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आपराधिक कानून
सरकारी कंपनियों के कर्मचारी स्वतः ही अभियोजन हेतु पूर्व मंजूरी के संरक्षण के हकदार नहीं होते हैं
« »05-Nov-2026
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जोधपुर डिस्कॉम्स बनाम ललित सोनी एवं अन्य इत्यादि “सरकारी अभिकरण का कोई कर्मचारी मात्र इस कारण कि वह लोक सेवक है, स्वतः ही ऐसा सरकारी सेवक नहीं हो जाता कि वह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अंतर्गत संरक्षण का हकदार हो।” न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति श्री चंद्रशेखर की पीठ ने जोधपुर डिस्कॉम बनाम ललित सोनी एवं अन्य (2026) में निर्णय दिया। न्यायालय ने अपील स्वीकार करते हुए राजस्थान उच्च न्यायालय के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसके द्वारा दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218) के अंतर्गत पूर्व मंज़ूरी न लिये जाने के कारण जोधपुर डिस्कॉम के तीन कर्मचारियों को उन्मोचित किया गया था। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि सरकारी कंपनियों के कर्मचारी मंज़ूरी संरक्षण के स्वतः हकदार नहीं हैं।
जोधपुर डिस्कॉम्स बनाम ललित सोनी और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- जोधपुर डिस्कॉम्स के तीन कर्मचारियों पर मीटर से छेड़छाड़ करके बालिम स्टील प्राइवेट लिमिटेड द्वारा की गई विद्युत चोरी के दुष्प्रेरण का आरोप लगाया गया था। वे कर्मचारी थे:
- एक कार्यकारी अभियंता,
- एक सहायक अभियंता, और
- एक जूनियर इंजीनियर।
- अभियोजन पक्ष का आरोप था कि कंपनी ने विद्युत चोरी से लगभग ₹12.99 करोड़ की राशि अर्जित की थी, जिसमें से ₹8.15 करोड़ की राशि का भुगतान अभी भी बकाया था।
- अन्वेषण के पश्चात आरोप-पत्र दाखिल किया गया, न्यायालय ने अपराध का संज्ञान लिया तथा विद्युत अधिनियम, 2003 के अधीन आरोप विरचित किये गए।
- कर्मचारियों ने राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष पुनरीक्षण याचिका प्रस्तुत कीं।
- उच्च न्यायालय ने याचिका स्वीकार करते हुए संज्ञान लेने के आदेश को अपास्त कर दिया। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधीन पूर्व स्वीकृति प्राप्त नहीं की गई थी।
- इसके पश्चात जोधपुर डिस्कॉम्स ने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत की।
उच्चतम न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न:
- क्या किसी सरकारी कंपनी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम के ऐसे कर्मचारी, जिन्हें लोक सेवक माना जाता है, दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 218) के अधीन संरक्षण का दावा कर सकते हैं तथा उनके विरुद्ध अभियोजन चलाने से पूर्व पूर्व स्वीकृति प्राप्त करना अनिवार्य है?
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
कर्मचारियों की स्थिति पर:
- न्यायालय ने ध्यान दिया कि तीनों कर्मचारी विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 169 के अधीन लोक सेवक थे।
- तथापि, वे जोधपुर डिस्कॉम्स के कर्मचारी थे। राज्य सरकार ने न तो उनकी नियुक्ति की थी और न ही उन्हें पद से हटाने की शक्ति राज्य सरकार के पास थी।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के संरक्षण के संबंध में:
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि किसी सरकारी अभिकरण का कर्मचारी केवल इस आधार पर स्वतः ऐसा सरकारी सेवक नहीं बन जाता, जो दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधीन संरक्षण प्राप्त करने का अधिकारी हो कि वह लोक सेवक है।
- लोक सेवक” होना तथा ऐसा व्यक्ति होना “जिसे सरकार की मंजूरी के बिना या उसके प्राधिकार से ही पद से हटाया जा सकता है”, दो पृथक अवधारणाएँ हैं। दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218) के अधीन पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता केवल दूसरी शर्त पूरी होने पर लागू होती है।
संविधान के अनुच्छेद 12 और सरकारी कंपनियों के संबंध में:
- मोहम्मद हादी राजा बनाम बिहार राज्य (1998) और पंजाब राज्य वेयरहाउसिंग कॉर्पोरेशन बनाम भूषण चंदर (2016) के निर्णयों पर विश्वास करते हुए, न्यायालय ने पुनः स्पष्ट किया कि सरकारी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों के अधिकारी केवल इस आधार पर दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधीन संरक्षण प्राप्त करने के अधिकारी नहीं हो जाते कि उनके संगठन संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में ‘राज्य’ हैं।
उच्च न्यायालय के निर्णय के संबंध में:
- न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि उच्च न्यायालय के निर्णय का मूल आधार, जिसके द्वारा प्रत्यर्थियों को दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अधीन संरक्षण प्रदान किया गया था, त्रुटिपूर्ण था, क्योंकि वह उच्चतम न्यायालय द्वारा स्थापित विधि के विरुद्ध था।
निर्णय:
- अपील स्वीकार कर ली गई।
- कार्यपालक अभियंता, सहायक अभियंता और कनिष्ठ अभियंता को आरोपमुक्त करने संबंधी उच्च न्यायालय के आदेश अपास्त कर दिये गए।
- पुनरीक्षण याचिकाओं को गुण-दोष के आधार पर पुनः निर्णय किये जाने हेतु उच्च न्यायालय को वापस भेज दिया गया। इसमें यह विचार करना भी सम्मिलित था कि क्या आरोप-पत्र में उपलब्ध सामग्री उनके विरुद्ध आरोप विरचित किये जाने को न्यायोचित ठहराती है।
दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 / भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 क्या है?
बारे में:
- दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 197 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 218 द्वारा प्रतिस्थापित किया गया है, जो 1 जुलाई, 2024 से प्रवृत्त हुई।
- इस मामले का निर्णय दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अंतर्गत किया गया था, क्योंकि कार्यवाही उस समय प्रारंभ हुई थी जब दण्ड प्रक्रिया संहिता प्रवृत्त थी। यह सिद्धांत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 पर भी समान रूप से लागू होता है।
- यह उपबंध न्यायाधीशों, मजिस्ट्रेटों तथा कतिपय लोक सेवकों को समुचित सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना अभियोजन से संरक्षण प्रदान करता है।
- इसका उद्देश्य लोक सेवकों द्वारा अपने पदीय कर्त्तव्यों के निर्वहन के दौरान किये गए कार्यों के लिये उन्हें तुच्छ या उत्पीड़नकारी अभियोजन से संरक्षण प्रदान करना है, जिससे ईमानदार अधिकारियों के विरुद्ध अनुचित अभियोजन न चलाया जा सके।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218(1) [पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197(1)] – न्यायाधीशों एवं लोक सेवकों का अभियोजन:
- यह संरक्षण तब लागू होता है, जब:
- अभियुक्त कोई न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या ऐसा लोक सेवक हो या रहा हो, जिसे सरकार द्वारा अथवा सरकार की मंजूरी के बिना पद से हटाया नहीं जा सकता हो, और
- यह आरोप लगाया गया हो कि अपराध उसके पदीय कर्त्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए अथवा ऐसा कार्य करने का दावा करते हुए किया गया है।
- ऐसी परिस्थितियों में, कोई भी न्यायालय निम्नलिखित की पूर्व मंजूरी के बिना अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता है:
- केंद्र सरकार, यदि संबंधित व्यक्ति संघ के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित है या रहा है, या
- राज्य सरकार, यदि संबंधित व्यक्ति किसी राज्य के कार्यकलापों के संबंध में नियोजित है या रहा है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन प्रमुख परिवर्तन:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 218 में मंजूरी प्रदान करने के संबंध में एक समय-सीमा निर्धारित की गई है। मंजूरी प्रदान करने वाले प्राधिकारी के लिये मंजूरी के अनुरोध पर 120 दिनों के भीतर निर्णय लेना अनिवार्य है। यदि निर्धारित 120 दिनों की अवधि के भीतर प्राधिकारी द्वारा कोई निर्णय नहीं लिया जाता है, तो मंजूरी मंजूर की गई मानी जाएगी।