- बुक्स एवं मैगज़ीन्स
- लॉग इन
- भाषा: Eng हिंदी
होम / करेंट अफेयर्स
सिविल कानून
संविदा भंग होने पर बयाना राशि का समपहरण स्वतः नहीं होता है
« »02-Nov-2026
|
श्री सोमनाथ खरबंदा (मृतक) विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से बनाम श्रीमती अरविंदर कौर (मृतक) विधिक प्रतिनिधि के माध्यम से “विक्रय के करार के अंतर्गत संदत्त बयाना राशि की जब्ती, संविदा के भंग का स्वतः परिणाम नहीं है।” न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा |
स्रोत: दिल्ली उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दिल्ली उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति नीना बंसल कृष्णा ने श्री सोमनाथ खर्बंदा (मृतक) अपने विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाम श्रीमती अरविंदर कौर (मृतका) अपने विधिक प्रतिनिधियों के माध्यम से (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने दो मृतक विक्रेताओं के विधिक प्रतिनिधियों द्वारा दायर अपील खारिज कर दी तथा विचारण न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें संभावित क्रेता को ₹4 लाख की बयाना राशि वापस करने का निदेश दिया गया था।
सोमनाथ खरबंदा बनाम अरविंदर कौर (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- 21 जून 2008 को, दोनों पक्षकारों ने दिल्ली के रमेश नगर में एक संपत्ति को ₹40 लाख की कीमत पर बेचने के लिये एक करार पर हस्ताक्षर किया ।
- क्रेता ने बयाना राशि के तौर पर ₹4 लाख दिये। बाकी ₹36 लाख 5 सितंबर 2008 को या उससे पहले देने थे।
- करार में यह बताया गया था कि यदि कोई भी पक्षकार व्यतिक्रम करता है तो क्या होगा:
- यदि क्रेता डील पूरी नहीं कर पाया, तो बयाना राशि समपहृत की जा सकती है।
- यदि विक्रेता व्यतिक्रम करते, तो उन्हें क्रेता को बयाना राशि का दोगुना देना होगा।
- क्रेता ने ₹8 लाख (बयाना राशि की दोगुनी राशि) की वसूली के लिये वाद दायर किया। उसने अभिकथन किया कि विक्रेताओं ने संपत्ति के स्वत्व संबंधी दस्तावेजों को सत्यापन हेतु उपलब्ध नहीं कराया था।
- विक्रेताओं ने तर्क दिया कि:
- क्रेता शेष राशि का भुगतान करने में विफल रही थी, अतः वे बयाना राशि जब्त करने के अधिकारी थे।
- उन्हें इसलिए हानि हुई थी क्योंकि किसी अन्य संपत्ति के क्रय का सौदा संपन्न नहीं हो सका तथा उस सौदे में उनके द्वारा बयाना राशि के रूप में संदत्त ₹4.60 लाख की राशि जब्त हो गई थी।
- विचारण न्यायालय ने बयाना राशि की दोगुनी राशि की वसूली के क्रेता के दावे को अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने विक्रेताओं को मूल ₹4 लाख की राशि ब्याज सहित वापस करने का निदेश दिया।
- तत्पश्चात् विक्रेताओं के विधिक प्रतिनिधियों ने दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष अपील (RFA 814/2026) दायर की।
उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
क्या विक्रय के करार के भंग की स्थिति में विक्रेता बयाना राशि को स्वतः जब्त कर सकता है, अथवा विक्रेता के लिए हुई हानि को सिद्ध करना अनिवार्य है?
न्यायालय की टिप्पणियां क्या थीं?
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 74 के संबंध में:
- न्यायालय ने धारा 74 का संदर्भ दिया, जो संविदा के उल्लंघन की स्थिति में युक्तियुक्त प्रतिकर प्रदान करने का उपबंध करती है, जहाँ संविदा में भंग की स्थिति में संदेय राशि विनिर्दिष्ट की गई हो अथवा शास्ति संबंधी खंड अंतर्विष्ट हो।
- न्यायालय ने कहा कि संविदा में विनिर्दिष्ट राशि केवल प्रतिकर की अधिकतम सीमा निर्धारित करती है। संबंधित पक्षकार उस राशि को स्वतः प्राप्त करने का अधिकारी नहीं हो जाता।
अवलंबित पूर्ववर्ती निर्णयों के संबंध में:
- फतेह चंद बनाम बालकिशन दास और कैलाश नाथ एसोसिएट्स बनाम दिल्ली विकास प्राधिकरण पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि केवल संविदा भंग हो जाने से संविदा में विनिर्दिष्ट राशि स्वतः वसूली योग्य नहीं हो जाती।
- ऐसी राशि को अपने पास बनाए रखने का दावा करने वाले पक्षकार को यह दर्शाना होगा कि संविदा के उल्लंघन के परिणामस्वरूप उसे विधिक क्षति हुई है। जहाँ हानि को साक्ष्य द्वारा साबित किया जाना संभव हो, वहाँ उसे साबित करना अनिवार्य है।
विक्रेताओं द्वारा दावा की गई हानि के संबंध में:
- विक्रेताओं ने तर्क दिया कि क्रेता द्वारा अपने संविदात्मक दायित्वों का पालन न किए जाने के कारण उन्हें किसी अन्य संपत्ति के सौदे में ₹4.60 लाख की हानि हुई थी।
- तथापि, उस अन्य सौदे से संबंधित रसीद एवं विक्रय का करार प्रदर्श से अपसारित (De-exhibited) कर दिये गए, क्योंकि विक्रेता मूल दस्तावेज प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे थे।
- इस दावे को प्रमाणित करने के लिए कोई अन्य विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया कि:
- ऐसा अन्य संव्यवहार वास्तव में अस्तित्व में था, या
- उक्त संव्यवहार किन कारणों से संपन्न नहीं हो सका।
- दस्तावेज प्रस्तुत करके अथवा उस अन्य संव्यवहार के विक्रेता की परीक्षा करके उक्त हानि साबित की जा सकती थी। चूँकि विक्रेताओं ने इनमें से कोई भी उपाय नहीं अपनाया, इसलिये वे अपने द्वारा दावा की गई हानि को साबित करने में विफल रहे।
निर्णय:
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि विचारण न्यायालय द्वारा बयाना राशि वापस करने का निदेश दिया जाना उचित था।
- अपील खारिज कर दी गई ।
भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 की धारा 74 क्या है?
बारे में:
- धारा 74 शास्ति विनिर्दिष्ट किये जाने की स्थिति में संविदा भंग के लिये प्रतिकर से संबंधित है।
- यह तब लागू होती है, जब किसी संविदा में निम्नलिखित में से किसी का उल्लेख किया गया हो:
- संविदा भंग की स्थिति में संदत्त की जाने वाली कोई राशि, या
- शास्ति के रूप में कोई अन्य संविदा।
- दोनों ही स्थितियों में, संविदा के भंग से प्रभावित पक्षकार, भंग करने वाले पक्षकार से युक्तियुक्त प्रतिकर प्राप्त करने का अधिकारी होता है। यह प्रतिकर संविदा में विनिर्दिष्ट राशि अथवा निर्धारित शास्ति की राशि से अधिक नहीं हो सकता।
- पक्षकार इस प्रतिकर का अधिकारी होगा, भले ही संविदा भंग के कारण हुई वास्तविक क्षति अथवा हानि साबित की गई हो अथवा नहीं।
प्रमुख विशेषताएँ:
- पूर्वनिर्धारित नुकसानी और शास्ति के बीच कोई भेद नहीं: भारतीय विधि इन दोनों के बीच अंग्रेज़ी विधि में प्रचलित भेद का अनुसरण नहीं करती है। दोनों को समान रूप से माना जाता है तथा केवल युक्तियुक्त प्रतिकर ही प्रदान किया जाता है।
- अधिकतम सीमा, न कि स्वतः प्राप्त होने वाला अधिकार: संविदा में विनिर्दिष्ट राशि, प्रदान किये जा सकने वाले प्रतिकर की अधिकतम सीमा होती है। यह स्वतः संदेय राशि नहीं होती है।
- हानि का सबूत: “वास्तविक क्षति अथवा हानि सिद्ध की गई हो अथवा नहीं” शब्दों का आशय यह नहीं है कि जहाँ हानि साबित की जा सकती है, वहाँ उसे साबित करने की आवश्यकता समाप्त हो जाती है। ये शब्द केवल उन मामलों को समाहित करते हैं, जिनमें हानि को साबित करना कठिन अथवा असंभव होता है।
- विधिक क्षति का होना आवश्यक: धारा 74 के अंतर्गत प्रतिकर का दावा इस आधार पर किया जाता है कि संविदा भंग से किसी प्रकार की विधिक क्षति हुई है।
धारा 73 से संबंध:
- धारा 73 संविदा भंग से उत्पन्न हानि अथवा क्षति के लिये प्रतिकर का उपबंध करती है। इसमें ऐसी हानि सम्मिलित होती है, जो सामान्य परिस्थितियों में स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होती है अथवा जिसके संविदा के भंग से उत्पन्न होने की संभावना के बारे में पक्षकारों को संविदा करते समय जानकारी थी।
- धारा 74 वहाँ लागू होती है, जहाँ पक्षकारों ने अग्रिम रूप से किसी राशि अथवा शास्ति के संबंध में सहमति व्यक्त की हो। ऐसी स्थिति में भी न्यायालय उस निर्धारित सीमा के भीतर केवल युक्तियुक्त प्रतिकर ही प्रदान करता है।