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सिविल कानून

वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अधीन संतान बेदखली के आदेशों के विरुद्ध अपील कर सकती है

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 04-Nov-2026

डॉ. उपासना गिरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य 

“संगति बनाए रखने के उद्देश्य से हम अपने ही न्यायालय के निर्णय का अनुसरण करते हैं।” 

न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति प्रकाश पडिया और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने डॉ. उपासना गिरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य (2026) के मामले का निर्णय किया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 के अधीन पारित बेदखली आदेश के विरुद्ध संतानों द्वारा धारा 16 के अंतर्गत प्रस्तुत अपील पोषणीय है। न्यायालय ने रिट याचिका का निस्तारण करते हुए याचिकाकर्त्ता को अपनी अपील प्रस्तुत करने हेतु जिला मजिस्ट्रेट, प्रयागराज के समक्ष जाने का निदेश दिया। 

उपासना गिरी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • उपखंड मजिस्ट्रेट (SDM), तहसील सदर, प्रयागराज ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 7(1) के अधीन कार्यवाही में दिनांक 3 अक्टूबर 2026 को एक आदेश पारित किया। 
  • याचिकाकर्ता, डॉ. उपासना गिरि, प्रत्यर्थी संख्या 5 की संतान हैं। उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समक्ष रिट याचिका प्रस्तुत करके उक्त आदेश को चुनौती दी। 
  • सुनवाई के दौरान: 
    • राज्य की ओर से इलाहाबाद उच्च न्यायालय तथा अन्य उच्च न्यायालयों के कई ऐसे निर्णयों का उल्लेख किया गया, जिनमें इस प्रश्न पर भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण अपनाए गए थे कि क्या संतानें अधिनियम के अधीन पारित बेदखली आदेशों के विरुद्ध अपील प्रस्तुत कर सकती हैं।  
    • राज्य ने अखिलेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) में खंडपीठ द्वारा दिये गए निर्णय पर भी विश्वास किया। 
    • भारत संघ के अधिवक्ता ने न्यायालय को अवगत कराया कि केंद्रीय विधायिका इस प्रश्न पर विचार कर रही है कि क्या संतानों को अपील का अधिकार प्रदान किया जाना चाहिये, किंतु अभी तक इस संबंध में कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया है। 

उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न: 

  • अधिनियम की धारा 16 अपील का अधिकार केवल वरिष्ठ नागरिकों और माता-पिता को प्रदान करती है। क्या अधिनियम के अधीन अधिकरण द्वारा पारित बेदखली आदेश से व्यथित संतानें भी अपीलीय अधिकरण के समक्ष अपील प्रस्तुत कर सकती हैं? 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अधिनियम की धारा 16 के संबंध में:  

  • न्यायालय ने स्वीकार किया कि धारा 16 के साधारण पाठ से यह स्पष्ट नहीं होता कि बेदखली आदेश से व्यथित संतानें अपील प्रस्तुत कर सकती हैं।  
  • तथापि, अखिलेश कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2019) में में खंडपीठ ने इस उपबंध की उद्देश्यपरक निर्वचन की थी। इसका उद्देश्य वरिष्ठ नागरिकों अथवा माता-पिता को एक पक्ष तथा संतानों को दूसरे पक्ष के रूप में रखते हुए उनके बीच स्पष्ट भेदभाव को रोकना था, जो उस स्थिति में उत्पन्न होता, जब अपील का अधिकार केवल एक पक्ष को प्रदान किया जाता। 

पूर्ववर्ती न्यायिक निर्णयों पर विश्वास किये जाने के संबंध में: 

  • अखिलेश कुमार मामले में उच्च न्यायालय ने निम्नलिखित निर्णयों पर विश्वास किया था: 
    • परमजीत कुमार सरोया बनाम भारत संघ (पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय), और 
    • बालामुरुगन बनाम रुक्मणी (मद्रास उच्च न्यायालय)। 
  • दोनों निर्णयों में यह अभिनिर्धारित किया गया था कि धारा 16(1) की उद्देश्यपरक निर्वचन किया जाना चाहिये तथा दोनों पक्षकारों को अपील प्रस्तुत करने का अधिकार प्राप्त है। 
  • रीता रॉय बनाम भरण-पोषण अधिकरण और उपखंड ऑफिसर मामले में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के बाद के निर्णय में भी यह माना गया कि बेदखली के आदेश से व्यथित संतानों द्वारा प्रस्तुत अपील पोषणीय है। 
  • इन निर्णयों को दृष्टिगत रखते हुए, न्यायालय ने भिन्न दृष्टिकोण अपनाने का कोई औचित्य नहीं पाया।  

पूर्वनिर्णय के सिद्धांत (Doctrine of Stare Decisis) के संबंध में: 

  • खंडपीठ के रूप में कार्य करते हुए, न्यायालय ने विधि में एकरूपता बनाए रखने के लिये अखलेश कुमार के निर्णय का अनुसरण किया, क्योंकि पूर्वनिर्णय का सिद्धांत ऐसा अपेक्षित करता है। 

मामले के तथ्यों के संबंध में: 

  • याचिकाकर्त्ता अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जाने के लिये इच्छुक थीं। अतः न्यायालय ने उन्हें जिला मजिस्ट्रेट, प्रयागराज के समक्ष जाने का निदेश दिया। 
  • न्यायालय ने उन्हें तीन दिनों के भीतर अंतरिम अनुतोष हेतु आवेदन के साथ अपील प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की। 
  • यदि दोनों निर्धारित अवधि के भीतर प्रस्तुत किये जाते हैं, तो जिला मजिस्ट्रेट को अंतरिम अनुतोष संबंधी आवेदन पर 16 नवंबर 2026 को या उससे पूर्व निर्णय करना था। 
  • जिला मजिस्ट्रेट को सभी पक्षकारों को सुनवाई का अवसर प्रदान करने तथा अधिनियम की धारा 16(6) के अनुसार, अपील प्रस्तुत किये जाने की तारीख से 30 दिनों के भीतर संपूर्ण अपील का निर्णय करने का निदेश दिया गया। 
  • न्यायालय ने प्रत्यर्थी संख्या 5 के अधिवक्ता द्वारा दिये गए इस आश्वासन को अभिलिखित किया कि प्रत्यर्थी अंतरिम अनुतोष संबंधी आवेदन पर निर्णय होने तक बेदखली की मांग नहीं करेगा और न ही उसके लिये आग्रह करेगा। इस आश्वासन के कारण, न्यायालय ने कोई अतिरिक्त संरक्षण प्रदान करना आवश्यक नहीं समझा। 

उपखंड मजिस्ट्रेट के आदेश के गुण-दोष के संबंध में: 

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उसने उपखंड मजिस्ट्रेट के आदेश को गुण-दोष के आधार पर चुनौती दिये जाने के प्रश्न पर कोई निर्णय नहीं किया है। 
  • न्यायालय ने दिनांक 3 अक्टूबर 2026 के आदेश में हस्तक्षेप किये बिना अपील प्रस्तुत करने की अनुमति प्रदान की तथा अपीलीय प्राधिकारी को तथ्यों और विधि का स्वतंत्र रूप से परीक्षण करने के लिये स्वतंत्र रखा। 

निर्णय: 

  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि अधिनियम के अधीन पारित बेदखली आदेश के विरुद्ध संतानों द्वारा प्रस्तुत अपील पोषणीय है। 
  • रिट याचिका का निस्तारण कर दिया गया तथा याचिकाकर्त्ता को अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष जाने का निदेश दिया गया। 

माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 16 क्या है? 

बारे में: 

  • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 16, भरण-पोषण अधिकरण के आदेशों के विरुद्ध अपील के उपबंध करती है। 
  • धारा 16(1): अधिकरण के किसी आदेश से व्यथित वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता, आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर अपीलीय अधिकरण के समक्ष अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। 
    • अपील लंबित रहने के दौरान, भरण-पोषण का संदाय करने के लिये आदेशित संतान या संबंधियों को निर्देशानुसार भरण-पोषण का संदाय जारी रखना होगा। 
    • यदि अपील प्रस्तुत करने में हुए विलंब का पर्याप्त कारण विद्यमान हो, तो अपीलीय अधिकरण 60 दिनों की अवधि के पश्चात प्रस्तुत अपील को भी सुनवाई के लिये स्वीकार कर सकता है। 
  • धारा 16 (2) से (4): अपील प्राप्त होने पर, अपीलीय अधिकरण प्रत्यर्थी को सूचना जारी करता है, अधिकरण से कार्यवाही का अभिलेख मंगा सकता है तथा अपील और अभिलेख का परीक्षण करने के पश्चात अपील को स्वीकार या खारिज कर सकता है। 
  • धारा 16(5): अपीलीय अधिकरण अपील पर निर्णय करता है और उसका आदेश अंतिम होता है। 
  • धारा 16(6): अपीलीय अधिकरण को अपील प्राप्त होने की तारीख से एक माह के भीतर अपना आदेश लिखित रूप में सुनाने का यथासंभव प्रयास करना होगा। 

प्रमुख विशेषताएँ:  

  • उपबंध के पाठ में अपील का अधिकार केवल एक पक्ष को: धारा 16(1) के साधारण पाठ (Plain Reading) के अनुसार, केवल वरिष्ठ नागरिक या माता-पिता ही अपील प्रस्तुत कर सकते हैं। 
  • उद्देश्यपरक निर्वचन: इलाहाबाद, पंजाब एवं हरियाणा, मद्रास तथा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालयों सहित कई उच्च न्यायालयों ने इस उपबंध की ऐसी उद्देश्यपरक निर्वचन की है, जिसके अंतर्गत आदेश से व्यथित संतानें, विशेष रूप से बेदखली आदेश के विरुद्ध, अपील प्रस्तुत कर सकती हैं। 
  • भेदभाव से बचना: अपील का अधिकार केवल एक पक्ष को प्रदान करना माता-पिता और संतानों के बीच स्पष्ट भेदभाव उत्पन्न करेगा।  
  • शीघ्र निस्तारण: अधिनियम का उद्देश्य शीघ्र अनुतोष प्रदान करना है। अतः अपीलीय अधिकरण से अपेक्षा की जाती है कि वह अपीलों का निस्तारण एक माह के भीतर करे।