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आपराधिक कानून
मृत्युदण्ड के मामलों में सम्यक् प्रक्रिया: बचन सिंह से वसंत संपत दुपारे तक
«04-Nov-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
10 अक्टूबर को मनाया जाने वाला मृत्युदण्ड विरोधी दिवस (Day Against the Death Penalty) इस बात पर विचार करने का एक उपयुक्त अवसर है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा वर्ष 1980 में निर्धारित सुरक्षा उपाय व्यवहार में किस प्रकार प्रभावी रहे हैं। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में संविधान पीठ ने मृत्युदण्ड को बरकरार रखा, किंतु न्यायिक विवेकाधिकार के प्रयोग के संबंध में दिशा-निर्देश निर्धारित करके इसे सीमित कर दिया। मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) के मामले में न्यायालय ने व्यावहारिक दिशा-निर्देश जोड़े, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य का मूल्यांकन तथा अभिरक्षा के दौरान अभियुक्त के आचरण से संबंधित रिपोर्टें शामिल थीं। समग्र रूप से, ये निर्णय विधि का एक ऐसा दीर्घकालिक परिवर्तन दर्शाते हैं, जिसमें अपराध पर केंद्रित दृष्टिकोण से हटकर दंडादेश प्राप्त करने वाले व्यक्ति पर ध्यान केंद्रित किया गया है। ये यह भी दर्शाते हैं कि विचारण न्यायालयों की कार्यप्रणाली अभी भी निर्धारित मानकों से कितनी पीछे है।
बचन सिंह मामले में न्यायालय ने क्या निर्धारित किया?
- बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में संविधान पीठ ने मृत्युदण्ड की सांविधानिक वैधता को बरकरार रखा।
- इसने न्यायाधीशों द्वारा अपने विवेकाधिकार के प्रयोग के संबंध में विशिष्ट दिशा-निर्देशों के अधीन मृत्युदण्ड को रखा।
- न्यायालय ने दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354(3) की विधायी योजना का अनुसरण किया, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 393(3) है:
- आजीवन कारावास सामान्य नियम है।
- मृत्युदण्ड केवल "विशेष कारणों" (Special Reasons) के लिये ही अधिरोपित किया जा सकता है।
- न्यायालयों को अपराध की परिस्थितियों के साथ-साथ अभियुक्त की परिस्थितियों पर भी विचार करना होगा।
- मृत्युदण्ड केवल तभी अधिरोपित किया जा सकता है, जब आजीवन कारावास का विकल्प "निस्संदेह अपवर्जित" हो।
अपवादात्मकता का सिद्धांत (Exceptionality Principle) क्या है?
- बचन सिंह के अंतर्गत, मृत्युदण्ड असाधारण है, क्योंकि यह मानव जीवन की गरिमा के प्रति वास्तविक और स्थायी चिंता पर आधारित है, न कि इस बात पर कि कोई अपराध कितना दुर्लभ है।
- न्यायालय ने वैयक्तिकृत दंडादेश (Individualised Sentencing) के माध्यम से इसे प्रभावी बनाया:
- भले ही मृत्युदण्ड आनुपातिक हो, फिर भी इसे केवल अभियुक्त की व्यक्तिगत परिस्थितियों पर समुचित विचार करने के पश्चात ही अधिरोपित किया जा सकता है।
- न्यायालय यह परीक्षा कर सकते हैं कि सामाजिक, संरचनात्मक और मनोवैज्ञानिक कारक नैतिक दोषिता को किस प्रकार प्रभावित करते हैं तथा क्या सुधार की संभावना वास्तव में समाप्त हो चुकी है।
- राज्य को साक्ष्य के माध्यम से यह साबित करना होगा कि सुधार की कोई संभावना नहीं है।
बचन सिंह के ढाँचे को किस प्रकार कमजोर किया गया?
- मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983): संगीता बनाम हरियाणा राज्य (2013) में न्यायालय ने बाद में स्वीकार किया कि मच्छी सिंह के निर्णय ने ध्यान अपराध की ओर केंद्रित कर दिया था। वस्तुतः, इसमें यह पूछा गया कि क्या आजीवन कारावास अधिरोपित करने के कारण मौजूद हैं, न कि यह कि मृत्युदण्ड अधिरोपित करने के लिये विशेष कारण मौजूद हैं या नहीं।
- रावजी बनाम राजस्थान राज्य (दिसंबर 1995): दो न्यायाधीशों की पीठ ने इससे भी आगे बढ़कर यह निर्णय दिया। इसने माना कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता, न कि अपराधी की परिस्थितियाँ, दण्ड का निर्धारण करती हैं।
- रावजी के निर्णय के अंतर्गत निष्पादन:
- रावजी को मई 1996 में तथा सूरजा राम को अप्रैल 1997 में फाँसी दी गई।
- दोनों को ऐसे सिद्धांत के आधार पर मृत्युदण्ड दिया गया, जिसे उच्चतम न्यायालय ने बाद में बाध्यकारी विधि के विपरीत घोषित किया।
बारीयार मामले में न्यायालय ने अपना दृष्टिकोण किस प्रकार सुधारा?
- संतोष कुमार बारीयार बनाम महाराष्ट्र राज्य (2009) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि रावजी का निर्णय बचन सिंह के निर्णय की उपेक्षा करते हुए दिया गया था, जिसके कारण वह Per Incuriam (विधि के सुसंगत उपबंधों अथवा बाध्यकारी न्यायिक पूर्वनिर्णय की अनदेखी में दिया गया निर्णय) था।
- न्यायालय ने उल्लेख किया कि रावजी के निर्णय का अनुसरण कम-से-कम छह अन्य मामलों में किया गया था, जिनमें मृत्युदण्ड अधिरोपित किया गया था।
- बारीयार ने स्पष्ट किया कि आजीवन कारावास का विकल्प केवल तभी "निस्संदेह अपवर्जित" होता है, जब सुधार का दंडादेश संबंधी उद्देश्य प्राप्त नहीं किया जा सकता।
- वर्ष 2012 में, 14 सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने रावजी और सूरजा राम को दी गई फाँसी को स्वतंत्र भारत में न्याय की ज्ञात सबसे गंभीर विफलता बताया।
सुधार पर केंद्रित दृष्टिकोण किस प्रकार विकसित हुआ है?
- बारीयार के बाद तथा अन्य स्थानों के साथ-साथ विधि आयोग की 262वीं रिपोर्ट (2015) में भी सुधार को मृत्युदण्ड के मामलों में एक केंद्रीय उद्देश्य के रूप में माना गया है।
- तथापि, विचारण न्यायालयों में दंडादेश की प्रक्रिया में बहुत कम परिवर्तन हुआ:
- वर्ष 2018 से 2020 के बीच अधिरोपित 306 मृत्युदंडों के एक राष्ट्रव्यापी अध्ययन में पाया गया कि 36.1% मृत्युदण्ड दोषसिद्धि वाले दिन ही सुनाए गए तथा 18.4% अगले दिन सुनाए गए।
- अधिकांश मामलों में, प्रतिरक्षा पक्ष ने न तो शमनकारी परिस्थितियों पर तर्क प्रस्तुत किये और न ही उनके संबंध में साक्ष्य प्रस्तुत किये।
मनोज और बाद के मामलों में उच्चतम न्यायालय ने क्या निर्णय दिया?
अपराध-केंद्रित इस कार्यप्रणाली का सामना करते हुए, उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में स्वयं दंडादेश प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ध्यान केंद्रित किया है।
- मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022):
- न्यायालय ने अभियुक्त के संबंध में जानकारी एकत्रित करने हेतु व्यावहारिक दिशा-निर्देश निर्धारित किये।
- राज्य को निम्नलिखित प्रस्तुत करना होगा:
- अभियुक्त का मानसिक स्वास्थ्य मूल्यांकन।
- अभिरक्षा के दौरान अभियुक्त के आचरण से संबंधित रिपोर्टें।
- परिवीक्षा अधिकारी की रिपोर्ट।
- स्वतः संज्ञान रिट याचिका (संविधान पीठ को संदर्भित): न्यायालय ने माना कि प्रतिरक्षा पक्ष को दण्ड के संबंध में सामग्री प्रस्तुत करने का वास्तविक और सार्थक अवसर मिलना चाहिये।
- वसंत संपत दुपारे बनाम भारत संघ (2025):
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि मनोज के अनुरूप दंडादेश सुनवाई का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 से उत्पन्न होता है।
- ऐसी सुनवाई के बिना अधिरोपित मृत्युदण्ड असांविधानिक है।
- ऐसा दंडादेश अंतिमता प्राप्त कर लेने के पश्चात भी पुनः खोला जा सकता है।
- वारिस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (सितंबर 2026):
- न्यायालय ने एक बालक के बलात्संग और हत्या के लिये दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा, किंतु मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया।
- राज्य सुधार की संभावना को समाप्त करने के लिये कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया था।
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी अपराध की गंभीरता, चाहे वह कितनी भी चरम क्यों न हो, अपने आप में यह प्रदर्शित नहीं कर सकती कि आजीवन कारावास का विकल्प निस्संदेह अपवर्जित है।
क्या मनोज की प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है?
- वर्ष 2025 में विचारण न्यायालयों ने 128 व्यक्तियों को मृत्युदण्ड सुनाया।
- जिन मामलों में अनुपालन का आकलन किया जा सकता था, उनमें से 95.18% मामलों में विचारण न्यायालयों ने मनोज में निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया।
व्यापक चिंता क्या है?
- बड़ी समस्या केवल दंडादेश तक सीमित नहीं है, अपितु दोषसिद्धियों में भी निहित है:
- पिछले एक दशक में, उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत मृत्युदण्ड के लगभग एक-तिहाई मामलों का परिणाम दोषमुक्ति के रूप में सामने आया।
- केवल वर्ष 2025 में ही, उच्चतम न्यायालय ने अपने द्वारा निर्णीत मृत्युदण्ड के 19 मामलों में से 10 में अभियुक्तों को दोषमुक्त कर दिया तथा बार-बार गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण अन्वेषण और अभियोजन पर ध्यान आकर्षित किया।
- दुपारे के मामले में, न्यायालय ने स्वीकार किया कि अन्वेषण प्रायः ऐसी संस्वीकृतियों पर आधारित होते हैं, जो पारदर्शिता के अभाव में अभिप्राप्त की जाती हैं तथा ऐसे न्यायवैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित होते हैं, जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध होती है।
- त्रुटियों की ऐसी आशंका से ग्रस्त प्रणाली में, केवल अपराध की प्रकृति के आधार पर अपरिवर्तनीय दण्ड निर्धारित करना सुरक्षित नहीं हो सकता।
- बचन सिंह मामले में, उच्चतम न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि न्यायाधीशों को कभी भी "रक्तपिपासु" (Bloodthirsty) नहीं होना चाहिये।
निष्कर्ष
बचन सिंह से लेकर दुपारे तक, उच्चतम न्यायालय ने प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का एक सुसंगत ढाँचा विकसित किया है, जिसमें वैयक्तिकृत दंडादेश, सुधार की संभावना को समाप्त सिद्ध करने का भार राज्य पर अधिरोपित करना तथा संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 में निहित सिद्धांतों पर आधारित सार्थक दंडादेश सुनवाई सम्मिलित हैं। रावजी का मामला दर्शाता है कि जब जघन्य अपराधों के प्रति जनाक्रोश विधिक तर्कणा पर हावी हो जाता है, तो उसके क्या परिणाम हो सकते हैं। ये सुरक्षा उपाय न्याय के मार्ग में बाधाएँ नहीं हैं, अपितु वे अनिवार्य शर्तें हैं जिन पर मृत्युदण्ड की सांविधानिकता निर्भर करती है। इनका अनुपालन करना दया का कार्य नहीं है, अपितु संविधान द्वारा अधिरोपित अनिवार्यता है। विचारण न्यायालय अभी भी बड़े पैमाने पर मनोज मामले में प्रतिपादित निर्देशों का अनुपालन नहीं करते हैं तथा मृत्युदण्ड से संबंधित अनेक दोषसिद्धियाँ अंततः दोषमुक्ति में परिणत होती हैं। न्यायिक पूर्वनिर्णयों और उनके व्यावहारिक अनुपालन के बीच विद्यमान यही अंतर भारत के मृत्युदण्ड संबंधी न्यायशास्त्र के समक्ष सबसे प्रमुख चुनौती है।