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आपराधिक कानून
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन परिशांति बनाए रखने हेतु बंधपत्र
«31-Oct-2026
स्रोत: द इंडियन एक्सप्रेस
परिचय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने हाल ही में AISA की नेता नेहा बोरा द्वारा विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SEM) के नोटिस के विरुद्ध दायर याचिका खारिज कर दी। उक्त नोटिस में उन्हें एक जांच के दौरान परिशांति बनाए रखने के लिये ₹10,000 के व्यक्तिगत बंधपत्र के साथ एक प्रतिभू प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था। उन्हें 16 अक्टूबर 2026 को एक विरोध प्रदर्शन के दौरान मंडी हाउस में अभिरक्षा में लिया गया था।
न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उक्त नोटिस SEM की व्यक्तिनिष्ठ संतुष्टि पर आधारित था, जो सामान्य डायरी की प्रविष्टियों, कलंदरा (मामले की पत्रावली) तथा तीन साक्षियों के परीक्षा के पश्चात् निर्मित हुई थी। यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 एवं 130 की अपेक्षाओं की पूर्ति करता था। चूँकि ये कार्यवाहियाँ निवारक प्रकृति की हैं, अतः SEM के लिये तथ्यान्वेषी प्राधिकारी के रूप में कार्य करना आवश्यक नहीं है। कारण बताओ नोटिस के चरण पर उच्च न्यायालय, SEM की संतुष्टि के स्थान पर अपनी संतुष्टि प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।
परिशांति बंधपत्र (Peace Bond) क्या है?
- परिशांति बंधपत्र एक निवारक उपाय है, जिसके माध्यम से ऐसे व्यक्ति को लोक शांति भंग करने से प्रतिबंधित किया जाता है, जिससे लोक शांति भंग करने की आशंका हो।
- ऐसी कार्यवाही प्रारंभ करने के लिये किसी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) अथवा अपराध का होना आवश्यक नहीं है।
- यह व्यवस्था भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अध्याय 9 (धारा 125–143) में उपबंधित है, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 8 के अनुरूप है।
कारण बताओ नोटिस कब जारी किया जा सकता है?
- धारा 126: जब किसी व्यक्ति द्वारा परिशांति भंग किये जाने अथवा लोक भंग किये जाने की आशंका हो।
- धारा 127 (अधिकतम एक वर्ष तक के बंधपत्र के लिये): जब कोई व्यक्ति निम्नलिखित विषय-वस्तु का प्रसार करता है अथवा उसके प्रसार का दुष्प्रेरण करता है:
- भारतीय न्याय संहिता की धारा 152, 196, 197 या 299 के अधीन दण्डनीय मामला।
- ऐसा मामला जिससे किसी न्यायाधीश की मानहानि होती हो अथवा उसे आपराधिक अभित्रास दिया जाता हो।
- अश्लील विषय-वस्तु।
- धारा 128: जब कोई व्यक्ति संज्ञेय अपराध करने के उद्देश्य से अपनी उपस्थिति छिपा रहा हो।
- धारा 129 (अधिकतम तीन वर्ष तक के बंधपत्र के लिये): जब कोई व्यक्ति अभ्यस्त अपराधी हो।
- धारा 130: मजिस्ट्रेट के लिखित आदेश में निम्नलिखित का उल्लेख होना अनिवार्य है:
- प्राप्त सूचना का सार।
- बंधपत्र की राशि।
- बंधपत्र की अवधि।
- प्रतिभुओं की संख्या।
नोटिस के पश्चात् कौन-सी प्रक्रिया अपनाई जाती हैं?
- धारा 131: यदि व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित है, तो आदेश उसे पढ़कर सुनाया जाएगा तथा समझाया जाएगा।
- धारा 132-133: यदि व्यक्ति अनुपस्थित है, तो समन जारी किया जाएगा। यदि व्यक्ति अभिरक्षा में है, तो वारण्ट जारी किया जाएगा। दोनों में से प्रत्येक के साथ धारा 130 के आदेश की एक प्रति संलग्न होना अनिवार्य है।
- धारा 134: मजिस्ट्रेट व्यक्ति की व्यक्तिगत उपस्थिति से छूट प्रदान कर सकता है तथा उसे अधिवक्ता के माध्यम से उपस्थित होने की अनुमति दे सकता है।
- धारा 135 – जांच:
- 135(1): जांच समन मामलों की प्रक्रिया का अनुसरण करती है।
- 135(3): अभिलिखित किए जाने वाले कारणों के आधार पर, मजिस्ट्रेट अंतरिम बंधपत्र की अपेक्षा कर सकता है तथा उसके निष्पादन तक व्यक्ति को अभिरक्षा में रख सकता है। ऐसी शर्तें धारा 130 के आदेश में विनिर्दिष्ट शर्तों से अधिक कठोर नहीं होंगी।
- 135(6): जांच माह के भीतर पूर्ण की जानी अनिवार्य है। अन्यथा कार्यवाहियाँ समाप्त हो जाएँगी, जब तक कि मजिस्ट्रेट उन्हें जारी रखने के लिये विशेष कारण अभिलिखित न करे।
- 135(7): यदि कार्यवाही जारी रखने के लिये अभिलिखित कारण विशेष प्रकृति के नहीं हैं अथवा विकृत हैं, तो सेशन न्यायाधीश ऐसी कार्यवाही को अपास्त कर सकता है।
जांच के पश्चात् क्या होता है?
- धारा 136: यदि बंधपत्र आवश्यक पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट उसके निष्पादन का आदेश देता है।
- बंधपत्र की राशि एवं अवधि, धारा 130 के आदेश में विनिर्दिष्ट राशि एवं अवधि से अधिक नहीं हो सकती।
- बंधपत्र की राशि अत्यधिक नहीं होनी चाहिये।
- यदि संबंधित व्यक्ति बालक है, तो केवल प्रतिभुओं द्वारा ही बंधपत्र निष्पादित किया जाएगा।
- धारा 137: यदि बंधपत्र आवश्यक नहीं पाया जाता है, तो व्यक्ति को अभिरक्षा से मुक्त कर दिया जाएगा अथवा उन्मोचित कर दिया जाएगा।
- धारा 140: मजिस्ट्रेट किसी अनुपयुक्त प्रतिभू को अस्वीकार कर सकता है, किंतु ऐसा करने से पूर्व प्रतिभू की उपयुक्तता के संबंध में जांच करना अनिवार्य है।
क्या परिशांति बंधपत्र आदेश को चुनौती दी जा सकती है?
- पुनरीक्षण (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 438): अंतरिम बंधपत्र के आदेश को सेशन न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण के माध्यम से चुनौती दी जा सकती है।
- अमर नाथ बनाम हरियाणा राज्य (1977): उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि ऐसा आदेश, जो किसी व्यक्ति के अधिकारों को सारतः प्रभावित करता है, अंतर्वर्ती आदेश नहीं है; अतः उसके विरुद्ध पुनरीक्षण वर्जित नहीं है।
- अंकपुत्तस्वामी बनाम पापेगौड़ा (1978): अमर नाथ के निर्णय को लागू करते हुए, कर्नाटक उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि परिशांति बंधपत्र प्रस्तुत करने का निर्देश देने वाला कारण बताओ नोटिस पुनरीक्षण योग्य है।
- अपील (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 414): निम्नलिखित आदेशों के विरुद्ध सेशन न्यायालय में अपील की जा सकती है:
- धारा 136 के अंतर्गत पारित अंतिम आदेश।
- प्रतिभू को अस्वीकार करने संबंधी धारा 140 के अंतर्गत पारित आदेश।
न्यायालयों ने क्या अभिनिर्धारित किया है?
- मधु लिमये बनाम एस.डी.एम. मुंगेर (1970):
- सात न्यायाधीशों की पीठ ने दण्ड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 8 तथा धारा 144 को अनुच्छेद 19 के अंतर्गत युक्तियुक्त निर्बंधनों के रूप में वैध ठहराया।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का परिसीमन केवल विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही किया जा सकता है, न कि मजिस्ट्रेट की मनमानी इच्छा पर।
- अंतरिम बंधपत्र तथा रिमांड अवैध होंगे, जब तक कि जांच वास्तव में प्रारंभ न हो गई हो और प्रथमदृष्टया संतुष्टि अभिलिखित न कर दी गई हो।
- संबंधित व्यक्ति को विधिक परामर्श प्राप्त करने का अधिकार है।
- अलदानिश रेन बनाम राज्य (एनसीटी ऑफ दिल्ली) (2018): दिल्ली उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि रिमांड का आदेश पारित करने से पूर्व विशेष कार्यपालक मजिस्ट्रेटों (SEMs) को मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिये तथा न्यायालय ने पूर्व-मुद्रित अर्थात् प्रारूप-आधारित आदेशों की आलोचना की।
- इश्तकार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2022): उच्चतम न्यायालय अभिनिर्धारित किया कि ये उपबंध निवारक प्रकृति के हैं, न कि दंडात्मक। बंधपत्रों का उद्देश्य लोक शांति बनाए रखना है, न कि राज्य के राजकोष में धन की वृद्धि करना।
क्या परिशांति बंधपत्र बाद में FIR दर्ज किये जाने पर रोक लगाता है?
- अनुच्छेद 20 बाद में FIR दर्ज किए जाने पर रोक नहीं लगाता, क्योंकि शांति बंधपत्र की कार्यवाही निवारक प्रकृति की होती है, जबकि FIR से संबंधित कार्यवाही दंडात्मक प्रकृति की होती है।
- बृज लाल बनाम जम्मू और कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश (2026): उच्च न्यायालय ने इस आधार पर दोहरे दण्ड के आरोप को खारिज कर दिया।
- राम कुमार बनाम तमिलनाडु राज्य (2026): मद्रास उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि केवल FIR का दर्ज होना, परिशांति बंधपत्र के उल्लंघन को निश्चायक रूप से साबित नहीं करता। मजिस्ट्रेट के लिये बंधपत्र के उल्लंघन के संबंध में स्वतंत्र संतुष्टि पर पहुँचना अनिवार्य है।
निष्कर्ष
परिशांति बंधपत्र कार्यपालक मजिस्ट्रेटों को FIR दर्ज किये बिना लोक व्यवस्था बनाए रखने का एक निवारक उपाय प्रदान करते हैं। चूँकि ये बंधपत्र अनुच्छेद 19 के अधीन स्वतंत्रता और अधिकारों को प्रतिबंधित कर सकते हैं, इसलिये न्यायालयों ने प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों की आवश्यकता रखी है: तर्कसंगत लिखित आदेश, वास्तव में शुरू की गई जांच, प्रथम दृष्टया संतुष्टि, विधिक परामर्श प्राप्त करने का अधिकार, एक युक्तियुक्त बंधपत्र राशि और समयबद्ध कार्यवाही। दिल्ली उच्च न्यायालय का निर्णय दर्शाता है कि कारण बताओ नोटिस के चरण पर न्यायालय मजिस्ट्रेट की संतुष्टि को कितना महत्त्व देते हैं। यह निर्णय इस बात की भी पुष्टि करता है कि इस शक्ति का प्रयोग निवारक प्रकृति तक ही सीमित रहना चाहिये तथा इसे दंडात्मक स्वरूप प्रदान नहीं किया जाना चाहिये।