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सांविधानिक विधि
विधान परिषदों की भूमिका
«03-Nov-2026
स्रोत: द हिंदू
परिचय
पिछले सप्ताह उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र और कर्नाटक में विधान परिषद की 28 सीटों के लिये निर्वाचन संपन्न हुए। निर्वाचन परिणामों के पश्चात् प्रधानमंत्री सहित विभिन्न राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं के मध्य परस्पर बयानबाजी हुई, जिसके परिणामस्वरूप विधान परिषदों के संबंध में जनसामान्य की जिज्ञासा पुनः बढ़ गई।
ब्रिटिश भारत में विधान परिषदें क्या थीं?
- भारत शासन अधिनियम, 1935 द्वारा छह बड़े प्रांतों—मद्रास, बंबई, बंगाल, संयुक्त प्रांत, बिहार और असम में द्विसदनीय विधायिकाओं (Bicameral Legislatures) की स्थापना की गई।
- इन परिषदों के निर्वाचक मंडल का स्वरूप अत्यंत सीमित एवं अभिजनवादी (Elitist) था। केवल अत्यधिक धनी अथवा शिक्षित अल्पसंख्यक वर्ग को ही मतदान का अधिकार प्राप्त था।
- इन परिषदों का उद्देश्य पुनरीक्षण सदन (Revising Chambers) के रूप में कार्य करना था, जो प्रांतीय विधान सभाओं के कार्यों की समीक्षा करती थीं। इन्हें भंग नहीं किया जा सकता था। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल नौ वर्ष होता था तथा प्रत्येक तीन वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते थे।
- इन विधान परिषदों को विधेयकों के पारित किए जाने के संबंध में विधान सभाओं के समान शक्तियां प्राप्त थीं। यदि दोनों सदनों के मध्य असहमति उत्पन्न होती थी अथवा कोई विधेयक परिषद में 12 माह तक लंबित रहता था, तो राज्यपाल को गतिरोध समाप्त करने के लिये केवल प्रांतीय विधान सभा एवं विधान परिषद की संयुक्त बैठक आहूत करने का अधिकार था।
विधान परिषदों के संबंध में संविधान सभा में क्या बहस हुई थी?
राज्यों में विधान परिषदों की स्थापना की जानी चाहिये अथवा नहीं, इस प्रश्न पर संविधान सभा में व्यापक एवं गहन विचार-विमर्श हुआ था।
- कुछ सदस्यों ने विधान परिषदों का समर्थन इस आधार पर किया कि वे लोकप्रिय रूप से निर्वाचित विधान सभाओं द्वारा जल्दबाजी में पारित किये गए विधानों के विरुद्ध नियंत्रण एवं संतुलन (Checks and Balances) के रूप में कार्य करती हैं। जबकि अन्य सदस्यों ने इन्हें लोक राजकोष पर अनावश्यक वित्तीय भार माना।
- कुछ सदस्यों ने इस आधार पर भी आपत्ति व्यक्त की कि विधान परिषद के गठन से संबंधित सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पहलुओं को स्वयं संविधान में स्पष्ट रूप से विनिर्दिष्ट करने के स्थान पर संसद के साधारण विधान के अधीन छोड़ दिया गया था।
- पर्याप्त विचार-विमर्श के पश्चात् विधान परिषदों से संबंधित सांविधानिक उपबंधों को अंगीकृत कर लिया गया।
राज्य विधान परिषदों की संरचना क्या है?
संविधान का अनुच्छेद 168 उपबंधित करता है कि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, बिहार, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक राज्यों के विधानमंडलों में विधान परिषद होगी।
अनुच्छेद 169 उपबंधित करता है कि संसद साधारण विधि द्वारा किसी राज्य में विधान परिषद का सृजन अथवा उसका उन्मूलन कर सकती है। तथापि, संसद ऐसी विधि तभी पारित कर सकती है, जब संबंधित राज्य की विधान सभा पहले इस आशय का संकल्प अपने कुल सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दे।
अनुच्छेद 171 उपबंधित करता है कि विधान परिषद के सदस्यों की कुल संख्या संबंधित राज्य की विधान सभा के सदस्यों की कुल संख्या के अधिकतम एक-तिहाई से अधिक नहीं होगी तथा किसी भी स्थिति में सदस्यों की संख्या 40 से कम नहीं होगी। विधान परिषद के सदस्यों का निर्वाचन एवं नामांकन निम्नलिखित प्रकार से किया जाता है:
- एक-तिहाई सदस्य नगरपालिकाओं एवं अन्य स्थानीय निकायों के सदस्यों द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं।
- एक-बारहवाँ सदस्य ऐसे व्यक्तियों द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं, जो कम-से-कम तीन वर्ष से स्नातक हों।
- एक-बारहवाँ सदस्य ऐसे माध्यमिक स्तर के शिक्षकों द्वारा निर्वाचित किये जाते हैं, जिन्हें कम-से-कम तीन वर्ष का शिक्षण अनुभव प्राप्त हो।
- एक-तिहाई सदस्य राज्य की विधान सभा के सदस्यों (MLAs) द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं।
- शेष एक-छठा सदस्य नामनिर्देशन (Nomination) द्वारा नियुक्त किये जाते हैं।
अनुच्छेद 172 उपबंधित करता है कि किसी राज्य की विधान परिषद विघटित नहीं की जा सकती। इसके प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष होता है तथा प्रत्येक दो वर्ष में एक-तिहाई सदस्य सेवानिवृत्त होते हैं।
विधान परिषद की शक्तियां क्या हैं?
- राज्य के मुख्यमंत्री सहित मंत्री, राज्य की विधान परिषद के सदस्य हो सकते हैं। इसी प्रकार, केंद्रीय मंत्री भी राज्यसभा के सदस्य हो सकते हैं।
- तथापि, विधायी प्रक्रिया में विधान परिषद की शक्तियां अत्यंत सीमित हैं। संविधान में विधान सभा एवं विधान परिषद के मध्य विधेयकों के संबंध में उत्पन्न गतिरोध को समाप्त करने के लिये संयुक्त बैठक का कोई उपबंध नहीं किया गया है।
- यदि दोनों सदनों के मध्य किसी विधेयक को लेकर असहमति उत्पन्न होती है, तो विधान सभा द्वारा पारित विधेयक ही अंतिम माना जाता है। विधान परिषद केवल विधेयक के पारित होने में अधिकतम चार माह तक विलंब कर सकती है।
समस्याएँ एवं भावी कार्ययोजना क्या है?
विधान परिषदों के उन्मूलन एवं सृजन के पीछे राजनीतिक विचार:
- विधान परिषदों का अधिकांशतः राजनीतिक कारणों से ही उन्मूलन अथवा सृजन किया गया है।
- तमिलनाडु की विधान परिषद का वर्ष 1986 में, जब एम.जी. रामचंद्रन मुख्यमंत्री थे, उन्मूलन कर दिया गया था।
- वर्ष 2010 में, जब एम. करुणानिधि मुख्यमंत्री थे, राज्य विधान सभा ने विधान परिषद को पुनः स्थापित करने के लिये एक संकल्प पारित किया। किंतु संसद द्वारा इसके पुनः सृजन संबंधी विधि को अधिसूचित किये जाने से पूर्व ही, वर्ष 2011 में जे. जयललिता के मुख्यमंत्री बनने के पश्चात् विधान सभा ने इसके पुनरुद्धार का विरोध करते हुए एक अन्य संकल्प पारित कर दिया।
- आंध्र प्रदेश की विधान परिषद का वर्ष 1985 में, जब एन.टी. रामाराव मुख्यमंत्री थे, उन्मूलन कर दिया गया था तथा वर्ष 2007 में इसका पुनः सृजन किया गया।
द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (ARC) की सिफारिशें:
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने अपनी स्थानीय शासन संबंधी रिपोर्ट, 2007 में प्रस्तावित किया कि संसद विधि द्वारा प्रत्येक राज्य में एक विधान परिषद का गठन 'स्थानीय शासन परिषद' के रूप में कर सकती है।
- आयोग का तर्क था कि वर्तमान समय में देशभर में साक्षरता का स्तर पर्याप्त रूप से बढ़ जाने के कारण स्नातकों एवं शिक्षकों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की आवश्यकता नहीं रह गई है।
- इसके स्थान पर विधान परिषद के सभी सदस्यों का निर्वाचन केवल स्थानीय निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा किया जा सकता है।
भावी कार्ययोजना:
- द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग की सिफारिश पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए तथा उसे उपयुक्त रूप से क्रियान्वित किया जाना चाहिये।
- अपनी सीमित विधायी शक्तियों के बावजूद, इस प्रकार गठित विधान परिषद एक प्रभावी 'पुनरीक्षण सदन' के रूप में कार्य कर सकती है, जो स्थानीय निकायों के हितों का संरक्षण एवं संवर्द्धन सुनिश्चित करेगी।
- अन्यथा, जिन छह राज्यों में वर्तमान में विधान परिषदें विद्यमान हैं, वहाँ इन्हें राज्य विधानमंडलों की मात्र शोभा बढ़ाने वाली संस्थाओं के रूप में बनाए रखने के बजाय इनका उन्मूलन कर दिया जाना चाहिये।
निष्कर्ष
विधान परिषदों की स्थापना का उद्देश्य पुनरीक्षण सदन के रूप में कार्य करना था, जिससे वे राज्य विधान सभाओं द्वारा जल्दबाजी में पारित किये गए विधानों पर नियंत्रण रख सकें। तथापि, इनका सृजन एवं उन्मूलन प्रायः राजनीतिक कारणों से किया जाता रहा है। संविधान में इनकी संरचना, कार्यकाल एवं भूमिका का उपबंध किया गया है, किंतु इनकी विधायी शक्तियां सीमित हैं तथा ये केवल विधेयकों के पारित होने में विलंब कर सकती हैं। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग द्वारा इन्हें स्थानीय शासन परिषदों के रूप में परिवर्तित करने तथा इनके सदस्यों का निर्वाचन केवल स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों द्वारा कराए जाने का प्रस्ताव किया गया है। यह प्रस्ताव स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करने में विधान परिषदों की भूमिका एवं उद्देश्य को स्पष्ट आधार प्रदान करता है। इस प्रकार के परिवर्तन के अभाव में, इन्हें मात्र अलंकरणात्मक संस्थाओं (Ornamental Bodies) के रूप में बनाए रखने के बजाय इनके उन्मूलन पर विचार किया जाना अधिक तर्कसंगत होगा।