- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
सिविल कानून
यदि कोई पक्षकार प्रतिकूल रूप से प्रभावित हुआ हो तो वह सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति मांग सकता है
« »31-Oct-2026
|
गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (मृत) विधि प्रतिनधि और अन्य द्वारा "वाद का पक्षकार न होना, अपील करने का अप्रतिबंधित अधिकार प्रदान नहीं करता है।" न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (मृत) विधिक प्रतिनधि और अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने गुजरात उच्च न्यायालय के उस आदेश के विरुद्ध दायर अपील को खारिज कर दिया, जिसमें गैर-पक्षकारों को सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति दी गई थी। न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि यदि समझौता डिक्री किसी अजनबी के अधिकारों या हितों को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करती है, तो उसे अपील करने से नहीं रोका जा सकता।
गिरीशभाई नटवरलाल पटेल बनाम गौतम पंजाबभाई पालखीवाला (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद गुजरात में एक भूखंड से संबंधित था।
- एक सहकारी आवास समिति ने विक्रय करार के आधार पर मूल स्वामी के विधिक वारिसों के विरुद्ध विनिर्दिष्ट पालन के लिये वाद दायर किया।
- यह वाद सोसाइटी के पक्ष में एक समझौते के डिक्री के साथ समाप्त हुआ।
- 2020 में, डिक्री को लागू किया गया और एक कोर्ट कमिश्नर के माध्यम से अपीलकर्त्ता पटेल के पक्ष में एक विक्रय विलेख निष्पादित किया गया, जिसमें सोसाइटी एक पुष्टिकरण पक्षकार के रूप में शामिल हुई।
- नौ व्यक्तियों (प्रत्यर्थी संख्या 1-9) ने, भूमि के मूल क्रेता से संबद्ध हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के माध्यम से अधिकार का दावा करते हुए, गुजरात उच्च न्यायालय का रुख किया। उन्होंने निम्नलिखित अभिकथन किये:
- सहमति डिक्री तथा उसके पश्चात् की गई कार्यवाहियाँ कपट एवं मिलीभगत का परिणाम थीं।
- मूल विक्रेता के विधिक उत्तराधिकारियों के पास संपत्ति का अंतरण करने हेतु कोई विद्यमान स्वत्व (Subsisting Title) शेष नहीं था।
- इस कार्यवाही से उनके अधिकारों को नुकसान पहुँचा था।
- उन्होंने सूचना का अधिकार (RTI) प्रक्रिया के अधीन प्राप्त दस्तावेजों पर विश्वास किया, जिनसे कथित तौर पर अपीलकर्त्ता का सोसाइटी के साथ घनिष्ठ संबंध प्रदर्शित होता है, जिसमें 2002-2003 में इसके अध्यक्ष के रूप में उनका पद भी सम्मिलित है।
उच्च न्यायालय के समक्ष कार्यवाही:
- उच्च न्यायालय ने एकपक्षीय अंतरिम व्यादेश जारी करते हुए अपीलकर्त्ता को विवादित संपत्ति में प्रवेश करने, उसका विक्रय करने, अंतरण करने, बंधक रखने, पट्टे पर देने अथवा उसमें किसी तृतीय पक्ष के अधिकार सृजित करने से प्रतिबंधित कर दिया।
- तत्पश्चात् उच्च न्यायालय ने:
- व्यादेश को जारी रखा।
- लगभग 11 वर्षों के विलंब को माफ कर दिया।
- प्रत्यर्थी संख्या 1–9 को सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति प्रदान की।
- इससे व्यथित होकर अपीलकर्त्ता ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
धारा 96(3) और आदेश 23 के अधीन वर्जन के विस्तार के संबंध में:
- सहमति डिक्री से उत्पन्न विबंध (Estoppel) केवल डिक्री के पक्षकारों के मध्य प्रभावी होता है, न कि ऐसे बाहरी व्यक्ति के विरुद्ध, जो कभी भी उस डिक्री का पक्षकार नहीं था।
- ऐसा व्यक्ति, जो न तो मूल कार्यवाही का पक्षकार था और न ही समझौते का, केवल इस आधार पर डिक्री के प्रति सहमत माना जा सकता कि अन्य व्यक्तियों ने अपनी सहमति प्रदान की थी।
- ऐसे व्यक्ति को सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96(3) के साथ आदेश 23 नियम 3 और 3क के साथ पढ़ने पर, ऐसे व्यक्ति के अपील करने पर कोई वर्जन लागू नहीं होता, क्योंकि ये उपबंध केवल समझौते के पक्षकारों तक सीमित हैं।
गैर-पक्षकार के अपील करने के अधिकार की सीमाओं के संबंध में:
- वाद का पक्षकार न होना, अपील करने का अप्रतिबंधित अधिकार प्रदान नहीं करता है।
- गैर-पक्षकार को:
- प्रथमदृष्टया यह दर्शाना होगा कि आक्षेपित डिक्री उसके अधिकारों अथवा हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है।
- गैर-पक्षकारों द्वारा अपील किये जाने को नियंत्रित करने वाले स्थापित सिद्धांतों के अधीन अपीलीय न्यायालय से अपील करने की अनुमति प्राप्त करनी होगी।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 के अधीन अपील करने के लिए कौन सक्षम है:
न्यायालय ने संक्षेप में स्पष्ट किया कि धारा 96 के अधीन निम्नलिखित व्यक्ति अपील प्रस्तुत कर सकते हैं:
- वाद का कोई भी ऐसा पक्षकार, जिस पर डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ा हो अथवा यदि ऐसा पक्षकार मृत हो, तो उसका विधिक प्रतिनिधि।
- ऐसे पक्षकार के हित का कोई भी अंतरिती, जो उस हित की सीमा तक डिक्री से आबद्ध हो।
- किसी गैर-पक्षकार को केवल अपीलीय न्यायालय की अनुमति से ही अनुमति दी जा सकती है। अनुमति तब दी जानी चाहिये जब व्यक्ति:
- निर्णय से व्यथित हो अथवा जिस पर निर्णय का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता हो।
- सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 11 के स्पष्टीकरण 6 के अधीन इसे पूर्व-न्याय के रूप में माना जाएगा और यह इससे बाध्य होगा।
- आदेश से आबद्ध हो अथवा उससे व्यथित हो।
- सामान्य नियम के रूप में, ऐसे व्यक्ति को अपील की अनुमति देने से इंकार नहीं किया जाएगा, जिसे मूल कार्यवाही में पक्षकार बनाया जा सकता था।
- किसी व्यक्ति पर डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है या नहीं, यह तथ्य का प्रश्न है, जिसका निर्धारण प्रत्येक मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाएगा।
सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील की अनुमति प्रदान करने की कसौटी के संबंध में:
- सहमति डिक्री के विरुद्ध अपील करने की अनुमति हेतु प्रस्तुत आवेदन की जांच उन्हीं सिद्धांतों के आधार पर की जानी चाहिये, जो न्यायनिर्णयन के पश्चात् पारित सामान्य डिक्री को चुनौती देने वाले गैर-पक्षकार पर लागू होते हैं।
- निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या आवेदक ने ऐसा विधिक रूप से मान्य हित दर्शाया है, जिस पर आक्षेपित डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
- यह तथ्य कि डिक्री सहमति डिक्री है, न तो इस आवश्यकता को समाप्त करता है और न ही अपने आप में अपील की अनुमति प्रदान किये जाने पर कोई रोक लगाता है।
मामले के तथ्यों के संबंध में:
- केवल इस सीमित प्रयोजन के लिये कि क्या वे अपील की अनुमति माँगने के अधिकारी हैं, अभिलेख पर उपलब्ध सामग्री से यह परिलक्षित हुआ कि प्रत्यर्थी संख्या 1–9 ने ऐसे विधिक रूप से मान्य हित का दावा किया था, जिस पर सहमति डिक्री का प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता था।
- मूल वाद अथवा समझौते का पक्षकार न होना, अपने आप में उन्हें अपील की अनुमति माँगने के अधिकार से वंचित नहीं करता, विशेषकर तब, जब डिक्री कथित रूप से उनके स्वतंत्र अधिकारों को प्रभावित करती हो।
- अतः उच्च न्यायालय द्वारा अपील करने की अनुमति प्रदान करना न्यायोचित था।
स्पष्टीकरण:
- यह निष्कर्ष केवल डिक्री को चुनौती देने के लिये प्रत्यर्थियों की विधिक स्थिति तथा अपीलीय न्यायिक परीक्षण की आवश्यकता तक सीमित था।
- यह निष्कर्ष न तो भूमि पर उनके दावे के गुण-दोषों के संबंध में कोई राय थी और न ही कपट एवं मिलीभगत के आरोपों की सत्यता के संबंध में। इन प्रश्नों का निर्णय विधि के अनुसार किया जाना आवश्यक है।
निर्णय:
- उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा गया और अपील खारिज कर दी गई।
सहमति डिक्री क्या है?
- सहमति डिक्री (या समझौता डिक्री) न्यायालय द्वारा पक्षों के बीच वैध समझौते या सुलह के आधार पर पारित की गई डिक्री है, न कि मामले की खूबियों पर निर्णय लेने के बाद।
- यह मूलतः पक्षों के बीच न्यायालय की मुहर लगा हुआ एक अनुबंध है। यह पक्षों को बाध्य करता है और उनके बीच एक निषेधात्मक नियम के रूप में कार्य करता है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 96 क्या है?
धारा 96 – मूल डिक्री से अपील:
- धारा 96(1): जब तक कि इस संहिता अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा स्पष्ट रूप से अन्यथा उपबंधित न किया गया हो, मूल अधिकारिता का प्रयोग करने वाले न्यायालय द्वारा पारित प्रत्येक डिक्री के विरुद्ध अपील की जा सकेगी। ऐसी अपील उस न्यायालय में प्रस्तुत की जाएगी, जिसे उक्त न्यायालय के निर्णयों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने का प्राधिकार प्राप्त है।
- धारा 96(2s): एकपक्षीय पारित मूल डिक्री के विरुद्ध भी अपील की जा सकती है।
- धारा 96(3): पक्षकारों की सहमति से न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी।
- धारा 96(4): ऐसे वाद में पारित डिक्री के विरुद्ध कोई अपील नहीं की जा सकेगी, जिसकी सुनवाई लघुवाद न्यायालय द्वारा की जा सकती है, जहाँ मूल वाद की विषय-वस्तु की रकम अथवा मूल्य दस हजार रुपये से अधिक न हो। इसका एकमात्र अपवाद विधि के किसी प्रश्न पर अपील है।