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करेंट अफेयर्स और संग्रह

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आपराधिक कानून

विश्वसनीय साक्ष्य द्वारा आरोपों के खंडन पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द करना

 08-Apr-2026

सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य 

"जहाँ विश्वसनीय और निर्विवाद सामग्री आरोपों के तथ्यात्मक आधार को विस्थापित करती है और अप्रतिबंधित रहती हैवहाँ न्यायालय अन्याय और प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये कार्यवाही को रद्द करने में न्यायसंगत होगा।" 

न्यायमूर्ति विक्रम नाथन्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया 

स्रोत: उच्चतम न्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति विक्रम नाथन्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारी की पीठ नेसजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले में CCTV फुटेज से स्पष्ट रूप से साबित होने के बादभारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 528 के अधीन आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दियाकि अभियुक्त कथित अपराध में शामिल नहीं थे। यह निर्णय आपराधिक विधि के दुरुपयोग को रोकने के लिये अंतर्निहित शक्तियों के दायरे को दोहराता है। 

सजल बोस बनाम पश्चिम बंगाल राज्य और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • यह मामला कोलकाता में एक अपार्टमेंट विवाद से संबंधित है (अक्टूबर 2022)। 
  • एक 77 वर्षीय परिवादकर्त्ता ने कई व्यक्तियों द्वारा मारपीट और धमकी देने का आरोप लगाया। 
  • प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) निम्नलिखित प्रावधानों के अधीन दर्ज की गई थी: 
    • विधिविरुद्ध जमाव 
    • साशय उपहति कारित करना  
    • आपराधिक धमकी 
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय: 
    • दो सह-अभियुक्तों के विरुद्ध कार्यवाही रद्द कर दी गई (विशिष्ट आरोपों का अभाव) 
    • तीन अपीलकर्त्ताओं को अनुतोष देने से इंकार कर दिया गया 
  • अपीलकर्त्ताओं ने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। 

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख टिप्पणियां कीं: 

  • निर्विवाद साक्ष्य नियम: 
    जहाँ उत्कृष्ट गुणवत्ता की सामग्री आरोपों को गलत साबित करती हैवहाँ न्यायालय कार्यवाही को रद्द कर सकते हैं। 
  • CCTV फुटेज की भूमिका: 
    • CCTV फुटेज (आरोप पत्र का भाग) में दिखाया गया: 
      • अपीलकर्त्ताहिंसा में शामिल नहीं थे 
      • इसके अतिरिक्त वेस्थिति को शांत करने का प्रयास कर रहे थे। 
    • यह परिवादकर्त्ता के कथन के बिल्कुल विपरीत था। 
  • अभियोजन पक्ष की विफलता: 
    • अभियोजन पक्ष CCTV फुटेज के साक्ष्यों काखंडन करने में असफल रहा। 
    • इस प्रकार की सामग्री को प्रारंभिक प्रक्रम में भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 
  • प्रक्रिया का दुरुपयोग: 
    विश्वसनीय साक्ष्यों के अभाव के होते हुए भी कार्यवाही जारी रखने से निम्नलिखित होगा: 
    • यहआपराधिक विधि का दुरुपयोग है। 
    • न्यायिक समय की बर्बादीहोती है।  
  • प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2025) के मामले में निर्धारित विधि को लागू करते हुएजहाँ न्यायालय ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 के अधीन याचिका रद्द करने की सुनवाई करते समय उच्च न्यायालय द्वारा विचार किये जाने वाले कदमों को निर्धारित किया थान्यायालय ने टिप्पणी की कि "कथित अपराधों से उन्हें जोड़ने वाले विश्वसनीय साक्ष्यों की पूर्ण कमी के होते हुए भी ऐसी कार्यवाही जारी रखना आपराधिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा।" 
  • प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 में प्रतिपादित परीक्षण निम्नलिखित है: 
    • उत्कृष्ट गुणवत्ता का साक्ष्य:जिस सामग्री पर विश्वास किया गया है वह विश्वसनीयभरोसेमंद और त्रुटिहीन गुणवत्ता की होनी चाहिये 
    • आरोपों का खंडन:प्रस्तुत सामग्री को परिवाद में किये गए तथ्यात्मक दावों को पूरी तरह से गलत साबित करना चाहिये या उनका खंडन करना चाहिये 
    • अभियोजन पक्ष द्वारा खंडन न किया गया:सामग्री को चुनौती नहीं दी गई है या अभियोजन पक्ष द्वारा प्रभावी ढंग से खंडन नहीं किया जा सकता है। 
    • न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग:विचारण को जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और न्याय के उद्देश्यों को विफल कर देगा। 
  • उच्चतम न्यायालय ने अपील को मंजूर करते हुए आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दियायह मानते हुए कि जहाँ विश्वसनीय साक्ष्य अभियोजन पक्ष के मामले को ध्वस्त कर देते हैं और उन्हें चुनौती नहीं दी जाती हैवहाँ विचारण को जारी रखना अन्यायपूर्ण होगा और आपराधिक विधि के उद्देश्य के विपरीत होगा।

 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 क्या है? 

बारे में: 

  • यह धारा पहले दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के अंतर्गत आती थी। 
  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 उच्च न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों के संरक्षण से संबंधित है। 
  • इसमें कहा गया है कि इस संहिता की कोई बात उच्च न्यायालय की ऐसे आदेश देने की अंतर्निहित शक्ति को सीमित या प्रभावित करने वाली न समझी जाएगी जैसे इस संहिता के अधीन किसी आदेश को प्रभावी करने के लिये या किसी न्यायालय की कार्यवाही का दुरुपयोग निवारित करने के लिये या किसी अन्य प्रकार से न्याय के उद्देश्यों की प्राप्ति सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हों 
  • यह धारा उच्च न्यायालयों को कोई अंतर्निहित शक्ति प्रदान नहीं करता हैअपितु यह केवल इस तथ्य को मान्यता देता है कि उच्च न्यायालयों के पास अंतर्निहित शक्तियां हैं। 

उद्देश्य: 

  • भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 528 में यह निर्धारित किया गया है कि अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कब किया जा सकता है।  
  • इसमें उन तीन उद्देश्यों का उल्लेख किया गया है जिनके लिये अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है: 
    • संहिता के अंतर्गत किसी भी आदेश को प्रभावी बनाने के लिये आवश्यक आदेश देना। 
    • किसी भी न्यायालय की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिये 
    • न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित करने के लिये 

सांविधानिक विधि

अनारक्षित श्रेणी में दिव्यांगजन आरक्षण सभी दिव्यांग श्रेणियों हेतु खुला है

 08-Apr-2026

पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड और अन्य बनाम दिपेंडु बिस्वास और अन्य 

"यदि अनारक्षित/खुला पद विशेष श्रेणी के दिव्यांगजन के लिये हैतो इसका अर्थ है कि उक्त पद सभी सामाजिक श्रेणियों के सभी अभ्यर्थियों के लिये खुला होगाचाहे वे अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग के होंबशर्ते कि ऐसे अभ्यर्थी दिव्यांगजन व्यक्ति भी हों।"  

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह 

स्रोत: उच्चतमन्यायालय 

चर्चा में क्यों? 

भारत के उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ नेपश्चिम बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी ट्रांसमिशन कंपनी लिमिटेड एवं अन्य बनाम दिपेंडु बिस्वास एवं अन्य (2026)के मामले में यह निर्णय दिया कि जब किसी अनारक्षित पद पर क्षैतिज आरक्षण लागू किया जाता हैतो क्षैतिज विशेषता रखने वाले सभी अभ्यर्थी - यहाँदिव्यांग व्यक्ति (कम दृष्टि/अंधापन) - योग्यता के आधार पर पद के लिये प्रतिस्पर्धा करने के हकदार हैंचाहे वे सामान्य वर्ग से संबंधित हों या अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग जैसी किसी ऊर्ध्वाधर सामाजिक आरक्षित श्रेणी से। 

पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड एवं अन्य बनाम दिपेंदु बिस्वास और एवं (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी? 

  • पश्चिम बंगाल राज्य विद्युत पारेषण कंपनी लिमिटेड में जूनियर सिविल इंजीनियर का एक पद अनारक्षित श्रेणी (UR)( PWD-LV) के रूप में अधिसूचित किया गया था - यह एक अनारक्षित पद है जो दिव्यांग व्यक्तियों (कम दृष्टि/अंधापन) के लिये क्षैतिज रूप से आरक्षित है। 
  • प्रत्यर्थी संख्या 3, जो OBC-A (अत्यंत पिछड़ा) श्रेणी से संबंधित अभ्यर्थी है और साथ ही PWD-LV विशेषता भी रखता हैने उपलब्ध अनारक्षित PWD-LV अभ्यर्थी की तुलना में अधिक अंक प्राप्त किये थेलेकिन उसे चयन से वंचित कर दिया गया था। 
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय ने इस इंकार को बरकरार रखते हुए कहा कि चूँकि अनारक्षित PWD-LV अभ्यर्थी उपलब्ध थाइसलिये तुलनात्मक योग्यता की परवाह किये बिनायह पद केवल उसी अभ्यर्थी द्वारा भरा जाना था।   
  • इससे व्यथित होकर मामला उच्चतम न्यायालय के समक्ष लाया गयाजिसे यह निर्धारित करने के लिये कहा गया कि क्या किसी OBC/PWD अभ्यर्थी को उच्च योग्यता के आधार पर अनारक्षित (PWD-LV) पद पर नियुक्त किया जा सकता हैऔर क्या किसी अनारक्षित - PWD अभ्यर्थी की मात्र उपलब्धता अधिक योग्य आरक्षित श्रेणी के PWD अभ्यर्थी के दावे को खारिज कर देती है।   

न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं? 

न्यायालय ने कलकत्ता उच्च न्यायालय के निर्णय को अपास्त कर दिया और निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ कीं: 

अनारक्षित श्रेणी में क्षैतिज आरक्षण की प्रकृति पर: 

  • न्यायालय ने माना कि आयु-पूर्व दिव्यांग व्यक्ति ((PWD-LV) पद केवल सामान्य/अनारक्षित सामाजिक वर्ग के अभ्यर्थियों के लियेआरक्षित नहींहै । चूँकि यह एक अनारक्षित पद है जो विशेष दिव्यांगजन के लिये आरक्षित हैइसलिये यह सभी अभ्यर्थियों - अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिअन्य पिछड़ा वर्ग या सामान्य - के लिये खुला है जो दिव्यांग व्यक्ति (कम दृष्टि/अंधापन) होने की शर्त को पूरा करते हैं। ऐसे सभी अभ्यर्थी इस शर्त के संबंध में समान स्थिति में हैंऔर इसलिये उनके साथ समान व्यवहार किया जाना चाहिये 

योग्यता को मार्गदर्शक मानदंड मानते हुए: 

  • पीठ ने इस बात पर बल दिया कि अनारक्षित श्रेणी के अंतर्गत आने वाले किसी भी पद पर नियुक्ति के लिये योग्यता एक अभिन्न और अविभाज्य गुण है। 
  • किसी अधिक योग्य अभ्यर्थी को केवल इसलिये अस्वीकार करना कि वह एक आरक्षित सामाजिक वर्ग से संबंधित है - जबकि एक कम योग्य अनारक्षित अभ्यर्थी उपलब्ध है - मनमाना और समता के सिद्धांत का उल्लंघन माना गया। 

अनुपलब्धता खंड पर: 

  • भर्ती अधिसूचना में एक खंड शामिल था जिसमें यह अनुमति दी गई थी कि यदि कोई अनारक्षित दिव्यांगजन अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं है तो रिक्ति को अन्य श्रेणियों के अभ्यर्थियों द्वारा भरा जा सकता है।  
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ऐसा खंड केवल एकवैकल्पिक प्रावधानहै और इसका यह अर्थ नहीं लगाया जा सकता कि किसी भी अनारक्षित दिव्यांग अभ्यर्थी की उपस्थितिचाहे वह कितना भी कम योग्य क्यों न होस्वतः ही अधिक योग्य आरक्षित श्रेणी के दिव्यांग अभ्यर्थियों को अपवर्जित कर देती है।  
  • इस प्रकार के प्रावधान खुली श्रेणी की नियुक्तियों में योग्यता के मूलभूत सिद्धांत को दरकिनार नहीं कर सकते। 

छूट के अभाव के संबंध में: 

  • न्यायालय ने पाया कि चूँकि प्रत्यर्थी संख्या ने आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों के लिये निर्धारित किसी भी छूट का लाभ उठाकर आयु वर्ग के पद के लिये आवेदन नहीं किया थाइसलिये उन्हें उनकी श्रेष्ठ योग्यता का लाभ देने से इंकार नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने तदनुसार आयु वर्ग (PWD-LV) पद पर उनके चयन की पुष्टि की।

आरक्षण क्या है और इसके प्रकार क्या हैं? 

आरक्षण: 

  • आरक्षण एक प्रकार का सकारात्मक विभेद है जिसका उद्देश्य ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर पड़े वर्गों के बीच समता को बढ़ावा देना और जाति-आधारित अन्याय को दूर करना है। 
  • भारत में दो अलग-अलग आरक्षण तंत्र एक साथ काम करते हैं - ऊर्ध्वाधर आरक्षण और क्षैतिज आरक्षण। 
  • दोनों एक ही पद के लिये एक साथ आवेदन कर सकते हैंऔर इससे किसी का भी दूसरे के आवेदन की अहमियत कम नहीं होगी। 

ऊर्ध्वाधर आरक्षण: 

बारे में: 

  • ऊर्ध्वाधर आरक्षण से तात्पर्य अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (SC) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के पक्ष में निर्धारित कोटा से है।  
  • सांविधानिक आधार: भारत के संविधान का अनुच्छेद 16(4)। 
  • यह प्रत्येक चिन्हित सामाजिक समूह के लिये कुल रिक्तियों का एक निश्चित प्रतिशत आरक्षित करके संचालित होता है। 
  • प्रत्येक श्रेणी के अभ्यर्थी अपने समूह के लिये आरक्षित सीटों के लिये आपस में प्रतिस्पर्धा करते हैं। 
  • इंदिरा साहनी मामले में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि एक वर्ष में कुल रिक्तियों के 50% से अधिक ऊर्ध्वाधर आरक्षण नहीं होना चाहिये 

ऊर्ध्वाधर आरक्षण (Vertical Reservation) कैसे काम करता है:  

  • कुल रिक्तियों में से एक निश्चित संख्या प्रत्येक श्रेणी—अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) तथा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)—के लिये पृथक् रूप से आरक्षित की जाती है।  
  • यदि कोई आरक्षित श्रेणी की अभ्यर्थी खुली/सामान्य योग्यता के आधार पर (आरक्षित श्रेणी की छूट पर निर्भर किये बिना) अर्हता प्राप्त करती हैतो उसकी गणना खुली/अनारक्षित कोटा के अंतर्गत की जाती है - न कि उसके आरक्षित श्रेणी के कोटा के अंतर्गत। 
  • इससे यह सुनिश्चित होता है कि आरक्षित श्रेणी का कोटा उसी समूह के कम प्रतिस्पर्धी अभ्यर्थियों के लिये उपलब्ध रहे।  
  • उदाहरण: यदि 10 अनुसूचित जाति (SC) के अभ्यर्थी सामान्य मेरिट सूची में चयनित हो जाते हैंतो यह नहीं माना जाएगा कि SC का आरक्षित कोटा समाप्त हो गया हैउन 10 अभ्यर्थियों को अवारक्षित श्रेणी के अंतर्गत ही गिना जाएगा 

क्षैतिज आरक्षण (Horizontal Reservation): 

बारे में: 

  • क्षैतिज आरक्षण से तात्पर्य विशेष समूहों - महिलाओंदिव्यांग व्यक्तियों (PwD), पूर्व सैनिकोंट्रांसजेंडर व्यक्तियों आदि को प्रदान किये जाने वाले सर्वव्यापी विशेषाधिकार से है।  
  • सांविधानिक आधार: भारत के संविधान के अनुच्छेद 15(3) और 16(1)। 
  • यह सभी वर्ग श्रेणियों पर लागू होता है - एक दिव्यांग व्यक्ति या महिला अभ्यर्थी अनुसूचित जातिअनुसूचित जनजातिअन्य पिछड़ा वर्ग या सामान्य वर्ग से संबंधित हो सकती हैफिर भी वह इस लाभ का दावा कर सकती है। 
  • ऊर्ध्वाधर आरक्षण के विपरीतयह पदों का एक अलग स्वतंत्र पूल नहीं बनाता है। 
  • क्षैतिज आरक्षण के अधीन चयनित अभ्यर्थियों को आवश्यक समायोजन करके उनकी संबंधित ऊर्ध्वाधर सामाजिक श्रेणी में रखा जाता है।  
  • क्षैतिज आरक्षण लागू करने के बाद भीऊर्ध्वाधर आरक्षण का प्रतिशत अपरिवर्तित रहना चाहिये 

क्षैतिज आरक्षण कैसे काम करता है: 

  • मान लीजिए कि 3% रिक्तियाँ दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिये समान रूप से आरक्षित हैं। 
  • अनुसूचित जाति श्रेणी से संबंधित दिव्यांग अभ्यर्थी को चयन के बाद अनुसूचित जाति कोटा में रखा जाएगायदि वह खुली योग्यता के आधार पर अर्हता प्राप्त करती हैतो उसे खुले/अनारक्षित कोटा में रखा जाता है - तदनुसार समायोजन किया जाता है। 
  • उदाहरण: अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के लिये 10 पद आरक्षित हैंजिनमें अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिये 2 पदों का आंतरिक कोटा है। 
    • चरण 1: अनुसूचित जाति के अभ्यर्थियों के समूह से योग्यता के आधार पर सभी 10 अनुसूचित जाति के पदों को भरें। 
    • चरण 2: जांचें कि 10 लोगों की सूची में अनुसूचित जाति की महिलाएँ शामिल हैं या नहीं। 
    • यदि हाँतो आगे किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं है। 
    • यदि सूची में केवल 1 SC महिला हैतो कट-ऑफ से नीचे की श्रेणी से एक और SC महिला को शामिल करें और अंतिम अभ्यर्थी को हटा दें। 
    • यदि सूची में पहले से ही योग्यता के आधार पर से अधिक SC महिलाएँ हैं - तो वे सभी बनी रहेंगीकिसी को भी अतिरिक्त रूप से हटाया नहीं जाएगा। 

क्षैतिज आरक्षण के प्रकार: 

रेखा शर्मा बनाम राजस्थान उच्च न्यायालय के मामले में उच्चतम न्यायालय ने क्षैतिज आरक्षण के दो तरीके बताए। 

1. खंडित क्षैतिज आरक्षण 

  • क्षैतिज रूप से आरक्षित सीटों को प्रत्येक ऊर्ध्वाधर श्रेणी के भीतर आनुपातिक रूप से विभाजित किया जाता है। 
  • उदाहरण: कुल 50 पदों में से महिलाओं के लियेआरक्षित 10 सीटों में से — अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिये, 4 अनुसूचित जनजाति की महिलाओं के लिये और अन्य पिछड़ा वर्ग की महिलाओं के लिये हैं। 
  • सीटों को विभिन्न श्रेणियों में स्थानांतरित नहीं किया जा सकता है - अनुसूचित जाति की महिला की सीट अनुसूचित जनजाति कोटा में स्थानांतरित नहीं की जा सकती है। 
  • यह उन मामलों में लागू होता है जहाँ भर्ती विज्ञापन में क्षैतिज समूह के लिये रिक्तियों को श्रेणीवार (सामान्य/OBC/SC/ST/MBC) रूप से पहचाना गया हो। 

2. समग्र क्षैतिज आरक्षण 

  • क्षैतिज रूप से आरक्षित सीटें किसी विशिष्ट ऊर्ध्वाधर श्रेणी से बंधी नहीं होती हैं और सभी पदों पर लागू होती हैं। 
  • अभ्यर्थियों को उनकी श्रेणी के अनुसार समायोजित किया जाता है - सीटें परस्पर अंतरणीय हैं। 
  • अभ्यर्थियों को अंततः जिस भी श्रेणी में रखा जाएसमग्र क्षैतिज कोटा का पूरी तरह से पालन किया जाना चाहिये 
  • यह सामान्यत: दिव्यांगजनों के लिये आरक्षण पर लागू होता हैजहाँ रिक्तियों को श्रेणी-वार विभाजन के बिना मानक दिव्यांगजन वाले व्यक्तियों के लिये आरक्षित किया जाता है। 

मुख्य अंतर: 

मन्हत्त्वपूर्ण विधिक मामले: 

  • इंद्र साहनी बनाम भारत संघ (1992) - न्यायालय ने ऊर्ध्वाधर आरक्षण (अनुच्छेद 16(4), अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग के लिये) और क्षैतिज आरक्षण (अनुच्छेद 16(1), महिलाओं/दिव्यांग व्यक्तियों के लिये) के बीच अंतर स्पष्ट किया। न्यायालय ने यह माना कि क्षैतिज आरक्षण वाले अभ्यर्थियों को चयन के बाद उनकी ऊर्ध्वाधर श्रेणी में समायोजित किया जाना चाहियेऔर ऊर्ध्वाधर आरक्षण कुल रिक्तियों के 50% से अधिक नहीं होना चाहिये 
  • राजेश कुमार दरिया बनाम राजस्थान लोक सेवा आयोग (2007) के मामले मेंन्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी के अभ्यर्थी खुली योग्यता के आधार पर अर्हता प्राप्त करती हैतो उसे खुले/अनारक्षित कोटे में गिना जाना चाहियेन कि उसके ऊर्ध्वाधर आरक्षित कोटे के अंतर्गत। न्यायालय ने ऊर्ध्वाधर श्रेणी के भीतर क्षैतिज आरक्षण के लिये आवेदन करने की चरणबद्ध प्रक्रिया भी निर्धारित की। 
  • सौरव यादव बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2020) - न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज आरक्षित श्रेणियों के अंतर्संबंध में आने वाला कोई अभ्यर्थीजो खुली योग्यता के आधार पर अर्हता प्राप्त करता हैउसे उसके ऊर्ध्वाधर कोटे तक सीमित नहीं किया जा सकता है। ऐसे अभ्यर्थी को खुली श्रेणी में ही गिना जाना चाहिये और उसे खुली श्रेणी पर लागू क्षैतिज कोटे से बाहर नहीं किया जा सकता है।