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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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पारिवारिक कानून

तलाक की घोषणा होते ही वह प्रभावी हो जाता है

 01-Apr-2026

हुमैरा रियाज़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य 

"जहाँ पति द्वारा तलाक की उद्घोषणा की जाती है और तत्पश्चात वह न्यायालय के समक्ष डिक्री हेतु अभ्यावेदन करता हैवहाँ न्यायालय द्वारा पारित डिक्री सामान्यतः घोषणात्मक प्रकृति की होती हैजो केवल उस विवाह-विच्छेद की स्थिति को मान्यता प्रदान करती है अथवा उसकी पुष्टि करती हैजो पूर्व में ही संपन्न हो चुका होता है।" 

न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मदन पाल सिंह ने हुमैरा रियाज़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले मेंयह निर्णय दिया कि मुस्लिम विधि के अधीनतलाक पति द्वारा इसकी घोषणा की तारीख से प्रभावी होता है। बाद में पारित न्यायालय की डिक्री केवल घोषणात्मक होती है - यह पहले से हो चुके तलाक को मान्यता और पुष्टि देता है और निर्णय की तारीख से नया तलाक नहीं बनाता है। 

  • न्यायालय ने इस बात की भी पुष्टि की कि वैध तलाक के बाद द्वितीय विवाह करने वाली पत्नी को भरण-पोषण का अधिकार हैभले ही तलाक की पुष्टि करने वाला न्यायालय का घोषणात्मक आदेश बाद में आया हो। 

हुमैरा रियाज बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • याचिकाकर्ता (पत्नी) ने प्रयागराज कुटुंब न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय में एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका दायर कीजिसमें उसे दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अधीन भरण-पोषण देने से इंकार कर दिया गया थाजबकि उसके दो अवयस्क पुत्रों को भरण-पोषण प्रदान किया गया था। 
  • कुटुंब न्यायालय द्वारा याचिका खारिज करने का मुख्य कारण यह निष्कर्ष था कि याचिकाकर्त्ता का प्रथम विवाह उसके द्वितीय विवाह की तारीख तक विधिक रूप से भंग नहीं हुआ थाऔर इसलिये उसका द्वितीय विवाह मुस्लिम विधि के अधीन शून्य था। 
  • उच्च न्यायालय के समक्ष पत्नी के अधिवक्ता ने बताया कि उसके पहले पति ने 27 फरवरी, 2005 को तलाक दे दिया था। 
  • तत्पश्चात् एक घोषणात्मक वाद दायर किया गयाऔर जनवरी, 2013 को न्यायालय ने 2005 के तलाक की वैधता को मान्यता देते हुए एक आदेश पारित किया। इद्दत की अवधि का विधिवत पालन करने के बादयाचिकाकर्त्ता ने मई 2012 में अपना द्वितीय विवाह संपन्न कियाऔर उसके दूसरे पति को पहले हुए तलाक की पूरी जानकारी थी।  
  • आगे यह तर्क दिया गया कि किसी महिला को केवल विवाह की वैधता के संबंध में तकनीकी आपत्तियों के आधार पर भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता है - विशेष रूप से तब जब पति ने जानबूझकर विवाह किया हो और दोनों पक्षकार पति-पत्नी के रूप में एक साथ रहते हों। 
  • दूसरी ओरपति के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि चूँकि तलाक का आदेश केवल 2013 में दिया गया थाइसलिये 2012 में संपन्न दूसरा विवाह शून्य थाक्योंकि उस समय कोई वैध न्यायालय द्वारा मान्यता प्राप्त तलाक विद्यमान नहीं था। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने पति के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कितलाक की घोषणा के बाद पारित न्यायालय का निर्णय केवल घोषणात्मक होता है —यह तलाक की उस स्थिति की पुष्टि करता है जो घोषणा की तारीख से पहले ही प्रभावी हो चुकी थी। ऐसा निर्णय तलाक की मूल तिथि से ही प्रभावी माना जाता है और निर्णय की तिथि से नया तलाक नहीं माना जाता। 
  • न्यायालय ने पाया कि कुटुंब न्यायालय द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण स्थापित विधिक स्थिति के अनुरूप नहीं था। 2013 की डिक्री को तलाक की प्रभावी तिथि मानकरकुटुंब न्यायालय ने 2005 में पहले ही की गई घोषणा की पुष्टि करने वाली घोषणात्मक डिक्री के भूतलक्षी स्वरूप को नजरअंदाज कर दिया था। 
  • यद्यपिउच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण शर्त भी स्पष्ट की — जहाँ तलाक की वैधता विवादित होवहाँ विचारण न्यायालयों को साक्ष्यों की सावधानीपूर्वक जांच करनी होगी और यह अवधारित करना होगा कि तलाक विधि के अनुसार वैध रूप से दिया गया था या नहीं। तलाक की डिक्री का घोषणात्मक स्वरूप विवादित मामलों में ऐसी जांच से छूट नहीं देता। 
  • तदनुसारउच्च न्यायालय ने कुटुंब न्यायालय के उस डिक्री को अपास्त कर दिया जिसमें याचिकाकर्त्ता को भरण-पोषण देने से इंकार किया गया था और मामले को कुटुंब न्यायालय को वापस भेज दिया जिससे वह पत्नी के भरण-पोषण के दावे पर नए सिरे से उसके गुण-दोष के आधार पर निर्णय ले सके। 

मुस्लिम विधि के अधीन तलाक क्या है? 

मुस्लिम विवाह का विघटन: 

  • मुस्लिम विधि के अधीनविवाह या तो पति या पत्नी की मृत्यु से या तलाक से समाप्त होता है। तलाक का अधिकार मुख्य रूप से पति के पास होता हैजो बिना कोई कारण बताए एकतरफा रूप से इसका प्रयोग कर सकता है। 

पति द्वारा (तलाक़): 

तलाक का व्यापक अर्थ विवाह बंधन का खंडन करना है। इसके तीन रूप होते हैं: 

  • तलाक़-उल-सुन्नतस्वीकृत रूप हैजिसे आगे तलाक़-ए-अहसान (एक बार घोषणा के बाद तीन महीने की इद्दतजिसे इस अवधि के दौरान रद्द किया जा सकता है) और तलाक़-ए-हसन (लगातार मासिक धर्म चक्रों में तीन घोषणाएँजिनमें से पहली दो रद्द की जा सकती हैं) में विभाजित किया गया है। 
  • तलाक़-उल-बिद्दत (ट्रिपल तलाक) एक अपरिवर्तनीय तत्काल तलाक थाजिसे उच्चतम न्यायालय ने शायरा बानो बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2017) के मामले में अनुच्छेद 14 का उल्लंघन मानते हुए रद्द कर दिया था और बाद में इसे अपराध घोषित कर दिया गया था। 
  • पति द्वारा शुरू किये गए अन्य रूपों में इला (चार महीने के लिये संयम की शपथ) और जिहार (पत्नी की किसी प्रतिषिद्ध महिला नातेदार से विधिविरुद्ध तुलना) शामिल हैंबाद वाला पत्नी को न्यायिक तलाक मांगने का अधिकार देता है। 

पत्नी द्वारा: 

  • एक पत्नी केवल तभी तलाक दे सकती है जब पति द्वारा उसे यह अधिकार सौंपा गया हो (तलाक़-ए-तफ़वीज़)या यदि पति व्यभिचार का मिथ्या आरोप लगाता है (लियान)जिससे उसे तलाक के लिये वाद दायर करने का अधिकार मिलता है। 

आपसी सहमति से: 

  • खुला एक ऐसा तलाक है जिसमें पत्नी महर (दान) लौटाती है। मुबारत आपसी सहमति से होने वाला तलाक हैजो शिया और सुन्नी दोनों विधियों के अधीन अपरिवर्तनीय है। 

मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम, 1939: 

  • एक मुस्लिम पत्नी सांविधिक आधारों पर न्यायिक तलाक की मांग कर सकती हैजिसमें पति का चार वर्ष तक लापता रहनादो वर्ष तक उसका भरण-पोषण करने में असफल रहनासात या उससे अधिक वर्षों का कारावास नपुंसकतापागलपनक्रूरता और 18 वर्ष की आयु से पहले बाल विवाह का त्याग करना शामिल है। 

पारिवारिक कानून

पत्नी स्त्रीधन की पूर्ण स्वामी हैं

 01-Apr-2026

अनामिका तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और एक अन्य 

"पत्नी को अपनी स्त्रीधन का निपटान अपनी इच्छानुसार करने का पूरा अधिकार हैन तो पति और न ही ससुराल वालों का इस पर कोई अधिकार है।" 

न्यायमूर्ति चवान प्रकाश 

स्रोत: इलाहाबाद उच्च न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति चवान प्रकाश नेअनामिका तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि विधिक रूप से विवाहित पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामी होती है और उस पर अपनी ही संपत्ति को कथित रूप से छीनने के आरोप में धारा 406 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन आपराधिक विचारण नहीं चलाया जा सकता है। 

  • न्यायालय ने आगे कहा कि यद्यपि पति संकट के समय स्त्रीधन का उपयोग कर सकता हैलेकिन उस पर इसे या इसके समतुल्य मूल्य को वापस करने का नैतिक दायित्त्व हैऔर न तो उसे और न ही अन्य ससुराल वालों को ऐसी संपत्ति पर कोई विधिक नियंत्रण प्राप्त है। 

अनामिका तिवारी और अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • अनामिका तिवारी और चार अन्य लोगों ने भारतीय दण्ड संहिता, 1860 की धारा 323, 504 और 406 के अधीन एक परिवाद मामले के समन आदेश और पूरी कार्यवाही को रद्द करने की मांग करते हुए आवेदन दायर किया था। 
  • आवेदक पत्नी ने अप्रैल 2012 में विपक्षी पक्ष के पति से विवाह किया था और उसके परिवार ने विवाह के समय पर्याप्त दहेज दिया था। 
  • तत्पश्चात् विवाद उत्पन्न हुआ और उसने अपने पति और उसके परिवार के सदस्यों के विरुद्ध धारा 498-क और 323 भारतीय दण्ड संहिता तथा दहेज निषेध अधिनियम के अधीन अतिरिक्त दहेज की मांग का आरोप लगाते हुए प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराई। इस मामले में दिसंबर 2018 में आरोप पत्र दाखिल किया गया। 
  • तत्पश्चात्मई 2022 मेंएक न्यायालय ने पति को पत्नी को 4,000 रुपए और उसके पुत्र को 1,000 रुपए मासिक भरण-पोषण के रूप में देने का निदेश दिया। 
  • तत्पश्चात्पति ने एक जवाबी परिवाद दर्ज कराया जिसमें आरोप लगाया गया कि उसकी पत्नी और अन्य आवेदकों ने सितंबर 2018 में उसके घर में प्रवेश किया और 6,400 रुपए नकदलगभग 1,50,000 रुपए के आभूषण और कुछ घरेलू सामान ले गए। 
  • इस परिवाद और साक्षियों के कथनों के आधार परमजिस्ट्रेट ने पत्नी और उसके परिवार के सदस्यों के विरुद्ध समन जारी किया। पत्नी ने इस आदेश को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

  • न्यायालय ने प्रारंभ में भारतीय दण्ड संहिता की धारा 405 और 406 की जांच की और पाया कि आपराधिक न्यासभंग का अपराध साबित होने के लियेसंपत्ति ऐसे व्यक्ति को सौंपी जानी चाहिये जो बाद में बेईमानी से संपत्ति का दुर्विनियोग करता है या उसे अपने निजी उपयोग के लिये परिवर्तित कर देता है। 
  • न्यायालय ने यह माना कि पत्नी अपने स्त्रीधन की पूर्ण स्वामी होती है—जिसमें विवाह से पहलेविवाह के समय या विवाह के बाद उसे दी गई सभी संपत्तियाँ  शामिल होती हैं—इसलिये पति या उसके परिवार द्वारा ऐसा कोई दायित्त्व सौंपना संभव नहीं है। फलस्वरूपआवेदक पत्नी के विरुद्ध अपने आभूषण और संपत्ति हटाने के लिये भारतीय दण्ड संहिता की धारा 406 के अधीन कोई अपराध नहीं बनता। 
  • न्यायालय ने आगे स्पष्ट किया किविवाह के कारण स्त्रीधन पति-पत्नी की संयुक्त संपत्ति नहीं बन जाता, और पत्नी को इसे अपनी इच्छानुसार बेचने का पूर्ण अधिकार है। यद्यपि पति आवश्यकता पड़ने पर स्त्रीधन का उपयोग कर सकता हैलेकिन इस उपयोग के साथ संपत्ति को उसकी मूल स्थिति में वापस लाने या उसके मूल्य को बहाल करने का नैतिक दायित्त्व भी आता है - इससे उसे या ससुराल वालों को स्वामित्व या नियंत्रण का कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता। 
  • शेष आवेदकों के विरुद्ध धारा 323 और 504 के अधीन लगाए गए आरोपों के संबंध मेंन्यायालय ने आरोपों को सामान्य और गैर-विनिर्दिष्ट प्रकृति का पाया। 
  • न्यायालय ने यह भी टिप्पणी की कि समन आदेश लापरवाही से पारित किया गया थाक्योंकि मजिस्ट्रेट ने प्रक्रिया जारी करने से पहले धारा 405 भारतीय दण्ड संहिता के अधीन आपराधिक न्यासभंग की परिभाषा संबंधी आवश्यकताओं को ठीक से लागू करने में विफल रहा था। 
  • तदनुसारसमन आदेश को अपास्त कर दिया गया और पत्नी और उसके नातेदारों के विरुद्ध पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया गया। 

स्त्रीधन की अवधारणा क्या है? 

बारे में: 

  • 'स्त्रीधन शब्द 'स्त्री' (जिसका अर्थ है स्त्री) और'धन' (जिसका अर्थ है संपत्ति)शब्दों से मिलकर बना है । 
  • स्त्रीधन वह सब कुछ है जो एकमहिला को अपने जीवनकाल में प्राप्त होता है। 
  • इसमें विवाह से पहलेविवाह के समयबच्चे के जन्म के दौरान और विधवा होने के दौरान महिलाओं द्वारा प्राप्तसभीचल और अचल संपत्ति दान शामिल हैं। 
  • स्त्रीधन दहेज से इस मायने में भिन्न है कि यहविवाह से पहले या बाद मेंएक महिला को स्वेच्छा से दिया जाने वाला दान है और इसमें किसी प्रकार का प्रपीड़न नहीं होता है। 
  • महिलाओं कोअपने स्त्रीधन परपूर्ण अधिकार है। 

स्त्रीधन की संरचना: 

  • स्त्रीधनमें निम्नलिखितशामिल हैं : 
  • विवाह की अग्नि से पहले दिये गए दान 
  • बारात के दौरान दिये गए दान 
  • प्रेम के प्रतीक के रूप में दिये गए दानअर्थात् वे दान जो उसके ससुरसास और अन्य बुजुर्गों द्वारा दिये गए थे। 
  • दुल्हन के पिता द्वारा दिये गए दान 
  • दुल्हन की माता द्वारा दिये गए दान 
  • दुल्हन के भाई द्वारा दिये गया दान 

स्त्रीधन से संबंधित विधि: 

  • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 27के अधीन एक महिला के स्त्रीधन के अधिकार को संरक्षित किया गया है, "भले ही इसे उसके पति या उसके ससुराल वालों को अभिरक्षा में रखा गया होउन्हें न्यासी माना जाएगा औरमहिला द्वारा मांगे जाने पर इसे वापस करने के लिये बाध्य होंगे ।" 
  • घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की धारा 12 घरेलू हिंसा की पीड़ितमहिलाओं को उनके स्त्रीधन पर अधिकार प्रदान करती है। स्त्रीधन की वसूली के लिये इस विधि के प्रावधानों का आसानी से उपयोग किया जा सकता है। मजिस्ट्रेट प्रत्यर्थी को पीड़ित व्यक्ति को उसका स्त्रीधन या कोई अन्य संपत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति लौटाने का निदेश दे सकता हैजिस पर उसका अधिकार है।