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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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सांविधानिक विधि
अनुसूचित जाति की स्थिति और धर्मांतरण
24-Mar-2026
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चिंतादा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य "संविधान या संसद या राज्य विधानमंडल के अधिनियम के अधीन किसी भी वैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण या हक का दावा ऐसे किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं किया जा सकता है और न ही उसे यह अधिकार दिया जा सकता है, जिसे धारा 3 के अनुसार अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाता है। यह प्रतिबंध पूर्ण है और इसमें कोई अपवाद नहीं है।" न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और मनमोहन |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और मनमोहन की पीठ ने चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले में आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश को बरकरार रखा और निर्णय दिया कि एक बार जब कोई व्यक्ति ईसाई धर्म में परिवर्तित हो जाता है और सक्रिय रूप से उसका पालन करता है, तो उसे अनुसूचित जाति समुदाय का सदस्य नहीं माना जा सकता है।
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के सिवाय किसी अन्य धर्म को मानने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता है, और किसी अन्य धर्म में धर्मांतरण करने पर अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत और पूरी तरह से समाप्त हो जाता है। न्यायालय ने यह भी कहा कि धर्मांतरित ईसाई अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 का सहारा नहीं ले सकता है।
चिंथदा आनंद बनाम आंध्र प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला प्रत्यर्थी 2 द्वारा दायर एक आपराधिक परिवाद से उत्पन्न हुआ, जो आंध्र प्रदेश के पिट्टलवानीपलेम गाँव में रविवार की प्रार्थना सभाओं का संचालन करने वाला एक पादरी है। उसने आरोप लगाया कि उसे बार-बार मारपीट का शिकार बनाया गया, उसे और उसके परिवार को जान से मारने की धमकियाँ दी गईं और जाति के नाम पर उसका अपमान किया गया।
- उन्होंने याचिकाकर्त्ता के विरुद्ध अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 3(1)(द), 3(1)(ध) और 3(2)(फक) तथा भारतीय दण्ड संहिता की धारा 341, 506 और 323 के साथ धारा 34 के अधीन मामला दर्ज किया। अन्वेषण पूरा हुआ और आरोप पत्र दाखिल किया गया।
- अभियुक्त (याचिकाकर्त्ता) ने आरोपों को रद्द करने के लिये आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में याचिका दायर की, जिसमें तर्क दिया गया कि परिवादकर्त्ता ने ईसाई धर्म अपना लिया था और एक पादरी के रूप में सक्रिय रूप से कार्य कर रहा था, और इसलिये वह संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अधीन अनुसूचित जाति समुदाय की सदस्यता का दावा नहीं कर सकता था।
- दूसरी ओर, प्रत्यर्थियों ने तर्क दिया कि पिट्टलवानीपलेम मंडल के तहसीलदार (साक्षी 12) ने अपने कथन में पुष्टि की थी कि प्रत्यर्थी 2 हिंदू-मदिगा जाति से संबंधित है, और उसके पास उसी प्राधिकरण द्वारा जारी किया गया एक वैध जाति प्रमाण पत्र है।
- आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति हरिनाथ एन. ने 30 अप्रैल, 2025 के एक आदेश द्वारा याचिका को स्वीकार करते हुए यह माना कि जाति व्यवस्था ईसाई धर्म के लिये अनुपयुक्त है और परिणामस्वरूप अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अधीन दायर आरोपों को रद्द कर दिया। इसके विरुद्ध पादरी ने उच्चतम न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 पर:
- न्यायालय ने कहा कि 1950 के आदेश में इस प्रतिबंध को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया गया था। उस आदेश के खंड 3 में निर्दिष्ट न किये गए किसी भी धर्म में धर्मांतरण करने पर—अर्थात्, हिंदू धर्म, सिख धर्म या बौद्ध धर्म के सिवाय किसी भी अन्य धर्म में—जन्म की परवाह किये बिना, अनुसूचित जाति का दर्जा तुरंत समाप्त हो जाता है।
धर्म और जाति के एक साथ दावों पर:
- न्यायालय ने निर्णय दिया कि कोई व्यक्ति अनुच्छेद 3 में निर्दिष्ट धर्मों के सिवाय किसी अन्य धर्म को मानने और उसका पालन करने के साथ-साथ अनुसूचित जाति का सदस्य होने का दावा नहीं कर सकता। इस नियम में कोई अपवाद नहीं है, और ऐसे व्यक्ति को संविधान या किसी अन्य विधि के अधीन कोई वैधानिक लाभ, संरक्षण, आरक्षण या अधिकार नहीं दिया जा सकता।
वर्तमान मामले के तथ्यों के आधार पर:
- न्यायालय ने पाया कि याचिकाकर्त्ता ने ईसाई धर्म से अपने मूल धर्म में पुनः धर्मांतरण नहीं किया था, और न ही उसे मदिगा समुदाय में पुनः स्वीकार किया गया था। साक्ष्यों से यह स्थापित हुआ कि वह ईसाई धर्म का पालन करता रहा था और एक दशक से अधिक समय से पादरी के रूप में नियमित रूप से रविवार की प्रार्थना करता आ रहा था। न्यायालय को इस बात में कोई संदेह नहीं रहा कि कथित घटना की तिथि पर भी वह ईसाई बना रहा।
जाति प्रमाण पत्र की वैधता के संबंध में:
- न्यायालय ने यह माना कि जाति प्रमाण पत्र रद्द न होने मात्र से धर्म परिवर्तन करने वाले व्यक्ति को अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अधिनियम के अंतर्गत संरक्षण प्राप्त करने का अधिकार नहीं मिल जाता। प्रमाण पत्र रद्द करना आंध्र प्रदेश (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग) सामुदायिक प्रमाण पत्र जारी करने संबंधी विनियमन अधिनियम, 1993 की धारा 5 के अंतर्गत उचित प्राधिकारी द्वारा निपटाया जाने वाला मामला है, लेकिन प्रमाण पत्र रद्द न होने से 1989 के अधिनियम के प्रयोजनों के लिये अनुसूचित जाति का दर्जा बहाल या संरक्षित नहीं होता है।
अनुसूचित जाति क्या है और इससे संबंधित कानूनी ढांचा क्या है?
अनुसूचित जातियों की परिभाषा पर:
- अनुच्छेद 366 में 'अनुसूचित जाति' शब्द को परिभाषित किया गया है।
- अनुच्छेद 341 के अनुसार, राष्ट्रपति संबंधित राज्य के राज्यपाल से परामर्श करने के बाद उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश (UT) के लिये अनुसूचित जातियों की सूची अधिसूचित कर सकते हैं। संसद द्वारा विधि बनाकर इस सूची में संशोधन किया जा सकता है।
- "अनुसूचित जाति" शब्द को सर्वप्रथम भारत सरकार अधिनियम, 1935 में शामिल किया गया था, जो विधिक और प्रशासनिक ढाँचे में इसकी मान्यता को दर्शाता है।
भारत में जाति आधारित अत्याचारों से निपटने के लिये ढाँचा:
- मौलिक अधिकार: अनुच्छेद 14, 15, 16 और 17।
- राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (DPSP): अनुच्छेद 46 राज्य को अनुसूचित जातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने का निदेश देता है।
- अनुच्छेद 338 अनुसूचित जातियों के अधिकारों की रक्षा के लिये राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग की स्थापना करता है।
- विधिक ढाँचा:
- अस्पृश्यता (अपराध) अधिनियम, 1955: अस्पृश्यता की प्रथा को दण्डित करने के लिये अधिनियमित किया गया था, जिसे बाद में संशोधित किया गया और इसका नाम परिवर्तित कर सिविल अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1976 कर दिया गया, जिसमें सामाजिक और धार्मिक अक्षमताओं के परिणामस्वरूप होने वाली अस्पृश्यता को दण्डनीय बनाया गया।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989: यह एक विशेष विधि है जो विशेष रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के विरुद्ध किये गए अपराधों से संबंधित है, जिन्हें "अत्याचार" के रूप में परिभाषित किया गया है। यह ऐसे मामलों के त्वरित निपटारे के लिये विशेष न्यायालयों की स्थापना अनिवार्य करता है।
- मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में नियोजन पर प्रतिबंध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013: इस अधिनियम का उद्देश्य मैनुअल स्कैवेंजिंग को समाप्त करना और इस प्रथा में शामिल लोगों के पुनर्वास को सुनिश्चित करना है।
- अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) संशोधन अधिनियम, 2015: इस संशोधन ने अत्याचार की परिभाषा का विस्तार करते हुए इसमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों की महिलाओं के विरुद्ध लैंगिक अपराधों को शामिल किया, जिससे विधिक संरक्षण को मजबूती मिली।
सिविल कानून
वरिष्ठ नागरिक अधिनियम का भूतलक्षी प्रभाव नहीं है
24-Mar-2026
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एम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकावासगम और अन्य "यह अधिनियम केवल अधिनियम के प्रारंभ होने के पश्चात् संपत्ति के अंतरण पर लागू होगा और इसका भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जा सकता है।" मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन |
स्रोत: मद्रास उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
मद्रास उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की पीठ ने एम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकवासगम और अन्य (2026) के मामले में एकल न्यायाधीश के उस आदेश को अपास्त कर दिया, जिसमें 2004 में निष्पादित निपटान विलेख को रद्द करने का निर्णय बरकरार रखा गया था। न्यायालय ने कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 को इसके प्रारंभ होने से पूर्व हुए संपत्ति अंतरणों पर भूतलक्षी रूप से लागू नहीं किया जा सकता है, जिससे पुत्र का संबंधित संपत्ति पर स्वामित्व बहाल हो गया और उसे निदेश दिया गया कि यदि उसके पिता उससे संपर्क करें तो वह उन्हें आवासीय आवास प्रदान करे।
एम.एम. रमेश बनाम एम.एस. मणिकवासगम और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- पिता एम.एस. मणिकवासगम ने 23 जून, 2004 को एक समझौता विलेख निष्पादित किया, जिसमें उन्होंने अपने पुत्र एम.एम. रमेश को प्रेम और स्नेह के साथ और भविष्य की सुरक्षा के रूप में संपत्ति अंतरित की।
- पिता के निर्देशों के अनुसार, पुत्र ने संपत्ति में अपने भाई के अधिकारों को त्यागने के लिये उसे 1,50,000 रुपए का संदाय किया।
- 2016 में, पिता ने समझौता विलेख को शून्य और अकृत घोषित करने और उसके प्रतिसंहरण को वैध ठहराने के लिये एक सिविल वाद दायर किया। वाद खारिज कर दिया गया, और अपील में भी खारिज करने के निर्णय को बरकरार रखा गया।
- 21 अक्टूबर 2019 को पिता ने वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 के अधीन राजस्व मंडल अधिकारी (RDO) के समक्ष परिवाद दर्ज कराया। राजस्व मंडल अधिकारी ने यह कहते हुए परिवाद खारिज कर दी कि पिता को मासिक पारिवारिक पेंशन मिलती है और सिविल न्यायालयों ने पहले ही उनके विरुद्ध निर्णय दिया है। राजस्व मंडल अधिकारी ने यह भी कहा कि पिता के चार अन्य बच्चे भी उनका भरण-पोषण करने के लिये बाध्य हैं।
- पिता की जिला कलेक्टर के समक्ष दायर अपील को भी इसी प्रकार खारिज कर दिया गया।
- ततपश्चात् पिता ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की, जिसमें एक एकल न्यायाधीश ने समझौता विलेख को रद्द करने के निर्णय को बरकरार रखा और पुत्र को संपत्ति का खाली कब्जा पिता को सौंपने का निदेश दिया।
- इससे व्यथित होकर पुत्र ने खंडपीठ के समक्ष यह अपील दायर की।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
अधिनियम के भूतलक्षी प्रभाव पर:
- न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरणपोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 भावी प्रकृति का है और यह केवल 29 सितंबर, 2008 को इसके लागू होने के पश्चात् किये गए संपत्ति अंतरणों पर ही लागू होता है। चूँकि समझौता विलेख 2004 में निष्पादित किया गया था, इसलिये इसे शून्य करने के लिये अधिनियम का सहारा नहीं लिया जा सकता।
- न्यायालय ने अधिनियम की धारा 23 पर विश्वास किया, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अधिनियम के लागू होने के बाद किसी वरिष्ठ नागरिक द्वारा किया गया अंतरण तभी शून्य होगा, बशर्ते अंतरिती बुनियादी सुविधाएँ और देखभाल प्रदान करने में विफल रहे। विधिक भाषा स्वयं ही भूतलक्षी प्रभाव को रोकती है।
रद्द करने के गुण-दोषों पर:
- न्यायालय ने कहा कि राजस्व मंडल अधिकारी (RDO) ने मूल परिवाद को ठोस आधार पर खारिज कर दिया था - पिता को मासिक पेंशन मिलती थी और सिविल न्यायालयों ने पहले ही संपत्ति विलेख को चुनौती देने के उनके निर्णय को खारिज कर दिया था। न्यायालय ने इस बात पर भी बल दिया कि माता-पिता का भरण-पोषण करने का दायित्त्व सांविधिक है और संपत्ति के कब्जे पर निर्भर नहीं है, जिसका अर्थ है कि संपत्ति विवाद के परिणाम की परवाह कियये बिना पुत्र अपने पिता का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य रहेगा।
माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 क्या है?
बारे में:
- भारत में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और कल्याण के लिये अधिक प्रभावी प्रावधान प्रदान करने हेतु माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007 को अधिनियमित किया गया था। अधिनियम के अनुसार, "वरिष्ठ नागरिक" वह व्यक्ति है जो भारत का नागरिक है और जिसकी आयु 60 वर्ष या उससे अधिक हो चुकी है।
मुख्य उपबंध:
- भरण-पोषण दायित्त्व (धारा 4-18): बालकों का अपने माता-पिता का भरण-पोषण करने का विधिक दायित्त्व है, और नातेदारों का निःसंतान वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण करने का दायित्त्व है।
- अधिकरणों की स्थापना (धारा 7): राज्य सरकारों को भरण-पोषण दावों का निपटारा करने के लिये भरण-पोषण अधिकरणों की स्थापना करनी होगी।
- वृद्धाश्रम (धारा 19): राज्य सरकारों को प्रत्येक जिले में वृद्धाश्रम स्थापित करने की आवश्यकता है।
- चिकित्सा सहायता (धारा 20): वरिष्ठ नागरिकों के लिये चिकित्सा देखरेख के उपबंध।
- जीवन और संपत्ति की सुरक्षा (धारा 21-23): वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के उपाय।
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