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आपराधिक कानून

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क लागू होने के लिये अम्ल से जलने के प्रभाव का दीर्घकालिक होना आवश्यक है

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 02-Nov-2026

तीरथराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य 

“क्षति का आहत शारीरिक अंग पर कोई स्थायी प्रभाव होना आवश्यक है।” 

न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी ने तीरथराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अपीलार्थी की भारतीय दण्ड संहिता (IPC) की धारा 326क (अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 124(1)) के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया तथा इसके स्थान पर उसे भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1)) के अंतर्गत दोषसिद्ध ठहराया। अपीलार्थी धारा 324 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत निर्धारित अधिकतम दंडावधि से अधिक समय कारागार में व्यतीत कर चुका था; अतः न्यायालय ने उसको छोड़ने का आदेश दिया।  

तीरथराज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • रायबरेली के सेशन न्यायालय ने पीड़ित पर अम्लीय पदार्थ से किये गए हमले के लिये अपीलार्थी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क के अंतर्गत दोषसिद्ध ठहराया। न्यायालय ने उसे निम्नलिखित दंडादेश दिया:   
    • 10 वर्ष का कठोर कारावास, तथा 
    • ₹20,000 का जुर्माना । 
  • अभियोजन के अनुसार: 
    • पीड़ित की गर्दन, सिर, छाती, पीठ, कलाई और जांघ पर जलने के निशान थे , जिससे उसका शरीर लगभग 35% जल गया था । 
    • उसे उपचार के लिये जिला चिकित्सालय भेजा गया था । 
  • अपीलार्थी ने अपनी दोषसिद्धि को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष अपील के माध्यम से चुनौती दी। 
  • साक्ष्यों का अवलोकन करने पर उच्च न्यायालय ने पाया कि: 
    • ऐसा कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं था, जिससे यह प्रमाणित हो कि पीड़ित ने इसके पश्चात् कोई और उपचार प्राप्त किया था। 
    • क्षतियों की प्रकृति अथवा उनके किसी स्थायी प्रभाव के संबंध में किसी विशेषज्ञ की चिकित्सकीय राय प्राप्त नहीं की गई थी। 
    • घटना के 13 दिन पश्चात्, अर्थात् 30 मार्च 2017 को जारी चिकित्सकीय प्रमाण-पत्र में पीड़ित के शरीर के किसी भी भाग पर न तो कोई क्षति और न ही कोई दृश्य चिह्न दर्ज किया गया था । 
  • यह घटना वर्ष 2017 में, भारतीय न्याय संहिता के 1 जुलाई 2024 को प्रवृत्त होने से पूर्व घटित हुई थी। अतः मामले का निर्णय भारतीय दण्ड संहिता के उपबंधों के अंतर्गत किया गया । 

उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न: 

क्या ऐसी साधारण दग्ध क्षति, जो 13 दिनों के भीतर बिना किसी दृश्य चिह्न अथवा कार्यात्मक अक्षमता के ठीक हो जाती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1)) के अर्थ में “जलना” (Burns) मानी जाएगी?   

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

क्षतियों की प्रकृति के संबंध में:  

  • न्यायालय ने पाया कि पीड़ित की क्षतियाँ 13 दिनों के भीतर ठीक हो गई थीं तथा शरीर पर कोई दृश्य चिह्न शेष नहीं रहा था और न ही कोई कार्यात्मक अक्षमता उत्पन्न हुई थी। 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1)) के अंतर्गत “जलने” के अर्थ के संबंध में:  

  • इस उपबंध में कई प्रकार की क्षतियाँ सूचीबद्ध हैं, जिनमें स्थायी क्षति, आंशिक क्षति, विकृति, जलना, अंगभंग, विरूपण, अक्षमता अथवा गंभीर चोट सम्मिलित हैं। 
  • न्यायालय ने कहा कि “जलना” शब्द अस्पष्ट है। किसी व्यक्ति को विभिन्न तीव्रताओं की जलन का अनुभव हो सकता है तथा इस उपबंध में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि दग्ध क्षति कितनी गंभीर अथवा व्यापक होनी चाहिये। 
  • Ejusdem Generis (सजातीय वर्ग का सिद्धांत) के सिद्धांत को लागू करते हुए न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि “जलना” शब्द की स्वतंत्र रूप से व्याख्या नहीं की जा सकती। इसे उक्त उपबंध में उल्लिखित अन्य क्षतियों के संदर्भ में समझा जाना आवश्यक है। 
  • अन्य क्षतियों से यह संकेत मिलता है कि क्षति इतनी गंभीर होनी चाहिये कि उससे प्रभावित शारीरिक अंग की संरचना में परिवर्तन हो अथवा उस पर पर्याप्त लंबी अवधि तक गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़े। 
  • अतः क्षति का आहत शारीरिक अंग पर कोई स्थायी प्रभाव होना आवश्यक है। 
  • ऐसी साधारण दग्ध क्षति, जो 13 दिनों के भीतर बिना किसी दृश्य चिह्न अथवा कार्यात्मक अक्षमता के ठीक हो जाती है, भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क के अर्थ में “जलना” नहीं है।  
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1) में भी क्षतियों की वही सूची दी गई है, जिसमें “जलना” शब्द सम्मिलित है। अतः न्यायालय द्वारा अपनाई गई यह व्याख्या भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत आने वाले मामलों पर भी समान रूप से लागू होगी। 

अपीलार्थी के वैकल्पिक दायित्व के संबंध में: 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क के अंतर्गत अपराध सिद्ध न पाए जाने के पश्चात् न्यायालय ने विचार किया कि क्या अपीलार्थी फिर भी उपहति कारित करने के अपराध के लिये उत्तरदायी था । 
  • साक्ष्यों से पता चला कि अपील करने वाले ने पीड़ित पर कोई संक्षारक पदार्थ डाला था और उसे उपहति कारित हुई थी । 
  • अतः न्यायालय ने पाया कि खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करने के अपराध के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 (अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1)) के अंतर्गत अपीलार्थी का दायित्व बनता है। 

जारी किये गए निर्देश: 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि को अपास्त कर दिया गया तथा अपीलार्थी को भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के अंतर्गत दोषसिद्ध ठहराया गया। 
  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के अधीन अधिकतम 3 वर्ष के कारावास अथवा जुर्माने अथवा दोनों का दण्ड निर्धारित है।  
  • अपीलार्थी पहले ही 3 वर्ष से अधिक समय तक कारावास में रह चुका था, इसलिये: 
    • उसे जुर्माने की राशि जमा करने की आवश्यकता नहीं थी, और 
    • यदि वह किसी अन्य मामले में अपेक्षित न हो, तो उसे छोड़ने का आदेश दिया गया। 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क और भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1) क्याहै? 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क के संबंध में: 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क अम्ल आदि के उपयोग द्वारा स्वेच्छया गंभीर उपहति कारित से संबंधित है। इसे न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा समिति की सिफारिशों के पश्चात् आपराधिक विधि (संशोधन) अधिनियम, 2013 द्वारा सम्मिलित किया गया था। 
  • इस उपबंध के अंतर्गत कोई व्यक्ति तब उत्तरदायी होगा, जब वह:  
    • किसी व्यक्ति के शरीर के किसी भाग को स्थायी या आंशिक क्षति पहुँचाता है अथवा उसमें विकृति उत्पन्न करता है, या 
    • शरीर के किसी भाग को जलाता है, अंगभंग करता है, विरूपित करता है अथवा उसे अक्षम बनाता है, या 
    • घोर उपहति कारित करने से है, 
    • और ऐसा उस व्यक्ति पर अम्ल फेंककर, उसे अम्ल पिलाकर अथवा किसी अन्य साधन का उपयोग करके करता है,   
    • तथा ऐसा करने का आशय ऐसी क्षति अथवा उपहति कारित करने का हो, अथवा उसे यह ज्ञान हो कि ऐसी क्षति अथवा उपहति कारित होना संभाव्य है। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1) के संबंध में:  

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(1), भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326क का प्रतिस्थापन करती है तथा इसके मूल तत्त्वों को यथावत् बनाए रखती है। 
  • इसमें एक अतिरिक्त परिणाम जोड़ा गया है, अर्थात् किसी व्यक्ति को स्थायी वानस्पतिक अवस्था (Permanent Vegetative State) में पहुँचा देना।   
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 124(2) में अम्ल फेंकने अथवा अम्ल फेंकने का प्रयास करने के अपराध का उपबंध किया गया है। यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326ख का प्रतिस्थापन करती है तथा इसके अंतर्गत 5 से 7 वर्ष तक का कारावास और जुर्माने का दण्ड निर्धारित है। 

दण्ड (दोनों उपबंधों के अंतर्गत समान): 

  • कम-से-कम 10 वर्ष का कारावास, जिसकी अवधि आजीवन कारावास तक बढ़ाई जा सकती है, तथा जुर्माना। 
  • जुर्माने की राशि पीड़ित के चिकित्सकीय व्ययों की पूर्ति के लिये न्यायसंगत एवं युक्तियुक्त होनी चाहिये। 
  • अधिरोपित किया गया कोई भी जुर्माना पीड़ित को संदत्त किया जाएगा। 

प्रमुख विशेषताएँ:  

  • अम्ल के अंतर्गत ऐसा कोई भी पदार्थ सम्मिलित है, जो अम्लीय, संक्षारक अथवा दाहक प्रकृति का हो तथा शारीरिक क्षति कारित करने में सक्षम हो, जिसके परिणामस्वरूप निशान, विरूपण अथवा अस्थायी या स्थायी अक्षमता उत्पन्न हो सकती है। 
  • स्थायी या आंशिक क्षति अथवा विकृति का अपरिवर्तनीय होना आवश्यक नहीं है। 
  • भारतीय न्याय संहिता में इन दोनों स्पष्टीकरणों को यथावत् बनाए रखा गया है। 
  • यह संज्ञेय, अजमानतीय एवं अशमनीय अपराध है, जिसका विचारण सेशन न्यायालय द्वारा किया जाता है। 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 और भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1) क्या है? 

भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 के संबंध में: 

  • भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति कारित करने के अपराध के लिये दण्ड का उपबंध करती है। 
  • यह धारा उन मामलों में लागू होती है, जहाँ भारतीय दण्ड संहिता की धारा 334 (गंभीर एवं अचानक प्रकोपन) के अंतर्गत आने वाले मामलों को छोड़कर, निम्नलिखित साधनों द्वारा उपहति कारित की जाती है:  
    • गोली चलाने, भोंकने अथवा काटने के लिए प्रयुक्त कोई आयुध, 
    • ऐसा कोई आयुध, जिसे अपराध के आयुध के रूप में प्रयुक्त किये जाने पर मृत्यु कारित होने की संभावना हो, 
    • अग्नि अथवा कोई तप्त पदार्थ, 
    • कोई विष अथवा संक्षारक पदार्थ (Corrosive Substance), 
    • कोई भी विस्फोटक पदार्थ, 
    • ऐसा कोई पदार्थ, जिसका श्वास द्वारा अंतर्ग्रहण करने, निगलने अथवा रक्त में पहुँचने से हानि हो सकती हो, या 
    • कोई पशु। 
  • दण्ड : अधिकतम 3 वर्ष तक का कारावास, अथवा जुर्माना, अथवा दोनों। जुर्माने की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की गई है। 

भारतीय न्याय संहिता की धारा 118 (1) के संबंध में:  

  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(1), भारतीय दण्ड संहिता की धारा 324 का प्रतिस्थापन करती है तथा इसमें खतरनाक आयुधों और साधनों की वही सूची बनाए रखी गई है। 
  • इसमें अपवाद के रूप में अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 122(1) (गंभीर एवं अचानक प्रकोपन के कारण उपहति कारित करना) का संदर्भ दिया गया है, जो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 334 का प्रतिस्थापन करती है। 
  • दण्ड: अधिकतम 3 वर्ष तक का कारावास, अथवा ₹20,000 तक का जुर्माना, अथवा दोनों। 
  • भारतीय न्याय संहिता की धारा 118(2) में खतरनाक आयुधों या साधनों द्वारा घोर उपहति कारित करने के अपराध का उपबंध किया गया है। यह भारतीय दण्ड संहिता की धारा 326 का प्रतिस्थापन करती है।