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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

दोषमुक्ति के विरुद्ध अपील करने के पीड़ित के अधिकार का समावेशन

 12-Jan-2026

गोपाल कृष्णन बनाम केरल राज्य और अन्य 

"पीड़ित द्वारा अपील के उपचार का सहारा लेने के पश्चात्वही पक्षकार द्वितीय अपील के रूप में कोई अन्य अपील दायर नहीं कर सकता है।" 

न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस 

स्रोत: केरल उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों 

गोपाल कृष्णन बनाम केरल राज्य और अन्य (2025)के मामले में न्यायमूर्ति बेचू कुरियन थॉमस ने निर्णय दिया कि पीड़ित भारतीयनागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 419(4) के उपबंधों के अनुसारकिसी अभियुक्त की दोषमुक्ति के विरुद्ध पीड़ित द्वारा उच्च न्यायालय से विशेष अनुमति प्राप्त कर द्वितीय अपील दायर नहीं की जा सकती। 

गोपाल कृष्णन बनाम केरल राज्य और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्त्ता ने अभिकथित किया था कि अभियुक्त ने भारतीय दण्ड संहिता धारा 420 तथा 415 सहपठित धारा 34 के अंतर्गतकेरल मनी लेंडर्स अधिनियम, 1958 की धाराओं 17 एवं 18 के अंतर्गत तथा चिट फंड्स अधिनियम, 1982 की धारा सहपठित धारा 76(1) के अंतर्गत अपराध कारित किये हैं।  
  • विचारण न्यायालय ने अभियुक्तों को समस्त आरोपों से दोषमुक्त कर दिया। 
  • पीड़ित ने विचारण न्यायालय के दोषमुक्ति आदेश के विरुद्ध भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 413 के अंतर्गत सेशन न्यायालय के समक्ष अपील दायर की 
  • सेशन न्यायालय नेपीड़ित की अपील खारिज कर दीऔर विचारण न्यायालय के दोषमुक्ति आदेश को बरकरार रखा। 
  • इस चरण परपीड़ित ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 419(4) के अंतर्गत विशेष अनुमति प्राप्त कर केरल उच्च न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील दायर करने का प्रयास किया।  
  • रजिस्ट्री द्वारा यह आपत्ति दर्ज की गई जिसमें कहा गया कि एक ही अपीलकर्त्ता द्वारा द्वितीय दाण्डिक अपील पोषणीय नहीं है। 
  • पीड़ित/याचिकाकर्त्ता ने रजिस्ट्री द्वारा बताई गई इस आपत्ति को चुनौती दी और तर्क दिया कि उन्हें द्वितीय अपील दायर करने का अधिकार है।   

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • न्यायालय ने इस बात पर बल देने के लियेएशियन पेंट्स लिमिटेड बनाम राम बाबू और अन्य (2025)में उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर विश्वास किया कि एक बार पीड़ित द्वारा अपीलीय उपचार का सहारा लिया जाता हैतो वही पक्षकारद्वितीय अपील के रूप में द्वितीय अपील दायर नहीं कर सकता है।  
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि सेशन न्यायालय के समक्ष भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 413 के अधीन अपील दायर करने के बाद, उसी अपीलकर्त्ता द्वारा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 419(4) के अधीन दोषमुक्ति के आदेश की पुष्टि के विरुद्ध द्वितीय अपील दायर नहीं की जा सकती है।  
  • न्यायालय ने इस तर्क को नामंजूर कर दिया कि पीड़ित को दोषमुक्त करने के प्रत्येक आदेश और दोषमुक्त करने की पुष्टि करने वाले आदेशों के विरुद्ध अपील करने का अधिकार है। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धारा 413 के परंतुक के अनुसारपीड़ित को 'अपीलकरने का अधिकार हैन कि 'अपीलोंकाऔर यह अधिकार अभियुक्त के पहले के दोषमुक्त होने की पुष्टि करने वाले आदेश तक विस्तारित नहीं किया जा सकता है। 
  • न्यायालय ने इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 132, 134 के अधीन उच्चतम न्यायालय के अपीलीय अधिकारिता या यहाँ तक ​​कि अनुच्छेद 136 के अधीन विशेष अनुमति याचिका से अलग बताया। 
  • द्वितीय अपील को पोषणीय नहीं पाया और रजिस्ट्री द्वारा बताई गई आपत्ति को बरकरार रखा गया।  
  • न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि याचिकाकर्त्ता द्वारा अनुमति याचिका पर कार्रवाई करने में व्यतीत किया गया समय परिसीमा काल से अपवर्जित किया जाएगा। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 419 क्या है? 

धारा 419 - दोषमुक्ति (Acquittal) के विरुद्ध अपील 

जिला मजिस्ट्रेट/राज्य सरकार द्वारा अपील: 

  • जिला मजिस्ट्रेटलोक अभियोजक को संज्ञेय और अजमानतीय अपराधों में मजिस्ट्रेट के दोषमुक्ति के आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय में अपील करने का निदेश दे सकता है। 
  • राज्य सरकार लोक अभियोजक को उच्च न्यायालय के अवर न्यायालयों द्वारा पारित दोषमुक्त करने के आदेशों (मूल या अपीलीय) के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील करने का निदेश दे सकती है। 
  • उपधारा (1) और (2) के अंतर्गत ऐसी अपीलों के लिये उच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक है। 

केंद्रीय धिनियमों के अंतर्गत मामलों में अपील: 

  • केंद्रीय अधिनियमों के अधीन केंद्रीय अभिकरणों द्वारा अपराध का अन्वेषण किये जाने पर केंद्र सरकार के पास भी इसी तरह की शक्तियां होती हैं। 
  • केंद्र सरकारमजिस्ट्रेट के आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय में अथवा अन्य न्यायालयों के आदेशों के विरुद्ध उच्च न्यायालय में अपील दायर करने हेतु निदेश दे सकती है।  

परिवादकर्त्ता का अपील करने का अधिकार: 

  • परिवादकर्त्ता उपधारा (4) के अधीन दोषमुक्ति के आदेश के विरुद्ध अपील करने के लिये उच्च न्यायालय से विशेष अनुमति मांग सकता है। 
  • यह उन मामलों पर लागू होता है जो परिवाद के आधार पर संस्थित किये गए हैं। 

परिवादकर्त्ता के लिये समय सीमा: 

  • लोक सेवक परिवादकर्त्ता: दोषमुक्ति आदेश की तारीख से मास।  
  • अन्य परिवादकर्त्ता के लिये: दोषमुक्ति आदेश की तारीख से 60 दिन। 

एकाधिक अपीलों पर रोक:  

  • यदि परिवादकर्त्ता की विशेष अनुमति याचिका उच्च न्यायालय द्वारा अस्वीकार कर दी जाती हैतो जिला मजिस्ट्रेट/राज्य/केंद्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) या (2) के अधीन कोई अपील दायर नहीं की जा सकती है। 

सिविल कानून

प्रवर्तक द्वारा धनराशि प्रविष्टि हेतु उपक्रम

 12-Jan-2026

यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025) 

"किसी उधारकर्ता को उसकी देनदारियों को पूरा करने में सक्षम बनाने के लिये धन उपलब्ध कराने का उपक्रमअपने आप में उधारकर्ता की लेनदार के प्रति देनदारी को निर्वहन करने के वचन के समकक्ष नहीं ठहराया जा सकता है ।" 

न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक आराधे  

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025)के मामले में न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक अराधे की पीठ ने यह निर्णय दिया कि किसी प्रवर्तक को वित्तीय शर्तों को पूरा करने के लिये उधारकर्ता में धन की व्यवस्था करने के लिये बाध्य करने वाला संविदात्मक खंडको भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 के अधीन प्रत्याभूति की संविदा नहीं है।  

यू.वी. एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड बनाम इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • इलेक्ट्रोस्टील लिमिटेड (ESL) ने 26.07.2011 के स्वीकृति पत्र के माध्यम से SREI इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंस लिमिटेड (SREI) से 500 करोड़ रुपए कीवित्तीय सहायता प्राप्त की । 
  • इलेक्ट्रोस्टील कास्टिंग्स लिमिटेड (ECL), जो ESL की प्रवर्तक (Promoter) कंपनी थीको ESL द्वारा वित्तीय उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने हेतु धनराशि की प्रविष्टि की व्यवस्था करने संबंधी एक उपक्रम प्रस्तुत करना आवश्यक था 
  • जब SREI और ESL ने ऋण करार पर हस्ताक्षर कियेतो उसमें इस आशय का एक खंड सम्मिलित किया गया था। 
  • तदनुसार, ECL ने दिनांक 27.07.2011 को एक उपक्रम विलेख निष्पादित कियाजिसके अंतर्गत उसने ESL में धनराशि की प्रविष्टि की व्यवस्था करने संबंधी सीमित दायित्त्व स्वीकार किया 
  • वर्ष 2017–18 में, ESL के विरुद्ध दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016 के अंतर्गत कॉर्पोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) आरंभ की गई 
  • ESL के लिये एक समाधान योजना अनुमोदित एवं कार्यान्वित की गई। 
  • SREI ने ESL को बिना शर्त 'नो ड्यू सर्टिफिकेटजारी किया। 
  • तत्पश्चात्, SREI ने यह दावा किया कि शेष ऋण को इक्विटी में परिवर्तित किये जाने पर उसे अपेक्षा से कम मात्रा में इक्विटी शेयर आबंटित किये गए।  
  • बाद में SREI ने कथित अवशिष्ट ऋण (Residual Debt) से संबंधित अपने अधिकार यूवी एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड (अपीलार्थी) के पक्ष में सौंप दिये 
  • बकाया ऋण का दावा करते हुएअपीलकर्त्ता ने दिवाला और शोधन अक्षमता की धारा के अधीन एक याचिका के साथ राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), कटक से संपर्क किया। 

राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील अधिकरण (NCLAT) के समक्ष कार्यवाही: 

  • NCLT ने दो आधारों पर याचिकाखारिज कर दी : (i) ECL, ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के संबंध में प्रतिभू नहीं था और इस कारण ECL पर कोई वित्तीय ऋण देय नहीं थाऔर (ii) समाधान योजना के अधीन ESL के ऋण को इक्विटी में परिवर्तित करने से ECL की किसी भी देनदारी का समापन हो गया।  
  • अपील में, NCLAT ने माना कि ECL, ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के लिये प्रतिभू नहीं था।  
  • तथापि, NCLAT ने यह भी पाया कि समाधान योजना की मंजूरी से केवल ESL के संबंध में ऋण समाप्त होते हैंन कि पर-पक्षकार के संबंध मेंजब तक कि विशेष रूप से प्रावधान न किया गया हो। 
  • अंततःयह पाते हुए कि ECL, ESL की प्रतिभू नहीं थीअपील को खारिज कर दिया गया 
  • उपर्युक्त निष्कर्षों से असंतुष्ट होकरदोनों पक्षकारों ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने कहा, "इस खंड मेंन तो लेनदार को देय ऋण चुकाने का कोई उपक्रम है और न ही इसमेंव्यतिक्रम की स्थिति में ऋणदाता को संदाय करने का प्रावधान है। इस खंड में लेनदार को व्यतिक्रम होने पर ऋण चुकाने का वचन नहीं हैअपितु उधारकर्ता के प्रति यह वचन है कि उसे वित्तीय शर्तों के अनुपालन में सक्षम बनाया जाएगा।" 
  • न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि "ऋण लेने वाले को उसकी देनदारियों को पूरा करने में सक्षम बनाने के लिये धन उपलब्ध कराने का वचन देनाअपने आप में ऋणदाता के प्रति ऋण लेने वाले के दायित्त्व के उपक्रम के वचन के समान नहीं माना जा सकता। केवल वित्तीय अनुशासन सुनिश्चित करने या धन उपलब्ध कराने का वचन देनाअधिनियम की धारा 126 की सांविधिक आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता है।" 
  • न्यायालय ने स्वीकृति पत्र सहित अन्य दस्तावेज़ों का भी हवाला देते हुए कहा कि ECL द्वारा कोई "प्रत्याभूति" नहीं दी गई थी। 
  • न्यायालय ने NCLT तथा NCLAT के निष्कर्षों से सहमति व्यक्त की कि उपक्रम विलेख (Deed of Undertaking) की धारा 2.2 प्रत्याभूति की संविदा का गठन नहीं करती तथा ECL को ESL द्वारा प्राप्त वित्तीय सुविधाओं के संबंध में प्रतिभू के रूप में नहीं माना जा सकता।  
  • तदनुसारअपील खारिज कर दी गई। 
  • ECL द्वारा दायर एक संबंधित अपील मेंन्यायालय ने पाया कि समाधान योजना ने SREI सहित वित्तीय लेनदारों को ESL के अस्थिर ऋण का पूरा मूल्य प्रदान नहीं किया।  
  • न्यायालय ने माना कि ESL की संकल्प योजना की मंजूरी सेसंपूर्ण ऋण का समापन नहीं हुआजिससे ECL के विरुद्ध प्रतिभूति प्रदाता/पर-पक्षकार के प्रतिभू के रूप में किसी भी दावे को रोका जा सके। 
  • तदनुसार, NCLAT के निर्णय के विरुद्ध ECL की अपील खारिज कर दी गई। 

भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 क्या है? 

बारे में: 

  • भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 126 में यह उपबंधित किया गया है कि "प्रत्याभूति की संविदा" किसीपर-व्यक्ति द्वारा व्यतिक्रम की दशा में उसके वचन का पालन या उसके दायित्त्व का निर्वहन करने की संविदा है । 
    • प्रत्याभूति का अर्थ है प्रतिभू देना या उत्तरदायित्त्व लेना। यह एक ऐसा करार है जिसके अधीन किसी व्यक्ति के व्यतिक्रम की दशा की स्थिति में उसके ऋण अथवा दायित्त्व के निर्वहन का वचन दिया जाता है 
  • प्रतिभू के संविदा में तीन पक्षकार सम्मिलित होते हैं। 
    • प्रतिभू:जो व्यक्ति प्रत्याभूति देता हैउसे प्रतिभू कहते हैं। प्रतिभू का दायित्त्व गौण होता हैअर्थात् उसे संदाय तभी करना होता है जब मूल देनदार संदाय करने में असफल हो जाता है। 
    • मुख्य देनदार:वह व्यक्ति जिसके व्यतिक्रम के संबंध में प्रत्याभूति दी जाती हैमुख्य देनदार कहलाता है। 
    • लेनदार:वह व्यक्ति जिसे प्रत्याभूति दी जाती हैउसे लेनदार कहा जाता है। 
  • प्रत्याभूति लिखित या मौखिक रूप में हो सकती है।  
  • यह संविदा मूल देनदार को नियोजनऋण या वस्तुएँ प्राप्त करने में सक्षम बनाता है और देनदार की ओर से किसी भी प्रकार के व्यतिक्रम होने की स्थिति में प्रतिभू पुनर्भुगतान सुनिश्चित करेगा।    
  • उदाहरण 
    • मोहन लखनऊ विश्वविद्यालय शाखा के यूको बैंक से लाख रुपए का ऋण लेता है। सोहन यूको बैंक को वचन देता है कि यदि मोहन समय पर ऋण चुकाने में विफल रहता हैतो वह ऋण चुका देगा। यह एक प्रत्याभूति की  संविदा है और मोहन मूल देनदार हैयूको बैंक लेनदार है और सोहन प्रतिभू है। 

प्रत्याभूति संविदा के आवश्यक तत्त्व: 

  • संविदा मौखिक या लिखित दोनों प्रकार का हो सकती है। यद्यपिअंग्रेज़ी विधि में प्रत्याभूति की संविदा केवल लिखित रूप में ही वैध मणि जाती है। 
  • प्रत्याभूति की संविदा मूल देनदार की किसी विद्यमान या प्रत्याशित देयता अथवा दायित्त्व के निर्वहन पर आधारित होती है। यदि ऐसी कोई मूल देयता अस्तित्व में न हो और कोई पक्षकार बिना किसी अन्य व्यतिक्रम पर निर्भर हुए किसी अन्य को संदाय करने का वचन देतो वह संविदा प्रत्याभूति नहीं अपितु क्षतिपूर्ति (Indemnity) की संविदा होगी 
  • मूल देनदार के समर्थन में पर्याप्त प्रतिफल होना आवश्यक है। लेनदार और प्रतिभू के बीच पृथक् प्रतिफल का होना अनिवार्य नहीं हैयह पर्याप्त है कि लेनदार ने मूल देनदार के लाभ हेतु कोई कार्य किया हो 
  • संव्यवहार से संबंधित किसी भी महत्त्वपूर्ण जानकारी को दुर्व्यपदेशन द्वारा प्रस्तुत करके या छुपाकर आश्वासन की सहमति प्राप्त नहीं की जा सकती है। 

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 128: 

  • भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 128 में कहा गया है किप्रतिभू का दायित्त्व मूल देनदार के दायित्त्व के समान होता हैजब तक कि संविदा में अन्यथा उपबंधित न हो। 
  • प्रतिभू का दायित्वमूल देनदारकेसमान हीहोता है। 
  • एक लेनदार प्रत्यक्षत: इसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकता है। 
  • मूल देनदार पर वाद किये बिनालेनदार प्रत्यक्षत: प्रतिभू पर वाद कर सकता है। 
  • मूल देनदार द्वारा किसी भी संदाय में व्यतिक्रम होने परप्रतिभू तुरंत संदाय करने के लिये उत्तरदायी होता है । 
  • संदाय करने का प्राथमिक उत्तरदायित्त्वमूल देनदार की होता हैजबकि प्रतिभू का उत्तरदायित्त्वगौण होता है। वास्तव मेंयदि किसी दस्तावेज़ त्रुटि के कारण मूल देनदार को किसी संदाय के लिये उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता हैतो प्रतिभू भी ऐसे संदाय के लिये उत्तरदायी नहीं होता है। 

चलत प्रत्याभूति 

  • भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 129 चलत प्रत्याभूति से संबंधित है। 
  • एक प्रकार की प्रत्याभूति जोसंव्यवहार की एक श्रृंखलातक विस्तारित होती है वह चलत प्रत्याभूति है।  
  • एक चलत प्रत्याभूति उन सभी संव्यवहारों पर लागू होती है जो मूल देनदार प्रतिभू द्वारा प्रत्याभूति रद्द किये जाने से पहले करता है। 
  • भविष्य के संव्यवहार के लिये चलत प्रत्याभूति को लेनदारों को सूचना देकर किसी भी समय वापस लिया जा सकता है। यद्यपि प्रत्याभूति प्रतिसंहरण होने से पहले पूर्ण किये गए संव्यवहार के लिये प्रतिभू का उत्तरदायित्त्व कम नहीं होता है।