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आपराधिक कानून
आपराधिक न्यासभंग और छल का सह-अस्तित्व संभव नहीं हो सकता
03-Jan-2026
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प्रियम प्रथम सबत बनाम ओडिशा राज्य "एक ही तरह के तथ्यों पर आधारित किसी मामले में ‘आपराधिक न्यासभंग’ तथा ‘छल’ के अपराधों का सह-अस्तित्व संभव नहीं है।" न्यायमूर्ति आर.के. पटनायक |
स्रोत: उड़ीसा उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उड़ीसा उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति आर.के. पट्टानाइक ने प्रियम प्रथम सबत बनाम ओडिशा राज्य (2025) के मामले में विचारण न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 316 के अधीन आपराधिक न्यासभंग और भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 के अधीन छल दोनों का एक साथ संज्ञान लिया गया था, यह मानते हुए कि दोनों अपराध का सह-अस्तित्व संभव नहीं हो सकता।
प्रियम प्रथम सबत बनाम ओडिशा राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह पुनरीक्षण याचिका दिगापहांडी के माननीय J.M.F.C. द्वारा G.R. Case No.287/2025 में दिनांक 29 अगस्त 2025 को पारित संज्ञान आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई थी।
- यह मामला दिगापहांडी पुलिस थाने के Case No.232 दिनांक 25 जून 2025 से उत्पन्न हुआ है, जो भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 और 318 के अधीन पंजीकृत है।
- प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में याचिकाकर्त्ता द्वारा 70 लाख रुपए के दुर्विनियोग के आरोप लगाए गए थे।
- विचारण न्यायालय ने आपराधिक न्यासभंग और छल दोनों अपराधों का संज्ञान एक ही प्रकार के आरोपों के आधार पर एक साथ लिया।
- याचिकाकर्त्ता ने तर्क दिया कि अवर न्यायालय दोनों अपराधों का एक साथ संज्ञान नहीं ले सकती था और विवादित आदेश विधि की दृष्टि से सही नहीं ठहराया जा सकता।
- याचिकाकर्त्ता के अधिवक्ता ने इस तर्क का समर्थन करने के लिये दिल्ली रेस क्लब (1940) लिमिटेड और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2024) और अरशद नेयाज खान बनाम झारखंड राज्य और अन्य (2025) में उच्चतम न्यायालय के निर्णयों का हवाला दिया कि संज्ञान का आदेश अवैध था।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्च न्यायालय ने कहा कि दिल्ली रेस क्लब (उपरोक्त) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला था कि जब एक आरोप न्यासभंग का हो और दूसरा छल का, तब दोनों अपराधों का एक साथ सह-अस्तित्व संभव नहीं है।
- अरशद नेयाज खान (उपरोक्त) में भी इसी तरह का विचार व्यक्त किया गया था , जिसमें आपराधिक न्यासभंग और छल जैसे अपराधों की प्रकृति और उनके आवश्यक तत्वों पर विस्तार से चर्चा की गई थी।
- न्यायालय ने टिप्पणी की कि न्यासभंग करने का तात्कालिक आशय नहीं हो सकता है, जबकि छल के अपराध के लिये, मिथ्या और भ्रामक प्रतिनिधित्व करने के समय से ही आपराधिक आशय होना आवश्यक है।
- न्यायालय ने माना कि विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता द्वारा किये गए दो अपराधों में से कौन सा अपराध किया गया था, इस बारे में निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिये आरोप पत्र के साथ-साथ अभिलेख पर विद्यमान सामग्री पर ठीक से विचार नहीं किया।
- उच्च न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि विचारण न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया गया था, और इसलिये विधि की स्थापित स्थिति को ध्यान में रखते हुए निर्णय पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि दिनांक 29 अगस्त 2025 के विवादित आदेश को बरकरार नहीं रखा जा सकता और इसे अपास्त किया जाना चाहिये।
- उच्च न्यायालय ने दिगापहांडी के माननीय न्यायिक मजिस्ट्रेट को याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध अपराध का संज्ञान लेने पर पुनर्विचार करने और अभिलेख पर विद्यमान सामग्री पर विचार करते हुए एक तर्कसंगत आदेश पारित करने का निदेश दिया।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि विचारण न्यायालय को निर्णय में की गई टिप्पणियों और विधि की स्थापित विधिक स्थिति को ध्यान में रखना चाहिये।
भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 क्या है?
धारा 316- आपराधिक न्यासभंग
- संपत्ति का न्यास : किसी व्यक्ति को किसी भी प्रकार से संपत्ति या संपत्ति पर आधिपत्य सौंपा जाना चाहिये, जिससे पक्षकारों के बीच एक विश्वासपूर्ण संबंध स्थापित हो सके।
- बेईमानी से संपत्ति का दुर्विनियोग या परिवर्तन : जिस व्यक्ति को संपत्ति सौंपी गई हो, उसका उस संपत्ति का बेईमानीपूर्वक दुर्विनियोग करना अथवा उसे अपने उपयोग में परिवर्तित करना, तथा न्यास की शर्तों से विचलित होना आवश्यक है।
- विधिक निदेश या संविदा का उल्लंघन : अभियुक्त द्वारा संपत्ति का बेईमानी से ऐसा उपयोग या निस्तारण करना, जो न्यास के निर्वहन की विधि निर्धारित करने वाले किसी विधिक निर्देश के विरुद्ध हो, अथवा न्यास के संबंध में किये गए किसी वैध संविदा (अभिव्यक्त या विवक्षित) का उल्लंघन करता हो।
- दूसरों को जानबूझकर अनुमति देना : यह धारा उन परिस्थितियों को भी समाविष्ट करती है, जहाँ अभियुक्त जानबूझकर किसी अन्य व्यक्ति को उपर्युक्त कृत्यों को करने देता है, जिससे निष्क्रिय सुविधा प्रदान करने पर भी दायित्त्व आरोपित होता है
भारतीय न्याय संहिता की की धारा 318 क्या है?
धारा 318 – छल
- प्रवंचना: अभियुक्त द्वारा किसी व्यक्ति को मिथ्या कथनों, महत्त्वपूर्ण तथ्यों को छिपाने या अन्य कपटपूर्ण साधनों के माध्यम से प्रवंचित किया जाना आवश्यक है।
- कपटपूर्ण या बेईमानी से प्रेरित करना : इस प्रकार का प्रवंचित किसी व्यक्ति को कपटपूर्ण या बेईमानी से प्रेरित करके उसे किसी अन्य व्यक्ति को संपत्ति सौंपने या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा संपत्ति को अपने पास रखने की सम्मति देने के लिये बाध्य करना चाहिये।
- कृत्य/उपेक्षा हेतु जानबूझकर उकसाना : अभियुक्त द्वारा पीड़ित व्यक्ति को ऐसा कोई कार्य करने या न करने के लिये जानबूझकर प्रेरित करना, जिसे वह प्रवंचना न होने पर न करता या न करने से परहेज करता।
- नुकसान या अपहानि का कारण : प्रवंचना के कारण किया गया कृत्य या उपेक्षा शारीरिक, मानसिक, ख्याति या सांपत्तिक को नुकसान कारित करने वाला हो अथवा ऐसी अपहानि की संभावना उत्पन्न करता हो।
- धोखे के कारण किया गया कार्य या चूक, धोखे से पीड़ित व्यक्ति को शारीरिक, मानसिक, प्रतिष्ठा या संपत्ति के रूप में क्षति या हानि पहुंचाता है या पहुंचाने की संभावना रखता है।
धारा 316 (आपराधिक न्यासभंग) और धारा 318 (छल) में क्या अंतर है?
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पहलू |
धारा 316- आपराधिक न्यासभंग |
धारा 318 – छल |
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प्रारंभिक संबंध की प्रकृति |
संपत्ति का वैध न्यास/सौंपा जाना; अभियुक्त के पास संपत्ति का वैध आधिपत्य होता है। |
प्रारंभ से ही कपटपूर्ण प्रेरण; अभियुक्त प्रवंचना द्वारा संपत्ति प्राप्त करता है। |
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आपराधिक आशय का समयक्रम |
वैध न्यास के पश्चात् आपराधिक आशय का उद्भव। |
प्रारंभ से ही आपराधिक आशय विद्यमान। |
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संपत्ति की प्राप्ति |
संपत्ति अभियुक्त को वैध रूप से न्यस्त/सौंपी जाती है। |
सम्पत्ति कपटपूर्ण साधनों द्वारा प्राप्त की जाती है। |
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अपराध का आधार |
वैध कब्जे के पश्चात् न्यासभंग। |
प्रवंचना के परिणामस्वरूप सम्पत्ति की सुपुर्दगी। |
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मानसिक तत्त्व |
सौंपी गई संपत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग या परिवर्तन। |
प्रवंचना द्वारा कपटपूर्ण अथवा बेईमानीपूर्ण प्रेरण। |
आपराधिक कानून
आपराधिक अन्वेषण में आवाज का नमूना (वॉइस सैंपलिंग) लेना
03-Jan-2026
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मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो "न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास आपराधिक अन्वेषण के उद्देश्यों के लिये आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति है, और ऐसा निदेश संविधान के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन करने वाला परिसाक्ष्य देने के लिये बाध्यता नहीं है।" न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2025) के मामले में याचिकाकर्त्ता को अवरोधित टेलीफोन वार्तालापों के साथ तुलना के लिये आवाज के नमूने प्रदान करने का निदेश देने वाले आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया, यह मानते हुए कि ऐसे निदेश विधिक रूप से वैध हैं और सांविधानिक सुरक्षा का उल्लंघन नहीं करते हैं।
मोइन अख्तर कुरैशी बनाम केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अक्टूबर 2013 और मार्च 2014 के बीच, आयकर विभाग ने याचिकाकर्त्ता से कथित तौर पर संबंधित मोबाइल नंबरों से हुई टेलीफोन बातचीत को इंटरसेप्ट (अवरोध) किया।
- प्रवर्तन निदेशालय ने 31 अगस्त, 2016 को CBI के समक्ष एक परिवाद दर्ज कराया, जिसमें अवरोधित रिकॉर्डिंग्स एवं संदेशों के आधार पर आरोप लगाया गया कि याचिकाकर्त्ता ने लोक सेवकों के लिये मध्यस्थ के रूप में काम किया।
- CBI ने 16 फरवरी, 2017 को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 120-ख के अधीन भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 8, 9 और 13(2) के साथ धारा 13(1)(घ) के अधीन प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) संख्या 224/2017 दर्ज की।
- मार्च 2021 में, CBI ने याचिकाकर्त्ता को निदेश देने का अनुरोध किया कि वह केंद्रीय फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशाला द्वारा अवरोधित कॉल के साथ तुलना के लिये आवाज के नमूने उपलब्ध कराए।
- विशेष न्यायाधीश ने रितेश सिन्हा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) 8 एससीसी 1 पर विश्वास करते हुए 26 अक्टूबर, 2021 को आवेदन स्वीकार कर लिया।
- याचिकाकर्त्ता ने दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अधीन इस आदेश को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
प्रक्रियात्मक विधि और मौलिक न्याय:
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि प्रक्रिया विधि न्याय की दासी होनी चाहिये, न कि स्वामी, और इसका उपयोग मौलिक अधिकारों को पराजित करने के लिये नहीं किया जा सकता है।
आवाज का नमूना लेना और आत्म-अभिशंसन से संरक्षण:
- न्यायालय ने माना कि आवाज का नमूना लेना आत्म-अभिशंसन नहीं है और यह भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन नहीं करता है।
- काठी कालू ओघड़ (1961) पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने कहा कि आत्म- अभिशंसन का अर्थ व्यक्तिगत ज्ञान के आधार पर जानकारी देना है, न कि साक्ष्य प्रस्तुत करने की यांत्रिक प्रक्रियाएँ।
- आवाज के नमूने तुलना के लिये ठोस साक्ष्य हैं और अपने आप में पूरी तरह से हानिरहित हैं, ये परिसाक्ष्य देने के लिये किसी प्रकार की बाध्यता नहीं दर्शाते हैं।
आवाज के नमूने लेने का निदेश देने की मजिस्ट्रेट की शक्ति:
- रितेश सिन्हा (2019) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने विधायी अंतर को भरने के लिये अनुच्छेद 142 का हवाला देते हुए कहा कि न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास अन्वेषण के लिये आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति है।
- उच्चतम न्यायालय ने राहुल अग्रवाल (2025) के मामले में इसकी पुष्टि की और स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 349 में इस शक्ति को स्पष्ट रूप से सम्मिलित किया गया है।
- यह अधिकार किसी भी व्यक्ति पर लागू होता है, जिसमें अभियुक्त और साक्षी भी सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष और निदेश:
- न्यायालय ने विशेष न्यायाधीश के आदेश में कोई अवैधता नहीं पाई और याचिका खारिज कर दी।
- याचिकाकर्त्ता को विचारण न्यायालय/अन्वेषण अधिकारी द्वारा निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार अनुपालन करने और आवाज के नमूने प्रदान करने का निदेश दिया गया था।
आपराधिक अन्वेषण में वॉइस सैंपलिंग क्या है?
बारे में:
- आपराधिक अन्वेषण में विवादित रिकॉर्डिंग से तुलना करने के लिये फोरेंसिक प्रयोगशालाओं में स्पेक्ट्रोग्राफिक विश्लेषण के माध्यम से किसी व्यक्ति की आवाज को रिकॉर्ड करना ही वॉयस सैंपलिंग है।
- आवाज के नमूने भौतिक साक्ष्य होते हैं, परिसाक्ष्य के साक्ष्य नहीं, और ये अपने आप में व्यक्ति को दोषी साबित नहीं करते।
विधिक ढाँचा:
- रितेश सिन्हा (2019) मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह मानते हुए विधायी त्रुटी को दूर किया कि न्यायिक मजिस्ट्रेटों के पास आवाज के नमूने लेने का आदेश देने की शक्ति है।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 349 में अब इस शक्ति को स्पष्ट रूप से संहिताबद्ध किया गया है।
सांविधानिक वैधता:
- वॉयस सैंपलिंग, काठी कालू ओघड़ (1961) में स्थापित आत्म-अभिशंसन के विरुद्ध अनुच्छेद 20 (3) के संरक्षण का उल्लंघन नहीं करता है।
- ये तुलना के लिये भौतिक साक्ष्य हैं और अपने आप में हानिरहित हैं; केवल अन्वेषण सामग्री के साथ तुलना करने से ही दोष सिद्ध हो सकता है।
संविधान सभा के अनुच्छेद 20(3) का क्या अर्थ है?
- अनुच्छेद 20 अपराधों के लिये दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण से संबंधित है।
- अनुच्छेद 20(3) पुष्टि करता है कि किसी भी अपराध के अभियुक्त को अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिये विवश नहीं किया जाएगा।
- इस अनुच्छेद द्वारा प्रदत्त अधिकार एक ऐसा अधिकार है जो किसी अभियुक्त को विचारण या अन्वेषण के दौरान मौन रहने का विशेषाधिकार देता है, जबकि राज्य को उसके द्वारा की गई संस्वीकृति पर कोई दावा प्राप्त नहीं होता है।
- सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) के मामले में, उच्चतम न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संविधान के अनुच्छेद 20(3) को सर्वोच्च दर्जा प्राप्त है । यह उपबंध आपराधिक प्रक्रिया में एक आवश्यक सुरक्षा उपाय है और अन्वेषण अधिकारियों द्वारा प्रयोग की जाने वाली यातना और अन्य दमनकारी विधियों के विरुद्ध एक महत्त्वपूर्ण सुरक्षा उपाय के रूप में भी काम करता है।