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सिविल कानून
लिखित किराएदारी में करार का अभाव
01-Jan-2026
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केनरा बैंक शाखा कार्यालय और 1 अन्य बनाम श्री अशोक कुमार उर्फ हीरा सिंह "2021 के अधिनियम के प्रावधानों के अधीन गठित किराया प्राधिकरण को उन मामलों में मकान मालिक द्वारा दायर आवेदन पर विचार करने का अधिकार है जहाँ किराएदारी करार निष्पादित नहीं किया गया है, और मकान मालिक प्राधिकरण को किराएदारी के विवरण की सूचना देने में असफल रहा है।" न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल |
स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति रोहित रंजन अग्रवाल ने कैनरा बैंक शाखा कार्यालय और 1 अन्य बनाम श्री अशोक कुमार उर्फ हीरा सिंह (2025) के मामले में यह निर्णय दिया कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी अधिनियम, 2021 के विनियमन के अधीन किराया प्राधिकरणों के पास मकान मालिक के बेदखली आवेदनों पर विचार करने की अधिकारिता है, भले ही कोई किराएदारी करार निष्पादित न किया गया हो और मकान मालिक किराएदारी का विवरण प्रस्तुत करने में असफल रहा हो।
केनरा बैंक शाखा कार्यालय और 1 अन्य बनाम श्री अशोक कुमार उर्फ हीरा सिंह मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मकान मालिक ने किराएदार को बेदखल करने और बकाया किराए की वसूली के लिये लघुवाद न्यायालय में वाद दायर किया, इस आधार पर कि किराएदार ने संपत्ति में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किये थे।
- किरायेदार-याचिकाकर्त्ता ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (CPC) के आदेश 7 नियम 11(घ) के अधीन एक आवेदन दायर किया, जिसमें तर्क दिया गया कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किराएदारी अधिनियम, 2021 के लागू होने के बाद, यह वाद धारा 38 द्वारा वर्जित हो गया है, जो कुछ मामलों के संबंध में सिविल न्यायालयों की अधिकारिता को वर्जित करता है।
- लघुवाद न्यायालय ने किराएदार का आवेदन नामंजूर कर दिया।
- तत्पश्चात् याचिकाकर्त्ता ने लघुवाद न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय का रुख किया।
- न्यायालय के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या 2021 के अधिनियम के अधीन गठित किराया प्राधिकरण के पास उन मामलों में मकान मालिकों द्वारा दायर आवेदनों पर विचार करने की अधिकारिता है जहाँ कोई किराएदारी करार निष्पादित नहीं किया गया है और मकान मालिक किराया प्राधिकरण के साथ किराएदारी का विवरण दाखिल करने में असफल रहा है।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने केंद्र सरकार द्वारा तैयार किये गए आदर्श किराएदारी अधिनियम और राज्य विधानमंडल द्वारा अधिनियमित 2021 के अधिनियम के बीच किराएदारी करारों की अनिवार्य प्रकृति के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण अंतर पाया।
- यद्यपि आदर्श किराएदारी अधिनियम स्पष्ट रूप से उन पक्षकारों को अनुतोष का दावा करने से रोकता है जो किराएदारी करार के निष्पादन या गैर-निष्पादन के बारे में सूचित करने में असफल रहते हैं, राज्य विधानमंडल ने 2021 के अधिनियम को अधिनियमित करते समय ऐसे परिणामों को छोड़ देने का विकल्प चुना।
- न्यायालय ने 2021 के अधिनियम की धारा 4 का विश्लेषण किया और पाया कि इसमें केवल उन विभिन्न स्थितियों का उल्लेख है जिनमें किराएदारी करार किये जाते हैं, किंतु यह कहीं भी मकान मालिक और किराएदार की स्थिति को स्वीकार करने वाले पक्षकारों के अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं करता है।
- यदि विधानमंडल का आशय पक्षकारों को केवल निष्पादित करारों या उचित सूचना के मामलों में ही किराया प्राधिकरण से संपर्क करने तक सीमित रखने का होता, तो वह आदर्श किराएदारी अधिनियम के प्रतिबंधात्मक प्रावधानों को अपना लेता।
- 2021 के अधिनियम में किराया प्राधिकरण को किराएदारी की जानकारी न देने पर किसी प्रकार के दण्डात्मक परिणाम का प्रावधान नहीं है, इसलिये धारा 4 के अधीन सूचना देने की आवश्यकता को निर्देशात्मक माना जाना चाहिये, न कि अनिवार्य।
- किराएदारी के विवरण के बारे में सूचित करने में मकान मालिक की विफलता, उसे 2021 के अधिनियम के अधीन बेदखली की मांग करने के अपने अधिकार से वंचित नहीं करेगी।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विधायिका के आशय को सभी प्रावधानों और उनके उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए देखा जाना चाहिये, और इसे किसी एक प्रावधान की अलग से समझ तक सीमित नहीं किया जा सकता है।
सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 में वाद का नामंजूर लिया जाना क्या है?
- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 7 नियम 11 में उसके अंतर्गत सूचीबद्ध विशिष्ट परिस्थितियों में वाद को नामंजूर करने का उपबंध है।
- खण्ड (क) के अनुसार, यदि वाद-हेतुक प्रकट नहीं किया गया है तो वाद को नामंजूर कर दिया जाएगा।
- खण्ड (ख) में जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन कम किया गया है और वादी मूल्यांकन को ठीक करने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर जो न्यायालय ने नियत किया है, ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (ग) उन मामलों से संबंधित है जहाँ दावाकृत अनुतोष का मूल्यांकन ठीक है किंतु वादपत्र अपर्याप्त स्टाम्प-पत्र पर लिखा गया है और वादी अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा अपेक्षित किये जाने पर उस समय के भीतर, जो न्यायालय ने नियत किया है. ऐसा करने में असफल रहता है।
- खण्ड (घ) के अनुसार, जहाँ वादपत्र में के कथन से यह प्रतीत होता है कि बाद किसी बिधि द्वारा वर्जित है, तो उसे नामंजूर कर दिया जाएगा।
- खण्ड (ङ) में यह उपबंध है कि यदि वादपत्र दो प्रतियों में दाखिल नहीं किया गया है तो उसे नामंजूर कर दिया जाएगा।
- खण्ड (च) में नामंजूरी का उपबंध है जहाँ वादी नियम 9 के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहता है।
- परंतुक में यह कहा गया है कि मूल्यांकन की शुद्धि के लिये या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने के लिये न्यायालय द्वारा नियत समय तब तक नहीं बढ़ाया जाएगा जब तक कि न्यायालय का अभिनिवित किये जाने वाले कारणों में यह समाधान नहीं हो जाता है कि वादी किसी असाधारण कारण में, न्यायालय द्वारा नियत समय के भीतर, यथास्थित्ति, मूल्यांकन की शुद्धि करने या अपेक्षित स्टाम्प-पत्र के देने से रोक दिया गया था और ऐसे समय के बढ़ाने में इंकार किये जाने से वादी के प्रति गंभीर अन्याय होगा।
- आदेश 7 नियम 11 के अधीन वाद को नामंजूर करने की शक्ति एक असाधारण शक्ति है और इसका प्रयोग अत्यंत सावधानी और विवेक के साथ किया जाना चाहिये।
- खण्ड (घ) के अधीन, न्यायालय को स्वयं वादपत्र में दिये गए कथनों से यह अवधारित करना होगा कि क्या वाद किसी विधि द्वारा, जिसमें परिसीमा विधि भी सम्मिलित है, वर्जित है।
- आदेश 7 नियम 11(घ) के अधीन जांच का दायरा वादपत्र और उससे संलग्न या उसमें संदर्भित दस्तावेज़ों तक सीमित है।
- सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 7 नियम 11 के अधीन आवेदन पर निर्णय लेते समय प्रतिवादी द्वारा प्रस्तुत प्रतिपक्ष पर विचार नहीं किया जा सकता है।
- इस शक्ति का प्रयोग केवल स्पष्ट और प्रत्यक्ष मामलों में ही किया जाना चाहिये जहाँ वाद प्रथम दृष्टया वर्जित हो।
- जहाँ परिसीमा का अवधारण साक्ष्य की परीक्षा या विधि और तथ्य के मिश्रित प्रश्नों पर विचार करने की आवश्यकता होती है, वहाँ खण्ड (घ) के अधीन वाद को नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- आदेश 7 नियम 11 के अधीन नामंजूरी के लिये आवेदन पर विचार करते समय न्यायालय वाद की चारदीवारी से बाहर नहीं जा सकता है।
- जहाँ कई अनुतोषों की मांग की जाती है और यहाँ तक कि एक अनुतोष भी समय सीमा के भीतर है, वहाँ वादपत्र को विधि द्वारा वर्जित होने के आधार पर पूरी तरह से नामंजूर नहीं किया जा सकता है।
- इस उपबंध का उपयोग केवल तकनीकी आधार पर, बिना पूर्ण रूप से गुण-दोष पर निर्णय लिये, वास्तविक दावों को खारिज करने के लिये नहीं किया जाना चाहिये।
सिविल कानून
मंदिर में विशेष सम्मान को पूर्ण अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता
01-Jan-2026
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श्रीरंगम श्रीमठ अंडवन आश्रमम बनाम थथादेसिकर तिरुवमसथर सभा और अन्य "विशेष सम्मान की मांग कभी नहीं की जा सकती, क्योंकि इसे पूर्ण अधिकार नहीं माना जा सकता। प्रथम सम्मान सदैव मंदिर में विराजमान देवताओं को ही दिया जाना चाहिये।" न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और सी. कुमारप्पन |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
श्रीरंगम श्रीमथ अंडवन आश्रमम बनाम थथादेसिकर थिरुवंशथर सभा और अन्य (2025) के मामले में न्यायमूर्ति एस.एम. सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति सी. कुमारप्पन की पीठ ने यह निर्णय दिया कि मंदिर में विशेष सम्मान को पूर्ण अधिकार के रूप में दावा नहीं किया जा सकता है और मंदिर में पहला सम्मान सदैव देवता को ही दिया जाता है, जबकि कांचीपुरम के श्री देवराज स्वामी मंदिर में अपने प्रमुख के लिये प्रथम विशेष सम्मान की मांग करने वाले आश्रमम की अपील को खारिज कर दिया गया।
श्रीरंगम श्रीमठ अंडवन आश्रमम बनाम थथादेसिकर तिरुवमसाथर सभा और अन्य की पृष्ठभूमि क्या थी? (2025) मामला?
- मूल रिट याचिका थथादेसिकर तिरुवंशथार सभा द्वारा दायर की गई थी, जिसमें हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिकारियों को श्री देवराज स्वामी मंदिर के धार्मिक प्रथाओं-रूढ़ियों और परंपराओं में हस्तक्षेप करने से रोकने की मांग की गई थी।
- रिट याचिका में, एकल न्यायाधीश ने माना कि प्रथा के अनुसार सम्मान केवल 5 मठों को दिया जा सकता है, अर्थात्: कांची कामकोटि पीठम - शंकर मठ, कांचीपुरम; श्री अहोबिला मठ; श्री वनमलाई मठ, नांगुनेरी; श्री परकला जीयर मठ, मैसूर; और श्री व्यासरयार मठ, सोसले (उडुपी)।
- एकल न्यायाधीश ने निर्णय दिया कि यदि किसी अन्य व्यक्ति को सम्मान दिया जाता है, तो उसे चुनौती दी जा सकती है।
- श्रीरंगम श्रीमथ अंडवन आश्रमम ने पर-पक्षकार के रूप में इस आदेश को चुनौती देते हुए यह अपील दायर की है।
- अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि अपीलकर्त्ता मठ प्रमुख को सम्मानित करने की प्रथा को अनुचित रूप से समाप्त कर दिया गया था।
- अपीलकर्त्ता ने तर्क दिया कि उन्हें रिट याचिका में पक्षकार नहीं बनाया गया था और वे अपने मामले का बचाव नहीं कर सकते थे।
- अपीलकर्त्ता ने दावा किया कि 1991 के बाद पाँच अवसरों पर मंदिर में उसके प्रमुख को सम्मान प्रदान किया गया था।
- हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती ने प्रस्तुत किया कि प्रथाएँ और रूढ़ियाँ और परंपराओं के अनुसार, परंपरागत रूप से केवल 5 मठों को ही सम्मान प्रदान किये जाते रहे हैं।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि मंदिरों में विशेष सम्मान को पूर्ण अधिकार के रूप में नहीं मांगा जा सकता है, और कहा कि ऐसे सम्मान, यद्यपि प्रथा के रूप में पालन किये जाते हैं, सक्षम अधिकारियों द्वारा उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिये।
- पीठ ने स्पष्ट किया कि "प्रथम सम्मान सदैव मंदिर में विराजमान देवताओं को दिया जाता है और मठों के प्रमुखों का सम्मान करना, यद्यपि एक प्रथा के रूप में इसका पालन किया जाता है, अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा तय किया जाने वाला विवाद्यक है।"
- न्यायालय ने स्वीकार किया कि हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती ने इस बात पर विवाद नहीं किया कि 1991 के बाद पाँच अवसरों पर अपीलकर्त्ता मठ के प्रमुख को यह सम्मान प्रदान किया गया था।
- न्यायालय ने कहा कि क्या इस प्रकार के सम्मान को अधिकार के रूप में दावा किया जा सकता है या नहीं, यह तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1959 के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा, विशेष रूप से उक्त अधिनियम की धारा 63(ङ) के अधीन निर्धारित किया जाना था।
- न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता को अधिनियम की धारा 63(ङ) के अधीन सक्षम प्राधिकारी से अपने दावे के निर्धारण के लिये संपर्क करने की स्वतंत्रता दी।
- एकल न्यायाधीश के आदेश में कोई त्रुटी न पाते हुए, न्यायालय ने अपील पर विचार करने की इच्छा नहीं जताई और उसे खारिज कर दिया।
भारत में मंदिर प्रशासन के लिये विधिक ढाँचा क्या है?
बारे में:
- तमिलनाडु हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती (HR&CE) अधिनियम, 1959 तमिलनाडु में हिंदू मंदिरों और धार्मिक संस्थानों के प्रशासन और प्रबंधन को नियंत्रित करता है।
- यह अधिनियम हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों और बंदोबस्ती के उचित प्रशासन, रखरखाव और प्रबंधन का प्रावधान करता है।
- हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 63(ङ) विशेष रूप से मंदिरों में प्रथाओं और रूढ़ियों से संबंधित विवादों का निर्णय करने के लिये सक्षम प्राधिकारी की शक्तियों से संबंधित है।
- हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती एक सांविधिक निकाय है जो धार्मिक प्रथाओं और रूढ़ियों से संबंधित मामलों सहित मंदिर प्रशासन की देखरेख के लिये उत्तरदायी है।
मंदिर के सम्मान और प्रथा:
- मंदिर में दिये जाने वाले सम्मान वे विशेषाधिकार हैं जो मंदिर की परंपराओं और प्रथाओं के भाग के रूप में धार्मिक नेताओं, मठ प्रमुखों या अन्य विशिष्ट व्यक्तियों को प्रदान किये जाते हैं।
- ऐतिहासिक रूप से ऐसे सम्मान स्थापित प्रथाओं, धार्मिक महत्त्व और मठों और मंदिरों के बीच संबंधों के आधार पर प्रदान किये जाते रहे हैं।
- मठ प्रमुखों को सम्मान देने की प्रथा विभिन्न हिंदू धार्मिक संस्थानों और उनकी संबंधित परंपराओं के बीच अंतर्संबंध को दर्शाती है।
- मंदिरों में प्रथाएँ और रूढ़ियाँ सामान्यत: ऐतिहासिक प्रथाओं, धार्मिक ग्रंथों और समय के साथ चली आ रही स्थापित प्रथाओं द्वारा निर्धारित होती हैं।
प्रथा और अधिकार के बीच अंतर:
- यद्यपि कुछ प्रथाएँ मंदिरों में पारंपरिक रूप से निभाई जाती हैं, किंतु वे स्वतः ही लागू करने योग्य विधिक अधिकारों में तब्दील नहीं हो जातीं।
- किसी प्रथा को अधिकार माना जाए या नहीं, इसका अवधारण करने के लिये संबंधित सांविधिक ढाँचे के अधीन सक्षम अधिकारियों द्वारा परीक्षा की आवश्यकता होती है।
- किसी भी मंदिर में पहला और सर्वोपरि सम्मान सदैव देवता को ही दिया जाता है, न कि किसी व्यक्ति या संस्था को।
- धार्मिक प्रथाओं और सम्मानों का मूल्यांकन मंदिर प्रशासन विधियों और समानता और गैर-भेदभाव के सांविधानिक सिद्धांतों के दायरे में किया जाना चाहिये।