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सांविधानिक विधि

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के पास न्यायनिर्णयन की भूमिका नहीं है

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 29-Jul-2026

मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और अन्य 

"राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) और अनुच्छेद 338क और 338ख के अधीन इसके अन्य साथी सांविधानिक निकाय हैं जिनका उद्देश्य सामाजिक रूप से लाभकारी हैलेकिन स्पष्ट रूप सेविधायिका ने एक ऐसी भूमिका निर्धारित की है जो सिफारिशी और सलाहकारी हैलेकिन निश्चित रूप से न्यायिक नहीं है।" 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ नेमुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और अन्य (2026) के मामलेमें यह निर्णय दिया कि राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) के पास न्यायनिर्णयन संबंधी शक्तियां नहीं हैं और वह केवल अन्वेषण कर सकता हैनिष्कर्ष अभिलिखित कर सकता है और उचित सरकार को कार्रवाई की सिफारिश कर सकता हैजबकि वरिष्ठता से संबंधित सेवा विवाद में बकाया भुगतान का निदेश देने वाले NCSC के आदेश को बरकरार रखने वाले बॉम्बे उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया। 

मुंबई पोर्ट अथॉरिटी बनाम राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी 

  • प्रत्यर्थी संख्या 3, जो मुंबई बंदरगाह प्राधिकरण का एक अनुसूचित जाति कर्मचारी हैको 2002 के कार्यालय ज्ञापन (OM) के अनुसार वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नत किया गया थाजिसने 1997 के एक पूर्व कार्यालय ज्ञापन का स्थान ले लिया था। 
  • 2016 मेंबॉम्बे उच्च न्यायालय ने 2002 के OM को रद्द कर दियाजिसके बाद प्राधिकरण ने 1997 के OM के अनुसार वरिष्ठता को पुनर्निर्धारित किया और परिणामस्वरूप 2020 में प्रत्यर्थी संख्या को पदावनत कर दिया। 
  • इससे व्यथित होकर उसने NCSC से संपर्क कियाजिसने 2024 में उसे बकाया राशि के भुगतान के साथ-साथ उसकी बहाली का निदेश दिया। 
  • NCSC के आदेश को चुनौती देने वाली प्राधिकरण की याचिका को बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक रिट याचिका में खारिज कर दियाजिसके बाद उच्चतम न्यायालय में अपील की गई। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • NCSC की सांविधानिक भूमिका की प्रकृति पर:न्यायालय ने पाया कि NCSC और अनुच्छेद 338क और 338क के अंतर्गत अन्य समान निकाययद्यपि सामाजिक रूप से लाभकारी उद्देश्य वाले सांविधानिक निकाय हैंउन्हें विधायिका द्वारा सिफारिशी और सलाहकार की भूमिका सौंपी गई हैन कि न्यायनिर्णयन 
  • NCSC की शक्तियों को नियंत्रित करने वाले पूर्व निर्णयों पर:न्यायालय ने ऑल इंडिया इंडियन ओवरसीज बैंक एससी एंड एसटी एम्प्लॉईज़ वेलफेयर एसोसिएशन बनाम भारत संघ, (1996) 6 एससीसी 606 पर विश्वास कियाजहाँ पहले यह माना गया था कि अनुच्छेद 338 के अधीन NCSC के पूर्ववर्ती निकाय को प्राप्त शक्तियां अनुसूचित जातियों से संबंधित मामलों का अन्वेषण और जांच तक ही सीमित थीऔर न्यायिक आदेश पारित करने तक विस्तारित नहीं थीं।  
  • NCSC की तथ्य-खोज शक्ति की सीमाओं पर:न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपि NCSC के पास दस्तावेज़ों की मांग करने और साक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति हैलेकिन उसके पास उन साक्ष्यों को प्रभावी करने का आदेश पारित करने की समान शक्ति नहीं हैवह केवल एक तथ्यात्मक निष्कर्ष अभिलिखित कर सकता है और उसके बाद संबंधित केंद्र या राज्य सरकार को उस पर कार्रवाई करने के लिये कह सकता है।  
  • अनुच्छेद 338(5) के अधीन"सुरक्षा उपायों" के अर्थ पर: NCSC के इस तर्क को खारिज करते हुए कि "सुरक्षा उपाय" शब्द उप-अनुच्छेद (5) के अधीन प्रवर्तन कार्य करता हैन्यायालय ने माना कि यह उपबंध अनुसूचित जातियों के अधिकारों और सुरक्षा उपायों के हनन की जांच करने की शक्ति प्रदान करता हैजो कि सिफारिशी है और न्यायनिर्णय का अधिकार प्रदान नहीं करता है।  
  • विवादित आदेश की वैधता पर:न्यायालय ने माना कि बकाया भुगतान के लिये NCSC का निदेश सांविधानिक व्यवस्था के विपरीत था और इसलिये विधि की दृष्टि से अमान्य था। 
  • अनुतोष मिलने पर:मुंबई पोर्ट अथॉरिटी द्वारा दायर अपील को मंजूर कर लिया गया और NCSC के आदेश के साथ-साथ बॉम्बे उच्च न्यायालय के उस निर्णय को भी अपास्त कर दिया गया जिसमें इसे बरकरार रखा गया था। 

राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC) क्या है? 

बारे में: 

  • NCSC एक सांविधानिक निकाय है जिसकी स्थापना अनुसूचित जातियों के शोषण के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान करने और उनके सामाजिकशैक्षिकआर्थिक और सांस्कृतिक हितों को बढ़ावा देने और उनकी रक्षा करने के उद्देश्य से की गई है। 

इतिहास: 

  • विशेष अधिकारी: 
    • प्रारंभ मेंसंविधान में अनुच्छेद 338 के अधीन एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति का उपबंध था। इस विशेष अधिकारी को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के आयुक्त के रूप में नामित किया गया था। 
  • 65वाँ सांविधानिक संशोधन अधिनियम, 1990: 
    • इसने संविधान के अनुच्छेद 338 में संशोधन किया और एक सदस्यीय प्रणाली को अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिये  बहुसदस्यीय राष्ट्रीय आयोग से प्रतिस्थापित किया। 
  • 89वाँ सांविधानिक संशोधन अधिनियम, 2003: 
    • अनुच्छेद 338 में संशोधन किया गया और वर्ष 2004 से पूर्ववर्ती राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग को दो अलग-अलग आयोगों द्वारा प्रतिस्थापित किया गयाजो इस प्रकार थे: 
      • राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (NCSC)अनुच्छेद 338 के तहत। 
      • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (NCST)अनुच्छेद 338क के अधीन 

गठन: 

  • NCSC में एक अध्यक्षएक उपाध्यक्ष और तीन अतिरिक्त सदस्य होते हैं। 
  • इन पदों को राष्ट्रपति की नियुक्ति के माध्यम से भरा जाता हैजिसे उनके हस्ताक्षर और मुद्रा के अधीन जारी अधिपत्र द्वारा दर्शाया जाता है।  
    • उनकी सेवा की शर्तें और कार्यकाल भी राष्ट्रपति द्वारा अवधारित किये जाते हैं।