9 मार्च से शुरू हो रहे हमारे ऑल-इन-वन ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स के साथ अपनी ज्यूडिशियरी की तैयारी को मजबूत बनाएं | यह कोर्स अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों माध्यमों में उपलब्ध है।   |   आज ही हमारे ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स में एडमिशन लें और अपनी तैयारी को और बेहतर बनाएँ | हिंदी माध्यम बैच: 9 मार्च, सुबह 8 बजे   |   आज ही एडमिशन लें बिहार APO (प्रिलिम्स + मेन्स) कोर्स में और अपने सपनों को दे नई दिशा | ऑफलाइन एवं ऑनलाइन मोड में उपलब्ध | 12 जनवरी 2026  से कक्षाएँ आरंभ   |   ज्यूडिशियरी की तैयारी अब हिंदी माध्यम में! दृष्टि ज्यूडिशियरी का नया बैच 22 जून 2026 से शुरू | आज ही एडमिशन लें | ऑनलाइन व ऑफलाइन दोनों मोड में उपलब्ध |   |   एडमिशन ओपन: UP APO प्रिलिम्स + मेंस कोर्स 2025, बैच 6th October से   |   ज्यूडिशियरी फाउंडेशन कोर्स (प्रयागराज)   |   अपनी सीट आज ही कन्फर्म करें - UP APO प्रिलिम्स कोर्स 2025, बैच 6th October से







होम / करेंट अफेयर्स

आपराधिक कानून

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38

    «
 28-Jul-2026

आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू 

"पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार" 

न्यायमूर्ति संदीप मेहता 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की खंडपीठ नेआंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार देती हैलेकिन यह अधिकार अधिवक्ता को प्रत्येक पूछताछ सत्र की पूरी अवधि के लिये निरंतर और शारीरिक रूप से उपस्थित रहने तक विस्तारित नहीं होता है। 

आंध्र प्रदेश राज्य बनाम सुदा सुरेश वीरा वेंकट नागा राजू (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • उच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थी -अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा से संबंधित मामले पर सुनवाई करते हुए अभियोजन पक्ष को दो अधिवक्ताओं को नामित करने का निदेश देते हुए एक शर्त अधिरोपित की थीजो अभियुक्त की पुलिस अभिरक्षा के दौरान जेल में मौजूद रहेंगे। 
  • उच्च न्यायालय ने आगे यह भी अनुमति दी थी कि अभियुक्त से पूछताछ के दौरान नामित दो अधिवक्ताओं में से एक "किसी भी समय" उपस्थित रह सकता है। 
  • इस निदेश से असंतुष्ट होकर आंध्र प्रदेश राज्य ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया और तर्क दिया कि यह शर्त अत्यधिक है और इससे अभियुक्तों की अभिरक्षा में पूछताछ में व्यावहारिक बाधाएं उत्पन्न होंगी। 
  • राज्य ने तर्क दिया कि पूछताछ के दौरान एक अधिवक्ता की निरंतर उपस्थिति विधि द्वारा अनुमत सीमा से परे थी और इससे अन्वेषण प्रक्रिया की प्रभावशीलता प्रभावित होगी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के दायरे पर:न्यायालय ने माना कि धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को सीधे पढ़ने से पता चलता है कि गिरफ्तार व्यक्ति को दिया गया अधिकार पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार हैऔर यह उपबंध प्रत्येक पूछताछ सत्र की संपूर्ण अवधि के लिये अधिवक्ता की निरंतरसतत शारीरिक उपस्थिति का बिना शर्त अधिकार प्रदान नहीं करता है। 
  • उच्च न्यायालय के निदेश पर:न्यायालय ने पाया कि यदि उच्च न्यायालय के उस निदेश कोजिसमें पूछताछ के दौरान किसी भी समय अधिवक्ता की उपस्थिति की अनुमति दी गई हैनिर्बाध निरंतर उपस्थिति का अधिकार प्रदान करने के रूप में समझा जाएतो ऐसा अर्थ धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता में परिकल्पित उपबंध से अधिक होगा। 
  • राज्य की आशंका पर:राज्य से सहमत होते हुएन्यायालय ने माना कि उच्च न्यायालय द्वारा मूल रूप से निर्धारित शर्तें अभिरक्षा में अन्वेषण के लिये व्यावहारिक बाधाएं उत्पन्न करेंगी और तदनुसार अत्यधिक थीं। 
  • संशोधित निदेश पर:उच्च न्यायालय के उस निदेश के सार को बरकरार रखते हुएजिसमें एक अधिवक्ता की उपस्थिति की अनुमति दी गई थीन्यायालय ने इसे संशोधित करते हुए निदेश दिया कि अधिवक्ता को केवल पूछताछ स्थल के भीतर उपस्थित रहने की अनुमति होगीइस प्रकार से कि वह अभियुक्त को देख सकेन कि पूरी पूछताछ के दौरान निरंतर और शारीरिक रूप से उसके साथ उपस्थित रहने की। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 गिरफ्तार व्यक्ति के अपनी पसंद के विधिक व्यवसायी से परामर्श करने और उसके द्वारा प्रतिरक्षा किये जाने के अधिकार को संरक्षित करती है और पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने के अधिकार को भी मान्यता देती है। 

  • अधिकार की प्रकृति:भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 38 के अधीन अधिकार पूछताछ के दौरान एक अधिवक्ता से मिलने का अधिकार हैन कि पूछताछ प्रक्रिया के दौरान अधिवक्ता की निरंतरनिर्बाध शारीरिक उपस्थिति का अधिकार। 
  • तर्क:इस उपबंध का उद्देश्य गिरफ्तार व्यक्ति को अभिरक्षा में दुर्व्यवहार से बचाना और विधिक सलाह तक पहुँच सुनिश्चित करना हैसाथ ही पुलिस के लिये उपलब्ध अन्वेषण उपकरण के रूप में अभिरक्षा में पूछताछ की प्रभावशीलता को बनाए रखना है। 

नोट:धारा 38 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 41घ के अनुरूप हैजिसे दण्ड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2010 द्वारा सम्मिलित किया गया थाऔर यह उसी अंतर्निहित सुरक्षा उपाय को जारी रखता है जिसे उच्चतम न्यायालय नेडी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में मान्यता दी थी।