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सांविधानिक विधि

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) के शिक्षकों को वर्षों तक संविदा पर नियोजित रखना अनुच्छेद 23 के अधीन बलात् श्रम है

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 31-Oct-2026

श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"शिक्षकों को दिया जाने वाला मानदेय अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिये निर्धारित मानदेय से भी कम है।" 

न्यायमूर्ति पंकज भाटिया 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज भाटिया ने श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों (KGBV) के शिक्षकों को वर्षों तक अल्प वेतन पर संविदा के आधार पर नियुक्त बनाए रखना तथा पदों के सृजन अथवा उनके नियमितीकरण की दिशा में कोई कदम न उठाना, संविधान के अनुच्छेद 23 के अधीन बलात् श्रम के समान है। न्यायालय ने राज्य सरकार को पदों को स्वीकृत करने, नियमित शिक्षकों के समकक्ष सेवा शर्तें निर्धारित करने तथा चार माह के भीतर नियमितीकरण संबंधी दावों पर विचार करने का निर्देश दिया। 

श्रीमती अर्चना बूध बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) योजना के संबंध में: 

  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) योजना 2004 में सर्व शिक्षा अभियान के अधीन शुरू की गई थी। 
  • यह ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों की लड़कियों को आवासीय शिक्षा प्रदान करता है। 
  • बाद में इसका विलय समग्र शिक्षा में कर दिया गया। 
  • शिक्षकों की नियुक्ति सर्वप्रथम 10 जुलाई 2009 को जारी एक विज्ञापन के माध्यम से आयोजित चयन प्रक्रिया द्वारा की गई थी। तब से, उन्हें मानदेय पर वर्ष-दर-वर्ष संविदा के आधार पर नियुक्त किया जाता रहा है। 

याचिकाकर्त्ताओं के संबंध में: 

  • मुख्य रिट याचिका में याचिकाकर्त्ता 11 जनवरी 2010 से एक कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में काम कर रहा है, जिसकी संविदा समय-समय पर नवीनीकृत की जा रही है। 
  • रीता वर्मा और 376 अन्य लोगों द्वारा दायर की गई संबंधित याचिका में, 270 याचिकाकर्त्ताओं ने 10 वर्षों से अधिक समय तक सेवा की थी, और बाकी ने कम अवधि के लिये। 
  • अंशकालिक शिक्षकों को प्रति माह 12,790 रुपए का मानदेय मिलता है। 25% EPF कटौती के बाद, 9,592 रुपए शेष बचते हैं। 

सरकारी आदेशों के अधीन नियुक्ति की शर्तें: 

  • शिक्षकों को 11 महीने और 29 दिनों के लिये नियुक्त किया जाता है, और अगले शैक्षणिक वर्ष से पहले एक दिन का अंतराल होता है। 
  • यदि सेवाएं असंतोषजनक हों या उनकी अब आवश्यकता न हो तो संविदाओं का नवीनीकरण नहीं किया जाता है। 
  • सेवाएं एक महीने के नोटिस पर या, अत्यंत गंभीर मामलों में, बिना नोटिस के समाप्त की जा सकती हैं। 

याचिकाकर्त्ताओं के तर्क: 

  • अधिकांश याचिकाकर्त्ताओं ने किसी अन्य सेवा में प्रवेश करने की आयु सीमा पार कर ली है, और राज्य ने नौकरी की सुरक्षा से वंचित करके उनकी इस कमजोरी का फायदा उठाया है। 
  • उनके कर्त्तव्य उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा (शिक्षक) सेवा नियम, 1981 के अधीन आने वाले शिक्षकों के समान हैं, जिन्हें राज्य द्वारा संचालित और सहायता प्राप्त स्कूलों में सांविधिक वेतन और संरक्षण प्राप्त होता है। 
  • चूँकि राज्य ने शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act) के साथ पठित संविधान के अनुच्छेद 21-क के अधीन अपने दायित्व का निर्वहन करने के लिये इन विद्यालयों की स्थापना की है, इसलिये उसका यह दायित्व है कि वह इस कार्य में सहायता करने वाले शिक्षकों को युक्तियुक्त सेवा शर्तें प्रदान करे। 
  • 9 अप्रैल 2026 के एक सरकारी आदेश द्वारा, राज्य ने निम्नलिखित व्यक्तियों के मानदेय में वृद्धि की: 
    • प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में शिक्षा मित्रों और अंशकालिक प्रशिक्षकों का वेतन 10,000 रुपए से लेकर 18,000 रुपए प्रति माह तक है। 
    • अंशकालिक शिक्षकों को 9,000 रुपये से लेकर 17,000 रुपए प्रति माह तक का वेतन दिया जाएगा (जो साल में 11 महीनों के लिये देय होगा)। 
  • याचिकाकर्त्ताओं द्वारा प्रति माह 17,000 रुपए की मांग वाला अपना निवेदन भी अनिर्णित रहा। 

राज्य के तर्क: 

  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों के लिये कोई पद स्वीकृत नहीं किये गए थे। 
  • यह संविदा योजना की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो गया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

याचिकाकर्त्ताओं के कार्य की प्रकृति के संबंध में: 

  • याचिकाकर्त्ताओं की नियुक्ति चयन प्रक्रिया के बाद की गई थी। 
  • मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अध्ययन, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 और शिक्षा मंत्रालय द्वारा समग्र शिक्षा को लागू करने के लिये तैयार किये गए ढाँच में यह मान्यता दी गई है कि राज्य द्वारा संचालित और सहायता प्राप्त स्कूलों में नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों की भूमिका के समान ही उनकी भी भूमिका होती है। 
  • ऐसा कोई सबूत नहीं था जिससे यह साबित हो सके कि उनका काम किसी भी प्रकार से अलग था। 

इस अभिवचन पर कि कोई पद अस्तित्व में नहीं थे और संविदा योजना के साथ ही समाप्त हो गई थी: 

  • न्यायालय ने इस याचिका को निम्नलिखित कारणों से खारिज कर दिया: 
    • यह योजना दो दशकों से अधिक समय से चल रही है। 
    • यह कार्य शाश्वत प्रकृति का है। 
    • शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 8(घ) के अधीन राज्य शिक्षण स्टाफ उपलब्ध कराने के लिये बाध्य है। 

शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की प्रयोज्यता के संबंध में: 

  • कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) धारा 2(ढ) के अधीन “स्कूल” की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं। 
  • धारा 7(1) के अधीन वित्त पोषण केंद्र और राज्यों की समवर्ती जिम्मेदारी है, लेकिन धारा 7(5) के अधीन राज्य सरकार अधिनियम को लागू करने के लिये धन उपलब्ध कराने के लिये उत्तरदायी है। 
  • धारा 8 के अधीन उपयुक्त सरकार को निम्नलिखित कार्य करने के लिये बाध्य किया गया है: 
    • शिक्षण स्टाफ उपलब्ध कराएं। 
    • निर्धारित मानकों के अनुरूप उच्च गुणवत्ता वाली प्राथमिक शिक्षा सुनिश्चित करना। 
    • यह सुनिश्चित करना कि कमजोर वर्गों और वंचित समूहों के बालकों के साथ विभेद न हो। 

वंचित छात्रों के विरुद्ध विभेद के संबंध में: 

  • सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में छात्रों को अच्छी तनख्वाह पाने वाले शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है, जबकि कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में वंचित छात्रों को असुरक्षित परिस्थितियों में काम करने वाले कम वेतन पाने वाले शिक्षकों द्वारा पढ़ाया जाता है। 
  • न्यायालय ने इसे कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) में पढ़ने वाले वंचित छात्रों के विरुद्ध स्पष्ट विभेद माना। 

कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों के कर्त्तव्यों और सुरक्षा के संबंध में: 

  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 23 से 28 के अधीन, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों और अन्य राज्य-संचालित स्कूलों के शिक्षकों के समान कर्त्तव्य और दायित्व हैं। 
  • यद्यपि, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) शिक्षकों को धारा 24(2) के परंतुक का लाभ भी नहीं मिलता है, जिसके अधीन अनुशासनात्मक कार्रवाई से पहले सुनवाई का उचित अवसर मिलना आवश्यक है। 
  • शिक्षा का अधिकार नियम, 2010 के नियम 20 के अनुसार, पेशेवर और स्थायी कैडर बनाने के लिए सेवा शर्तों को अधिसूचित करना अनिवार्य है। KGBV शिक्षकों के लिये ऐसे कोई नियम नहीं बनाए गए हैं, जिनकी नियुक्ति, वेतन और सेवा शर्तें अभी भी सरकारी आदेशों द्वारा शासित हैं। 

मानदेय की अपर्याप्तता के संबंध में: 

  • शिक्षकों को दिया जाने वाला मानदेय अर्ध-कुशल श्रमिकों के लिये निर्धारित मानदेय से भी कम है है। 
  • न्यायालय ने टिप्पणी की कि इसे "मानदेय" कहना एक क्रूर मजाक है। 

साधनों की शुद्धता के सिद्धांत के संबंध में: 

  • मिनर्वा मिल्स लिमिटेड बनाम भारत संघ के मामले का हवाला देते हुए, न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि एक प्रशंसनीय लक्ष्य असांविधानिक साधनों को उचित नहीं ठहराता है। 
  • वंचित विद्यार्थियों, विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा प्रदान करना प्रशंसनीय उद्देश्य है तथा शिक्षा मंत्रालय और NCERT की रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि इस उद्देश्य की प्राप्ति में पर्याप्त सफलता मिली है। 
  • तथापि, इसके लिये अपनाए गए साधन न्यायोचित नहीं हैं: 
  • शिक्षकों को अपर्याप्त वेतन का भुगतान किया गया है । 
    • उन्हें किसी भी प्रकार की सेवा-सुरक्षा से वंचित रखा गया है। 
    • उन्हें वर्षों तक अल्प मानदेय पर नियुक्त बनाए रखा गया है तथा उनके नियमितीकरण की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया है। 
  • शिक्षकों को 11 माह और 29 दिनों के लिए नियुक्त करना तथा एक दिन का अंतराल देकर पुनः नियुक्त करना और यह उपबंध करना कि यदि उनकी सेवाओं की आवश्यकता नहीं होगी तो बिना किसी सूचना के उनके संविदा का नवीनीकरण नहीं किया जाएगा, संविधान के भाग III के प्रावधानों के असंगत है तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम का उल्लंघन करता है। 

अनुच्छेद 14 और 23 पर निष्कर्ष: 

  • याचिकाकर्त्ताओं को वर्षों तक संविदा पर बनाए रखना, बिना पद सृजित किये, उन्हें स्थायी रूप से समायोजित किये या नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के समान वेतन दिये बिना, अनुच्छेद 23 द्वारा प्रतिषिद्ध बलात् श्रम का एक रूप है। 
  • यह संविधान के भाग 3 के अधीन याचिकाकर्त्ताओं के अनुच्छेद 14 एवं 23 द्वारा प्रदत्त अधिकारों का उल्लंघन करता है तथा भाग 4 में निहित राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के असंगत है। 

जारी किये गए निर्देश: 

  • राज्य सरकार चार महीने के भीतर निम्नलिखित कार्य करेगी: 
    • शिक्षा का अधिकार अधिनियम की अनुसूची को ध्यान में रखते हुए, उत्तर प्रदेश के KGBV के लिये शिक्षकों के पदों का सृजन करेगी। 
    • सभी KGBV शिक्षकों, जिनमें याचिकाकर्त्ता भी सम्मिलित हैं, के लिये नियमित रूप से नियुक्त शिक्षकों के समकक्ष, इंटरमीडिएट स्तर तक सेवा की शर्तें निर्धारित करेगी। 
    • नवसृजित पदों के विरुद्ध नियमितीकरण संबंधी दावों पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा, संबंधित शिक्षकों की अर्हताओं एवं उनकी सेवा की अवधि को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाएगा। 
    • मानदेय को समय-समय पर संशोधित करेगी, जिससे उसे अपने तथा सहायता प्राप्त विद्यालयों के शिक्षकों के वेतन के समकक्ष लाया जा सके। 
  • उपर्युक्त कदम उठाए जाने तक:  
    • सभी KGBV शिक्षकों, जिनमें याचिकाकर्त्ता भी सम्मिलित हैं, को निर्णय की तिथि से ₹17,000 प्रतिमाह का भुगतान किया जाएगा। 
    • वे शिक्षा का अधिकार अधिनियम की धारा 24(2) के अधीन अपनी सेवाओं के संरक्षण के हकदार होंगे। 
  • वित्तपोषण के संबंध में: 
    • सहमति के अनुसार व्यय में अपना हिस्सा वहन करने का उत्तरदायित्व केंद्र सरकार का है। 
    • राज्य सरकार यह तर्क नहीं दे सकती कि इन निर्देशों का क्रियान्वयन केंद्रीय निधि प्राप्त होने तक स्थगित रखा जाए। राज्य सरकार "भुगतान करो और वसूल करो" के सिद्धांत के आधार पर केंद्र सरकार से उसका हिस्सा वसूल कर सकती है। 
    • रिट याचिकाओं का निपटारा कर दिया गया। 

भारतीय संविधान (COI) का अनुच्छेद 23 क्या है? 

अनुच्छेद 23 – मानव के दुर्व्यापार और बलात् श्रम का प्रतिषेध: 

प्रावधान का पाठ: 

  • अनुच्छेद 23(1): मानव का दुर्व्यापार, बेगार तथा इसी प्रकार के अन्य बलात् श्रम के स्वरूप प्रतिषिद्ध हैं। इस उपबंध का कोई भी उल्लंघन विधि के अनुसार दण्डनीय अपराध होगा। 
  • अनुच्छेद 23(2): राज्य लोक प्रयोजनों के लिये अनिवार्य सेवा अधिरोपित कर सकता है। ऐसी सेवा अधिरोपित करते समय राज्य केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग अथवा इनमें से किसी एक के आधार पर कोई विभेद नहीं करेगा। 

प्रमुख विशेषताएँ:  

  • यह अधिकार नागरिकों और गैर-नागरिकों दोनों को उपलब्ध है। 
  • यह व्यक्तियों को राज्य के साथ-साथ निजी व्यक्तियों के विरुद्ध भी संरक्षण प्रदान करता है।  
  • यह राज्य पर मानव दुर्व्यापार तथा बलात् श्रम के अन्य स्वरूपों जैसी शोषणकारी प्रथाओं के उन्मूलन का सकारात्मक दायित्व अधिरोपित करता है। 

स्पष्ट रूप से प्रतिषिद्ध प्रथाएँ: 

  • मानव का दुर्व्यापार  
  • बेगार — किसी व्यक्ति को बिना पारिश्रमिक का भुगतान किए कार्य करने के लिए विवश करना 
  • बलात् श्रम के अन्य समान स्वरूप  

अपवाद – लोक प्रयोजनों के लिये अनिवार्य सेवा: 

  • राज्य सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए अनिवार्य सेवा की मांग कर सकता है, जैसे कि सैन्य सेवा या सामाजिक सेवा। 
  • यह शक्ति केवल धर्म, मूलवंश, जाति या वर्ग के आधार पर विभेद किए जाने के प्रतिषेध के अधीन है।  

न्यायिक निर्णय:  

  • पीपुल्स यूनियन फॉर डेमोक्रेटिक राइट्स बनाम भारत संघ (1982): 
    • उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 23 का विस्तार व्यापक एवं असीमित है।  
    • "बल" के अंतर्गत केवल शारीरिक अथवा विधिक बल ही नहीं, अपितु ऐसी आर्थिक परिस्थितियाँ भी सम्मिलित हैं, जो किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध न्यूनतम मजदूरी से कम पर कार्य करने के लिये विवश करती हैं। 
    • न्यायालय ने सरकार को अनुच्छेद 23 के अधीन प्रदत्त मूल अधिकार का उल्लंघन करने वाले निजी व्यक्तियों को दण्डित करने के लिये आवश्यक कदम उठाने का निदेश दिया।