camera) बालक के माता-पिता अथवा किसी ऐसे अन्य व्यक्ति की उपस्थिति में करेगा, जिस पर बालक विश्वास करता हो। 
  • जहाँ विशेष न्यायालय की यह राय हो कि बालक की परीक्षा न्यायालय के अतिरिक्त किसी अन्य स्थान पर किया जाना आवश्यक है, वहाँ वह लागू दण्ड प्रक्रिया विधि के अधीन कमीशन जारी कर सकता है।