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सांविधानिक विधि
एच.आई.वी. संक्रमित कामगार को स्थायी नियुक्ति देने से इंकार
29-Dec-2025
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कुमार दशरथ कांबले बनाम बॉम्बे हॉस्पिटल याचिकाकर्त्ता को एच.आई.वी. संक्रमित होने के आधार पर स्थायीत्व का लाभ देने से इंकार करना स्पष्ट रूप से मनमाना, विभेदकारी और भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है। न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति संदीप वी. मार्ने ने कुमार दशरथ कांबले बनाम बॉम्बे हॉस्पिटल (2025) के मामले में निर्णय दिया कि किसी कामगार को केवल एच.आई.वी. संक्रमित होने के आधार पर स्थायीकरण से वंचित करना मनमाना, विभेदकारी और भारत के संविधान, 1950 (COI) के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है।
कुमार दशरथ कांबले बनाम बॉम्बे हॉस्पिटल (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- याचिकाकर्त्ता 1994 से बॉम्बे अस्पताल में सफाईकर्मी के रूप में कार्यरत था।
- याचिकाकर्त्ता का नाम स्थायी नियुक्ति के पात्र अस्थायी कामगारों की सूची में सम्मिलित था।
- समझौते के अधीन चिकित्सा परीक्षा के दौरान, याचिकाकर्त्ता एच.आई.वी. संक्रमित पाया गया और उसे चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर दिया गया।
- याचिकाकर्त्ता को केवल एच.आई.वी. संक्रमित होने के आधार पर स्थायी नियुक्ति से वंचित कर दिया गया था।
- इंकार के होते हुए भी, याचिकाकर्त्ता ने स्थायी किये गए सहकर्मियों के समान कर्त्तव्यों का निर्वहन करना जारी रखा।
- 2017 में, मुंबई जिला एड्स नियंत्रण सोसायटी के हस्तक्षेप के बाद, याचिकाकर्त्ता को भविष्य के लिये स्थायीकरण प्रदान किया गया था।
- याचिकाकर्त्ता ने वर्ष 2006 से स्थायीकरण और परिणामी लाभों की घोषणा की मांग करते हुए औद्योगिक न्यायालय का रुख किया।
- औद्योगिक न्यायालय ने परिवाद को खारिज कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वर्तमान रिट याचिका दायर की गई।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने माना कि औद्योगिक न्यायालय ने पूर्ण-न्याय के सिद्धांत को लागू करने में अति-तकनीकी दृष्टिकोण अपनाया और केवल एच.आई.वी. स्थिति के कारण स्थायीकरण से इंकार की वास्तविक शिकायत की जांच करने में असफल रहा।
- न्यायालय ने कहा कि मात्र 1 दिसंबर 2006 को हुए समझौता ज्ञापन के कारण याचिकाकर्त्ता को स्थायी नियुक्ति से इंकार के विवाद्यक को उठाने से नहीं रोका जा सकता।
- न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता की बीमारी ने कभी भी उसके कर्त्तव्यों के निर्वहन में बाधा नहीं डाली और एच.आई.वी. संक्रमित पाए जाने के बाद भी उसने लगभग दो दशकों तक काम करना जारी रखा।
- न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि जब कोई कामगार बिना किसी बाधा के सहकर्मियों के समान कर्त्तव्यों का निर्वहन करता रहता है, तो उसकी एच.आई.वी. स्थिति को कम मजदूरी पर समान काम करवाते हुए स्थायीकरण से इंकार करने के आधार के रूप में प्रयोग नहीं किया जा सकता है।
- न्यायालय ने कहा कि इस प्रकार का इंकार शत्रुतापूर्ण विभेद के समान है और समता और गरिमा के सांविधानिक मूल्यों के विपरीत है।
- एच.आई.वी. और एड्स (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 2017 का हवाला देते हुए, न्यायालय ने कहा कि नियोजन के मामलों में एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों के साथ विभेद करना स्पष्ट रूप से प्रतिषिद्ध है।
- बकाया के विवाद्यक पर, न्यायालय ने माना कि विलंब और असावधानी का सिद्धांत लागू होगा, क्योंकि याचिकाकर्त्ता 12 वर्षों से अधिक समय तक अपने अधिकारों के प्रति उदासीन रहा।
- न्यायालय ने औद्योगिक न्यायालय के आदेश को अपास्त कर दिया और बॉम्बे अस्पताल को याचिकाकर्त्ता को 1 दिसंबर 2006 से स्थायी नियुक्ति प्रदान करने का निदेश दिया।
- विलंब और असावधानी के सिद्धांत को लागू करते हुए, न्यायालय ने वास्तविक मौद्रिक लाभों को परिवाद दर्ज करने से 90 दिन पहले की अवधि तक सीमित कर दिया।
- अस्पताल को तीन महीने के भीतर सभी स्वीकार्य बकाया राशि का संदाय करने का निदेश दिया गया था, ऐसा न करने पर 8% प्रति वर्ष की दर से ब्याज देय होगा।
ह्यूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस (HIV)/एड्स क्या है?
बारे में:
- एच.आई.वी. एक ऐसा वायरस है जो प्रतिरक्षा प्रणाली पर हमला करता है, मुख्य रूप से CD4 कोशिकाओं (श्वेत रक्त कोशिकाओं) को नुकसान पहुँचाता है, जिससे शरीर कमजोर हो जाता है और संक्रमण और कैंसर के प्रति अधिक संवेदनशील हो जाता है।
संचरण:
- यह संक्रमण संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों (रक्त, वीर्य, स्तन का दूध, योनि द्रव) के सीधे संपर्क से फैलता है, जैसे असुरक्षित यौन संबंध, साझा सुई का उपयोग, या बिना कीटाणुरहित टैटू बनवाना। यह आकस्मिक संपर्क से नहीं फैलता है।
लक्षण:
- शुरुआती लक्षणों में बुखार और त्वचा पर चकत्ते शामिल हैं। बाद के चरणों में लिम्फ ग्रंथियों में सूजन, वजन कम होना और दस्त हो सकते हैं। गंभीर एच.आई.वी. से तपेदिक, मेनिन्जाइटिस और लिम्फोमा जैसे कैंसर जैसी अवसरवादी बीमारियाँ हो सकती हैं।
इलाज:
- इसका कोई इलाज नहीं है। यद्यपि, जीवन भर प्रतिदिन एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) लेने से वायरस को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है।
एच.आई.वी. और एड्स (निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 2017:
- एच.आई.वी. और एड्स (निवारण एवं नियंत्रण) अधिनियम, 2017 एक केंद्रीय विधायन है जो एच.आई.वी. और एड्स से संक्रमित और प्रभावित व्यक्तियों के अधिकारों की रक्षा और उन्हें बढ़ावा देता है।
- एच.आई.वी. और एड्स के प्रसार को रोकने और नियंत्रित करने तथा एच.आई.वी. और एड्स से संक्रमित और प्रभावित व्यक्तियों के विधिक और मानवाधिकारों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से यह अधिनियम 10 सितंबर, 2018 को लागू हुआ।
- इसका उद्देश्य स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं के अधिकारों की रक्षा करना भी है।
- यह अधिनियम कलंक और विभेद को संबोधित करता है और सेवाओं तक पहुँच बढ़ाने के लिये अनुकूल वातावरण बनाने का प्रयास करता है।
- यह एच.आई.वी. और एड्स से पीड़ित लोगों को ART से संबंधित निदान सुविधाएं और अवसरवादी संक्रमणों के प्रबंधन की सुविधा प्रदान करता है।
- इस अधिनियम में राज्य स्तर पर लोकपाल और संस्थान स्तर पर शिकायत अधिकारी के रूप में एक मजबूत परिवाद निवारण तंत्र का भी प्रावधान है, जिसका उद्देश्य त्वरित निवारण प्रदान करना है।
संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 क्या हैं?
संविधान के अनुच्छेद 14: विधि के समक्ष समता
- दो-भाग का उपबंध : अनुच्छेद 14 में दो अलग-अलग लेकिन पूरक अवधारणाएँ सम्मिलित हैं।
- विधि के समक्ष समता (नकारात्मक अवधारणा)
- विधियों का समान संरक्षण (सकारात्मक अवधारणा)
- विधि के समक्ष समता : यह विभेद को प्रतिबंधित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि भारतीय क्षेत्र के भीतर किसी भी व्यक्ति को विधि के समक्ष समान व्यवहार से वंचित न किया जाए।
- विधियों का समान संरक्षण : इसके अधीन राज्य को सभी के बीच समता स्थापित करने के लिये विभिन्न परिस्थितियों में व्यक्तियों के साथ विशेष व्यवहार करना आवश्यक है।
- मूल सिद्धांत : सच्ची समानता प्राप्त करने के लिये समान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये, जबकि असमान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाना चाहिये।
- आवेदन का दायरा : सभी व्यक्तियों पर लागू होता है, जिनमें सम्मिलित हैं:
- नागरिक और विदेशी
- सांविधिक निगम
- कंपनियाँ
- रजिस्ट्रीकृत समितियाँ
- किसी अन्य प्रकार का विधिक व्यक्ति
भारत के संविधान का अनुच्छेद 16: लोक नियोजन में अवसर की समता
- प्राथमिक प्रत्याभूति : नियोजन या किसी भी लोक पद पर नियुक्ति के मामलों में सभी नागरिकों के लिये समान अवसर सुनिश्चित करता है।
- विभेद का प्रतिषेध : राज्य को निम्नलिखित आधारों पर विभेद करने से रोकता है:
- धर्म
- मूलवंश
- जाति
- लिंग
- उद्भव
- जन्म स्थान
- निवास स्थान
- अनुमत विशेष प्रावधान : राज्य को निम्नलिखित मामलों में विशेष प्रावधान प्रदान करने की स्वायत्तता है:
- पिछड़े वर्गों के लिये
- अल्प प्रतिनिधित्व वाले राज्य के लिये
- अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिये
- कुछ विशिष्ट पदों हेतु स्थानीय उम्मीदवारों के लिये।
- धार्मिक/संप्रदाय संबंधी अपवाद : धार्मिक या संप्रदायिक संस्थानों में किसी विशिष्ट धर्म या संप्रदाय के व्यक्तियों के लिये पदों का आरक्षण अवैध नहीं माना जाता।
- आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) आरक्षण : अनुच्छेद 16(6), जिसे 2019 में 103वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया, राज्य को आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिये लोक नियोजन (और शिक्षा) में 10% तक आरक्षण प्रदान करने में सक्षम बनाता है।
सिविल कानून
भोग- बंधक और परिसीमा काल
29-Dec-2025
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दलीप सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य बनाम सावन सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य "भोग-बंधकों में, मोचन का परिसीमा काल बंधक निर्माण की तारीख से नहीं अपितु बंधक धन के संदाय या निविदा की तारीख से प्रारंभ होती है।" न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
दलीप सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य बनाम सावन सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य (2025) के मामले में न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना और आर. महादेवन की पीठ ने बंधकदारों द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया और पुष्टि की कि भोग-बंधकों में, मोचन की मांग करने का अधिकार बंधक धन के संदाय की तारीख से उत्पन्न होता है, न कि बंधक सृजन की तारीख से।
दलीप सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य बनाम सावन सिंह (मृत) विधिक वारिस और अन्य (2025) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- अपीलकर्त्ता (मूल वादी) विवादित संपत्ति के बंधकदार थे, जिसका क्षेत्रफल 114 कनाल और 4 मरला था और जो तमकोट गाँव, तहसील मानसा, जिला बठिंडा में स्थित था।
- यह संपत्ति प्रत्यर्थियों (मूल प्रतिवादियों) के पूर्वजों द्वारा बंधक रखी गई थी।
- प्रत्यर्थियों/प्रतिवादियों ने बंधक मोचन करने के लिये बंधक मोचन अधिनियम, 1913 की धारा 6 के अधीन एक आवेदन दायर किया।
- कलेक्टर ने दिनांक 17.09.1975 के आदेश द्वारा प्रत्यर्थियों/प्रतिवादियों के पक्ष में मोचन आवेदन को मंजूरी दे दी।
- कलेक्टर के आदेश से व्यथित होकर, अपीलकर्त्ताओं/वादियों ने मोचन आदेश को चुनौती देते हुए सिविल वाद संख्या 291/1975 दायर किया।
- विचारण न्यायालय ने 22.09.1976 के आदेश के माध्यम से वादी के पक्ष में वाद तय किया, यह मानते हुए कि मोचन के लिये आवेदन परिसीमा से बाधित था और कलेक्टर के आदेश को अपास्त कर दिया।
- प्रत्यर्थियों/प्रतिवादियों ने अपर जिला न्यायाधीश, बठिंडा के समक्ष सिविल अपील संख्या 107/ R.T. -99 ऑफ 76/77 में प्रथम अपील दायर की, जिसे दिनांक 24.12.1980 के आदेश द्वारा खारिज कर दिया गया।
- तत्पश्चात् प्रत्यर्थियों/प्रतिवादियों ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के समक्ष नियमित द्वितीय अपील संख्या 1053/1981 दायर की।
- उच्च न्यायालय ने 18.09.2001 के आदेश द्वारा अपील को मंजूर करते हुए यह माना कि बंधक मोचन का अधिकार परिसीमा द्वारा वर्जित नहीं था और भूमि से प्राप्त आय से ऋण में किये गए समायोजन के आधार पर कार्यवाही का एक नया वाद-हेतुक उत्पन्न हुआ था।
- अपीलकर्त्ताओं/वादियों ने सिविल अपील संख्या 6084/2002 में उच्चतम न्यायालय के समक्ष इसे चुनौती दी, जिसे प्रक्रियात्मक आधार पर दिनांक 16.04.2009 के आदेश द्वारा स्वीकार कर लिया गया।
- मामले को पुनर्विचार के लिये उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया क्योंकि उच्च न्यायालय अपील को स्वीकार करने से पहले विधि के सारवान् प्रश्नों को तैयार करने में असफल रहा था।
- विधि के सारवान् प्रश्नों को तैयार करने के बाद, पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने दिनांक 25.01.2010 के आदेश द्वारा प्रत्यर्थियों/प्रतिवादियों के पक्ष में अपील को फिर से मंजूर कर लिया।
- उच्च न्यायालय ने राम किशन और अन्य बनाम शिव राम और अन्य (2008) पर विश्वास करते हुए वादी के वाद को खारिज करने वाले कलेक्टर के दिनांक 17.09.1975 के आदेश को बहाल कर दिया।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उच्च न्यायालय ने सिंह राम (मृत) के विधि प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाम श्यो राम और अन्य के मामले पर विश्वास करते हुए प्रतिवादियों द्वारा दायर अपील को मंजूर कर लिया और वादियों के वाद को खारिज कर दिया।
- न्यायालय ने सिंह राम मामले (2014) में तीन न्यायाधीशों की पीठ के निर्णय का हवाला दिया, जिसने भोग-बंधक संबंधी बंधकों में परिसीमा के संबंध में विधिक सिद्धांत स्थापित किया था।
- न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि भोग-बंधकों में, परिसीमा काल बंधक के निर्माण की तिथि से नहीं अपितु बंधक धन के संदाय की तिथि से प्रारंभ होती है।
- परिसीमा काल या तो भोग के अधिकार से संदाय करने पर, भाग के अधिकार से भागत: संदाय करने पर, या संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 52 के अधीन बंधककर्त्ता द्वारा भागत: संदाय या जमा करने पर प्रारंभ होती है।
- जब तक ऐसा संदाय या निविदा नहीं की जाती, परिसीमा अधिनियम की अनुसूची की धारा 61(क) के अधीन परिसीमा काल प्रारंभ नहीं होगा।
- न्यायालय ने यह माना कि विहित काल की समाप्ति मात्र से बंधककर्त्ता का मोचन का अधिकार समाप्त नहीं हो सकता, और इस प्रकार बंधक संपत्ति पर स्वामित्व और अधिकार की घोषणा की मांग करने का बंधकदार का अधिकार अप्रभावित रहता है।
- न्यायालय ने प्रत्यर्थियों के अधिवक्ता की इस दलील में दम पाया कि सिंह राम निर्णय के अनुपात को लागू करने से वादियों का वाद खारिज हो जाएगा और कलेक्टर का आदेश बहाल हो जाएगा।
- उच्चतम न्यायालय ने याचिकाकर्त्ताओं द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया , उच्च न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा और मुकदमे को खारिज कर दिया।
- अंतरिम स्थगन आदेश रद्द कर दिया गया और पक्षकारों को अपने-अपने खर्च वहन करने का निदेश दिया गया।
भोग-बंधक क्या है ?
बारे में:
- संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 58 (क) के अनुसार बंधक को किसी विनिर्दिष्ट स्वावर संपत्ति में के किसी हित का वह अंतरण है जो उधार के तौर पर दिये गए या दिये जाने वाले धन के संदाय को या वर्तमान या भावी ऋण के संदाय की गा ऐसे वचनबंध का पालन, जिससे धन संबंधी दायित्त्व पैदा हो सकता है, प्रतिभूत करने के प्रयोजन से किया जाता है।
- अंतरक बंधककर्त्ता और अंतरिती बंधकदार कहलाता है, मूलधन और ब्याज, जिनका संदाय तत्समय प्रतिभूत है, बंधक धन कहलाते हैं और वह लिखत (यदि कोई हो), जिसके द्वारा अंतरण किया जाता है बंधक विलेख कहलाती है।
बंधकों के प्रकार:

- भोग-बंधक:
- संपत्ति अंतरण अधिनियम की धारा 58(घ) में भोग-बंधक को परिभाषित किया गया है।
- इसमें कहा गया है कि जहाँ कि बंधककर्त्ता बंधक संपत्ति का कब्जा बंधकदार को परिदत्त कर देता है या परिदत्त करने के लिये अपने को अभिव्यक्त या विवक्षित तौर पर आबद्ध कर लेता है। और उसे प्राधिकृत करता है कि बंधक धन का संदाय किये जाने तक वह ऐसा कब्जा प्रतिधृत करे और उस संपत्ति में प्रोद्भुत भाटकों और लाभों को या ऐसे भाटकों और लाभों के किसी भाग को प्राप्त करे और उन्हें ब्याज मद्धे या बंधक धन के संदाय में या भागतः ब्याज मद्धे या भागतः बंधक धन के संदाय में, विनियोजित कर ले, वहाँ वह संव्यवहार भोग-बंधक और वह बंधकदार भोग- बंधकदार कहलाता है।
- एक ही संपत्ति पर एक ही समय में दो अलग-अलग भोग-बंधक नहीं हो सकते, क्योंकि संपत्ति का कब्ज़ा केवल एक ही व्यक्ति को दिया जा सकता है।
- इस प्रकार के बंधक में, बंधकदार को स्वयं को ऋण चुकाने का लाभ होता है।