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आपराधिक कानून

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत प्रारंभिक निर्धारण

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 27-Jul-2026

बनाम बिहार राज्य और अन्य 

"SIR और SBR रिपोर्ट पूरक सामग्री नहीं हैंवे प्रारंभिक निर्धारण के लिये प्रासंगिक इनपुट हैं और विशेषज्ञ की राय के साथ-साथ उन्हें उचित महत्त्व दिया जाना चाहिये।" 

न्यायमूर्ति जे.बीपरदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

न्यायमूर्ति जे.बी. परदीवाला और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ नेबनाम बिहार राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंकिशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 15 के अधीन प्रारंभिक निर्धारण करते समय किशोर न्याय बोर्ड द्वारा विचार किये जाने वाले कारकों पर दिशानिर्देश जारी कियेजबकि पटना उच्च न्यायालय के उस निर्णय को चुनौती देने वाली अपील को खारिज कर दिया जिसमें अपीलकर्ता पर वयस्क के रूप में विचारण चलाने का आदेश दिया गया था। 

बनाम बिहार राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला मई 2022 में बिहार में एक लड़के की कथित हत्या से जुड़ा हैजहाँ पीड़ित का गला कथित तौर पर चाकू से काट दिया गया था। 
  • घटना के समय अपीलकर्ता की आयु16 वर्ष और चार महीने थी। उस पर अपराध का आरोप लगाया गया था और भागने की कोशिश करते समय उसे गिरफ्तार कर लिया गया था। 
  • किशोर न्याय बोर्ड ने माना कि अपीलकर्ता में अपराध करने की मानसिक और शारीरिक क्षमता का अभाव था और उसे किशोर के रूप में विचारण चलाने का निर्णय किया। 
  • परिवादकर्त्ता द्वारा दायर अपील परसेशन न्यायालय ने बोर्ड के आदेश को अपास्त कर दिया और निदेश दिया कि किशोर पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाए। 
  • पटना उच्च न्यायालय ने सेशन न्यायालय के निर्णय को बरकरार रखा। 
  • इससे व्यथित होकर किशोर ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं 

  • बोर्ड के सभी सामग्रियों का स्वतंत्र रूप से मूल्यांकन करने के कर्त्तव्य पर:न्यायालय ने माना कि किशोर न्याय बोर्ड को अपने समक्ष उपलब्ध सभी सामग्रियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहियेऔर यह कि किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के अधीन निर्धारित चार मापदंड अलग-अलग हैं और उन पर स्वतंत्र रूप से और सामूहिक रूप से दोनों तरह से विचार किया जाना चाहिये 
  • प्रारंभिक निर्धारण को लघु-विचारण बनने से रोकने के संबंध में:न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि निष्पक्ष विचारण के अधिकार और न्याय न्याय अधिनियम के अधीन निर्दोषता की उपधारणा के सिद्धांत के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक हैऔर प्रारंभिक निर्धारण करते समय अभियुक्त के अपराध या निर्दोषता के संबंध में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिये 
  • "मानसिक क्षमता" के संबंध में:न्यायालय ने मानसिक क्षमता को बालक की सामाजिक निर्णय लेने और आकलन करने की क्षमता के रूप में परिभाषित कियाजिसमें संज्ञानात्मक क्षमताएंविकासात्मक अक्षमतासमझनिर्णय लेने और तर्क करने की क्षमता शामिल हैसाथ ही संघर्ष और अपने कार्यों के परिणामों को समझने की बालक की क्षमता भी शामिल है। 
  • "शारीरिक क्षमता" के संबंध में:न्यायालय ने माना कि शारीरिक क्षमता केवल बालक की चलने-फिरने की क्षमताओं तक ही सीमित नहीं हैअपितु कथित अपराध में शामिल कृत्य की प्रकृति के संदर्भ में इसका आकलन किया जाना चाहियेजिसमें यह भी शामिल है कि क्या बालकअपनी आयु और शारीरिक विकास को देखते हुएकथित तरीके से अपराध करने में शारीरिक रूप से सक्षम था। 
  • धारा 15 के अंतर्गत "परिणामों" पर:बरुन चंद्र ठाकुर बनाम भोलू के मामले में अपने पूर्व के निर्णय पर विश्वास करते हुएन्यायालय ने माना कि "परिणामों" को व्यापक रूप से पढ़ा जाना चाहिये जिससे पीड़ितबालक और दोनों परिवारों पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक और दीर्घकालिक प्रभावों को शामिल किया जा सकेन कि केवल तात्कालिक शारीरिक हानि को। न्यायालय ने यह भी कहा कि जोखिम के प्रति बालक की बौद्धिक जागरूकता आवश्यक नहीं कि आवेगी व्यवहार को नियंत्रित करने की क्षमता में तब्दील होक्योंकि उस आयु में साथियों का प्रभाव और भावनात्मक आवेग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 
  • विशेषज्ञ की राय को एकमात्र मानदंड न मानने पर:न्यायालय ने पाया कि किशोर न्याय बोर्ड ने धारा 15(1) के अधीन केवल विशेषज्ञ की राय के आधार पर अपना निष्कर्ष निकालने में त्रुटि की हैजबकि उसने सामाजिक अन्वेषण रिपोर्ट (SIR) या सामाजिक पृष्ठभूमि रिपोर्ट (SBR) पर कोई विचार नहीं कियाजिसमें परिवीक्षा अधिकारी और बाल कल्याण पुलिस अधिकारी के पूर्ववृत्त और सिफारिशें शामिल थीं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि यद्यपिबरुन चंद्र ठाकुर बनाम भोलू के मामलेमें विशेषज्ञ सहायता के महत्त्व पर विचार किया गया थाफिर भी बोर्ड के निर्णय में विशेषज्ञ की राय एकमात्र मानदंड नहीं हो सकती। 
  • निर्धारण के लिये अतिरिक्त कारकों पर:न्यायालय ने चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ बनाम गुजरात राज्य के मामले में गुजरात उच्च न्यायालय के निर्णय का हवाला दियाजिसमें SIR और SBR के अलावा विचार किये जाने वाले ग्यारह अतिरिक्त कारकों को सूचीबद्ध किया गया थाजिसमें बालक का पूर्ववृत्त और स्कूल और शिक्षा संबंधी रिकॉर्ड शामिल हैं। 
  • तर्कसंगत निर्णय की आवश्यकता पर:न्यायालय ने किशोर न्याय बोर्ड के लिये यह अनिवार्य कर दिया कि वह इस बात पर तर्कसंगत निर्णय अभिलिखित करे कि किशोर पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाना चाहिये या नहींजिसमें SIR और SBR में दिये गए अवलोकन और सिफारिशों को स्वीकार करने या अस्वीकार करने के कारण भी शामिल होंऔर धारा 15 के अधीन चार मापदंडों के आलोक में सभी सामग्री का एक साथ मूल्यांकन करे। 
  • किशोर न्याय मॉडल नियम, 2016 के नियम 10क पर:न्यायालय ने नियम 10क के महत्त्व को दोहरायाजो बोर्ड को कठिन परिस्थितियों में बालकों के साथ काम करने का अनुभव रखने वाले मनोवैज्ञानिकों और मनोसामाजिक कार्यकर्ताओं की सहायता लेने के लिये अधिकृत करता हैऔर जो यह अनिवार्य करता है कि यदि बोर्ड इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि किशोर पर वयस्क के रूप में विचारण चलाया जाए तो वह कारण बताएयह देखते हुए कि यह आवश्यकता केवल एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है अपितु एक सुरक्षा उपाय है जो यह सुनिश्चित करता है कि बोर्ड का निर्णय न्यायिक जांच के योग्य हो। 
  • अनुतोष दिये जाने पर:न्यायालय ने सेशन न्यायालय और पटना उच्च न्यायालय के निष्कर्षों को बरकरार रखते हुए अपील खारिज कर दी। 

किशोर न्याय अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत प्रारंभिक निर्धारण क्या है? 

धारा 15 – बोर्ड द्वारा जघन्य अपराधों का प्रारंभिक निर्धारण  

धारा 15(1): 

  • यदि किसी जघन्य अपराध का आरोप सोलह वर्ष की आयु पूरी कर चुके या उससे अधिक आयु के बालक पर लगाया जाता हैतो बोर्ड को निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल करते हुए एक प्रारंभिक निर्धारण करना होगा: 
    • अपराध करने के लिये बालक की मानसिक और शारीरिक क्षमता; 
    • अपराध के परिणामों को समझने की उसकी क्षमताऔर 
    • वे परिस्थितियाँ जिनमें उसने कथित तौर पर अपराध किया। 
  • इस निर्धारण के आधार परबोर्ड धारा 18(3) के अनुसार आदेश पारित कर सकता है। 
  • परंतुक:इस प्रकार के निर्धारण के लियेबोर्ड अनुभवी मनोवैज्ञानिकोंमनो-सामाजिक कार्यकर्ताओं या अन्य विशेषज्ञों की सहायता ले सकता है। 
  • स्पष्टीकरण:यह स्पष्ट किया जाता है कि प्रारंभिक निर्धारण कोई विचारण नहीं हैअपितु यह केवल बालक की कथित अपराध करने और उसके परिणामों को समझने की क्षमता का निर्धारण है। 

धारा 15(2): 

  • यदि प्रारंभिक निर्धारण के आधार पर बोर्ड संतुष्ट है कि मामले का निपटारा स्वयं बोर्ड द्वारा किया जाना चाहिएयेतो उसे दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 के अधीन समन मामले में विचारण की प्रक्रिया का यथासंभव पालन करना होगा। 
  • प्रथम परंतुक :मामले के निपटारे के लिये बोर्ड का आदेश धारा 101(2) के अधीन अपील योग्य है। 
  • द्वितीय परंतुक :इस धारा के अंतर्गत निर्धारण धारा 14 में निर्दिष्ट अवधि के भीतर पूरा किया जाना चाहिये