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आपराधिक कानून
पुलिस थाने 'गृह' की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं
31-Dec-2025
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बीनू थंकप्पन और अन्य बनाम केरल राज्य “केरल में पुलिस थानों को संपत्ति की सुरक्षा के लिये प्रयोग किये जाने वाले भवनों के रूप में माना जा सकता है, जिससे वे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 442 के अधीन गृह की परिभाषा को पूरा करते हैं।” न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस |
स्रोत: केरल उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
केरल उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने बिनु थैंकप्पन और अन्य बनाम केरल राज्य (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि पुलिस थाना भारतीय दण्ड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 442 [अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 329] के अधीन 'गृह' की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं क्योंकि इनका उपयोग संपत्ति, आधिकारिक अभिलेखों, आयुधों और गोला-बारूद की अभिरक्षा के लिये किया जाता है।
बिनु थैंकप्पन और अन्य बनाम केरल राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह अपील अभियुक्त संख्या 1 से 3 द्वारा दायर की गई थी, जिन्हें भारतीय दण्ड संहिता की धारा 143, 147, 148, 452, 323, 149, 332, 149, 294(ख), 354 के साथ-साथ लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 की धारा 3(1) के अधीन दोषसिद्ध ठहराया गया था।
- अपीलकर्त्ताओं को पाँच वर्ष के कारावास की दण्ड सुनाया गया।
- अभियोजन पक्ष का मामला पहले अभियुक्त के नेतृत्व में लोगों के एक समूह से संबंधित था, जिन्होंने एक सहकारी बैंक के चुनाव के संबंध में लोक उपताप किया था।
- तत्पश्चात्, 14 लोगों ने विधिविरुद्ध जमाव द्वारा और घातक आयुधो से सज्जित होकर एक पुलिस थाने में अतिचार किया।
- अभियुक्तों पर बल्वा करने, उपहति, आपराधिक मानव वध का प्रयत्न करने, अश्लील शब्द बोलने, पुलिस थाने की संपत्ति को नुकसान कारित करने और एक महिला पुलिस अधिकारी की गरिमा को ठेस पहुँचाने का आरोप है।
- शुरू में 14 अभियुक्तों पर विचारण चलाया जाना था, किंतु एक की मृत्यु हो गई और उसके विरुद्ध कार्यवाही समाप्त हो गई।
- अपीलकर्त्ताओं के अतिरिक्त अन्य अभियुक्तों को विचारण न्यायालय ने निर्दोष पाया।
- अपीलकर्त्ताओं को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 308 के अधीन अपराध से दोषमुक्त कर दिया गया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने इस बात की परीक्षा की कि क्या भारतीय दण्ड संहिता की धारा 452 के अधीन किसी पुलिस थाने में अतिचार करके गृह अतिचार का अपराध किया जा सकता है।
- केरल पुलिस अधिनियम, 2011 की धारा 5 में पुलिस थानों की स्थापना का उपबंध है, जबकि धारा 6 में पुलिस थानों में उपलब्ध सुविधाओं का उल्लेख है।
- केरल पुलिस अधिनियम की धारा 6(2) में यह उपबंध है कि अभिरक्षा में रखी गई वस्तुओं, आधिकारिक अभिलेखों, आधिकारिक आयुधों और गोला-बारूद की सुरक्षित रखने के लिये पर्याप्त भंडारण स्थान होना चाहिये और अभियुक्त की सुरक्षित अभिरक्षा के लिये सुविधाएँ होनी चाहिये।
- न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि इन सांविधिक प्रावधानों को संयुक्त रूप से पढ़ने से यह स्पष्ट हो जाता है कि केरल में पुलिस थानों को संपत्ति की अभिरक्षा के लिये उपयोग किये जाने वाले भवनों के रूप में माना जा सकता है, जिससे धारा 442 भारतीय दण्ड संहिता (अब धारा 329 भारतीय न्याय संहिता) के अधीन गृह की परिभाषा संतुष्ट होती है।
- न्यायालय ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए दूसरे और तीसरे अभियुक्त को दोषमुक्त कर दिया क्योंकि उनकी संलिप्तता साबित करने वाले कोई पुख्ता साक्ष्य नहीं थे।
- प्रथम अभियुक्त के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 452 और 323 के साथ-साथ लोक संपत्ति नुकसान निवारण अधिनियम, 1984 की धारा 3(1) के अधीन अपराधों के लिये दोषी पाए जाने की पुष्टि की गई। उसे अन्य अपराधों से दोषमुक्त कर दिया गया।
संदर्भित विधिक उपबंध क्या हैं?
भारतीय दण्ड संहिता की धारा 442 – गृह-अतिचार:
- भारतीय दण्ड संहिता की धारा 442 गृह-अतिचार और गृह भेदन के अपराधों के प्रयोजनों के लिये 'गृह अतिचार' को परिभाषित करती है।
- जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे भवन, तम्बू या जलयान में अतिचार या उसमें रहकर आपराधिक अतिचार करता है, जिसका उपयोग मानव निवास के रूप में किया जाता है, तो उसे गृह-अतिचार माना जाता है।
- इस परिभाषा में पूजा स्थलों या संपत्ति की सुरक्षा के लिये उपयोग किये जाने वाले भवन भी सम्मिलित हैं।
- यह परिभाषा आवासीय भवनों तक ही सीमित नहीं है, अपितु इसमें संपत्ति की सुरक्षा के लिये उपयोग की जाने वाली कोई भी संरचना सम्मिलित है।
- इस परिभाषा के अंतर्गत पुलिस थाने ‘गृह’ की श्रेणी में आते हैं क्योंकि इनका उपयोग आधिकारिक संपत्ति, अभिलेखों, आयुधों और गोला-बारूद की सुरक्षा के लिये किया जाता है।
- इस उपबंध का उद्देश्य आवासों तथा संपत्ति की अभिरक्षा हेतु प्रयुक्त स्थलों को अतिचार से अतिरिक्त एवं सुदृढ़ संरक्षण प्रदान करना है।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 329 - आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार:
- धारा 329 भारतीय न्याय संहिता ने धारा 442 भारतीय दण्ड संहिता का स्थान ले लिया है और आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार से संबंधित उपबंधों को समेकित करती है।
- आपराधिक अतिचार तब घटित होता है, जब कोई व्यक्ति दूसरे के कब्जे में स्थित संपत्ति में इस आशय से प्रवेश करता है कि वह कोई अपराध कारित करे, अथवा कब्जाधारी व्यक्ति को भयभीत करने, अपमानित करने या परेशान करने के उद्देश्य से ऐसा करे।
- इसमें वह स्थिति भी सम्मिलित है, जहाँ कोई व्यक्ति वैध रूप से प्रवेश करने के पश्चात् भी, भयभीत करने, अपमानित करने, परेशान करने या कोई अपराध कारित करने के आशय से अवैध रूप से बना रहता है।
- भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत गृह-अतिचार की परिभाषा भारतीय दण्ड संहिता के समान है, अर्थात् ऐसा आपराधिक अतिचार, जो किसी ऐसे भवन, तंबू या पोत में प्रवेश करने या उसमें बने रहने द्वारा किया जाए, जिसका उपयोग मानव आवास, पूजा-स्थल अथवा संपत्ति की अभिरक्षा के लिये किया जाता हो।
- भारतीय न्याय संहिता में यह स्पष्ट रूप से उपबंधित है कि आपराधिक अतिचार करने वाले के शरीर के किसी भी भाग का प्रवेश मात्र ही गृह-अतिचार के गठन के लिये पर्याप्त है।
- भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत आपराधिक अतिचार के लिये दण्ड तीन माह तक का कारावास, या पाँच हजार रुपये तक का जुर्माना, अथवा दोनों हो सकता है।
- गृह-अतिचार के लिये दण्ड एक वर्ष तक का कारावास, या पाँच हजार रुपए तक का जुर्माना, अथवा दोनों हो सकता है।
- भारतीय न्याय संहिता के ये प्रावधान भारतीय दण्ड संहिता के साथ निरंतरता बनाए रखते हुए, अधिक स्पष्ट संरचना तथा अद्यतन दण्ड व्यवस्था प्रदान करते हैं।
सिविल कानून
परिसीमा अधिनियम की धारा 5 निर्वाचन याचिकाओं को दाखिल करने पर लागू नहीं होती है
31-Dec-2025
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ओमकार गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रधान सचिव, शहरी विकास विभाग, लखनऊ और 3 अन्य "परिसीमा अधिनियम की धारा 5 नगरपालिका अधिनियम, 1916 के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर लागू नहीं होती है, क्योंकि ऐसी याचिकाएँ वाद नहीं हैं।" न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने ओमकार गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, प्रधान सचिव, शहरी विकास विभाग, लखनऊ और 3 अन्य (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 उत्तर प्रदेश नगर पालिका अधिनियम, 1916 के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर लागू नहीं होती है।
ओमकार गुप्ता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- प्रत्यर्थी ने उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 के अधीन नगरपालिका निर्वाचन परिणाम को चुनौती देते हुए एक निर्वाचन याचिका दायर की।
- निर्वाचन याचिका के साथ, प्रत्यर्थी ने परिसीमा अधिनियम की धारा 5 के अधीन 17 दिनों के विलंब की क्षमा हेतु एक आवेदन दायर किया।
- विलंब की क्षमा के लिये दायर आवेदन को अंबेडकर नगर के अपर जिला न्यायाधीश (F.T.C.-I) ने मंजूर कर लिया।
- याचिकाकर्त्ता ओमकार गुप्ता ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के अधीन इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विलंब की क्षमा देने वाले इस आदेश को चुनौती दी।
- मूल विधिक प्रश्न यह था कि क्या परिसीमा अधिनियम की धारा 5, जो वादों को दायर करने में विलंब की क्षमा की अनुमति देती है, नगरपालिका अधिनियम, 1916 के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर लागू होती है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने यह माना कि यद्यपि नगरपालिका अधिनियम की धारा 20 के अधीन दायर की गई निर्वाचन याचिका एक वाद नहीं है, फिर भी यह एक मूल कार्यवाही है जिसका निर्णय वादों के निर्णय के लिये निर्धारित तरीके से किया जाना चाहिये।
- न्यायमूर्ति विद्यार्थी ने टिप्पणी की कि परिसीमा अधिनियम की धारा 5 वादों पर लागू नहीं होती है, और इसी कारण से यह नगरपालिका अधिनियम, 1916 के अधीन निर्वाचन याचिकाओं को दाखिल करने पर भी लागू नहीं होगी।
- परिसीमा अधिनियम के विनिर्दिष्ट अनुप्रयोग के संबंध में, न्यायालय ने देखा कि नगरपालिका अधिनियम की धारा 23 का परंतुक यह निर्धारित करता है कि परिसीमा अधिनियम की धारा 12 की उपधारा (2) निर्वाचन याचिका की परिसीमा अवधारित करने के लिये लागू होगी।
- न्यायालय ने तर्क दिया कि जब विधानमंडल ने परिसीमा अधिनियम (धारा 12(2)) के किसी विशेष प्रावधान के आवेदन के लिये विशेष रूप से प्रावधान किया है और उस पर अन्य प्रावधान लागू नहीं किये हैं, तो परिसीमा अधिनियम की धारा 5 नगर पालिका अधिनियम के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर लागू नहीं होगी।
- न्यायालय ने सुमन देवी बनाम मनीषा देवी के मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया, जिसका अनुसरण इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मेनका संजय गांधी बनाम रामभुआल निषाद के मामले में किया था, और यह माना कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर परिसीमा अधिनियम की धारा 5 लागू नहीं होगी।
- चूँकि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधान उत्तर प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1916 के समान हैं, इसलिये न्यायालय ने माना कि धारा 5 बाद वाले अधिनियम के अधीन दायर निर्वाचन याचिकाओं पर लागू नहीं होगी।
- तदनुसार, रिट याचिका स्वीकार कर ली गई और अपर जिला न्यायाधीश ((F.T.C.-I),), अंबेडकर नगर के समक्ष दायर निर्वाचन याचिका खारिज कर दी गई।
परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 क्या है?
बारे में:
- परिसीमा अधिनियम, 1963 की धारा 5 विलंब की क्षमा के सिद्धांत को प्रतिपादित करती है। इसमें कहा गया है:
- कोई भी अपील या कोई भी आवेदन, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 21 के उपबंधों में से किसी के अधीन से आवेदन से भिन्न हो, विहित काल के पश्चात् ग्रहण किया जा सकेगा यदि अपीलार्थी या आवेदक, न्यायालय का यह समाधान कर दे कि उसके पास ऐसे काल के भीतर अपील या आवेदन न करने के लिये पर्याप्त हेतुक था।
- इस अधिनियम की धारा 5 में कहा गया है कि विलंब की क्षमा मांगने के लिये किसी पक्षकार को विलंब का "पर्याप्त हेतुक" दिखाना होगा।
विलंब की क्षमा:
- विलंब की क्षमा न्यायालयों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला एक विवेकाधीन उपचार है, जिसमें किसी पक्षकार द्वारा विहित काल के पश्चात् अपील या आवेदन को स्वीकार कराने के लिये किए गए आवेदन पर, न्यायालय विलंब को क्षमा (उपेक्षा करना) कर सकता है यदि पक्ष "पर्याप्त हेतुक" प्रदान करता है जिसके कारण वह समय पर अपील या आवेदन दाखिल करने में असमर्थ रहा।
पर्याप्त हेतुक:
- पर्याप्त हेतुक का अर्थ है कि न्यायालय के पास यह मानने के लिये पर्याप्त हेतुक या उचित आधार होना चाहिये कि आवेदक को न्यायालय में आवेदन के साथ आगे बढ़ने से रोका गया था।
- धारा 5 कुछ मामलों में विलंब के लिये पर्याप्त हेतुक बताए जाने पर विहित काल के विस्तार की अनुमति देती है।
- पश्चिम बंगाल राज्य बनाम प्रशासक (1972) :
- उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि समय का विस्तार एक रियायत का मामला है और इसे पक्षकार द्वारा अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता है।
- पर्याप्त हेतुक के अर्थ को सटीक रूप से परिभाषित करना कठिन और अवांछनीय है। इसका अवधारण प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिये। यद्यपि, पर्याप्त हेतुक में निम्नलिखित आवश्यक तत्त्व होने चाहिये:
- इसका कारण ऐसा होना चाहिये जो इसे लागू करने वाले पक्षकार के नियंत्रण से बाहर हो।
- वह उपेक्षा का दोषी नहीं होना चाहिये।
- उनकी लगन और सावधानी प्रदर्शित की जानी चाहिये।
- उसका आशय सद्भावनापूर्वक होना चाहिये।