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आपराधिक कानून

दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 457

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 28-Jul-2026

कृष्णन नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य 

"रजिस्ट्रीकरण एक सुसंगत कारक हैलेकिन यह साक्ष्य मात्र हैअंतरिम कब्जे के अधिकार का निश्चायक सबूत नहीं है।" 

न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोलऔरन्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीहकी खंडपीठ नेकृष्णन नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामलेमेंयह निर्णय दिया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 और 457 (धारा 497 और 503 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के अधीन जब्त वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा के हकदार होने का निर्णय करते समय रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र को एकमात्र या निश्चायक कारक नहीं माना जा सकता हैऔर ऐसे अवधारण के लिये सभी संबंधित परिस्थितियों का संचयी मूल्यांकन आवश्यक है। 

कृष्णा नारायण बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अपीलकर्त्ता मेसर्स प्योर मिनरल्स के निदेशक थे और साथ ही प्रत्यर्थी कंपनी मेसर्स अर्थ स्टीन प्राइवेट लिमिटेड में 80% शेयरधारिता भी रखते थे। 
  • उक्त वाहनजिनमें एक बोलेरो सिटी पिक-अपतीन एक्सकेवेटर और एक अशोक लेलैंड टिपर शामिल हैंको 2014 और 2022 के बीच मेसर्स प्योर मिनरल्स के नाम पर खरीदा गया था। 
  • अपीलकर्त्ता ने आरोप लगाया कि 31 अगस्त, 2023 को प्रत्यर्थियों ने आपराधिक अतिचार द्वारा उसकी फैक्ट्री में घुसपैठ की और जबरन वाहन ले गए। 
  • प्रत्यर्थी कंपनी द्वारा एक जवाबी प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई गई जिसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्त्ता ने कंपनी से ₹1,73,11,894 का गबन किया और इन धनराशि का उपयोग अपनी कंपनी के नाम पर वाहन खरीदने के लिये किया। 
  • अपीलकर्त्ता और प्रत्यर्थी दोनों ने विचारण न्यायालय के समक्ष वाहनों की वापसी की मांग करते हुए अलग-अलग आवेदन दायर कियेउनके आवेदनों को खारिज किये जाने परउन्होंने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय का रुख किया। 
  • एक सामान्य आदेश द्वाराउच्च न्यायालय ने प्रत्यर्थियोंको वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा प्रदान कीजिसमें कथित दुर्विनियोग के लिये अपीलकर्त्ता के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही और जब्ती के समय प्रत्यर्थियों  द्वारा अपने खनन कार्यों के लिये वाहनों के निरंतर उपयोग का हवाला दिया गया। 
  • उच्च न्यायालय के आदेश से असंतुष्ट होकरअपीलकर्त्ता नेसुंदर भाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य (2002) पर विश्वास करते हुए उच्चतम न्यायालय कारुख कियाजिसमें यह तर्क दिया गया कि अंतिम निपटान लंबित रहने तक जब्त किये गए वाहनों को रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के अनुसार वास्तविक स्वामी को सौंप दिया जाना चाहिये 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • अपीलकर्त्ता द्वारा सुंदर भाई अंबालाल देसाई पर निर्भरता के संबंध में:न्यायमूर्ति मसीह द्वारा लिखित निर्णय में न्यायालय ने अपीलकर्त्ता द्वारा इस पूर्व निर्णय पर निर्भरता को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह कोई अटल नियम नहीं है कि अन्य परिस्थितियों के होते हुए भी अभिरक्षा हमेशा रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के बाद ही होनी चाहियेअपितु यह न्यायालयों से अपेक्षा करता है कि वे संपत्ति के दुरुपयोग और क्षरण को रोकने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए शीघ्रता और विवेकपूर्ण ढंग से कार्य करें। 
  • दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 451 और 457 के दायरे पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ये प्रावधान न्यायालयों को स्वामित्व या मालिकाना हक के प्रश्नों का निर्णय किये बिनाजब्त संपत्ति पर अंतरिम कब्जे का सबसे योग्य व्यक्ति निर्धारित करने का अधिकार देते हैं। न्यायालय ने कहा कि "कब्जा" और "अभिरक्षा" शब्दों का प्रयोग इस बात पर बल देता है कि यह कार्यवाही स्वामित्व का निर्णय नहीं हैअपितु केवल संपत्ति के मूल्य में गिरावट और क्षय को रोकने के उद्देश्य से अंतरिम कब्जे का निर्धारण है। 
  • न्यायालय के मूल्यांकन की प्रकृति पर:न्यायालय ने माना कि इस शक्ति के प्रयोग के लिये केवल इस बात का प्रथम दृष्ट्या आकलन आवश्यक है कि संपत्ति की प्रकृतिज़ब्ती की परिस्थितियों और अभिलेख में मौजूद सामग्री को ध्यान में रखते हुएकब्जे का सबसे अच्छा हकदार कौन हैऔर इसमें स्वामित्व का निर्णय शामिल नहीं हैजो कि एक सक्षम नागरिक मंच के अनन्य अधिकारिता में आता है। 
  • प्रत्यर्थी कंपनी के पक्ष में परिस्थितियों के संबंध में:न्यायालय ने पाया कि वाहन प्रत्यर्थी के परिचालन स्थल से जब्त किये गए थेजहाँ वे निरंतर उपयोग में थेअपीलकर्त्ता ने कंपनी को हिसाब-किताब निपटाने तक वाहनों का उपयोग करने की अनुमति देते हुए एक वचनपत्र निष्पादित किया थाऔर वाहनों के लिये ऋण की किश्तें प्रत्यर्थी कंपनी के खाते से चुकाई गई थीं। यद्यपि अपीलकर्त्ता ने वचनपत्र को कूटरचित बतायान्यायालय ने माना कि ऐसे विवादों का निपटारा पृथक् कार्यवाही में किया जाना चाहिये 
  • रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्र के महत्त्व पर:न्यायालय ने माना कि निरंतर कब्ज़ा, EMI किश्तों का निर्विवाद संदाय और रिकॉर्ड पर मौजूद वचनबद्धता ने अपीलकर्त्ता के अनन्य व्यक्तिगत अधिकार के दावे को काफी कमजोर कर दिया और निरंतर लाभकारी उपयोग और नियंत्रण के प्रत्यर्थियोंके मामले को विश्वसनीयता प्रदान कीजो केवल रजिस्ट्रीकरण प्रमाण पत्रों पर अपीलकर्त्ता की निर्भरता से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण है। 
  • अनुतोष प्रदान करने पर:यह मानते हुए कि प्रत्यर्थी कंपनी के पक्ष में परिस्थितियाँ अपीलकर्त्ता के पक्ष में परिस्थितियों से अधिक थींन्यायालय ने अपील खारिज कर दी और प्रत्यर्थियोंको वाहनों की अंतरिम अभिरक्षा प्रदान करने वाले उच्च न्यायालय के आदेश की पुष्टि की। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 497 और 503 क्या हैं? 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 497 - कतिपय मामलों में विचारण लंबित रहने तक सम्पत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश: 

  • उपधारा (1) – जब कोई संपत्ति, किसी दण्ड न्यायालय या विचारण के लिये मामले का संज्ञान या सुपूर्द करने हेतु सशक्त मजिस्टेट के समक्ष किसी अन्वेषणजांच या विचारण के दौरान पेश ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा के लिये ऐसा आदेश जैसा वह ठीक समझेकर सकता है और की जाती है तब वह न्यायालय या मजिस्टेट उस अन्वेषण जांच या विचारण के समाप्त होने तक यदि वह संपत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है या यदि ऐसा करना अन्यथा समीचीन है तो वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट ऐसा साक्ष्य अभिलिखित करने के पश्चात जैसा वह आवश्यक समझेउसके विक्रय या उसका अन्यथा व्ययन किये जाने के लिये आदेश कर सकता है 
  • उपधारा (1) का स्पष्टीकरण– "संपत्ति" का अर्थ: इस धारा के प्रयोजनों के लिये, "संपत्ति" में (क) किसी भी प्रकार की संपत्ति या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत या उसकी अभिरक्षा में मौजूद दस्तावेजतथा (ख) कोई भी संपत्ति जिसके संबंध में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता हैया जिसका उपयोग अपराध करने के लिये किया गया प्रतीत होता हैशामिल है। 
  • उपधारा (2) – संपत्ति का विवरण तैयार करना: न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संपत्ति की प्रस्तुति के चौदह दिनों के भीतरराज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप और तरीके सेसंपत्ति का विवरण तैयार करना होगा। 
  • उपधारा (3) – फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी: यदि आवश्यक होतो न्यायालय या मजिस्ट्रेट को संपत्ति की फोटो खींचनी होगी और मोबाइल फोन या अन्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर वीडियोग्राफी करानी होगी। 
  • उपधारा (4) – साक्ष्य मूल्य: उपधारा (2) के अधीन तैयार किया गया कथनउपधारा (3) के अधीन ली गई तस्वीर या वीडियोग्राफी के साथसंहिता के अधीन किसी भी जांचपरीक्षण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयोग किया जाएगा। 
  • उप-धारा (5) – निपटान आदेश के लिये समयसीमा: न्यायालय या मजिस्ट्रेट को उप-धारा (2) के अधीन कथन तैयार करने और उप-धारा (3) के अधीन फोटो या वीडियोग्राफी लेने के तीस दिनों के भीतरबाद के उपबंधों के अधीन विनिर्दिष्ट तरीके से संपत्ति के निपटाननष्टअधिहृत या परिदान का आदेश देना होगा। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 503 – संपत्ति के अभिग्रहण पर पुलिस द्वारा प्रक्रिया: 

  • उपधारा (1) – मजिस्ट्रेट को अभिग्रहण की सूचना देना: जब कभी किसी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी संपत्ति के अभिग्रहण की रिपोर्ट इस संहिता के उपबंधों के अधीन मजिस्ट्रेट को की जाती है और जांच या विचारण के दौरान ऐसी संपत्ति दण्ड न्यायालय के समक्ष पेश नहीं को ऐसी संपत्ति का परिदान किये जाने के बारे में या यदि ऐसा व्यक्ति अभिनिश्चित नहीं किया की जाती है तो मजिस्टेट ऐसी संपत्ति के व्ययन के, या उस पर कब्जा करने के हकदार व्यक्ति जा सकता है तो ऐसी संपत्ति की अभिरक्षा और पेश किये जाने के बारे में ऐसा आदेश कर सकता जो वह ठीक समझे।  
  • उपधारा (2) – यदि ऐसा हकदार व्यक्ति ज्ञात हैतो मजिस्ट्रेट वह संपत्ति उसे उन शर्तों पर (यदि कोई हो। जो मजिस्ट्रेट ठीक समझे परिदत्त किये जाने का आदेश दे सकता है और यदि ऐसा व्यक्ति अज्ञात है तो मजिस्टेट उस संपत्ति को निरुद्ध कर सकता है और ऐसी दशा में एक उदघोषणा जारी करेगाजिसमें उस संपत्ति की अंगभूत वस्तुओं का विनिर्देश होऔर जिसमें किसी व्यक्ति से, जिसका उसके ऊपर दावा हैयह अपेक्षा की गई हो कि वह उसके समक्ष हाजिर हो और ऐसी उद्‌घोषणा की तारीख से छह मास के अंदर अपने दावे को सिद्ध करे।