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आपराधिक कानून
वैवाहिक गृह में रहने वाले व्यक्तियों को महिला की अस्वाभाविक मृत्यु के संबंध में स्पष्टीकरण देना होगा
« »03-Nov-2026
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रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य “साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 के अधीन, सांविधिक भार अपीलार्थी पर अत्यधिक रूप से अध्यारोपित था।” न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति संदीप मेहता एवं न्यायमूर्ति देवेंद्र कुमार उपाध्याय की खंडपीठ ने 2 नवंबर 2026 को रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अपील खारिज कर दी तथा भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 302 के अंतर्गत पत्नी की हत्या के अपराध में पति की दोषसिद्धि और उसे दिये गए आजीवन कारावास के दंडादेश को बरकरार रखा।
रामकिशन दिगंबर जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- मृतका विमलबाई का विवाह अपीलार्थी रामकिशन के साथ हुआ था।
- अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि अभियुक्तगण ने अवैध दहेज की माँगों को लेकर उसके साथ उत्पीड़न एवं क्रूरता का व्यवहार किया था।
- परिवादी नारायण (PW-2) के अनुसार, विमलबाई अपने मायके आने पर अपने परिवार के सदस्यों को बताती थी कि:
- अभियुक्त उसके साथ मारपीट करता था,
- वे उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे तथा भूखा रखते थे, और
- एक घटना में उसे रस्सी से बाँधकर कुएँ में नीचे लटकाया गया था तथा धमकी दी गई थी कि यदि दहेज की माँगें पूरी नहीं की गईं, तो उसकी हत्या कर दी जाएगी।
- विमलबाई की उसके वैवाहिक गृह में अस्वाभाविक मृत्यु हो गई। मृत्यु के समय वह अपीलार्थी के साथ अकेली थी।
- अपीलार्थी की प्रतिरक्षा यह थी कि उसकी मृत्यु एक दुर्घटना थी। उसने दावा किया कि जब वे यौन संबंध स्थापित कर रहे थे, तब विमलबाई को अचानक मिर्गी का दौरा पड़ा और उसे चक्कर आ गए थे।
- अधीनस्थ न्यायालयों ने अभियुक्तों को दोषसिद्ध ठहराते हुए आजीवन कारावास का दंडादेश दिया।
- इसके पश्चात् अभियुक्तों ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील दायर की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- जब किसी पत्नी की उसके वैवाहिक गृह में, पति के साथ अकेले रहते हुए, अस्वाभाविक मृत्यु हो जाती है, तो क्या साक्ष्य अधिनियम की धारा 106 पति पर यह स्पष्टीकरण देने का भार अध्यारोपित करती है कि उसकी मृत्यु कैसे हुई? तथा यदि वह कोई स्पष्टीकरण नहीं देता अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, तो मामले पर इसका क्या प्रभाव पड़ता है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के संबंध में:
- न्यायालय ने इस तथ्य पर बल दिया कि विमलबाई की अस्वाभाविक मृत्यु के समय वह वैवाहिक गृह में अपीलार्थी के साथ अकेली थी।
- चूँकि अपीलार्थी को गृह की एकांत परिस्थितियों में अपनी पत्नी की अभिरक्षा प्राप्त थी, इसलिये धारा 106 के अंतर्गत उस पर भारी सांविधिक भार अध्यारोपित था। उसके लिये यह स्पष्ट करना आवश्यक था कि उसकी पत्नी की मृत्यु किन परिस्थितियों में हुई। इसके लिये उसे सुसंगत, विश्वसनीय एवं संतोषजनक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना था।
- अपीलार्थी इस भार का निर्वहन करने में विफल रहा। इसके विपरीत, उसने मिर्गी का दौरा पड़ने की मिथ्या एवं मनगढ़ंत प्रतिरक्षा प्रस्तुत की, जबकि चिकित्सकीय साक्ष्य एवं शव-परीक्षण के निष्कर्षों ने इस प्रतिरक्षा को अस्वीकार कर दिया।
अवलंबित पूर्व निर्णय के संबंध में:
- न्यायालय ने त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006) के मामले पर विश्वास किया जिसमें कहा गया था कि धारा 106 किसी घर में रहने वालों पर यह स्पष्ट करने का भार डालती है कि उसके अंदर अपराध कैसे हुआ।
- घर में रहने वालों यह तर्क देकर मौन नहीं रह सकते और कोई स्पष्टीकरण देने से बच नहीं सकते कि समस्त साक्ष्य प्रस्तुत करने का भार केवल अभियोजन पक्ष पर है।
अतिरिक्त कड़ी के रूप में मिथ्या प्रतिरक्षा के संबंध में:
- अपीलार्थी युक्तियुक्त स्पष्टीकरण देने में विफल रहा तथा उसने मिथ्या प्रतिरक्षा भी प्रस्तुत की।
- इन दोनों परिस्थितियों को समग्र रूप से देखने पर, उन्होंने दोषसिद्धि को पुष्ट करने वाली एक अतिरिक्त अभियोगात्मक कड़ी प्रदान की, जिससे परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला पूर्ण हो गई। इससे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 302 के अंतर्गत हत्या के अपराध में उसकी दोषिता स्थापित हुई।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113ख के अंतर्गत उपधारणा के संबंध में:
- PW-2 ने दहेज की माँगों को लेकर निरंतर उत्पीड़न एवं क्रूरता किए जाने के संबंध में स्पष्ट साक्ष्य दिया।
- उसकी साक्ष्य की निम्नलिखित साक्षियों द्वारा सुदृढ़ पुष्टि की गई:
- संभाजी तुरतवाड़ (PW-3), जिन्होंने विवाह तय कराने में मध्यस्थ की भूमिका निभाई थी,
- रामराव (PW-4), मृतका के पिता, जिन्होंने बार-बार दहेज की माँग किये जाने तथा शारीरिक उत्पीड़न की पुष्टि की, और
- वैजनाथ संभाजी मारपटवार (PW-5) एवं महाजन मुंजाजी येम्बलवाड़ (PW-6), जो मृतका के मायके के दो स्वतंत्र पड़ोसी थे।
- अतः न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तगण साक्ष्य अधिनियम की धारा 113B के अंतर्गत सांविधिक उपधारणा का खंडन करने में विफल रहे तथा अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा उन्हें दोषसिद्ध ठहराना उचित था।
निर्णय:
- अपील खारिज कर दी गई।
- दोषसिद्धि और आजीवन कारावास के दंडादेश को बरकरार रखा गया ।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 109 क्या है?
बारे में:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 (BSA) की धारा 109 विशेषत: ज्ञात तथ्य को साबित करने के भार से संबंधित है, जो किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो।
- इसमें यह उपबंधित है कि जब कोई तथ्य किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होगा।
- यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अध्याय 7 के अंतर्गत आती है, जो सबूत के भार से संबंधित है।
दृष्टांत:
- (क) जबकि कोई व्यक्ति किसी कार्य को उस आशय से भिन्न किसी आशय से करता है, जिसे उस कार्य का स्वरूप और परिस्थितियां इंगित करती हैं, तब उस आशय को साबित करने का भार उस पर है।
- (ख) ख पर रेल से बिना टिकट यात्रा करने का आरोप है। यह साबित करने का भार कि उसके पास टिकट था उस पर है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- सामान्य नियम का अपवाद: भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 104 के अंतर्गत, जो व्यक्ति किसी तथ्य का अभिकथन करता है, उस तथ्य को साबित करने का भार उसी पर होता है। धारा 109 इस सामान्य नियम का अपवाद है।
- अभियोजन का प्राथमिक भार यथावत् रहता है: धारा 109 अभियोजन पक्ष को युक्तियुक्त संदेह से परे अपराध साबित करने के दायित्व से मुक्त नहीं करती। यह तभी लागू होती है, जब अभियोजन पक्ष आधारभूत तथ्यों को साबित कर चुका हो।
- घर में रहने वाले लोग: जब कोई अपराध किसी गृह के भीतर, लोकदृष्टि से परे घटित होता है, तो वहाँ निवास करने वाले व्यक्तियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अपराध घटित होने की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण दें।
- मौन अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण अभियुक्त के विरुद्ध विचारणीय होगा: यदि अभियुक्त अपने विशेष ज्ञान में आने वाले तथ्यों के संबंध में कोई स्पष्टीकरण नहीं देता अथवा मिथ्या स्पष्टीकरण प्रस्तुत करता है, तो यह परिस्थितिजन्य साक्ष्य की श्रृंखला में एक अतिरिक्त कड़ी के रूप में कार्य कर सकता है। तथापि, यह दोषसिद्धि का एकमात्र आधार नहीं हो सकता।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 109, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (IEA) की धारा 106 के समतुल्य है। दोनों के शब्दांकन एवं दोनों दृष्टांतों में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 106 में यह उपबंधित है कि जब कोई तथ्य किसी व्यक्ति के विशेष ज्ञान में हो, तो उस तथ्य को साबित करने का भार उसी व्यक्ति पर होगा।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 106 लागू की, क्योंकि घटना भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के प्रवृत्त होने से पूर्व घटित हुई थी ।
- त्रिमुख मारोती किरकन बनाम महाराष्ट्र राज्य (2006) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि धारा 106 के अंतर्गत गृह के अंतःवासियों पर यह दायित्व अध्यारोपित होता है कि वे गृह के भीतर घटित अपराध की परिस्थितियों का स्पष्टीकरण दें। गृह के अंतःवासी मौन रहकर यह तर्क नहीं दे सकते कि संपूर्ण भार अभियोजन पक्ष पर है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 118 क्या है?
बारे में:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 118 दहेज मृत्यु के संबंध में उपधारणा से संबंधित है।
- यह तब लागू होती है, जब यह प्रश्न विचाराधीन हो कि किसी व्यक्ति ने किसी महिला की दहेज मृत्यु कारित की है या नहीं तथा यह दर्शाया गया हो कि उसकी मृत्यु से ठीक पूर्व उस व्यक्ति ने दहेज की माँग के संबंध में अथवा उसके संबंध में उस महिला के साथ क्रूरता या उत्पीड़न किया था।
- ऐसी स्थिति में न्यायालय यह उपधारणा करेगा कि उक्त व्यक्ति ने दहेज मृत्यु कारित की है।
प्रमुख विशेषताएँ:
- अनिवार्य उपधारणा: “उपधारणा करेगा” (Shall Presume) शब्दों के प्रयोग से यह उपधारणा अनिवार्य हो जाती है, बशर्ते इसके आधारभूत तथ्य साबित कर दिये गए हों। तथापि, अभियुक्त को इस उपधारणा का खंडन करने का अवसर प्राप्त रहता है।
- दहेज मृत्यु का अर्थ: “दहेज मृत्यु” का वही अर्थ है, जो भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) की धारा 80 में दिया गया है। इससे पूर्व यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 304ख के अंतर्गत उपबंधित थी।
- “मृत्यु से ठीक पूर्व”: क्रूरता अथवा उत्पीड़न और मृत्यु के बीच निकट एवं जीवंत संबंध होना आवश्यक है।
- अभियुक्त पर भार का स्थानांतरण: अभियोजन पक्ष द्वारा आधारभूत तथ्यों को साबित कर दिये जाने के पश्चात् अभियुक्त पर इस वैधानिक उपधारणा का खंडन करने का भार आ जाता है।
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 113ख:
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) की धारा 118, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 113ख के समतुल्य है।
- वर्तमान मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अभियुक्तगण भारतीय साक्ष्य अधिनियम (IEA) की धारा 113ख के अंतर्गत उत्पन्न उपधारणा का खंडन करने में विफल रहे।