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सांविधानिक विधि

यदि अभियुक्त को 24 घंटे के भीतर प्रस्तुत कर दिया जाता है, तो पारगमन रिमांड (ट्रांजिट रिमांड) अनिवार्य नहीं है ज़रूरी नहीं है

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 05-Nov-2026

सबीना प्रकाश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य 

“'निकटतम मजिस्ट्रेट' से आशय 'समय' से है, 'दूरी' से नहीं।” 

न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी और न्यायमूर्ति अलापति गिरिधर 

स्रोत: आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति रवि नाथ तिलहरी एवं न्यायमूर्ति अलापाटी गिरिधर की खंडपीठ ने सबीना प्रकाश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य (2026) के मामले में निर्णय दिया। न्यायालय ने बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी और अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा पारित रिमांड आदेश को यथावत रखा। न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर दिया जाए, तो पारगमन रिमांड प्राप्त न करना अपने आप में अनुच्छेद 22(2) का उल्लंघन नहीं है। 

सबीना प्रकाश बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला कर्नाटक में निरुद्ध व्यक्ति और एक अन्य व्यक्ति के बीच लंबे समय से चले आ रहे संपत्ति विवाद से उत्पन्न हुआ था, जिसके परिणामस्वरूप सिविल मुकदमेबाजी तथा कई आपराधिक मामले उत्पन्न हुए थे। 
  • इसी पृष्ठभूमि में, आंध्र प्रदेश पुलिस ने उसी संपत्ति विवाद से संबंधित अपराधों के संबंध में आंध्र प्रदेश में एक पृथक आपराधिक मामला दर्ज किया। 
  • निरुद्ध व्यक्ति को षड्यंत्र के आरोप के आधार पर अभियुक्त बनाया गया था, जबकि: 
    • वह घटनास्थल पर शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं था, और 
    • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) में उसके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष कृत्य (Overt Act) आरोपित नहीं किया गया था। 
  • आंध्र प्रदेश पुलिस ने उसे कर्नाटक में गिरफ्तार किया और कर्नाटक के किसी मजिस्ट्रेट से पारगमन रिमांड (Transit Remand) प्राप्त किये बिना उसे आंध्र प्रदेश ले गई। 
  • गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर, उसे मामले पर अधिकारिता रखने वाले आंध्र प्रदेश के मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया तथा उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया। 
  • उसकी पत्नी (याचिकाकर्त्ता) ने उच्च न्यायालय के समक्ष बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत की। उसने तर्क दिया कि पुलिस को उसे आंध्र प्रदेश ले जाने से पूर्व कर्नाटक में निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिये था। 
  • अवैध रूप से अभिरक्षा में लिये जाने और मारपीट किये जाने के संबंध में कर्नाटक पुलिस के समक्ष एक पृथक परिवाद भी दायर किया गया था। 
  • आंध्र प्रदेश राज्य ने तर्क दिया कि: 
    • निरुद्ध व्यक्ति को संविधान द्वारा निर्धारित समय-सीमा के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया था, 
    • इन परिस्थितियों में पारगमन रिमांड प्राप्त करना अनिवार्य नहीं था, और 
    • न तो अनुच्छेद 22(2) का और न ही भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) का कोई उल्लंघन हुआ था। 

उच्च न्यायालय के समक्ष विचारणीय प्रश्न: 

  • यदि पुलिस किसी व्यक्ति को अपनी अधिकारिता से बाहर गिरफ्तार करने के पश्चात निकटतम गैर-अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट से पारगमन रिमांड प्राप्त नहीं करती, किंतु उस व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर देती है, तो क्या रिमांड आदेश अविधिमान्य होगा और निरुद्धि अवैध मानी जाएगी? 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

अनुच्छेद 22(2) में प्रयुक्त अभिव्यक्ति “निकटतम मजिस्ट्रेट” के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि “निकटतम मजिस्ट्रेट” का तात्पर्य आवश्यक रूप से गिरफ्तारी के स्थान से अधिकारिता रखने वाले अथवा गैर-अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट की भौतिक दूरी से नहीं है। 
  • “निकटतम” का संबंध समय से है, अर्थात् क्या गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है। 
  • गैर-अधिकारिता वाला मजिस्ट्रेट भौतिक रूप से अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट की तुलना में अधिक निकट हो सकता है। इसके होते हुए भी, यदि पुलिस गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर देती है, तो मूल अधिकारों का कोई उल्लंघन नहीं होता। 

व्यावहारिक परिस्थितियों के संबंध में:  

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भौगोलिक स्थिति, परिवहन सुविधाएँ तथा सड़क संपर्क की उपलब्धता के कारण ऐसा संभव है कि अधिक दूरी पर स्थित न्यायालय तक उस निकटवर्ती मजिस्ट्रेट के न्यायालय की तुलना में पहले पहुँचा जा सके, जिसके पास मामले पर अधिकारिता नहीं है। 

पारगमन रिमांड (Transit Remand) के संबंध में: 

  • न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि गिरफ्तार व्यक्ति को रिमांड हेतु अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिये पारगमन रिमांड प्राप्त करना अनिवार्य नहीं है। 
  • केवल पारगमन रिमांड प्राप्त न करना अपने आप में अनुच्छेद 22(2) अथवा भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के प्रासंगिक उपबंधों का उल्लंघन नहीं है, बशर्ते गिरफ्तार व्यक्ति को आवश्यक यात्रा समय को अपवर्जित करते हुए 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। 

गिरफ्तारी के आधारों के संबंध में: 

  • न्यायालय ने ध्यान दिया कि सुनवाई के दौरान याचिकाकर्त्ता ने अपनी चुनौती को केवल पारगमन रिमांड प्राप्त न किये जाने तक सीमित रखा था। उसने पृथक रूप से यह तर्क नहीं दिया कि गिरफ्तारी के आधारों की संसूचना नहीं दी गई थी। 
  • न्यायालय ने अभिलिखित किया कि गिरफ्तारी के आधारों को अंतर्विष्ट करने वाली रिमांड रिपोर्ट, रिमांड आदेश पारित किये जाने से पूर्व निरुद्ध व्यक्ति तथा उसके परिवार को तामील कर दी गई थी। 

निर्णय: 

  • अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट द्वारा पारित रिमांड आदेश को विधिमान्य अभिनिर्धारित किया गया। 
  • उक्त आदेश के अधीन निरुद्ध व्यक्ति की निरंतर अभिरक्षा को विधिसम्मत माना गया तथा उसे अवैध निरुद्धि नहीं माना गया। 
  • रिट याचिका खारिज कर दी गई। 

संविधान का अनुच्छेद 22(2) तथा संबंधित भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के उपबंध क्या हैं? 

बारे में: 

  • संविधान का अनुच्छेद 22 व्यक्तियों को मनमानी गिरफ्तारी एवं निरोध के विरुद्ध संरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 21 के साथ मिलकर यह गिरफ्तार व्यक्तियों के लिये प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों का मूल आधार निर्मित करता है। 
  • कोई व्यक्ति, जो अवैध रूप से निरुद्ध किये जाने का दावा करता है, अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय अथवा अनुच्छेद 32 के अंतर्गत उच्चतम न्यायालय से बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) की रिट जारी करने की मांग कर सकता है। 

अनुच्छेद 22(1): 

  • गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को यथाशीघ्र उसकी गिरफ्तारी के आधारों की जानकारी दी जानी अनिवार्य है। 
  • गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी पसंद के विधि व्यवसायी (Legal Practitioner) से परामर्श करने तथा उसके द्वारा प्रतिरक्षित होने का अधिकार प्राप्त है। 

अनुच्छेद 22(2): 

  • गिरफ्तार एवं निरुद्ध किए गए प्रत्येक व्यक्ति को गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य है। 
  • गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा करने में लगा आवश्यक समय 24 घंटे की अवधि की गणना से अपवर्जित किया जाएगा। 
  • किसी भी ऐसे व्यक्ति को इस अवधि से अधिक समय तक मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना निरुद्ध नहीं रखा जा सकता है।  

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 58 (पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 57)– गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे से अधिक निरुद्ध न रखा जाना: 

  • कोई पुलिस अधिकारी, बिना वारण्ट के गिरफ्तार किये गए व्यक्ति को परिस्थितियों के अंतर्गत युक्तियुक्त अवधि से अधिक समय तक निरुद्ध नहीं रख सकता है। 
  • यह अवधि 24 घंटे से अधिक नहीं हो सकती है। तथापि, मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा करने में लगा आवश्यक समय इस अवधि की गणना से अपवर्जित होगा, जब तक कि मजिस्ट्रेट द्वारा अन्यथा आदेश न दिया जाए। 

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187 (पूर्ववर्ती दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 167) – जब अन्वेषण 24 घंटे के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता, तब प्रक्रिया: 

  • यदि अन्वेषण 24 घंटे के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता है, तो गिरफ्तार व्यक्ति को निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजना अनिवार्य है। 
  • मजिस्ट्रेट, चाहे उसे मामले का विचारण करने की अधिकारिता प्राप्त हो या नहीं, व्यक्ति के निरोध को प्राधिकृत कर सकता है। 
  • अधिकारिता से रहित मजिस्ट्रेट केवल सीमित अवधि के लिए निरोध को प्राधिकृत कर सकता है तथा तत्पश्चात् अभियुक्त को अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष भेजना अनिवार्य है। व्यवहार में, इस प्रकार के सीमित अवधि के निरोध संबंधी आदेश को पारगमन रिमांड (Transit Remand) कहा जाता है। 

पारगमन रिमांड (Transit Remand) 

  • पारगमन रिमांड, गिरफ्तारी के स्थान पर स्थित मजिस्ट्रेट द्वारा पारित ऐसा आदेश है, जिसके माध्यम से पुलिस को गिरफ्तार व्यक्ति को उस न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने की अनुमति दी जाती है, जिसे मामले की सुनवाई करने की अधिकारिता प्राप्त है। 
  • सामान्यतः इसकी मांग तब की जाती है, जब अभियुक्त को किसी अन्य जिले या राज्य में गिरफ्तार किया जाता है तथा उसे 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना संभव नहीं होता है।  
  • इस मामले में, उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि पुलिस यात्रा में लगने वाले समय को अपवर्जित करते हुए, गिरफ्तार अभियुक्त को 24 घंटे के भीतर अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है, तो पारगमन रिमांड प्राप्त करना अनिवार्य नहीं है।