9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

सिविल कानून

न्यायालय न्यायहित में सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के अधीन साक्ष्य को पुनः खोल सकते हैं

    «
 28-Oct-2026

मंगत राम बनाम शानो देवी

"...न्याय के हित में ऐसा करना सुसंगत और आवश्यक है।"

न्यायमूर्ति संजय धर

स्रोत: जम्मू और कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय

चर्चा में क्यों?

जम्मू-कश्मीर और लद्दाख उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय धर ने मंगत राम बनाम शानो देवी (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया, जिसके द्वारा साक्ष्य बंद किये जाने के पश्चात् पत्नी को साक्षियों को पुनः बुलाने तथा अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 तथा धारा 151 के पृथक-पृथक क्षेत्राधिकार एवं प्रयोज्यता को स्पष्ट किया।

मंगत राम बनाम शानो देवी (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?

  • याचिकाकर्त्ता (पति) ने हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के अधीन अभित्यजन, धारा 9 के अधीन पत्नी के विरुद्ध पारित दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना के आदेश का अनुपालन न करने और क्रूरता के आधार पर विवाह-विच्छेद की मांग करते हुए एक याचिका दायर की।
  • प्रत्यर्थी (पत्नी) ने याचिका का विरोध किया, और विचारण न्यायालय ने क्रूरता, अभित्यजन और दिये जाने वाल अनुतोष के संबंध में विवाद्यक विरचित किये।
  • दोनों पक्षकारों ने साक्ष्य प्रस्तुत किये, जिनमें स्वयं की और प्रत्येक पक्ष के तीन साक्षियों की परीक्षा शामिल थी।

साक्ष्य को पुनः खोलने के लिये आवेदन:

  • साक्ष्य बंद होने और मामले को अंतिम बहस के लिय सूचीबद्ध किये जाने के बाद, पत्नी ने आदेश 18 नियम 17 के अधीन धारा 151 सिविल प्रक्रिया संहिता के साथ एक आवेदन दायर किया।
  • उसने पति और उसके साक्षियों को आगे की प्रतिपरीक्षा के लिये पुन: बुलाने और दो नए साक्षियों की परीक्षा करने की मांग की।
  • उसने बताया कि उसे हाल ही में पता चला है कि पति ने अपने विवाह के दौरान ही दूसरी महिला से विवाह कर लिया था और उससे तीन बच्चे भी हैं।
  • उसे इस बात का पता तब चला जब वह पति के कथित दामाद से मिली, जिसकी शादी पति की दूसरी शादी से हुई कथित बेटी से हुई थी।

कुटुंब न्यायालय का आदेश:

  • जम्मू स्थित कुटुंब न्यायालय के अपर प्रधान न्यायाधीश ने आवेदन स्वीकार कर लिया।
  • इससे पति और उसके दो साक्षियों को पुन: बुलाने और दो नए साक्षियों से परीक्षा करने की अनुमति मिली।
  • इसके अलावा, इसने पति पर 10,000 रुपए का जुर्माना भी अधिरोपित किया गया।

उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती:

  • पति ने यह तर्क दिया कि:
    • साक्ष्यों को पुन:जांचने की कोई आवश्यकता नहीं थी;
    • यह तय किये बिना कि क्या उसने वास्तव में द्वितीय विवाह किया था, उस पर जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जा सकता था; और
    • यह आदेश अवैध था और बिना सोचे-समझे पारित किया गया था।

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 के दायरे के संबंध में:

  • यह नियम न्यायालय को पहले से जांचे जा चुके किसी भी साक्षी को पुन: बुलाने और उससे ऐसे प्रश्न पूछने का अधिकार देता है जो वह उचित समझे।
  • इसका मुख्य उद्देश्य न्यायालय को पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों के बारे में अपने स्वयं के संदेहों को स्पष्ट करने में सक्षम बनाना है।       
  • इसका उपयोग पक्षकारों को मुख्य परीक्षा या प्रतिपरीक्षा के लिये साक्षियों को पुन: बुलाने की अनुमति देने या ऐसी अतिरिक्त सामग्री लाने के लिये नहीं किया जा सकता है जिसे पहले प्रस्तुत नहीं किया जा सका था।    
  • वादीराज नागप्पा वर्नेकर बनाम शरदचंद्र प्रभाकर गोगेट (2009) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि इस शक्ति का प्रयोग संयम से किया जाना चाहिये और केवल किसी पक्षकार को उसके साक्ष्य में कमियों या लोप को भरने में सहायता करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
  • के. के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी (2011) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि शक्ति का प्रयोग स्वतः संज्ञान से या आवेदन पर किया जा सकता है, लेकिन यह विवेकाधीन है और इसका उद्देश्य केवल स्पष्टीकरण देना है।

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 के संबंध में:

  • धारा 151 न्याय के उद्देश्यों के लिये या प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये आवश्यक आदेश देने की न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को संरक्षित करती है ।
  • जैसा कि के. के. वेलुसामी मामले में कहा गया है, जहाँ संहिता में स्पष्टीकरण के अलावा अन्य उद्देश्यों के लिये साक्ष्य को पुन: खोलने या साक्षियों को पुन: बुलाने का कोई उपबंध नहीं है, वहाँ उचित मामलों में धारा 151 लागू की जा सकती है।
  • अतः न्यायालय किसी पक्षकार को साक्ष्य प्रस्तुत करने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद प्राप्त अतिरिक्त साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दे सकता है, यदि यह न्याय के हित में आवश्यक हो।

तथ्यों पर लागू होना:

  • पति ने तर्क दिया कि पत्नी को द्वितीय विवाह के बारे में पहले से ही पता था, क्योंकि उसने रणबीर दण्ड संहिता की धारा 494 के अधीन परिवाद दायर कराया गया था, जिसे 2014 में खारिज कर दिया गया था।
  • न्यायालय ने कहा कि पूर्ववर्ती परिवाद एक अलग महिला से संबंधित था और वह आरोप साबित नहीं हुआ था, जबकि वर्तमान आरोप एक अलग व्यक्ति से संबंधित है।
  • पत्नी ने आधार कार्ड, वैवाहिक याचिका और विवाह करार सहित कई दस्तावेज पेश किये थे, जिनसे प्रथम दृष्टया यह साबित होता है कि पति कथित पुत्री का पिता है।
  • यह साक्ष्य पति के आचरण से संबंधित था और न्याय के हित में सुसंगत और आवश्यक था।
  • यदि द्वितीय विवाह साबित हो जाता है, तो इससे इस बात पर असर पड़ेगा कि क्या पत्नी का पति के साथ न रहना उचित था, और यह क्रूरता के आरोप के विरुद्ध प्रतिरक्षा का आधार बन सकता है।

पति को पुन: बुलाने के संबंध में:

  • चूँकि महत्त्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत किये जा रहे थे, इसलिये आदेश 18 नियम 17 के अधीन उत्पन्न संदेहों को स्पष्ट करने के लिये पति को पुन: बुलाना आवश्यक था।

पति के अन्य साक्षियों को पुन: बुलाने के संबंध में:

  • पति के दो साक्षियों को पुन: बुलाना अनावश्यक था, क्योंकि वे पहले ही प्रतिपरीक्षा में कह चुके थे कि उन्हें किसी द्वितीय विवाह के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।

लागत अधिरोपित करने के संबंध में:

  • क्योंकि द्वितीय विवाह अभी तक साबित नहीं हुआ था, इसलिये जुर्माना अधिरोपित नहीं किया जा सका।
  • इस प्रकार के निष्कर्ष के बिना, यह नहीं कहा जा सकता कि पति ने तथ्य को छिपाया था।

निदेश:

  • याचिका को आंशिक रूप से मंजूर कर लिया गया।
  • कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया गया जिसमें 10,000 रुपए का जुर्माना अधिरोपित करने और पति के दो साक्षियों को पुन: पेश करने का निदेश दिया गया था।
  • आदेश को इस हद तक बरकरार रखा गया कि पति को पुन: बुलाया गया और पत्नी को दो नए साक्षियों से परीक्षा करने की अनुमति दी गई।
  • विचारण न्यायालय को उच्च न्यायालय की टिप्पणियों के अनुसार कार्यवाही करने का निदेश दिया गया था।

सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 18 नियम 17 क्या है?

 बारे में:

  • आदेश 18 वाद की सुनवाई तथा साक्षियों की परीक्षा से संबंधित है ।
  • नियम 17 के अधीन, न्यायालय वाद के किसी भी प्रक्रम पर ऐसे किसी साक्षी को, जिसकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुला सकता है तथा उससे ऐसे प्रश्न पूछ सकता है, जिन्हें वह साक्ष्य विधि के अधीन उचित समझे।

प्रमुख सिद्धांत:

  • इस शक्ति का उद्देश्य न्यायालय को साक्ष्यों के बारे में संदेह दूर करने में सक्षम बनाना है।
  • न्यायालय इस शक्ति का प्रयोग स्वप्रेरणा से अथवा किसी पक्षकार द्वारा प्रस्तुत आवेदन पर कर सकता है।
  • यह एक विवेकाधीन शक्ति है, जिसका प्रयोग संयमपूर्वक तथा विरल परिस्थितियों में किया जाना चाहिये।
  • इस शक्ति का प्रयोग किसी पक्षकार के साक्ष्य में विद्यमान कमियों अथवा चूकों को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।

सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 क्या है?

बारे में:

  • धारा 151 यह उपबंधित करती है कि संहिता की कोई भी बात न्यायालय की उन अंतर्निहित शक्तियों को सीमित या प्रभावित नहीं करेगी, जिनका प्रयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करने अथवा न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये आवश्यक आदेश पारित करने हेतु किया जा सकता है।

इसके प्रयोग को नियंत्रित करने वाले सिद्धांत (के.के. वेलुसामी बनाम एन. पलानीसामी, 2011):

  • यह कोई ऐसी मूलभूत उपबंधात्मक धारा नहीं है, जो अधिकारिता का सृजन करती हो अथवा उसे प्रदान करती हो।
  • इसका प्रयोग केवल तभी किया जा सकता है, जब संहिता किसी प्रक्रियात्मक पहलू के संबंध में उपबंध नहीं करती हो।
  • न्यायालय इसका प्रयोग ऐसा कार्य करने के लिये नहीं कर सकता, जो विधि द्वारा निषिद्ध हो।
  • इस शक्ति का प्रयोग सावधानी एवं समुचित विचार-विमर्श के साथ तथा केवल वहीं किया जाना चाहिये, जहाँ इसकी पूर्णतः आवश्यकता हो।
  • आवेदक की सद्भावना के संबंध में कोई संदेह नहीं होना चाहिये।
  • इस शक्ति का प्रयोग न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति करने तथा न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये किया जाना चाहिये।