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करेंट अफेयर्स और संग्रह
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आपराधिक कानून
विचारण न्यायालय प्रासंगिकता के आधार पर दस्तावेज़ों को स्वीकृति अथवा अस्वीकृति से इंकार नहीं कर सकता
21-Apr-2026
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मेसर्स एसेंट वेंचर्स और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य "माननीय विचारण न्यायालय ने याचिकाकर्त्ता/अभियुक्त द्वारा जिन दस्तावेज़ों पर विश्वास करने की मांग की गई थी, उनकी प्रासंगिकता के आधार पर ही आवेदन को खारिज करने में त्रुटी की।" न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान |
स्रोत: बॉम्बे उच्च न्यायालय
चर्चा में क्यों?
बॉम्बे उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति मेहरोज के. पठान ने मेसर्स एसेंट वेंचर्स और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330) अनिवार्य है और विचारण न्यायालय केवल सुसंगति के आधार पर विपक्षी पक्ष को दस्तावेज़ों को स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने के लिये बाध्य करने वाले आवेदन को खारिज नहीं कर सकती। न्यायालय ने विचारण न्यायालयके आदेश को रद्द कर दिया और उसे निदेश दिया कि वह परिवादकर्त्ता को धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अनुसार दस्तावेज़ों को स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने के लिये कहे।
मेसर्स एसेंट वेंचर्स एंड अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य (2026) मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह मामला मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परक्राम्य लिखत अधिनियम की धारा 138 के अधीन चेक के अनादरण के एक मामले से संबंधित है।
- अभियुक्तों ने अपनी प्रतिरक्षा के हिस्से के रूप में कुछ प्रतिरक्षा दस्तावेज़ों- जिनमें विक्रय विलेख, संशोधन विलेख और विकास अनुमतियाँ शामिल हैं - पर विश्वास करने की कोशिश की।
- अभियुक्त ने धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन एक आवेदन दायर कर परिवादकर्त्ता से इन दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता को स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने के लिये कहा।
- परिवादकर्त्ता ने आवेदन का विरोध करते हुए इसे अप्रासंगिक बताया और विलंब करने की रणनीति अपनाने का आरोप लगाया।
- विचारण न्यायालय ने दस्तावेज़ों को पेश करने की अनुमति तो दे दी, लेकिन सुसंगति की कमी का हवाला देते हुए उन्हें स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने के लिये बाध्य करने से इंकार कर दिया।
- अभियुक्त ने बॉम्बे उच्च न्यायालय में आपराधिक रिट याचिका के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
- न्यायालय ने धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता की जांच की और स्पष्ट किया कि यह अभिलेख पर रखे गए दस्तावेज़ों की प्रक्रिया को नियंत्रित करती है, जिसमें विपक्षी पक्ष को उनकी प्रामाणिकता को स्वीकृत या अस्वीकृत करना आवश्यक होता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 बाद के चरण में दस्तावेज़ों को दाखिल करने पर रोक नहीं लगाती है, बशर्ते उन्हें विधि के अनुसार विधिवत रूप से अभिलेख में लाया गया हो।
- चूँकि विचारण न्यायालय पहले ही दस्तावेज़ों को पेश करने की अनुमति दे चुका था, इसलिये धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन स्वीकृत या अस्वीकृत करने की मांग वाली दूसरी प्रार्थना को अस्वीकार करने का कोई औचित्य नहीं था।
- विचारण न्यायालय ने उस स्तर पर सुसंगति के प्रश्न में प्रवेश करके त्रुटी की; सुसंगति अंतिम निर्णय का विषय है और धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अधीन सांविधिक प्रक्रिया को अस्वीकार करने का आधार नहीं हो सकती।
- किसी पक्षकार से दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता को स्वीकृत करने या अस्वीकृत करने के लिये कहना मात्र उनकी ग्राह्यता या साक्ष्य मूल्य को अवधारित नहीं करता है – परिवादकर्त्ता को विचारण के दौरान दस्तावेज़ों पर विवाद करने का अधिकार बरकरार रहता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 में "shall" शब्द का प्रयोग एक अनिवार्य दायित्त्व को इंगित करता है, जिससे विचारण न्यायालय के पास अनुपालन से इंकार करने का कोई विवेक नहीं रह जाता है।
- दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 के अधीन प्रक्रिया का उद्देश्य अनावश्यक विलंब से बचना और दस्तावेज़ों के औपचारिक प्रमाण की आवश्यकता को समाप्त करके त्वरित विचारण को सुविधाजनक बनाना है, जहाँ उनकी प्रामाणिकता पर कोई विवाद नहीं है।
- तदनुसार, रिट याचिका मंजूर कर ली गई, विवादित आदेश को अपास्त कर दिया गया और विचारण न्यायालय को धारा 294 दण्ड प्रक्रिया संहिता का पालन करने का निदेश दिया गया।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330 क्या है?
बारे में:
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 330 ऐसे दस्तावेज़ प्रदान करती है जिनके औपचारिक सबूत की आवश्यकता नहीं है।
- पहले यह दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 294 के अंतर्गत आता था।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 330 के अधीन दो नए परंतुक जोड़े गए हैं।
धारा 330
- खंड (1) में कहा गया है कि जहाँ अभियोजन या अभियुक्त द्वारा किसी न्यायालय के समक्ष कोई दस्तावेज़ फाइल किया गया है वहाँ ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ की विशिष्टियां एक सूची में सम्मिलित की जाएगी और अभियोजन या अभियुक्त या अभियोजन या अभियुक्त के अधिवक्ता से, यदि कोई हों, ऐसे दस्तावेज़ों की पूर्ति करने के शीघ्र पश्चात् किसी भी दशा में ऐसी पूर्ति के पश्चात् तीस दिन के अपश्चात् ऐसे प्रत्येक दस्तावेज़ का असली होता स्वीकार या इंकार करने की अपेक्षा की जाएगी।
- परंतु न्यायालय अपने विवेक से ऐसे कारणों से जो अभिलिखित किये जाएं, समय सीमा को शिथिल कर सकेगा:
- परंतु यह और कि किसी विशेषज्ञ को न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिये जब तक नहीं बुलाया जाएगा तब तक ऐसे विशेषज्ञ की रिपोर्ट पर विचारण के किसी पक्षकार द्वारा विवाद नहीं किया जाता है।
- खंड (2) में कहा गया है कि दस्तावेज़ों की सूची ऐसे प्ररूप में होगी जो राज्य सरकार नियमों द्वारा उपबंधित कर सके।
- खंड (3) में कहा गया है कि जहाँ किसी दस्तावेज़ का असली होना विवादग्रस्त नहीं है वहाँ ऐसा दस्तावेज़ उस व्यक्ति के जिसके द्वारा उसका हस्ताक्षरित होना तात्पर्यत है. हस्ताक्षर के सबूत के बिना इस संहिता के अधीन किसी जांच विचारण या अन्य कार्यवाही में साक्ष्य में पढ़ा जा सकेगा।
- इसमें यह उपबंधित किया गया है कि न्यायालय अपने विवेकानुसार ऐसे हस्ताक्षर को साबित करने की मांग कर सकता है।
सिविल कानून
विधिक प्रतिनिधि धारा 34 के अधीन माध्यस्थम् पंचाट को चुनौती दे सकते हैं, अनुच्छेद 227 के अधीन नहीं
21-Apr-2026
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वी.के. जॉन बनाम एस. मुकनचंद बोथरा और एच.यू.एफ. (मृत) विधिक वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व और अन्य "इस न्यायालय के विचार में, किसी माध्यस्थम् पंचाट को चुनौती देने के लिये विधिक प्रतिनिधि के लिये उचित अनुतोष माध्यस्थम् अधिनियम की धारा 34 के अधीन है, न कि संविधान के अनुच्छेद 227/सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के अधीन।" न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह |
स्रोत: उच्चतम न्यायालय
चर्चा में क्यों?
उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने वी.के. जॉन बनाम एस. मुकनचंद बोथरा और एच.यू.एफ. (मृत) विधिक वारिसों द्वारा प्रतिनिधित्व और अन्य (2026) के मामले में यह निर्णय दिया कि माध्यस्थम् पंचाट से व्यथित विधिक प्रतिनिधि के लिये उचित उपचार माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अधीन आवेदन दाखिल करना है, न कि संविधान के अनुच्छेद 227 या सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 115 के अधीन याचिका। न्यायालय ने अपील खारिज कर दी और मद्रास उच्च न्यायालय के धारा 34 के अधीन उपचार का लाभ उठाने के निदेश की पुष्टि की।
वी.के. जॉन बनाम एस. मुकनचंद बोथरा और एच.यू.एफ. (मृत) एल.आर.एस. और अन्य (2026) के मामले की पृष्ठभूमि क्या थी?
- यह विवाद 2007 में अपीलकर्त्ता के चाचा अप्पू जॉन द्वारा निष्पादित एक विक्रय करार से उत्पन्न हुआ, जिनका करार पर हस्ताक्षर करने के कुछ ही समय बाद निधन हो गया।
- माध्यस्थम् की कार्यवाही शुरू की गई, लेकिन कथित तौर पर एक गलत विधिक प्रतिनिधि के विरुद्ध 2011 में पारित माध्यस्थम् पंचाट में विक्रय विलेख के निष्पादन का निदेश दिया गया।
- अपीलकर्त्ता ने एकमात्र विधिक उत्तराधिकारी होने का दावा करते हुए और नोटिस न मिलने का हवाला देते हुए संविधान के अनुच्छेद 227 के अधीन मद्रास उच्च न्यायालय में माध्यस्थम् पंचाट को चुनौती दी।
- उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और अपीलकर्त्ता को इसके बजाय माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 के अधीन उपचार अपनाने का निदेश दिया।
- अपीलकर्त्ता ने इस आदेश को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी।
न्यायालय की क्या टिप्पणियां थीं?
न्यायमूर्ति संजय करोल द्वारा लिखित एक निर्णय में न्यायालय ने निम्नलिखित प्रमुख सिद्धांतों को प्रतिपादित किया:
- माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 अपने आप में एक संपूर्ण संहिता है। इसमें किसी पक्षकार की मृत्यु होने पर माध्यस्थम् कार्यवाही के समाप्त होने का प्रावधान नहीं है।
- माध्यस्थम् अधिनियम की धारा 34 के अंतर्गत 'पक्षकार' शब्द में इसके अधीन दावा करने वाले विधिक प्रतिनिधि' भी शामिल हैं। किसी पक्षकार की मृत्यु होने पर, अधिनियम के अंतर्गत सभी प्रयोजनों के लिये विधिक प्रतिनिधि उस पक्षकार का स्थान ग्रहण कर लेते हैं।
- माध्यस्थम् अधिनियम की धारा 35 माध्यस्थम् पंचाट की अंतिम वैधता को न केवल पंचाट के पक्षकारों तक अपितु 'उनके अधीन दावा करने वाले पक्षकारों' तक भी विस्तारित करती है, जिसमें अनिवार्य रूप से विधिक प्रतिनिधि सम्मिलित होते हैं।
- धारा 34 के अधीन किसी विधिक प्रतिनिधि को पंचाट को चुनौती देने के अधिकार से वंचित करना विवाद समाधान के एक स्व-निहित संहिता के रूप में माध्यस्थम् अधिनियम के उद्देश्य को विफल कर देगा, और एक ओर तो विधिक प्रतिनिधि बिना किसी उपचार के रह जाएँगे, वहीं दूसरी ओर उन्हें पंचाट को पूरा करने के लिये उत्तरदायी बना देगा।
- माध्यस्थम् कार्यवाही में मुकदमे के पक्षकार की मृत्यु होने पर विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार समाप्त नहीं किया जा सकता है।
- ऐसी परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 227 या सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 115 का सहारा लेना अनुमेय नहीं है, क्योंकि अधिनियम स्वयं पर्याप्त और उचित उपचार प्रदान करता है।
- तदनुसार, अपील खारिज कर दी गई, उच्च न्यायालय के निष्कर्षों की पुष्टि की गई और अपीलकर्त्ता को अधिनियम की धारा 34 के अधीन पंचाट को चुनौती देने का निदेश दिया गया।
माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 34 क्या है?
धारा 34 – माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करना:
- इसका कार्य: यह माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध एकमात्र उपचार प्रदान करता है - इसे अपास्त करने के लिये आवेदन।
- अपास्त करने के आधार (धारा 34(2)):
- पक्षकार आधारित आधार:
- किसी पक्षकार की असमर्थता
- अमान्य माध्यस्थम् करार
- उचित सूचना नहीं दी गई/मामला प्रस्तुत करने में असमर्थ
- माध्यस्थम् के दायरे से बाहर का पंचाट
- अधिकरण/प्रक्रिया की अनुचित संरचना
- न्यायालय द्वारा शुरू किये गए आधार:
- विधि के अधीन विवाद का माध्यस्थम् संभव नहीं है।
- यह पंचाट भारत की लोक नीति के विपरीत है (इसमें कपट/भ्रष्टाचार, भारतीय विधि की मूलभूत नीति का उल्लंघन, या नैतिकता/न्याय की बुनियादी अवधारणाओं का उल्लंघन शामिल है)।
- घरेलू पंचाट के लिये अतिरिक्त आधार (धारा 34(2क)): पंचाट के मुख पर स्पष्ट रूप से पेटेंट अवैधता (गुणों का पुन: मूल्यांकन अनुमत नहीं है)।
- समय सीमा (धारा 34(3)): पंचाट प्राप्ति की तिथि से 3 महीने + 30 दिन की छूट (आगे कोई विस्तार नहीं) ।
- प्रक्रिया: दूसरे पक्षकार को पूर्व सूचना देना और अनुपालन का शपथपत्र देना अनिवार्य है; सूचना दिये जाने के 1 वर्ष के भीतर मामले का निपटारा किया जाना चाहिये।
भारत के संविधान का अनुच्छेद 227 क्या है?
- यह अनुच्छेद संविधान के भाग 5 के अंतर्गत निहित है, जो उच्च न्यायालय द्वारा सभी न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति से संबंधित है।
- यह प्रकट करता है की-
- खण्ड (1) में कहा गया है कि प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन सभी न्यायालयों और अधिकरणों पर अधीक्षण का अधिकार होगा जिनके संबंध में वह अधिकारिता का प्रयोग करता है।
- खंड (2) में कहा गया है कि पूर्वोक्त प्रावधान की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालय निम्नलिखित कार्य कर सकता है—
- ऐसे न्यायालयों से विवरणी मांग सकेगा।
- ऐसे न्यायालयों की पद्धति और कार्यवाहियों के विनियमन के लिये साधारण नियम और प्ररूप बना सकेगा, और निकाल सकेगा तथा विहित कर सकेगा।
- किन्हीं ऐसे न्यायालयों के अधिकारियों द्वारा रखी जाने वाली पुस्तकों, प्रविष्टियों और लेखाओं के प्ररूप विहित कर सकेगा।
- खंड (3) में कहा गया है कि उच्च्च न्यायालय उन फीसों की सारणियां भी स्थिर कर सकेगा जो ऐसे न्यायालयों के शैरिफ को तथा सभी लिपिकों और अधिकारियों को तथा उनमें विधि-व्यवसाय करने वाले अटर्नियों, अधिवक्ताओं और प्लीडरों को अनुज्ञेय होंगी।
- बशर्ते कि खंड (2) या खंड (3) के अधीन बनाए गए कोई भी नियम, विहित किये गए कोई प्ररूप या स्थिर की गई कोई सारणी, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंध के साथ असंगत नहीं होगी और इनके लिये राज्यपाल के पूर्व अनुमोदन की अपेक्षा होगी।
- खंड (4) में कहा गया है कि इस अनुच्छेद की कोई बात उच्च न्यायालय को सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि द्वारा या उसके अधीन गठित किसी न्यायालय या अधिकरण पर अधीक्षण की शक्तियां देने वाली नहीं समझी जाएगी।
