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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

तलाशी और अभिग्रहण की अनिवार्य वीडियोग्राफी

 07-Jan-2026

शादाब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

"किसी स्थान की तलाशी लेने या किसी संपत्ति पर कब्जा करने की प्रक्रिया को किसी भी ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम सेअधिमानतः मोबाइल फोन के माध्यम से रिकॉर्ड किया जाएगा ।" 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की पीठ ने शादाब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025)के मामले मेंआवेदक को जमानत देते हुएभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 105 के अधीन अनिवार्य वीडियोग्राफी आवश्यकताओं के साथ पुलिस के गैर-अनुपालन के बारे में गंभीर चिंताओं को उजागर किया। 

शादाब बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • जमानत याचिका मुजफ्फर नगर जिले के मंसूरपुर पुलिस थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 305(2) और 317(2) के अधीन केस क्राइम नंबर 185/2024 में आवेदक की रिहाई की मांग करते हुए दायर की गई थी। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में आवेदक का नाम नहीं था। 
  • तत्पश्चात्मिली जानकारी के आधार परआवेदक को चार अन्य सह-अभियुक्तों के साथ गिरफ्तार किया गया। 
  • उनके संयुक्त कब्जे से कथित तौर पर 40 मोटरसाइकिलें बरामद की गईं। 
  • बरामदगी के दौरान कोई निजी साक्षी मौजूद नहीं था, और न ही कथित बरामदगी की कोई वीडियोग्राफी की गई थी। 
  • आवेदक के अधिवक्ता ने तर्क दिया किभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 105 के अनुसार बरामदगी की वीडियोग्राफी अनिवार्य हैऔर इसकी अनुपस्थिति पूरी अभियोजन कहानी पर संदेह उत्पन्न करती है। 
  • दो सह-अभियुक्तशोएब और ओवैसको इलाहाबाद उच्च न्यायालय की समन्वय पीठों द्वारा पहले ही जमानत पर छोड़ दिया गया था। 
  • आवेदक ने तर्क दिया कि वह उन सह-अभियुक्त के समान स्थिति में था जिन्हें समानता के आधार पर जमानत दी गई थी। 
  • इस मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका थाजिससे अभिरक्षा में पूछताछ की आवश्यकता समाप्त हो गई थी। 
  • आवेदक 16 अप्रैल, 2025 से जेल में था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने मामले के तथ्योंकारागारों में अत्यधिक भीड़ तथा आपराधिक मामलों की भारी लंबितता पर विचार करते हुए अभियुक्त को कुछ शर्तों के साथ जमानत प्रदान की। इन शर्तों में विचारण में सहयोग करनासाक्षियों को किसी प्रकार का प्रलोभन या धमकी न देना तथा किसी भी प्रकार की आपराधिक क्रियाकलाप में संलिप्त न होना सम्मिलित था 
  • न्यायालय ने यह भी अभिलेखित किया कि पुलिस द्वारा 40 मोटरसाइकिलों की कथित बरामदगी के संबंध में न तो अनिवार्य वीडियोग्राफी की गई और न ही जब्त की गई वस्तुओं की सूची तैयार की गईजबकि यह धारा 105, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के अंतर्गत अनिवार्य है। इस प्रकार का अनुपालन न किया जाना पुलिस की उपेक्षा एवं मनमानी को दर्शाता हैजिससे अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर संदेह उत्पन्न होता है 
  • न्यायालय ने ऐसे अनेक मामलों का उल्लेख किया जहाँ पुलिस ने स्वतंत्र साक्षियों की अनुपलब्धता के होते हुए भी ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं कीजिससे जमानत और विचारण की कार्यवाही के दौरान अपराधियों को अनुचित लाभ मिला। 
  • न्यायालय ने उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक को निदेश दिया कि वे विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) जारी करें जिसमें ई-साक्ष्य पोर्टल या मोबाइल फोन सहित अन्य इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के माध्यम से संपत्ति की तलाशीअभिग्रहण और कब्जे की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य हो। 
  • उत्तर प्रदेश भारतीय नागरिक सुरक्षा नियम, 2024 के नियम 18 के साथ पढ़ी जाने वाली धारा 105 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अनुपालन न करने परसंबंधित पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है।  
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि इससे दोहरे उद्देश्य पूरे होंगे: निर्दोष व्यक्तियों को मिथ्या आरोपों में फंसाने से रोकना और जमानत आवेदनों और विचारण के लिये वास्तविक अपराधियों के विरुद्ध पुख्ता साक्ष्य तैयार करना। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 105 क्या है? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 105 के बारे में: 

  • यह प्रावधान किसी स्थान की तलाशी लेने अथवा संबंधित अध्याय के अंतर्गत या धारा 185 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन किसी संपत्तिवस्तु या सामग्री का कब्जा लेने की स्थिति में लागू होता है 
  • यह धारा तलाशी और अभिग्रहण की संपूर्ण कार्यवाही को अपने दायरे में समाहित करती है।  

क्या-क्या रिकॉर्ड करना आवश्यक है: 

  • किसी स्थान की खोज करने की पूरी प्रक्रिया। 
  • किसी संपत्तिवस्तु या चीज़ पर कब्ज़ा करना। 
  • तलाशी और जब्ती के दौरान जब्त की गई सभी वस्तुओं की सूची तैयार करना। 
  • साक्षियों द्वारा ऐसी सूची पर हस्ताक्षर करना। 

रिकॉर्डिंग की रीति: 

  • इसे किसी भी ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड किया जाना चाहिये 
  • रिकॉर्डिंग हेतु मोबाइल फोन को प्राथमिक उपकरण के रूप में उपयोग किए जाने का प्रावधान किया गया है। 

जमा करने की आवश्यकता: 

  • संबंधित पुलिस अधिकारी द्वारा उक्त ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग को बिना विलंब अग्रेषित किया जाना आवश्यक है। 
  • रिकॉर्डिंग को जिला मजिस्ट्रेटउप-विभागीय मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को प्रेषित किया जाना चाहिये।  

उद्देश्य: 

  • यह पुलिस अधिकारियों द्वारा मिथ्या बरामदगी और साक्ष्य गढ़ने से रोकता है। 
  • निष्पक्ष विचारण की कार्यवाही के लिये विश्वसनीय विधिक सामग्री तैयार करता है। 

आपराधिक कानून

वैवाहिक कलह के कारण विवाहित महिला द्वारा गर्भपात कराना अपराध नहीं है

 07-Jan-2026

एक्स बनाम राज्य और अन्य 

"यद्यपि गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम द्वारा प्रजनन संबंधी विकल्पों के प्रयोग का अधिकार प्रतिबंधित हैफिर भी यह गर्भावस्था को अस्वीकार करने के उसके अधिकार को मान्यता देता है और उसकी रक्षा करता हैयदि उसका मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खतरे में हो।" 

न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा 

स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने एक्स बनाम राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि वैवाहिक कलह के कारण मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले गर्भपात से गुजरने वाली विवाहित महिला भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 312 के अधीन अपराध नहीं करती हैयदि यह प्रक्रिया गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 (MTP Act) के अनुसार की जाती है। 

एक्स बनाम स्टेट और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • एक महिला ने वैवाहिक कलह के कारणजो उसके मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा था, गर्भावस्था के 14वें सप्ताह में गर्भपात करवा लिया। 
  • बाद में गर्भपात कराने के लिये उसे भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 312 के अधीन तलब किया गया। 
  • महिला ने इस समन आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 
  • उपस्थित चिकित्सक ने OPD कार्ड में यह नोट किया था कि विद्यमान निर्णयों को देखते हुएगर्भपात से इंकार नहीं किया जा सकता है और इसलिये उन्होंने प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। 
  • महिला पहले से ही अपने वैवाहिक जीवन में तनाव का सामना कर रही थी और गर्भपात के समय उसने अपने पति से पृथक् होने का निर्णय कर लिया था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने माना कि जब किसी महिला का मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य खतरे में होतोप्रजनन संबंधी विकल्प चुनने का अधिकार गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीन मान्यता प्राप्त और संरक्षित हैऔर गर्भपात एक ऐसा निर्णय है जो केवल महिला को ही लेना चाहिये 
  • न्यायमूर्ति कृष्णा ने इस बात पर बल दिया कि प्रजनन पर नियंत्रण सभी महिलाओं का एक बुनियादी अधिकार हैजिसमें विधिक और सुरक्षित गर्भपातजन्म नियंत्रणगुणवत्तापूर्ण प्रजनन स्वास्थ्य देखभाल और सूचित प्रजनन विकल्प का अधिकार सम्मिलित है। 
  • न्यायालय ने यह स्वीकार किया किवैवाहिक कलह से उत्पन्न मानसिक आघात गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता हैऔर यह माना कि "मानसिक स्वास्थ्य" का निर्वचन केवल शारीरिक या तंत्रिका संबंधी स्थिति के रूप में संकीर्ण रूप से नहीं की जानी चाहिये 
  • न्यायालय कहा कि वैवाहिक कलह का अर्थ यह नहीं है कि पक्षकार पृथक् हो गए हों या विधिक कार्यवाही शुरू कर दी हो - तनाव और कलह की भावना ही ऐसी स्थिति उत्पन्न करती है जिससे मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होने की संभावना होती हैजिससे एक महिला गर्भपात कराने के लिये सक्षम हो जाती है। 
  • न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि एक स्त्री-विरोधी समाज में गर्भावस्था के दौरान वैवाहिक कलह का सामना कर रही महिला को बहुस्तरीय आघात सहना पड़ता हैक्योंकि उसे प्रायः समस्त दायित्त्व अकेले ही वहन करने के लिये विवश कर दिया जाता हैजिससे उसके समक्ष अपार कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं तथा उसे गंभीर मानसिक पीड़ा और आघात का सामना करना पड़ता है। 
  • न्यायालय ने कहा किगर्भ में पल रहे भ्रूण को जीवित महिला के अधिकारों से ऊपर नहीं रखा जा सकता है, और किसी महिला को अनचाही गर्भावस्था जारी रखने के लिये विवश करना उसकी शारीरिक अखंडता का उल्लंघन करता है और मानसिक आघात को बढ़ाता है। 
  • न्यायालय ने कहा कि गर्भ का चिकित्सीय समापन नियम 2021 का नियम 3ख उन सभी महिलाओं पर लागू होता है जिनकी भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन होता हैन कि केवल सीमित सूचीबद्ध स्थितियों मेंऔर यह कि सुरक्षित गर्भपात तक पूर्ण पहुँच को रोकने वाली बाधाएं अभी भी विद्यमान हैं। 
  • न्यायालय ने भारतीय दण्ड संहिता की धारा 312 के अधीन जारी किये गए समन को रद्द कर दियायह मानते हुए कि जब उच्चतम न्यायालय ने वैवाहिक कलह की स्थिति मेंजो मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैगर्भपात कराने के लिये महिला की स्वायत्तता को मान्यता दी हैऔर गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुएकोई अपराध नहीं किया गया है।

गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम, 1971 क्या है 

  • गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम 1 अप्रैल 1972 से प्रवर्तन में आया 
  • गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीनएक चिकित्सक द्वारा दो चरणों में गर्भसमापन की अनुमति दी गई है: 
    • गर्भधारण के 12 सप्ताह तक गर्भसमापन के लिये एक चिकित्सक की राय आवश्यक थी 
    • 12 सप्ताह से 20 सप्ताह की अवधि के गर्भ के मामलों में दो चिकित्सकों की राय आवश्यक थीजिससे यह निर्धारित किया जा सके कि गर्भावस्था को जारी रखना गर्भवती महिला के जीवन के लिये जोखिमपूर्ण होगा अथवा उसके शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर क्षति पहुँचा सकता हैअथवा यदि शिशु का जन्म होता है तो उसमें ऐसे शारीरिक या मानसिक असामान्यताएँ होने की प्रबल संभावना हैजिनके कारण वह गंभीर रूप से “अपंग” होगा।  
  • इस अधिनियम में वर्ष 2020 में व्यापक संशोधन किया गया तथा संशोधित विधि सितंबर 2021 से प्रभावी हुईजिसके अंतर्गत निम्नलिखित प्रमुख परिवर्तन किये गए  
    • गर्भसमापन की अधिकतम अनुमत गर्भकाल सीमा को वर्ष 1971 के अधिनियम के अंतर्गत 20 सप्ताह से बढ़ाकर 24 सप्ताह किया गया 
    • गर्भावस्था के 20 सप्ताह तक गर्भ का चिकित्सीय समापन का आकलन करने के लिये एक योग्य चिकित्सा पेशेवर की राय का उपयोग किया जा सकता है और 20 सप्ताह से लेकर 24 सप्ताह तकदो रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा चिकित्सकों की राय की आवश्यकता होगी।  
    • दो रजिस्ट्रीकृत चिकित्सकों की राय लेने के बादगर्भावस्था को 24 सप्ताह की गर्भकालीन आयु तक निम्नलिखित शर्तों के अधीन समाप्त किया जा सकता है:  
      • यदि महिला लैंगिक उत्पीड़नबलात्कार या अनाचार की पीड़िता हो; 
      • यदि वह अवयस्क है; 
      • यदि गर्भावस्था के दौरान उसकी वैवाहिक स्थिति में कोई परिवर्तन होता है (विधवा होने या तलाक के कारण); 
      • यदि वह गंभीर शारीरिक अक्षमताओं से पीड़ित है या मानसिक रूप से बीमार है; 
      • यदि महिला गंभीर शारीरिक दिव्यांगता से ग्रस्त हो अथवा मानसिक रूप से अस्वस्थ हो 
      • यदि भ्रूण में ऐसी विकृतियाँ पाई जाएँ जो जीवन के अनुकूल न हों अथवा ऐसे गंभीर रूप से दिव्यांग शिशु के जन्म की संभावना हो 
      • यदि महिला किसी मानवीय संकटआपदा-स्थिति अथवा सरकार द्वारा घोषित आपातकालीन परिस्थितियों में फँसी हुई हो।  
    • गर्भपात उन मामलों में किया जाता है जहाँ भ्रूण में असामान्यताएँ पाई जाती हैं और गर्भावस्था 24 सप्ताह से अधिक समय तक बढ़ चुकी होती है। 
      • गर्भ का चिकित्सीय समापन अधिनियम के अधीन प्रत्येक राज्य में स्थापित चार सदस्यीय चिकित्सा बोर्ड को इस प्रकार के गर्भसमापन की अनुमति देनी होगी।